लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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Kashmir-firing-PTIडा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

सुरक्षा बलों ने कश्मीर घाटी में हिज़बुल मुजाहिदीन के तथाकथित कमांडर आतंकी बुरहान बानी को आठ जुलाई को मार गिराया । बाईस साल का बुरहान पिछले छह-सात साल से घाटी में सक्रिय था । वह घाटी के स्थानीय मुसलमानों को आतंकी संगठनों में शामिल हो जाने के लिए तैयार करता था । इसके लिए अन्य साधनों के अतिरिक्त सोशल मीडिया का भी भरपूर उपयोग करता था । उस पर सरकार ने दस लाख का ईनाम भी घोषित किया हुआ था । आतंकियों के लिए वह उनका पोस्टर ब्याय था । यक़ीनन बुरहान का वर्णन करने के लिए यह शब्द मीडिया ने ही घड़ा होगा । इससे आतंक के जगत में ही किसी भी आतंकी का रुतबा बढ़ता है । क़द और रुतबा बढ़ने से दूसरे युवक भी उस ओर आकर्षित होते हैं और उससे प्रेरित होते हैं । आतंकी जगत के सूत्रधार , बुरहान बानी का इस्तेमाल इस काम के लिए भी कर रहे थे । मीडिया ने जाने अनजाने इसमें ख़ूब मदद की और अब भी कर रहा है । कुछ राजनीतिज्ञ भी हवा का रुख़ देख कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं । शेख़ अब्दुल्ला ख़ानदान के चिराग़ उमर अब्दुल्ला कश्मीर घाटी के मुसलमानों को आश्वस्त कर रहे हैं कि चिन्ता मत करो , एक बुरहान के मारे जाने से आतंक का खात्मा नहीं होगा , अनेक नए बुरहान पैदा हो जाएँगे । उधर जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में पिछले दिनों बहुत परिश्रम से मुसलमान युवकों का नया नायक जिसको तैयार किया गया था और जिसमें देश के अनेक राजनैतिक दलों ने बहुत मेहनत की थी , उस उमर ख़ालिद ने भी उमर अब्दुल्ला की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा कि एक बानी की मौत से दूसरे बानी निकलेंगे । लेकिन इस नायक को को साम्प्रदायिक न कहा जाए , इस लिए उन्होंने चे ग्वेवारा के नाम का सहारा लिया । हैदराबाद विश्वविद्यालय में भी बुरहान बानी को शहीद घोषित करते हुए बाक़ायदा शोक सभा आयोजित की । इसके कारण विद्यार्थियों में विवाद भी हुआ । जम्मू कश्मीर के एक और नेता ग़ुलाम नवी आज़ाद , जो सोनिया कांग्रेस के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं चेतावनी दे रहे थे कि तसलीमा नसरीन और तारिक फ़तह कश्मीर के मसले पर कैसे बोल रहे हैं । ग़ुलाम नवी को ग़ुस्सा था कि जब ये बोलते हैं तो वह इस्लाम की तौहीन होती है और उसे जम्मू कश्मीर के वाशिंदों भला कैसे सहन कर सकते हैं ? उनका लहजा कुछ ऐसा था कि यदि उनका वंश चलता तो वे तसलीमा नसरीन और तारिक फ़तह दोनों को ही पकड़ कर घाटी के आतंकवादियों के हवाले कर देते ।
आजकल दुनिया में यह माहौल बनता जा रहा है कि पाकिस्तान आतंक फैलाने में आधिकारिक तौर पर मदद करता है । यानि आतंक और आतंकी पाकिस्तान की राज्य नीति का हिस्सा है । पाकिस्तान की कोशिश रहती है कि इस छवि को ठीक किया जाए । इसलिए वह बुरहान की मौत पर चुप रह सकता था । लेकिन उसके चुप रहने से शायद घाटी में सक्रिय , उस द्वारा नियंत्रित आतंकियों का हौसला गिरता । इसलिए पाकिस्तान ने सारी शर्म हया त्याग कर प्रधानमंत्री के स्तर पर बुरहान बानी की