लेखक परिचय

प्रो. एस. के. सिंह

प्रो. एस. के. सिंह

प्रो. एस. के. सिंह प्राध्यापक, वाणिज्य जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर

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villagesशारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, आत्मिक विकास के साथ राष्ट्रीय भावना जागृत करना एवं जीवन-यापन के लिये रोजगार के साधन उपलब्ध करवाना शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य माने गये हैं, लेकिन वर्तमान भौतिकवादी युग में शिक्षा अपने मूल उद्देश्यों से भटक गई है, एवं यह सिर्फ रोजगार प्राप्त करने का साधन मात्र बनकर रह गई है। स्कूलों, काॅलेजों एवं विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले लाखों छात्रों के अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य सिर्फ रोजगार प्राप्त करना ही रह गया है। शिक्षा के इन बदलते आयामों के कारण ‘पैकेज‘ को सफलता का आधार एवं अन्तिम लक्ष्य माना जाने लगा है। ‘नैसर्गिक प्रतिभा‘ का आकलन करने की अक्षमता एवं उसकी उपेक्षा के कारण ‘रट्टू तोताओं‘ को प्रतिभाशाली माना जा रहा है। शिक्षा, सीखने एवं ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम बनने की जगह निजी स्वार्थसिद्वि एवं धन इकट्ठा करने का एक औजार बन गई है। इन बदलती हुई परिस्थतियों के लिये वे नीतियाँ जिम्मेदार हैं, जिनके कारण अंग्रेजों के जाने के बाद भी हिन्दुस्तान में अंग्रेजी न जानने वाले व्यक्ति को हीनभावना से ग्रसित होने के लिए मजबूर कर दिया गया है। कितनी बड़ी विडम्बना है कि हमारे न्यायालयों की कार्यवाही अभी भी पूरी तरह से हिन्दी एवं प्रादेशिक भाषाओं में नहीं हो रही है। कई क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें हम अभी तक कोई भी बड़ा आवश्यक बदलाव नहीं कर पाये हैं, एवं उन्हें उसी रूप में ओढ़े हुए हैं, जैसे वे स्वतंत्रता के पहले थे।
प्ले-ग्रुप, नर्सरी, एलकेजी जैसी छोटी कक्षाओं के बच्चों को स्कूल आते-जाते देखने मात्र से ही उन पर होने वाली हिन्सा एवं अत्याचार का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। भले ही ‘बचपन बचाओ आन्दोलन‘ के जनक कैलाश सत्यार्थी को बाल-मजदूरी के विरोध में काम करने के लिये नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया हो, लेकिन इस हकीकत को नकारा नहीं जा सकता है कि छोटे बच्चों को बलपूर्वक नींद से जगाना बहुत बड़ा अपराध है एवं इसे घरेलू हिन्सा में शामिल किया जाना चाहिए। कम उम्र के बच्चों को स्कूल भेजने पर स्कूल संचालक के साथ-साथ अभिभावकों से भी पूछताछ होनी चाहिए। जब शुरू में ही बच्चे का शारीरिक एवं मानसिक विकास नहीं हो पायेगा, अर्थात् उसकी नींव कमजोर हो जायेगी, उसके बाद उससे संवेदनशील होने की अपेक्षा रखना उचित नहीं है। फिनलैण्ड की शिक्षा व्यवस्था को दुनिया की बेहतरीन शिक्षा व्यवस्था माना जाता है, वहां पर बच्चे छह साल के बाद स्कूल में दाखिला लेते हैं।
