लेखक परिचय

परमजीत कौर कलेर

परमजीत कौर कलेर

मैं प्रोडूयसर के तौर पर 4 रीयल न्यूज में काम कर रही हूं । फीचर लिखती हूं । प्रसार भारती दिल्ली के वूमेन सैक्शन के लिए भी लिखती हूं ।आकाशवाणी पटियाला में रिकार्ड हुए प्रोग्राम वेहड़ा शगना दा, तीआं तीज दीआं विभिन्न विषयों पर फीचर लिख सकती हूं। लिखने का है शौक पंजाब के मैगजीन समुदरों पार , चढ़दीकला पटियाला, पटियाला भास्कर, माईल स्टोन मैगजीन में प्रकाशित हुए हैं फीचर

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father dayबाबुल मेरे ने उड़ना सिखाया…बचपन में गिरते को ऊंगली पकड़कर चलना सिखाया… उनके एक उत्साह से मानो मेरे हौसले को लग गए हों पंख…मानो मैं आसमान से बातें करने के लिए हो पड़ा हूं लालयित…ऐसा उत्साह एक शख्स ही भर सकता है…सोचिए सोचिए  कौन है वो शख्स …भई अभी भी नहीं समझे…जी हां हम बात कर रहें हैं  प्यारे प्यारे पापा की…

जी हां दोस्तों जी आज है फादर्स डे …फादर यानि कि पिता  पर होता है पूरे परिवार का जिम्मा…घर का मुखिया हैड होने के नाते वो …हर डयूटी  बड़ी ही तनदेही और शिद्दत से निभातें हैं…और अपने बच्चों को भी ऐसा करने के लिए करता है प्रेरित …जी हां दोस्तों जिन्हें हम पिता ,पापा,पिता जी , डैडी , डैड के नाम से पुकारतें है…बापू जी ,पिता जी  ,पापा जी ,वालिद , डैड, डैडी  जिन्हें हम प्यार में आकर न जाने कितने लफ्जों से पुकारते हैं…ये वो शख्स हैं जो होता है परिवार का हैड ही नहीं होता …बल्कि सभी जिम्मेदारियों को निभाता है  खुशी खुशी …अपने परिवार के लिए तो जिन्हें  न सर्दी की परवाह होती है न गर्मी की …न तो उन्हें चिलचिलाती गर्मी की परवाह होती है और न ही कंपकंपाने वाली ठंड की…वो तो बस चलते जाते  है…परिवार के प्यार के लिए तो वो सारा दिन लगे रहतें हैं…कड़ी मेहनत करने में …मानो बच्चों का स्नेह पाकर मिलती है उन्हें  आत्म सन्तुष्टि…बच्चे भी अपने पिता के सिर पर करते हैं खूब मौज मस्ती और खरमस्ती……पापा  के सिर पर होती हैं फुल्ल टू ऐश…बच्चे अपने पापा का स्नेह , प्यार पाकर हो जाते हैं मंत्रमुग्ध …पिता की भी ख्वाहिश होती है कि वो अपने बच्चों की हर फरमाइश करे पूरी…बच्चे भी अपने डैड को दिलों जां से चाहते हैं …देखिए जब एक बच्चा अपने पिता के साथ मेला देखने जाता है तो पिता के साथ उसे मेले की हर चीज़ अच्छी लगती है और वो मेले से हर चीज़ खरीदने की जिद्द करता है … पिता के साथ उसे मेले की हर चीज प्यारी लगती है …मगर जैसे ही भूल से मेले में से बेटे की बाप से ऊंगली छूट जाती है तो वो रोने लगता है …अब तक जो मेले की वस्तुएं उसे अच्छी लग रही थीं …वो उसे फूटी आंख नहीं सुहाती…असल में उस बच्चे को स्वाद और आनंद अपने पिता के साथ आ रहा था और उनकी ऊंगली पकड़कर मानो उसे जन्नत का एहसास हो रहा हो।

मां बच्चे को जन्म ही नहीं देती बल्कि अपने जिगर का टुकड़ा निकाल कर बाहर रख देती है…वहीं पिता भी एक ऐसे पेड़ के समान है जो अपने बच्चों को सरंक्षण देता है…और अपने बच्चों के जीवन में आने वाले दुख सुख को उसके साथ लड़ने के लिए जज्बा और जुनून पैदा करता है…भई सच में डैड तो है बड़े ही ग्रेट…बच्चे भी अपने पिता के सिर पर भूल जाते हैं सभी  फिक्र और गम …अगर फिक्र होता है तो फादर को …बच्चों का प्यार और उन्हें खुश देखकर मानो कड़ी मेहनत करके लौटे पिता के चेहरे पर भी आ जाती है गजब सी मुस्कराहट..कभी पिता के कंधे पर झूलना तो कभी पिता से प्यार करना ….फादर यानि कि पिता अपने सभी बच्चों को एक नज़र से देखता है और उन्हें  तो अपने सभी बच्चे अज़ीज होते हैं……दुनियां के सभी डैड की तमन्ना होती है उनके बच्चे दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की करें…उनके बच्चे आसमां की बुलंदियों को छुएं…मगर एक पिता की अपनी बच्चियों  से कुछ ज्यादा ही एटेचमेंट होती है…और बच्चियां भी मानो अपने पिता के लिए दिलों जां निसार करने के लिए आतुर रहती है…अपने पिता की रहनुमाई में चलना…उनकी फितरत में शुमार होता है …बच्चों के साथ बच्चे हो जाना तो कोई इन डैड से सीखे…कभी बच्चियों  के साथ पैर से पैर मिलाकर साईकल चलाना तो कभी अपनी बच्चियों के साथ को घोड़ा बन कर मानो उन्हें मिलता है एक अलग ही सुकून और खुशी …पापा का प्यार पाकर उन्हें एक खास अनुभूति का अहसास होता है…सारे संसार के पापा चाहते हैं कि उनके बच्चे आसमां की बुलंदियों को छुए…अगर कह लिया जाए कि बच्चों के सरंक्षण और पोषण का दायित्व एक पापा के कंधों पर होता है तो कहना ज़रा भी गलत न होगा..पिता अपनी इस डयूटी को बाखूबी निभाते हैं और ये कम्र आज से ही नहीं बल्कि आदिकाल से ही चला आ रहा है….

