लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

बाबा और अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों से हलाकान यूपीए की केंद्र सरकार अब खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे की स्थिति में है। दुर्घटना के करीब 50 घंटे बाद आए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बयान ने भी साबित कर दिया है कि वे लाचारी की हालत में हैं और उन्हें मुंह खोलने की उतनी ही इजाजत है, जितनी दस जनपथ से मिली है। इसीलिए उसमें निहत्थे व निर्दोष सत्याग्रह में भागीदारी कर रहे लोगों पर बरपाए पुलिसिया कहर को सही ठहराने का अंहकार तो प्रकट है, लेकिन राष्टीय दयित्वों के प्रति स्वाभिमान की झलक कतई नहीं है। लिहाजा वे बमुश्किल सीलबंद चुप्पी तोड़कर घटना को दुर्भाग्यपूर्ण तो कहते हैं, लेकिन सरकार के पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं था, कहकर एक गरिमाहीन व लाचार प्रधानमंत्री की स्थिति में खुद ही उजागर कर देते हैं। यह बयान भी उनका तब आया जब देश की सर्वोच्च न्यायालय ने समाचार माध्यमों में दिखाई बर्बरता से आहत होकर स्वमेव मामले को संज्ञान में लेते हुए घटना के लिए जिम्मेबार अधिकारियों को नोटिस जारी कर दिए। इसलिए यह कहना भी मुश्किल है कि उनका यह बयान देश की जनता के लिए था अथवा प्रकारांतर से सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी सूचना- पत्रों की सफाई । में अब बाबा की अकूत संपत्ति में खोट खोजने, अन्ना को सबक सिखाने और संघ का हौवा खड़ा करने की कवायद में लगी सरकार के ये भस्मासुरी उपक्रम अपने ही हाथों अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसे हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार कालाधन वापिसी का कानून और लोकपाल विधेयक का मसौदा अन्ना हजारे जैसा चाहते हैं, वैसा कठोर न बन पाए, इस नजरिये से कुटिल चालाकियां बरत रही हैं। बाबा रामदेव की अगवानी में वरिष्ठ मंत्री प्रणव मुखर्जी समेत चार मंत्री यूं ही हवाई अङ्ढे नहीं पहुंचे थे, बल्कि उनके दिमागों में सुनियोजित चालाकी का अजेंडा पहले से ही क्रियाशील था। दरअसल सरकार के चार मंत्री लाल कार्पेट बिछाकर बाबा के अभिनंदन में इसलिए पलक-पांवड़े बिछाए खड़े थे, जिससे बाबा को अतिरिक्त महत्व देकर उनका न केवल आभामण्डल फैलाया जाए, बल्कि बाबा को अन्ना के प्रतिद्वंद्वी के रुप में सरकार की मंशा के अनुरुप खड़ा किया जाए।

दरअसल ये आंदोलन जहां कांग्रेस को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं, वहीं व्यवस्था सुधार की दृष्टि से आवाज बुलंद कर रहे सामाजिक संगठन और राजनीतिक दल जिस तरह से अन्ना और रामदेव में आस्था जता रहे हैं, उससे भी कांग्रेस की घबराहट बड़ी है। अन्ना के प्रति उदारवादी, वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष संगठनों का रुख भी नरम व सहयोगी रहा है। इसलिए खासतौर से यूपीए का नेतृत्व कर रही कांग्रेस चाहती थी कि बाबा को प्रोत्साहन देकर अन्ना के प्रतिरोध में एक समानांतर आंदोलन खड़ा कर दिया जाए। और जब दोनो की शक्तियां परस्पर टकराकर क्षीण होने लगें तो दोनों को ही ठेंगा दिखा दिया जाए। लेकिन कांग्रेस की जोखिम उठाकर मोल ली गईं ये चालाकियां आखिरकार उसी पर संकट बनकर टूट पड़ी हैं। भारतीय लोकतंत्र में आंदोलन, अनशन और सत्याग्रह कोई नई बात नहीं हैं। गांधी के इन्हीं मंत्रों ने हमें दासता से मुक्त कराया। इन शांतिपूर्ण व अहिंसक आंदोलनों को हिटलरशाही तरीकों से जितना दबाने की कोशिशें की जाती हैं, ये उतनी ही बड़ी ताकत के साथ उभरते हैं। जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति इंदिरा गांधी की ऐसी ही दमनकारी मनमानियों का प्रतिफल थी। लोकतंत्र में ऐसे आंदोलन न केवल जरुरी हैं, बल्कि निरंकुश प्रशासन और बेकाबू हुए भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के लिए उनकी संवैधानिक उपादेयता भी है। ऐसे आंदोलन से एक प्रजातांत्रिक सरकार का वास्ता पड़ता ही रहता है। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वह इनसे दंभ और निरंकुशता से पेश आए और सोते हुए नीरोह आंदोलनकारियों पर लठियां व आंसू गैस के गोले बरसाकर उन्हें पंडाल से खदेड़ने पर विवश कर दे। इससे तय होता है हमारे मंत्रियों में सूझबूझ और दूरदृष्टि का सर्वथा अभाव है। अन्यथा वे इस आंदोलन को खत्म करने का पारदर्शी, समझौतावादी और अहिंसक रवैया अपनाते। क्योंकि बाबा का जारी आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण तो था ही इसके हिंसक होने की भी कोई आशंका नहीं थी। जबकि यही सरकार कश्मीर में अलगाववादी पत्थबाजों के सामने घुटने टेकती है। राजस्थान में गुर्जर और हरियाणा व पूर्वी उत्तरप्रदेश में जाट न केवल एक पखवाड़े रेल व सड़क यातायात को बाधित करते हैं, हिंसा और आगजनी का तांडव रचते हैं और दिल्ली की दिनचर्या को ध्वस्त भी कर देते हैं, बावजूद इसके केंद्र व राज्य सरकारें तमाशबीन बनी रहती हैं।