मौत पर दुख व्यक्त किया । नवाज़ शरीफ़ ने बुरहान बानी की मौत पर कैबीनिट की विशेष मीटिंग बुलाई और उसमें बानी को शहीद घोषित करते हुए १९ जुलाई को पाकिस्तान में बानी की मौत के विरोध में काला दिवस मनाने की घोषणा की । नवाज शरीफ़ ने कहा कि बानी की मौत ने उन्हें बहुत बेचैन कर दिया है । एक आतंकी को किसी सरकार द्वारा दी गई राजकीय श्रद्धांजलि । ज़ाहिर है इसका संदेश घाटी में सक्रिय आतंकियों में गया होगा । कहा जा रहा है कि नवाज़ शरीफ़ पर ऐसा आचरण करने के लिए वहाँ की सेना , आई एस आई और वहाँ के आतंकवादी संगठनों का ज़बरदस्त जबाब था । हाफ़िज़ सैयद तो सार्वजनिक रुप से पाकिस्तान की सिविल सरकार के व्यवहार को नियंत्रित कर रहा था । ख़बर है कि बानी की मौत के बाद घाटी के कुछ जिलों में दंगा फ़साद करवाने के लिए पाकिस्तान सरकार की आई एस आई ने पचास साठ करोड़ रुपया हवाला के ज़रिए घाटी में पहुँचा दिया है । यह सभी जानते हैं कि आतंक का भी एक अर्थशास्त्र है । लेकिन जिनके पास आतंक का अर्थ यानि पूँजी रहती है वे समाज के भद्र पुरुष होते हैं । वे समाज में ही छिपे होते हैं , सामान्य क्रिया कलाप करते हुए । लेकिन जिनके पास आतंक की बन्दूक़ थमा दी जाती है वे समाज के मध्य या निम्न मध्य वर्ग के ही होते हैं ।
बाक़ी अपने देश के सूचीबद्ध बुद्धिजीवी तो तुरन्त सक्रिय हो ही गए हैं । उनको बुरहान की मौत में मानवाधिकारों का हनन दिखाई दे रहा है । अपनी अपनी नज़र का सवाल है । जब नज़र ही किसी की नज़रबन्द हो जाती है तो आतंकी भी पीर दिखाई देने लगता है । बुरहान बानी के मामले में यही हो रहा है । लेकिन इससे घाटी में असर पड़ता है और पड़ रहा है । बुरहान बानी की मौत के बाद कश्मीर घाटी के कुछ हिस्सों में लोग सुरक्षा बलों से भिड़ रहे हैं । पत्थरबाज़ी हो रही है और आगज़नी की जा रही है ।

बुरहान की मौत के बाद घाटी में जो पत्थर मार अभियान शुरु हुआ है , वह स्वाभाविक प्रक्रिया तो नहीं है । ये पत्थरबाज़ी में प्रशिक्षित युवा हैं । इनको इस काम के लिए बाकायदा इनको तैयार किया गया लगता है । जो लोग पत्थर मार रहे हैं , वे आतंकवाद की पूरी रणनीति का एक हिस्सा मात्र है । इस बार आतंकवादियों ने अपनी रणनीति में भी बदलाव किया है । इस बार वे सामान्य जनता को निशाना बनाने की बजाय सुरक्षा बलों को ही निशाना बना रहे हैं ।
कुछ लोग इस पत्थरबाज़ी को देख कर यह अन्दाज़ा लगा रहे हैं कि घाटी में आतंकवाद उभर ही नहीं रहा बल्कि वह सरकारी प्रशासन पर भारी भी पड़ रहा है । इस पत्थरबाज़ी में ३४ लोग मारे जा चुके हैं । सुरक्षाबलों के अनेक लोग घायल हुए हैं । दरअसल इन दिनों के आसपास आतंकवादी , पाकिस्तान की योजना के अनुसार हर साल घाटी के हालात ख़राब करने की कोशिश करते हैं । ये अमरनाथ यात्रा के दिन हैं । लाखों यात्री देश के हर हिस्से से कश्मीर घाटी में अमरनाथ के दर्शनों के लिए पहुँचते हैं । उसमें ख़लल डालना उद्देष्य होता है । उस ख़लल की कथाएँ इन यात्रियों के माध्यम से देश के हर हिस्से में पहुँचाई जा सकती हैं । आगे आने वाले दिनों में मौसम बदल जायेगा और बर्फ़बारी के कारण घुसपैठ के रास्ते बन्द हो जायेंगे । इसलिए इन्हीं दिनों घुसपैठ करवाना लाज़िमी है । कश्मीर घाटी में आतंकी एक नारा देते हैं- मक्की हमारी, बर्फ़ तुम्हारी । अभी मक्की की ऊँची फसल के खेतों में आतंकियों के लिए पर्याप्त अवसर हैं । इसलिए इस मौसम को आतंकी अपने लिए लाभदायक मानते हैं । बर्फ़ के दिनों में घुसपैठ करना कठिन हो जायेगा और सुरक्षाबल भारी पड़ेंगे । इसलिए जो करना होगा अभी करना होगा । और वह किया जा रहा है ।