पापा दिखने में बेशक थोड़े कठोर स्वभाव के लगते हैं …वो भी सिर्फ बच्चों के लिए…अगर शुरू में बच्चों में अपने फादर का डर या भय नहीं होगा तो वो हो जाते हैं बिगड़ैल …असल में फादर यानि पिता तो उस नारियल की तरह है जो बाहर से तो होते हैं बेहद कठोर मगर अन्दर से होते हैं बेहद नर्म ।जिनके कंधों पर बैठ कर और झूल कर हम बड़े होते हैं…पापा अपने बच्चों की हर ख्वाहिश पूरी के लिए तत्पर रहते है…वो बच्चों  की रग – रग से वाकिफ हो…उन्हें किस समय क्या चीज़ की जरूरत है …वो अपने बच्चों की जरूरत का हमेशा ही ख्याल रखते हैं… बच्चों का हौसला बढ़ाना तो कोई इनसे सीखे …अपने बच्चों में वो जुनून और ज्जबा पैदा करते है… वो अपने बच्चों के देते हैं खुशी …अपने बच्चे को हंसता खिलखिलाता देखकर तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं रहता…अगर बच्चे का चेहरा मायूस होगा तो ऐसा हरगिज नहीं होगा कि पिता को भी चैन की सांस आएंगी…वो पता लगा कर ही रहेगा कि आखिर उसके खिलखिलाते हुए बच्चे की मायूसी की वजह आखिर क्या है…उसकी उदासी को खंगालते हुए पिता अपने बच्चे से वो राज पूछेगा कि आखिर उसका बच्चा उदास क्यों है…और उसके उदासी भरे चेहरे पर हंसी के फुहारे छुड़ा कर ही दम लेते हैं…बच्चे को दुखी या बीमार  देखकर एक पिता की आंखे भी पल भर में छलक उठती हैं…यही नहीं  बच्चे के जीवन में आने वाले उतार – चढ़ाव को पिता ही  हौसले से पार करने के लिए प्रेरित करते हैं…पापा के एक हौसले पर बच्चे पा जाते हैं एक नया मुकाम…जिस पर पहुंचना नहीं है किसी के लिए आसान… पिता की एक शाबाशी कर जाती है …कुछ कर गुजरने का जज्बा और जुनून …उसी जज्बे की बदौलत …हम पा जाते हैं वो मुकाम…जिस पर पहुंचना नहीं होता आसान…मानो  हमारे हमारी उम्मीदों और आशाओं को लग जाते हैं  पंख…और हम उड़ने के लिए हो जाते हैं तैयार…जी हां ये कमाल होता है पापा की प्रेरणा का..

