लेखक परिचय

केशव झा

केशव झा

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साल 2016 भारतीय विदेश नीति और खासकर पाकिस्तान के साथ संबंध के हवाले से काफी तल्खी और उतार चढ़ाव वाला रहा। पिछले साल  जब प्रधानमंत्री मोदी ने अफगानिस्तान से लौटकर पाकिस्तान जाने का फैसला किया था तो इसे भारत-पाक रिश्तों के लिहाज से ऐतिहासिक फैसला माना गया। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पाकिस्तानी समकक्ष को उनके वर्षगांठ पर उनके घर जाती-उमरा, लाहौर जा कर व्यक्तिगत रूप से बधाई दी और उनकी नतनी की सगाई में भी शरीक हुए जिसे दोनों देशों के संबंध सुधारने की दिशा में एक ठोस और लीक से हटकर उठाया गया कदम माना गया।  प्रधानमंत्री मोदी का इस तरह अचानक पाकिस्तान जाने के कारण उन्हे भारत मे सदीद- तनकीद का भी सामना करना पड़ा। इसके फौरन बाद जैसा की आशंका थी पाकिस्तान इस कदम का जबाब हमले के रूप में देगा और हुआ भी ठीक ऐसा ही। पाक प्रायोजित आतंकवादियों ने भारत के पठानकोट आर्मी बेस पर हमला कर दिया जिसके कारण हमारे करीब 10 बहादुर जवानो की शहादत हुई। यह तोहफा पहली बार नहीं दिया गया था । इससे पहले भी कारगिल के रूप में पाकिस्तान ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी जी के साथ छल किया था जो उनकी लाहौर बस यात्रा के ठीक बाद हमला किया गया था । खैर पाकिस्तान से इससे ज्यादा की उम्मीद न कभी रही है और ना ही 2107 मे ज्यादा की उम्मीद की जा सकती है।

समूचा विश्व 2016 में पाकिस्तानी सियासत की जानी मानी उठापटक का गवाह बना। वहीं नवाज सरकार और सैन्य कयादत के बीच तनाव भरे रिश्ते भी वैश्विक हल्कों में चर्चा का विषय बना रहा। साल के शुरुआत में ही जहां पनामा पेपर्स से समूचे विश्व में तहलका मचा तो भला पाकिस्तान इससे कहाँ बचने वाला था। इसकी लौ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री दफ्तर तक पहुँचा और प्रधानमंत्री के दोनों पुत्र हुसैन नवाज और हसन नवाज का नाम भी इस पेपर मे सामने आया। इस पेपर में दोनों पुत्रों द्वारा अवैध तरीके से ब्रिटेन और अन्य देशों मे ज्यादाद बनाने का खुलासा किया गया। हद तो तब हो गयी जब नवाज साहब के निजी वकील सलमान बट्ट ने सूप्रीम कोर्ट में नवाज शरीफ द्वारा संसद के इकरारनामे को महज सियासी तकरीर बता दिया गया, जिसमें इन तमाम ज्यादातों के हवाले से स्पष्टीकरण दिया गया था, जिससे प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की तमाम तकरीरों और वादों की विश्वसनीयता पर ही सवालिया निशान लग गया। जिसे इमरान खान ने सियासी बढ़त के तौर पर इस्तेमाल किया । जिससे पूरा साल, पाकिस्तानी सियासत पनामा, नवाज और इमरान खान के बीच द्वंद के बीच झूलता रहा। इमरान द्वारा 30 नवम्बर को इस्लामाबाद बंद कराने की घोषणा ने तो जैसे नवाज शरीफ की साँसे रोक दी। हालांकि इसलामबंद बंद करने की फैसले को पाकिस्तानी सूप्रीम कोर्ट और तत्कालीन सेनाध्यक्ष राहील शरीफ के हस्तक्षेप के बाद टाल दिया गया। इन सब घटनाओं से और जिस तरह इमरान ने इस घटना को लपका इससे पाकिस्तानी सियासत की नाटकीय प्रवृति को ही उजागर किया। पनामा पेपर मार्च- अप्रैल का मामला है परंतु इमरान खान ने इसे छः महीने ठंडा होने दिया और सितंबर मे जाकर लामबंदी शुरू की। ज्ञातव्य हो की इमरान खान खुद को पाकिस्तान के भावी प्रधानमंत्री क तौर पर देखते हैं। इस बड़े मुद्दे को जिस तरह इमरान ने हैंडल किया उससे उनके सियासी समझ पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया है। अब तो पीपीपी के मुखिया और पाकिस्तानी सियासत के धुरंधर पूर्व राष्ट्रपति जिनपर भ्रष्टाचार के गंभीर मामले चल रहें हैं वह भी सियासी खंभ ठोकने को पाकिस्तान वापस आ चुके हैं। आसिफ अली जरदारी के आने से नवाज शरीफ को दोतरफा विरोध और संसद की नाकेबंदी का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में नवाज शरीफ को इस साल भी काम करना मुश्किल होगा। अगले साल पाकिस्तान में आम चुनाव भी होने है परंतु इस साल जल्द चुनाव के होने के आसार से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। पाकिस्तान में नए सेनाध्यक्ष की नियुक्ति देशव्यापी चर्चा और जिज्ञासा का मसला होता और हो भी ना क्यों सेनाध्यक्ष ही अप्रत्यक्ष तौर पर सरकार चलाते हैं।