‘प्रायमरी-शिक्षा‘ में आमूल-चूल परिवर्तन किये बिना देश की शिक्षा व्यवस्था को नहीं सुधारा जा सकता है। शुरूआती कक्षाओं में पढ़ाने वाले शिक्षकों को महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वाले प्रोफेसरों जैसी सुविधायें एवं वेतन मिलना चाहिए, तथा इन शिक्षकों का प्रमुख उद्देश्य बच्चों को संस्कारवान, नैतिक एवं चारित्रिक रूप से मजबूत बनाकर शिक्षा के वास्तविक उद्देश्यों से परिचित कराना होना चाहिए। प्राइमरी कक्षाओं में शिक्षकों की योग्यता मापने का सिर्फ एक पैमाना होना चाहिए, कि बच्चे उनसे डरें नहीं, छोटे बच्चे का स्कूल जाने से डरना हमारी शिक्षा व्यवस्था पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है। शुरूआती कक्षाओं में बच्चों को समझाने के साथ-साथ उन्हें समझने का भी प्रयास करना चाहिए। यदि हमारे राजनेता एवं नौकरशाह अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने लगें तो निश्चित रूप से देश की शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है।
हमें सफलता, मूल्यांकन एवं आकलन के वर्तमान आधारों पर पुनर्विचार करना होगा। हमारे मूल्यांकन की इससे बड़ी विसंगति और क्या हो सकती है कि जिन्होंने कभी गाॅव नहीं देखा, जो कभी गाॅव में नहीं रहे, वे ‘ग्रामीण विकास‘ एवं ‘गाॅव‘ के बारे में अधिकारपूर्वक लिख रहे हैं, एवं बड़ी-बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल कर रहे हैं। मूल्यांकन का आधार त्रुटिपूर्ण होने के कारण लोक-सेवक के रूप में अधिकतर ऐसे लोग चयनित हो रहे हैं, जिन्हें देखने पर अंग्रेजों की याद ताजा हो जाती है। जिस व्यक्ति की थानेदार बनने में रूचि हो, उसे शिक्षक का दायित्व दे दें तथा जो शिक्षक बनना चाहता हो उसे थानेदार बना दें, तो दोनों ही अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन सही ढंग से नहीं कर पायेंगे। यदि सरकारी कर्मचारी गलत काम करते हैं तो उनके साथ-साथ इन्हें चयन करने वाली संस्थाओं एवं व्यक्तियों को चिन्हित कर इनके खिलाफ भी कार्यवाही होनी चाहिए। कितने आश्चर्य की बात है कि लोक-सेवक बनकर गाॅव का विकास करने के लिये शहरों में कोचिंग सेन्टरों के माध्यम से प्रशिक्षण दिया जा रहा है। गाॅवों के विकास के लिये हमारे लोक-सेवकों एवं राजनेताओं को गाॅव में ही रहना होगा।
गाॅवों को आत्मनिर्भर न बना पाने के कारण गाॅव से शहरों की ओर पलायन बहुत तीव्र गति से जारी है। यदि इसी गति से यह पलायन जारी रहा तो आने वाले समय में गाॅव में खेती करने वाले लोग नहीं बचेंगे। संयुक्त परिवार टूटने के बाद अब स्थिति यहां तक आ गई है कि बच्चों की शिक्षा के कारण पति और पत्नी भी अलग रहने के लिये मजबूर हो गये हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में नौकरी करने वाले लोग अपने छोटे बच्चों को शहरों में अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, इसलिए पत्नी और बच्चे शहरों में एवं खुद दूसरी जगह रहने के लिये मजबूर हैं। लेकिन इन अभिभावकों को शायद यह एहसास नहीं है कि जिस अंग्रेजी माध्यम शिक्षा के लिये वे अपना सब कुछ दाॅव पर लगा रहे हैं उसको ग्रहण करने के बाद यह बच्चे कभी भी उनके बुढ़ापे का सहारा नहीं बन सकते हैं, क्योंकि इन अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की वरीयता संस्कार, नैतिक एवं चारित्रिक मूल्य नहीं है। सीखने के लिये पे्ररित करने की बजाय ये स्कूल बचपन से ही बच्चों को ‘प्रतिस्पर्धी‘ एवं ‘रट्टू तोता‘ बनाने का प्रशिक्षण देते हैं। इनकी सफलता के पैमाने भारतीय संस्कृति से मेल नहीं खाते हैं। पहले बच्चे अपने गाॅव के आस-पास के स्कूलों में ही पढ़ाई करते थे तथा उच्च शिक्षा के लिये गाॅव से बाहर निकलते थे, लेकिन आज अंगे्रजी माध्यम स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने की होड़ के कारण कोई भी गाॅव में रहने के लिये तैयार नहीं है।
शिक्षा में निजीकरण को लेकर गहन विचार-विमर्श की आवश्यकता है। उद्देश्यों एवं छात्रों की पृष्ठभूमि में अन्तर होने के कारण सरकारी एवं निजी शिक्षण संस्थानों की तुलना न्याय-संगत नहीं है। शिक्षा में यदि निजीकरण का लाभ गाॅव तक नहीं पहुंच पा रहा है तो हमें इस व्यवस्था पर पुनर्विचार करना चाहिए। इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि शिक्षा में निजीकरण उचित है अथवा नहीं। निजी शिक्षण संस्थाओं को संचालित करने वाले व्यक्तियों की पूर्व पृष्ठभूमि का भी पूरी तरह से अध्ययन किया जाना चाहिए, उसके बाद ही नैतिक एवं चारित्रिक रूप से सुदृढ़ तथा शिक्षा में स्वाभाविक रूचि रखने वाले व्यक्तियों को प्राथमिकता के आधार पर शिक्षण संस्थानों को चलाने की अनुमति प्रदान करनी चाहिए। यदि कोई आपराधिक एवं संदिग्ध पृष्ठभूमि के व्यक्ति निजी शिक्षण संस्थानों से जुड़े हुए हैं तो उन्हें तुरन्त उन संस्थानों से दूर किया जाना चाहिए। स्वतंत्रता के पश्चात् जिस तेजी से मानवीय एवं नैतिक मूल्यों का पतन हुआ है उसने सभी को झकझोर कर रख दिया है।
संवेदनहीन, भावविहीन एवं ज्ञान का प्रयोग व्यक्तिगत लाभ के लिए करने वाले युवाओं को संवेदनशील जिम्मेदारियों से दूर रखना होगा। संवेदनशील, भाव-प्रधान एवं देशभक्ति तथा समाजसेवा में स्वाभाविक रूचि रखने वाले युवाओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देनी होंगी। अब आकलन का आधार बदलना होगा। स्वतंत्रता के पश्चात् निर्धारित मानदण्डों पर भी पुनर्विचार की आवश्यकता है। सिर्फ सूचनाओं को आधार मानकर सफलता एवं असफलता का निर्धारण करना अब हमें बन्द करना होगा। हमें अपनी श्रेष्ठ प्रतिभाओं को गाॅवों में भेजना होगा। यदि हम प्रतिभा-सम्पन्न युवाओं को गाॅवों में भेजने में असफल रहते हैं तो गाॅव एवं शहरों का अन्तर दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जायेगा। इसके साथ ही शिक्षा से संबंधित नीतियों का निर्माण एवं मानदण्ड, योग्य, अनुभवी, चारित्रिक एवं नैतिक रूप से मजबूत व्यक्तियों द्वारा निर्धारित किये जाने चाहिए।