पिता ,डैड ,डैडी का तो हम मरते दम तक कर्ज नहीं चुका सकते…फादर की रहनुमाई में हम जिन्दगी के तमाम गम भूल जाते हैं…और मानो उनकी गोद में जाकर हमें होता है जन्नत का एहसास…पिता का दिया तो हम उम्र भर नहीं भूल  सकते… फिर इस दिवस को मनाने का मक्सद ही क्या…तो चलिए आपको बताते हैं कि इस दिवस को मनाने की शुरूआत कहां से हुई…फादर्स डे संसार के सभी पिताओं के सम्मान में मनाया जाने वाला त्यौहार है…जो सभी पिताओं के सम्मान में मनाया जाता है…फादर्स डे सारी दुनियां में अलग – 2 तारीखों में मनाया जाता है…जिसमें बच्चे अपने पिता को उपहार ,तोहफे, देते हैं और उनका आशीर्वाद पाते हैं….पिता के मुख से तो अपने बच्चों के लिए हमेशा ही दुआएं निकलती हैं…गौर करने वाली बात यह है कि पश्चिम वर्जीनिया के फेयरमोंट में 5 जुलाई 1908 में इस दिवस को मनाया गया था…कई महीने पहले 6 दिसम्बर, 1907 को मोनोंगाह,पश्चिम वर्जीनिया में एक खान दुर्घटना में मारे गए 210 पिताओं के सम्मान में इस दिवस को मनाया गया था…जिसकी शुरूआत ग्रेस गोल्डन क्लेटन ने की थी..फर्स्ट फादर्स डे चर्च आज भी सेन्ट्रल यूनाइटेड मेथोडिस्ट चर्च के नाम से फेयरमोंट में मौजूद है…1909 में स्पोकाने के सेंट्रल मेथोडिस्ट एपिस्कोपल चर्च के बिशप ने जब मदर्स डे पर उपदेश सुना तो डोड को लगा कि पिताधर्म को भी ऐसी मान्यता मिलनी चाहिए…वे अपने पिता विलियम स्मार्ट जैसे पिताओं के सम्मान में उत्सव करना चाहती थी….जो एक रिटायर्ड सैनिक थे…जिन्होंने छठे बच्चे के जन्म के समय …जब सोनोरा 16 साल की थी…अपनी पत्नी की मौत के बाद दूसरी शादी नहीं की थी…और अपने पूरे परिवार की परवरिश की थी…सोनोरा ने सुझाव दिया था कि उनके पिता का जन्म 5 जून को हुआ है इसलिए सभी पिताओं के सम्मान के लिए ये दिन तय किया जाए…पादरी इसकी तैयारी के लिए कुछ ओर वक्त चाहते थे..इसलिए 19 जून 1910 को वाय एम सी ए के युवा गुलाब का फूल लगाकर चर्च गए …लाल फूल था जिन्दा पिता के लिए …जबकि सफेद फूल था मृतक पिता के सम्मान में…डोड घोड़ा गाड़ी में बैठकर पूरे शहर में घूमी और जो पिता बीमारी होने की वजह से घर रह गए थे…उन्हें उपहार बांटे गए…और इस तरह फादर्स -डे मनाने की ये परम्परा शुरू हुई।

एक पिता के लिए तो उसके बच्चे हमेशा रहते है बच्चे ही… चाहे वो कितना भी बड़ा क्यों न हो जाएं…हर समय बच्चों को कुछ सिखाते रहना ही उनकी आदत में होता है शुमार…भई फर्ज को निभाना तो कोई इनसे सीखे ।बाबुल मेरे ने उड़ना सिखाया…साईकिल पकड़ कर हमें साईकिल चलाना सिखाया…बचपन में जब गिरते थे तो उठकर चलना सिखाया…पग- पग पर चलना सिखाया..भले बुरे की पहचान करवाई…निरउत्साहित हुए तो उत्साह देकर आगे बढ़ना सिखाया…हौसला हिम्मत देकर सफलता की ऊंचाईयों को छूना सिखाया…इसी को तो कहते हैं पापा का प्यार ….तभी तो है डैड ग्रेट और हमेशा रहेंगे भी ग्रेट…पिता , डैड, डैडी वो प्यारा सा शब्द जिस पर होती हैं कई जिम्मेदारियां…पर वो नहीं होने देता परिवार को इन  जिम्मेदारियों का अहसास…बेशक बोझ है कोई दिमाग पर …वे अपने नन्हें  बच्चों को बता कर नहीं बढ़ाना चाहते उन पर कोई बोझ…मगर क्या बच्चे भी समझते हैं अपने पिता के इस अहसास को …कई बच्चे तो ऐसे होते है जिस पिता ने अपने बच्चों  को लाड प्यार से पाला होता है…और इतने दुख, तकलीफ और मुसीबतें झेली होती है…वो बच्चे उनकी जिम्मेदारियों को भूल जाते हैं…यही नहीं जिन लाडलों ने अपने पिता के बुढ़ापे का सहारा बनना होता है…उसी बेटे को बुजुर्ग पिता को अपने घर में रखने में शर्म महसूस होती है…भई कल को आप भी तो बुजुर्ग होंगे और आपके साथ भी आपके बच्चे भी वैसा ही सलूक करेंगे जैसा आप अपने बुजुर्गों के साथ करते हैं ….वो कहते हैं न जैसा बीज बोओगे वैसा ही काटोगे…क्योंकि परिवार का प्रभाव बच्चों पर पड़ना जाहिर सी बात है…मगर  लड़कियों को अपने फादर से होता है खास लगाव.. पिता , पापा , डैड अपने बच्चों को समय समय पर नसीहतें देते रहते हैं…और उनकी रहनुमाई में चलते हुए…हम आगे बढ़ते रहते है …उनके  लिए तो हमेशा ही हम बच्चे ही रहते हैं इसलिए तो पल पल देते हैं नसीहतें…हर पल हम उनसे सीखते हैं …क्योंकि उन्हें होता है उम्र भर का तजुर्बा…इसलिए हर शख्स को अपने पिता को दिलों जां से प्यार करना चाहिए…खुश रखिए अपने फादर साहब को और खुद भी रहिए खुश…इस दिवस को एक दिन में नहीं बांध सकते हम पिता का दिया तो ताउम्र नहीं दे सकते…उनके लिए एक दिन काफी नहीं हम तो उनका कर्ज दे ही नहीं सकते…

 

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