ऐसे में पाकिस्तानी लोकतांत्रिक सरकार की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह खड़े होना लाज़मी है। जनरल कमर जावेद बाजवा की नियुक्ति भी कम नाटकीय नहीं रही। जनरल राहील का सेवा विस्तार और उनको फील्ड मार्शल बनाए जाने तक की चर्चा से पाकिस्तानी सियासत गर्म रहा। हालांकि जनरल राहील अवकाश प्राप्त हुए परंतु उन्हें भारत द्वारा किया गया सर्जिकल स्ट्राइक का भी सामना करना पड़ा जिससे उनका सुखद कार्यकाल और एक जाँबाज जनरल के तौर पर रिटायर होने का ख्वाब अधूरा रहा गया। वर्तमान जनरल बाजवा कश्मीर में नियुक्त रहे हैं और उन्हें काश्मीर मामले में कार्य करने का व्यापक अनुभव है और उनकी नियुक्ति भी उनकी इसी खूबी के कारण हुई है। बाजवा को 3 वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को दरकिनार कर बनाया गया है। पाकिस्तान में सेनाध्यक्ष की नियुक्ति करना प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार होता है जिसके कारण प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ को अपने समूचे तीनों कार्यकाल में कुल आठ सेनाध्यक्षों की नियुक्ति का मौका मिला है। परंतु नवाज शरीफ के संबंध हरेक जनरल से तल्ख ही रहे है और एक बारगी तो उनका तख्तापलट कर दिया गया था। उन्हें अंधेर में रखते हुये पाकिस्तान को कारगिल युद्ध में झोंक दिया गया था। पाकिस्तान अब आगे अफगानिस्तान को अपनी प्राथमिकता सूची मे रखने वाला है।

आईएसआई चीफ़ नवीद मुख्तार को अफगानिस्तान का अनुभव है। उनके बारे मे कहा जाता है की पाकिस्तानी सैन्य अकादमी से पढ़ाई के दौरान उन्होने अफगानिस्तान में पाकिस्तान की कूटनीतिक गहराई के हवाले से शोध पत्र प्रस्तुत किया था। नवीद मुख्तार को अफगानिस्तान से भारत की स्ट्राटेजिक डेप्थ को खत्म करने का काम जावेद बाजवा ने सौंपा है। पाकिस्तान, अफगानिस्तान में भारत की कूटनीतिक सफलता को स्वीकार नहीं कर पा रहा है और ना ही कभी आसानी से स्वीकार करेगा। पाकिस्तान, अफगानिस्तान को अपना पांचवा सूबा बनाना चाहता था। यह अलग बात है उससे वर्तमान चार सूबे भी संभाले नहीं जाते जहां आजादी की लड़ाई जारी है और वहाँ बड़े पैमाने पर पाकिस्तानी सैन्य अत्याचार भी होते है। हल में ही यूरोपीय संघ ने भी पाकिस्तान को बलूचिस्तान के हवाले से चेतावनी जारी किया था।

वहीं साल के आखिरी महिनों में एक समय ऐसा भी आया जब लगा की अब सैन्य तख्तापलट होने ही वाला है। पाकिस्तान की मशहूर अंग्रेजी अखबार डान में तालिबानी और अन्य आतंकी संगठनों पर कारवाई पर सरकार और आर्मी के बीच अनबन की खबर छपी थी। अखबार में सरकार और आर्मी अधिकारियों के बीच बैठक के अंदर की अन्य खबरों को भी छापा गया था जिसके बाद सरकार और सैन्य कयाद्त के बीच अनबन और अविश्वास का दौर अपने चरम पर पहुँच गया था। दोनों इदारे एक दूसरे पर खबर लीक करने का आरोप लगाने लगे, जिसके कारण रिश्ते तल्ख हुए और खबर छापने वाले पत्रकार सायरिल अलमेडिया को ईसीएल सूची मे डाल दिया गया जिसके कारण उनकी आगामी विदेश यात्राओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, जिसे भाड़ी विरोध के बाद हटा लिया गया। इस तल्खी का शिकार नवाज शरीफ के वफादार और तत्कालीन सूचना मंत्री परवेज़ रशीद भी बने जिन्हें इस खबर को ना रोक पाने के कारण उनका छुट्टी कर दिया गया।