जम्मू कश्मीर में लोक सभा , बाद में विधान सभा के लिए हुए चुनावों ने भी वहाँ के वातावरण को बदला है । लेकिन यह बदला हुआ वातावरण ही पाकिस्तान और आतंकवादी संगठनों की आँख की किरकिरी है । कुछ दिन पहले अनन्तनाग की विधान सभा सीट के लिए पी डी पी की महबूबा मुफ़्ती का चुन लिए जाना भी आतंकवादी संगठनों के लिए चुनौती बन गया था । यह सीट उनके पिता मुफ़्ती मोहम्मद की मौत के कारण रिक्त हुई थी । वैसे तो किसी राज्य के मुख्यमंत्री का किसी विधान सभा सीट के लिए उपचुनाव में जीत जाना बड़ी ख़बर नहीं है । लेकिन महबूबा की जीत की ख़बर केवल ख़बर नहीं बनी बल्कि वह महाख़बर बन गई । यहाँ तक की पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी इस चुनाव में खासी रुचि दिखाई जा रही थी । यह जान लेना भी जरुरी है कि आतंकवादियों ने इस चुनाव का बायकाट करने का आदेश जारी किया था और इश्चहार लगा कर , मतदान करने वालों को सबक़ सिखा देने की धमकी दी हुई थी । आतंकवादियों द्वारा यह धमकी देने का एक ही अर्थ निकाला जा सकता है कि वे प्रदेश की आम जनता से कट गए हैं और अब केवल बंदूक़ के बल पर अपना दबदबा बनाए रखना चाहते हैं । इस धमकी के बावजूद चौंतीस प्रतिशत मतदान हुआ जो घाटी की हालत देखते हुए केवल संतोषजनक ही नहीं बल्कि उत्साह वर्धक भी कहा जा सकता है ।
दरअसल यह मतदान पीडीपी-भाजपा गठबंधन को लेकर किया गया जनमत संग्रह भी कहा जा सकता है । ऐसा प्रचार काफ़ी देर से किया जा रहा है कि कश्मीर का आम आदमी , पीडीपी से नाराज़ हो गया है क्योंकि उसने सत्ता में बने रहने की ख़ातिर भारतीय जनता पार्टी से समझौता कर लिया है । घाटी में यह प्रचारित किया जा रहा था कि भाजपा मुस्लिम विरोधी पार्टी है । आम चुनाव में जनता ने प्रदेश में भाजपा को सत्ता के रास्ते से दूर रखने के लिए पीडीपी को जिताया था । लेकिन पार्टी ने तो उस जनादेश के विपरीत जाकर भारतीय जनता पार्टी के साथ ही मिल कर सत्ता में भागीदारी निश्चित कर ली । कहा जा रहा था कि घाटी के कश्मीरी मुसलमान पीडीपी के इस विश्वासघात से सख़्त ख़फ़ा हैं और वे महबूबा मुफ़्ती को सबक़ सिखाने के लिए वेकरार है । पीडीपी से मुसलमानों की नाराज़गी का यह तथाकथित ख़ौफ़ इतना घर कर गया था कि पार्टी के भीतर भी महबूबा मुफ़्ती के कुछ शुभचिन्तकों ने उन्हें यह चुनाव न लड़ कर विधान परिषद में मनोनयन के सुरक्षित विकल्प को अपनाने की सलाह दी । इसे महबूबा की दिलेरी ही कहा जाएगा कि उसने एक मुझे हुए राजनीतिज्ञ की तरह पीडीपी-भाजपा गठबंधन का निर्णय प्रदेश की आम जनता से ही करवाने का निर्णय किया । वे चुनाव में स्वयं उम्मीदवार बनीं । इसलिए इस चुनाव में महबूबा मुफ़्ती का भविष्य ही दाँव पर नहीं लगा हुआ था बल्कि आतंकवादियों और नैशनल कान्फ्रेंस दोनों की ही साख भी दाँव पर लगी हुई थी । आतंकवादियों की साख तो जनता ने ३४ प्रतिशत मतदान करके मिट्टी में मिला दी । उपचुनावों में सामान्य से कम ही मतदान देखने को आता है । लेकिन चुनाव वाले दिन ख़राब मौसम के बावजूद ३४ प्रतिशत मतदान एक प्रकार से जनता की अदालत में आतंकवादियों की हार ही मानी जाएगी ।