शिक्षकों की चयन प्रक्रिया में भी ‘आमूल-चूल‘ परिवर्तन की आवश्यकता है। अकादमिक आधार (डिग्री) के साथ-साथ महत्वपूर्ण मानवीय गुणों को भी महत्व देना चाहिए। शिक्षकों के चयन में मनुष्य द्वारा विकसित गुणों के साथ-साथ प्रकृति प्रदत्त गुणों एवं मानवीय मूल्यों को भी तरजीह मिलनी चाहिए। जिनके लिए शिक्षा एवं ज्ञान सिर्फ रोजगार प्राप्त करने का एक साधन मात्र है, ऐसे लोगों को शिक्षक नहीं होना चाहिए। शिक्षक बनने के जिन वर्तमान मानदण्डों पर ‘तुलसी‘ और ‘कबीर‘ जैसे अद्भुत एवं विलक्षण प्रतिभा के धनी महापुरूष भी खरे नहीं उतर रहे हों तो यह नितान्त आवश्यक है कि हम शिक्षा, शिक्षा के उद्देश्य एवं शिक्षकों की चयन प्रक्रिया पर पुनर्विचार करें एवं ऐसी व्यवस्था लागू करने का प्रयास करें जिससे देश में उपलब्ध विशेष योग्यता एवं प्रतिभा सम्पन्न युवा शिक्षक बनने को अपनी पहली वरीयता देने लगें। इसके साथ ही इस तरह की व्यवस्था पर भी विचार किया जा सकता है, जिसमें समाज के विभिन्न क्षेत्रों में एक आदर्श शिक्षक की तरह अपना दायित्व निभाने वाले व्यक्तियों को एक शिक्षक के रूप में मान्यता दी जा सके। हमारी शिक्षा से संबंधित नीतियां इस तरह की होनी चाहिए जिसमें शिक्षक को ‘चिन्तन‘ के लिए पर्याप्त समय मिल सके। ‘चिन्तन‘ के लिए समय न मिलना एवं इसके महत्व को नकारना हमारी शिक्षा व्यवस्था की बहुत बड़ी खामी है। मनुष्य से मशीन जैसी अपेक्षायें मनुष्य के अनमोल प्रकृति-जन्य एवं मूल भावों को खत्म कर देंगी। गूगल में शिक्षकों का विकल्प ढूंढने के परिणाम बहुत ही भयावह होंगे।
उच्च शिक्षा में तीन प्रमुख कार्य करने होते हैं – शिक्षण, शोध तथा अकादमिक प्रशासन। किसी भी शिक्षक का समान रूप से इन तीनों पर अधिकार होना आसान कार्य नहीं है। किसी की शिक्षण में अधिक रूचि होगी तो किसी की शोध में तथा किसी में अकादमिक प्रशासनिक दायित्वों को अच्छी तरह निभाने की क्षमता होगी। ए0पी0आई0 (अकादमिक कार्य निष्पादन सूचक) व्यवस्था के माध्यम से सभी को एक जैसा बनाने का प्रयास किया जा रहा है। जिसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि शिक्षक अपनी अभिरूचि वाला क्षेत्र मजबूत करने के बजाय जिसमें वह कमजोर है उसमें अधिक समय दे रहा है, क्योंकि नियुक्ति तथा प्रमोशन में उसे इन तीनों में अपनी दक्षता प्रदर्शित करनी होगी। ए0पी0आई0 व्यवस्था लागू होने के बाद देश में जिस तादात में रिसर्च जर्नल्स एवं पुस्तकों का प्रकाशन तथा शोध-संगाष्ठियों एवं सेमीनारों का आयोजन हो रहा है, इसके आधार पर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उच्च शिक्षा में हम कितनी गुणवत्ता रख पा रहे होंगे। सिर्फ कुछ केन्द्रीय विश्वविद्यालय तथा चुनिन्दा संस्थान देश में उच्च शिक्षा की स्थिति का सही प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। उच्च शिक्षा की रीढ़ कहे जाने वाले राज्य विश्वविद्यालयों की स्थिति के आधार पर ही उच्च शिक्षा की वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2016’ के लिये समाज के लगभग सभी वर्गो से सुझाव मांगे जा रहे हैं। शिक्षा में निजीकरण, स्वायत्तता, ग्रामीण भारत को ध्यान में रखना, बचपन को बचाना एवं अंग्रेजी के आभा-मण्डल से बचना ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2016’ के लिए सबसे बड़ी चुनौतियां होंगी। अब देखना यह है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय इन चुनौतियों का सामना किस तरह से करता है।

 

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