वैसे ही पाकिस्तान के रिश्ते अमेरिका से अच्छे नहीं चल रहे हैं और तो और डोनाल्ड ट्रम्प का चुना जाना पाकिस्तान के लिए किसी झटके से कम नहीं था। पाकिस्तान ने हिलेरी को जितवाने का हरसंभव सट्टा लगाया परंतु ख्वाब थे की अधूरे रह गए। ट्रम्प के जीतने के करीब 15 दिन बाद प्रधानमंत्री शरीफ की ट्रम्प से टेलिफोनिक बातचीत हुई जिसके हवाले से पाक विदेश मंत्रालय ने उसका स्क्रिपटेड कॉपी मीडिया मे जारी किया गया जिसकी आलोचना अमेरिका मे जमकर हुई और इसे कूटनीतिक परंपरा के विपरीत बताया गया। इस घटना ने पाक की विदेश नीति का भद्द पिटवाया और साथ ही उसके कूटनीतिक समझ की साख पर बट्टा भी लगाया।

पाकिस्तान 2016 मे सार्क शिखर सम्मेलन का मेजबान देश था। पाकिस्तान को उस समय भाड़ी शर्मिंदगी और तन्हापान जैसे हालत का सामना करना पड़ा जब भारत सहित तमाम अन्य सार्क सदस्य देशों ने सार्क शिखर सम्मेलन में भाग लेने से इंकार कर दिया। इन देशों ने पाकिस्तान पर आतंकवाद द्वारा आंतरिक अस्थिरता और पाकिस्तान में सुरक्षा के हालत सही ना होने को सार्क के बहिष्कार का वजह बताया था।

पाकिस्तान को उस समय और तनहाइय का सामना करना पड़ा जब पाकिस्तान को छोड़ तमाम बिम्स्टेक देशों और म्यांमार और थाईलैंड को विशेष आमंत्रित सदस्य देश के तौर पर ब्रीक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने हेतु भारत ने गोवा में आमंत्रित किया। ये सभी देश सार्क के भी सदस्य देश थे। इन सदस्य देशों ने सीमापार प्रायोजित आतंकवाद को वैश्विक चुनौती माना और एकजुटता प्रदर्शित करते हुए ऐसी ताकतों के खिलाफ संयुक्त कारवाई पर जोर दिया। इसी साल भारत को संयुक्त राष्ट्र आम सभा की बैठक से ठीक पहले ही उरी आर्मी कैंप पर हमले में अपने 20 जवानों को खोना पड़ा। जिसके ठीक बाद भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक किया। इससे ठीक पहले नवाज शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र में खिताब करते हुए आतंकवादी बुरहान वाणी को शहीद बताया जिसकी वैश्विक आलोचना हुई और इससे पाकिस्तान के अच्छे और बुरे आतंकवादी की नीति का फिर से पर्दाफ़ाश हो गया। जवाबी तौर पर भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी पाकिस्तान को आईना दिखाया।

पाकिस्तान उस समय हिल गया जब भारत ने 1960 से बेरोक चले आ रहे सिंधु नदी समझौते की समीक्षा की बात की और अपने हक मे समझौता को रद्ध करने की चेतावनी दे डाली। भारत वर्तमान में इस समझौते के तहत कुल 20 % पानी भी नहीं इस्तेमाल कर रहा है और उसकी मांग और 50% पानी की है। पाकिस्तानी संसद ने पिछले साल मार्च में अपने हिस्से को 80 से बढ़ाकर 90 % तक की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया था और तो और वह भारत को किशनगंगा पर कोई भी विकास का परियोजना की इजाजत नहीं दे रहा है। मोदी सरकार ने भी प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव नृपेन्द्र मिश्रा के नेतृत्व में सिंधु नदी की समीक्षा हेतु टास्क फोर्स का गठन किया है। साल के आखिरी महीनों में भारत में हुए हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन भी पाकिस्तान के लिए उत्पादकता वाला नहीं रहा जहां उसे आतंकवाद के मुद्दे पर अलग थलग होना पड़ा और उसे भाड़ी फजीहत उस समय हुई जब अफगान सदर असरफ गनी ने पाकिस्तान द्वारा अफगान को उसके विकास के लिए 50 करोड़ रूपये देने के प्रस्ताव को नकार दिया और उलट उसे पाकिस्तान मे आतंकवाद को रोकने में लगाने का सलाह दे दिया।