नैशनल कान्फ्रेंस को भी इस चुनाव से बहुत आशा थी । फारुख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला , बाप-बेटे की जोड़ी को लगता था कि जनता पीडीपी के इस तथाकथित विश्वासघात से क्रोधित होकर उसके पास चली आयेगी । यही कारण था कि बाप बेटे की इस जोड़ी ने चुनाव में धुंयाधार प्रचार किया था । इसलिए इस चुनाव के परिणाम की ओर सभी की आँखें लगी हुई थीं । लेकिन चुनाव परिणामों में महबूबा मुफ़्ती की जीत ने सभी की ग़लतफ़हमी दूर कर दी । इस चुनाव से इतना तो ज़ाहिर है कि रियासत का आम आदमी अपने यहाँ अमन चैन चाहता है । वह अपने नेताओं का चुनाव ख़ुद करना चाहता है । आतंकवादी प्रदेश की आम जनता को यह अधिकार देना नहीं चाहते । वे बंदूक़ के बल पर आम जनता को बंधक बना कर रखना चाहते हैं । यदि जनता को विश्वास हो जाए कि बंदूक़ का डर समाप्त हो गया है तो वह अपने मत की अभिव्यक्ति करती है । अनन्तनाग की जनता ने तो बंदूक़ का भय होते हुए भी अपने मत की निष्पक्ष अभिव्यक्ति की है । महबूबा बारह हज़ार के भी ज़्यादा अन्तर से अपने निकटतम प्रतिद्वन्द्वी को पराजित कर विधान सभा के लिए चुन ली गईं । नैशनल कान्फ्रेंस के प्रत्याशी को तो कुल मिला कर दो हज़ार वोटों के आसपास ही संतोष करना पडा । दिल्ली में बैठे तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया को इसीलिए हैरानी होती है कि इतनी बड़ी तादाद में मतदाता मतदान केन्द्रों पर क्यों आए ? यदि आए भी तो उन्होंने महबूबा मुफ़्ती को वोट कैसे डाल दिए क्योंकि इस राष्ट्रीय मीडिया के अनुसार तो घाटी के सारे मुसलमानों ने महबूबा की पार्टी को इस्लाम विरोधी घोषित कर रखा है । महबूबा मुफ़्ती की जीत ने यह भी सावित कर दिया है कि दिल्ली में बैठ कर कश्मीरियों के मन को सही सही पढ़ लेने के तथाकथित विशेषज्ञ ज़मीनी सच्चाई से कितनी दूर हैं ।

आतंकवादियों की निराशा इसी से झलकती है कि उन्होंने चुनाव परिणाम निकलने के कुछ घंटे बाद ही सुरक्षा बलों पर आक्रमण कर दिया । यह महबूबा मुफ़्ती का बढ़ा हुआ आत्मविश्वास ही था कि वे उन सुरक्षा कर्मियों को श्रद्धांजलि अर्पित स्वयं गईं और उन्होंने स्पष्ट कहा भी कि जिन लोगों ने आक्रमण किया है वे राज्य के हितों से खिलवाड़ तो कर ही रहे हैं साथ ही वे इस्लाम के नाम पर भी कलंक हैं । ऐसी हिम्मत इससे पहले किसी मुख्यमंत्री की नहीं हुई । कुल मिला कर पहल आतंकवादियों के हाथ से निकल कर प्रदेश की आम जनता के हाथ में आ रही थी । यह स्थिति न पाकिस्तान को और न ही आतंकवादी संगठनों को चैन से बैठने दे रही थी । बुरहान बानी की मौत ने इन दोनों को एक अवसर प्रदान कर दिया जिसके बलबूते वे घाटी में एक बार फिर अराजकता फैला सकते हैं । उमर अब्दुल्ला उस हार का बदला बुरहान की प्रशंसा करके ले रहे हैं । पाकिस्तान उसको स्वतंत्रता सेनानी बता कर ले रहा है । आतंकी आम आदमी की ३४ लाशों पर अपनी आगे की रणनीति बना रहा है ।
