लेखक परिचय

धीरेन्‍द्र प्रताप सिंह

धीरेन्‍द्र प्रताप सिंह

उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद के बक्शा थाना क्षेत्रान्तर्गत भुतहां गांव का निवासी। जौनपुर के तिलकधारी महाविद्यालय से वर्ष 2005 में राजनीति शास्त्र से स्नात्कोत्तर तत्पश्चात जौनपुर में ही स्थित वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय से पत्रकारिता एवं जनसंचार में भी स्नात्कोत्तर की उपाधियां प्राप्‍त की। पत्रकारिता से स्नात्कोत्तर करने के दौरान वाराणसी के लोकप्रिय दैनिक समाचार पत्र आज से जुड़े रहे। उसके बाद छह महीने तक लखनऊ में रहकर दैनिक स्वतंत्र भारत के लिए काम किया। उसके बाद देश की पहली हिन्दी समाचार एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े। उसमें लगभग दो वर्षों तक मैं चीफ रिपोर्टर रहे। उसके बाद तकरीबन ग्यारह महीने दिल्ली-एनसीआर के चैनल टोटल टीवी में रन डाउन प्रोडयूसर रहे। संप्रति हिन्दुस्थान समाचार में उत्तराखंड ब्यूरो प्रमुख के तौर पर कार्य। पत्रपत्रिकाओं और वेब मीडिया पर समसामयिक लेखन भी करते रहते हैं।

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कई सौं बर्षो से देश में अमानत में खयानत बने अयोध्या विवाद पर 30 सितंबर को आए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लखनउ बेंच के फैसले ने देश की प्रगति और समाज में एकता की पैरोकारी करने वालों लोगों को इतिहास रचने और बदलने का अवसर दिया है। शायद यही कारण है िक इस मामले के एक पक्षकार रहे हासिम अंसारी ने आपसी विचार विमर्श और समझौते से हल करने की पहल की है। हालांकि वे इसमें कितने सफल होंगे ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन अपनी जवानी के स्वर्णिम दिनों को इस विवाद की आग में झोंकने वाले हासिम अंसारी की पहल को पूरा देश सराहनीय नजर से देख रहा है। आजमगढ़ के एक जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने वाले हासिम अंसारी कभी भी कट्टर मुसलमान नहीं रहे शायद यहीं कारण है कि 90 वर्ष की अवस्था में भी उन्हें अयोध्या का दर्द समझ में आ रहा है कि इस समस्या की जड़ कुछ तथाकथित मुसलमान नेताओं द्वारा रामजन्म भूमि पर मस्जिद को मान्यता दिलाने में छुपी हुई है।

इतिहास रचना के जितने भी तंत्र होते है जैसे पुरातात्विक,साहित्यिक,मौखिक सभी ने शुरू से ही अयोध्या के विवादित स्थल पर रामजन्म भूमि होने की बात को सही साबित किया। लेकिन वोट बैंक की घटिया राजनीति ने देश के सबसे बडे़ लोकतंत्र होने की आड़ में एक समुदाय विशेष का तुश्टिकरण कर उनके वोट को सत्ता की सीढ़ी बना मौज मारने की साजिश करते रहे और एक ऐसा मुद्दा जो आपसी सुलह समझौंते से बिना किसी खून खराबे के निपटाया जा सकता था को देश की सबसे खूनी जंग बना दिया।

इस जंग में जहां सत्ता लोलुपों को सत्ता की मलाई चाटने का अवसर मिला तो वहीं देश के कई हजार बेगुनाह नागरिक दो वर्गो की नफरत की ज्वाला में स्वाहा हो गए। लेकिन विवाद जस का तस बना रहा। हालांकि अगर केन्द्र की सत्ता संभालने वाले इसको हल कराने की ईमानदार कोशिश करते तो खून खराबों से बचा जा सकता था। क्यों कि जब तैमूर लंग द्वारा तोड़ा गया सोमनाथ मंदिर फिर से बनवाया जा सकता था तो विदेशी आक्रांता बाबर द्वारा रामजन्म भूमि के अपमान का प्रतीक बन चुका अयोध्या मंदिर क्यों नहीं।

इसी तरह जब केन्द्र सरकार मुसलमानों को संतुष्ट करने के लिए शाहबानों जैसी बूढ़ी महिला के साथ अन्याय करने की धृष्टता कर सकती है तो करोड़ों हिन्दुओं की आस्था के प्रतीक और प्राण भगवान श्रीराम के जन्म स्थान पर मंदिर क्यों नहीं बना सकती। खैर सत्ता लोभियों की अच्छाई और बुराई गिनाने की बजाय मैं सिर्फ विधाता द्वारा दोनों समुदायों में प्रेम और सौहार्द की नींव रखने और उसे दृढ करने के 30 सितंबर के मामले से मिले अवसर पर ही बातचीत करना चाहूंगा।

30 सितंबर को न्यायालय ने जो फैसला दिया उसे कुछ राजनीतिक दल अपने हितों के लिहाज से व्याख्यायित कर रहे है। लेकिन पूरे देश की जनता इस फैसले में इस विवाद का अंत देख रही है और शायद यही कारण है कि अब दोनों पक्षों में इस मामले को आपसी सुलह समझौते के आधार पर निपटाए जाने की कोशिशें शुरू हो गई है। क्यों कि मुसलमान भाईयों को भी इस बात का इल्म हो गया है कि उस स्थान पर उनका दावा कम से कम कानूनन तो बहुत ही कमजोर है।