पाकिस्तान खुद को आतंकवाद पीड़ित देश बताता है परंतु उसने ऐसी कोई कारवाई और हिम्मत नहीं दिखाया है जिससे ऐसा माना जाये की पाकिस्तान सच में आतंकवाद को अपने जमीन से खत्म करने का इच्छुक है। पाकिस्तान का दावा है उसके कुल 60 हजार नागरिक आतंकवादी हमलों में जान दे चुके हैं। 2 साल पहले पाकिस्तान के आर्मी पब्लिक स्कूल पर हुए हमले में 160 के करीब मासूम बच्चे मारे गए थे जिसके बाद ऐसा लगा था की पाकिस्तान कुछ तो कारवाई करेगा। खैर पाकिस्तान ने ज़ोर शोर से नेशनल एक्शन प्लान बनाया था जिसमें 20 सूत्री एजेंडा तय किया गया था जिसमे एक सूत्र था की पाकिस्तान से नफरत का भाषण और उकसाने वाले तत्वों पर कारवाई की जाएगी और ऐसे मदरसों की पहचान की जाएगी जो आतंकवाद की पाठ पढाते हैं।

परंतु अब भी आतंकी हाफ़िज़ सईद और लखवि बेधड़क जहर उगलता है और मशुद अजहर को बार-बार बचाया जाता है। इसी साल इमरान खान की पार्टी के नेतृत्व वाली खैबर पख्तूनख्वा सरकार ने एक जेहाद फैलाने का आरोप झेलने वाले मदरसे की फंडिंग की थी। साथ ही पाक की सरकार और सैन्य कायदत औपरेशन जर्ब-ए-अज़्ब की सफलता के दावे करते नहीं थकती है परंतु इस कारवाई को पंजाब में शुरू तक नहीं किया गया है जहां सभी आतंकवादी, उग्र जेहादी का ठिकाना है। इस कारवाई को महज कराची और स्वात क्षेत्र में किया गया है जहां से सभी आतंकवादी भाग कर पंजाब मे पनाह ले चुके हैं।

इन्हें नवाज शरीफ और शहबाज शरीफ का भी प्रश्रय प्राप्त है। पाकिस्तान से आतंकवाद के मुद्दे पर कुछ कारवाई की उम्मीद करना बेमानी है।  2016 में ही बलूचिस्तान के क्वेटा में हुए हमले मे तकरीबन 70 वकील मारे गए और वहाँ के वकीलों की एक पौध खत्म हो गयी। इस हवाले से न्यायधीश काजी फैज ईसा ने अपनी विस्तरित जांच रिपोर्ट सूप्रीम कोर्ट को सौंपा है जिसमें उन्होने पाकिस्तान के वजीर-ए-दाखला चौधरी निसार अली खान के प्रतिबंधित आतंकी संगठन के सरगनाओं से मिलने सहित प्रशासन की सोची समझी नाकामी को उजागर किया गया है। न्यायधीश ईसा सरकार के निशाने पर हैं और उन पर हमले के खतरा भी मंडरा रहा है।

वहीं ओसामा बिन लादेन के हलाकत के बाद गठित कमीशन की रिपोर्ट अभी तक बाहर नहीं आ पाया है। इस कमीशन को ओसामा के पाकिस्तान मे होने सहित अमेरिकी कारवाई और पाक सरकार को कानों कान खबर ना होने की स्थिति का पता लगाने का काम सौंपा गया था। ऐसे हालात में पाकिस्तान से उम्मीद ना करते हुए भारत को इतिहास से सीखने की जरूरत है जहां उसे आंतरिक सह बाहरी सुरक्षा को अभेद्य बनाना होगा और आतंकवाद संबन्धित अपनी नीति को जीरो टोलेरंस की नीति अपनानी होगी। भारत मे आतंकवाद के मुद्दे पर अति राजनीति होती है और आतंक के संबंध मे न्याय की प्रक्रिया काफी दुरुस्त नहीं है जिससे आतंकवादियों के हौसले बढ़ते हैं। भारत ने तो 2016 में काफी हद तक पाकिस्तान को अलग थलग करने की अपनी नीति पर सफलता पाया है परंतु 2017 उतना आसान नहीं रहने वाला जहां ट्रम्प के रूप मे अमेरिका में नयी सरकार आ रही है और रूस का पाक से नजदीकी बढ़ रहा है। चीन तो खैर पाक के लिय ईस्ट इंडिया कंपनी साबित होने वाला है।

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