लेकिन एक प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है । यदि आम आदमी आतंकवादियों के साथ नहीं है तो बुरहान बानी की मौत के विरोध में स्थान स्थान पर इतनी ज़्यादा संख्या में आम लोग सड़कों पर कैसे निकल आए हैं ? ख़ासकर तब जब सुरक्षा बलों की गोली का शिकार हो जाने का भी ख़तरा हो ? कश्मीर घाटी में प्रदर्शनों हेतु भीड़ जुटाने का एक तंत्र बहुत अच्छे ढंग से विकसित हो चुका है । जमायत-ए-इस्लामी का नैटवर्क पूरी घाटी में अच्छी तरह फैला हुआ है । गाँव तक ही नहीं बल्कि मुहल्ले तक भी । प्रत्येक जगह इस संगठन के इन्चार्ज तैनात है । लेकिन यह काम बिना पैसे के नहीं हो सकता । इसीलिए बुरहान बानी की मौत के मौक़े पर आगे की कार्यवाही के लिए पाकिस्तान के संगठनों को आनन फ़ानन में साठ सत्तर करोड़ रुपया झोंकने की जरुरत घाटी में पडी । गाँव तक इन इन्चार्जों के माध्यम से संदेश पहुँचाया जाता है कि इस दिन इतने बजे इस गाँव से इतने लोग विरोध प्रदर्शन में आने चाहिए । जिस घर से कोई नहीं जाता , उसका विवरण ऊपर पहुँच जायेगा , यह गाँव में सभी जानते हैं और शहरी मुहल्लों में भी । ऊपर नाम पहुँच जाने का अर्थ क्या होता है , यह घाटी में सभी जानते हैं । इस नैटवर्क से विरोध प्रियदर्शन में हज़ारों की भीड़ जुटती है । ध्यान रहे , जमायते इस्लामी का नैटवर्क घाटी में फैलाने में शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला ने अपने मुख्यमंत्रित्व के अंतिम शासन काल में बहुत सहायता की थी । लेकिन जो पत्थर मारते हैं , उसका इस भीड़ से कोंई ताल्लुक़ नहीं है । उसका एक दूसरा अपना नैटवर्क है । यह नैटवर्क बच्चों के हाथ में पत्थर देता है । लेकिन इस पूरी प्रकिया में दायाँ हाथ क्या कर रहा है , यह बाँए हाथ को भी पता नहीं होता । पत्थर मारने वालों का काम सुरक्षा बलों को ज़्यादा से ज़्यादा ललकारने का होता है । इस पूरी प्रक्रिया में जो सिविलियन मारे जाते हैं , उनकी लाशें लम्बे अरसे तक लोगों को भड़काने के काम आती हैं । ज़ाहिर है कि यह सब कुछ आतंकवादी संगठनों के भूमिगत और भूमि के उपर की ईकाइयां मिल कर करती हैं ।
और जहाँ तक सुरक्षा बलों का प्रश्न है , राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने जम्मू कश्मीर सरकार को नोटिस भेज ही दिया है कि राज्य में आम लोगों के मानवाधिकारों का हनन हो रहा है ।

लेकिन इस सब के बावजूद , यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि आतंकवादी भारी पड़ रहे हैं । वे घाटी में एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं । पाकिस्तान किसी भी तरह घाटी में आतंकवादियों का और हुर्रियत कान्फ्रेंस का उत्साह बनाए रखना चाहता है । बुरहान बानी की मौत के बाद घाटी के एक हिस्से में जो हो रहा है , वह इसी रणनीति में से उपजा है । यह आतंकवादियों के अंडरग्राऊंड और अप्परग्राऊंड नैटवर्क का करिश्मा है न कि कि आम जनता के स्वतंत्र मन की अभिव्यक्ति । लेकिन एक बात पक्की है यह आतंकियों की निराशा से उपजी जो पत्थरबाज़ी है , वह सफल नहीं हो सकती है । प्रश्न इस नैटवर्क को तोड़ने का है , लेकिन यदि यह टूटता है तो एक पूरी जमात का करोड़ों का आतंकवादी व्यवसाय समाप्त हो जायेगा , इसे महबूबा मुफ़्ती से बेहतर और कौन जान सकता है । इसलिए इसे तोड़ने की पहल भी उसे ही करनी होगी ।

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