सरकार यदि थोड़ा धीरज से काम लेते हुए विवेक का परिचय देती तो बाबा के आंदोलन का पानी आप से आप उतर हो गया होता। कपिल सिब्बल ने जब बाबा के सहयोगी बालकृष्ण की डील संबंधी चिट्ठी मीडिया को जारी की थी तब यदि याद हो तो बाबा के चेहरे का जोश एकाएक ठंडा पड़ गया था। रही-सही कोर-कसर मीडिया पूरी करने लग गया था, लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकारों ने आधी रात को बाबा और उनके अनुयायिओं के साथ दरिंदगी का दुराचरण कर हालातों को एकदम उलट दिया।

इसके बावजूद कांग्रेस अपनी करतूतों पर पश्चाताप करने की बजाय बाबा के खोट खोजकर उनके चेहरे पर कालिख पोतने की साजिश रच रही है। अन्ना हजारे को भी सबक सिखाने के मूड में है। एक प्रजातांत्रिक सरकार के ये हथकंडे न केवल लोकतंत्र बल्कि संविधान विरोधी हैं। सरकार को अहसास करना चाहिए की सुप्रीम कोर्ट ने रामलीला मैदान में खेली गई रावण लीला को बेवजह संज्ञान में नहीं लिया है, लोकतंत्र, संविधान, नागरिक अधिकारों और न्याय के मूल्यों की रक्षा के दृष्टिगत ही न्यायालय ने इस क्रूर हादसे को स्वमेव निगरानी में लिया है। इस कार्यवाही की पृष्ठभूमि में न्यायालय की राजनीति में अधिनायकवादी प्रवृत्तियों और प्रशासनिक निरंकुशता को नियंत्रित करने की मंशा भी अंतर्निहित है। कांग्रेस बाबा को राष्टीय स्वयं सेवक संघ जैसी ताकतों से जोड़कर संघ परिवार का हौवा भी खड़ा करना चाहती है। जबकि कांग्रेस को अपना खुद मूल्यांकन करके सोचना चाहिए कि केरल में मुस्लिम लीग के साथ सरकार बनाकर उसने कौन-सी धर्मनिरपेक्षता की बानगी पेश की है ? बाबा और अन्ना को संघ का मुखौटा जताकर कालाधन और भ्रष्टाचार के मुद्दे बेअसर होने वाले नहीं हैं। क्योंकि जनता अच्छी तरह से जान गई है कि सरकार चालाकियां बरतने से बाज नही आ रही है। जबकि अन्ना और बाबा के साथ देश की जनता का समर्थन है और यूपीए सरकार ऐसा कोई कानून बनाना नहीं चाहती जिससे वह खुद और उसके हिमायती उस कानून के फंदे में फंसे नजर आएं। इस कानून से मुक्ति के उपायों की तलाश में सरकार बाबा को अन्ना के प्रतिद्वंद्वी के रुप में खड़ा करना चाहती थी, लेकिन उसकी चालाकी की पोल खुलते ही अब राष्टवादी ताकतें और धाराएं एक धु्रवीय होने जा रही हैं। यूपीए और कांग्रेस के लिए दमनकारी नीतियां किसी भी हालत में संकटमोचक सिध्द नहीं हो सकतीं।

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1 Comment on "बाबा रामदेव के खोट खोजने की कवायद"

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himwant
Guest

कांग्रेस बाबा को हिंदुत्व का नवावातर बना कर हिन्दू वोटों को बाटने प्रयोग कर रही है. देखे क्या होता है. यह तो समय बताएगा की भारत की सामूहिक चित्त धारा इस चुनौती को अवसर में कैसे परिवर्तित करती है.

भारत को नव क्रांती की शुभकामना.

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