सुप्रीमकोर्ट भी कोई फैसला देगा तो वह इन्हीं सुबुतों और गवाहों की बिना पर ही देगा। इसलिए सुप्रीमकोर्ट में अपनी भद्द पिटवाने की अपेक्षा सुलह समझौते से ही मामला निपटा लिये जाने में दोनों पक्षों की भलाई है। मुहम्मद हासिम अंसारी इसी बात को समझते हुए इस मामले में पहल भी कर चुके है। 90 वर्ष के हासिम अंसारी ने 60 सालों के संघर्ष के बाद यह अच्छी तरह समझ लिया है कि मुस्लिम समुदाय के नेता होने का दावा करने वाले लोग निहायत ही मतलबपरस्त और स्वार्थी है। वे इस मुद्दे का उपयोग सिर्फ मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को उत्तेजित कर उसका चुनावी लाभ लेने के लिए कर रहे है। ये मौका परस्त लोग इस मामले को कभी भी सुलझाने नहीं देना चाहते।

उनकों इस बात की चिंता है िकइस विवाद को शुरू करके उन्होंने जो गुनाह मुस्लिम समुदाय के साथ किया है उसका शायद यहीं प्रायश्चित है िक वे अपने जीते जी ही इस मामले का पटाक्षेप करवा दे। हासिम अंसारी इसलिए भी समझौते के लिए ज्यादा संक्रिय है कि उन्हें मालुम है कि 16 अक्टूबर को लखनउ में आयोजित ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में शायद ये मौका परस्त मासूम मुस्लिम नेतृत्व को गुमराह कर इस बात को मनवाने में सफल हो जाएं कि मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया जाए। उनका मानना है कि यदि ऐसा हुआ तो शायद एक बार फिर ये मामला लटक जाए।
दूसरी तरफ इस मामले का दुरूपयोग करने वाले लोग इसे किसी भी तरह से उलझाने के लिए तिकड़म लगा रहे है।
दूसरी तरफ इस मामले से गहरे जुड़ी भाजपा और आरएसएस इसे सुलझाने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। देश का अमन चैन बना रहे इसके लिए दोनों संगठनों ने 30 सितंबर स ेअब तक बिना किसी बयानबाजी के मंदिर निर्माण के लिए कोशिश कर रहे है। जैसे कि कहा जाता है कि जीत में संयत और हार में आक्रामक होना चाहिए तो दोनों संगठन इस बात को अपने पल्लू में बांध कर बहुत फूंक फूंक कर कदम रख रहे हैं। इसी का परिणाम है कि भाजपा के राश्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने भावी समस्याओें और विवाद को देखते हुए बयान दिया है कि अयोध्या में ही राम मंदिर और मुसलमानों के लिए मंस्जिद बने लेकिन मस्जिद पंचक्रोशी क्षेत्र से बाहर बने।

हालांकि कुछ लोग इनके बयान में राजनीति तलाश रहे है लेकिन समझदार जनता का मत है कि भविष्य में किसी प्रकार के विवाद से बचने के लिए गडकरी की सलाह बिल्कुल उपयुक्त और तर्कपूर्ण है। गडकरी के बयान को सकारात्मक इसलिए भी माना जा रहा है कि जहां एक तरफ समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने इस फैसले को सुबुत और कानून नहीं बल्कि आस्था के आधार पर दिया गया बयान बताकर माहौल को खराब करने की कोशिश की है तो वहीं उनका यह कथन इस विवादित मामले को एक बार फिर से विवाद को अदालत और समझौते की पंचायत से बाहर राजनीति के अखाड़े में खींच लाता है। हालांकि मुलायम के इस बयान को प्रबुद्ध मुस्लिम समुदाय ने कोई तवज्जों नहीं दी है जिससे सपा को अपनी खिसकती जमीन का बखूबी अंदाजा हो गया है।

इन सब बातों को दरकिनार कर देखा जाए तो अयोध्या मामला पूरी तरह से वोट बैंक और क्षुद्र राजनीति का मामला बन कर रह गया है। इसे जहां छद्म सेक्युलरवादियों कट्टरपंथियों ने अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला के तौर पर प्रयोग किया है वहीं इसमें अमन पंसद जनता भी दोषी साबित होती है। क्योंकि वो चुपचाप इनके तमाशे को देखती है। ऐसे में मोहम्मद हासिम अंसारी जैसे लोगों की पहल एक उम्मीद जगाती है कि शायद देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा बन चुके इस मुद्दे के आखिरी अध्याय लिखने का समय आ गया है। अगर हासिम अंसारी अपने प्रयास में सफल होते है तो भारतीय इतिहास के स्वर्णिम अध्याय में उनका नाम अमर हो जाएगा। क्यों कि एक बात सदैव याद रखनी चाहिए िकइस देश में अगर अकबर सफल हो सका तो इसका सिर्फ एकमात्र कारण उसने भारतीयता को अपने आप में समाहित कर लिया और हिन्दू बहुल इस देश की नब्ज को पकड़ते हुए सफलता की सफल कहानी लिखी।

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