लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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malala and satyarthi
प्रमोद भार्गव
समाजसेवी कैलाश सत्यार्थी को मिला नोबेल शान्ति पुरूस्कार वास्तव में बालश्रम के शिकार बच्चों के अभिभावक का सम्मान है। किसी भारतीय को पहली बार नोबेल शान्ति के लिए चुना गया है। हालांकि इसके पहले हकदार महात्मा गांधी थे। कैलाश पिछले 34 साल से ‘बचपन बाचाओ आंदोलन‘के जरिए बाल अधिकारों के सरंक्षण में लगे हैं। कैलाश करीब 83 हजार बच्चों को बाल श्रमिक,बाल बंधुआ और बाल अपराधी बने रहने के अभिशाप से उबार कर उन्हें मानवीय सरोकारों और शिक्षा से जोड़कर काबिल इंसान बनाने का अभूतपूर्व काम कर चुके हैं। महिला शिक्षा के लिए आतंकी चरमपंथियों से लड़ रही पाकिस्तानी किशोरी मलाला युसूफजई के साथ कैलाश को यह साझा सम्मान तब मिला है,जब भारत में देशी-विदेशी पूंजी निवेशकों को लालायित करने की दृष्टि से ऐसे श्रम कानूनों में ढील दी जा रही हैं,जो कारखानों में बाल-श्रमिकों को काम करने से रोकते हैं। उम्मीद नहीं है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस विश्वव्यापी पहचान दिलाने वाले पुरूस्कार के सम्मान में ऐसे कानून और मजबूत बनाने को मजबूर होगी,जिससे किसी भी हाल में बच्चे कारखानों में काम न करने पाएं।
अपने संकल्प की निरंतरता बनाए रखने के लिए कैलाश ने जानलेवा जोखिम उठाते हुए बाल-कल्याण की लंबी पारी खेली है। जितने बच्चों को अपराध मुक्त जीवन देकर उन्होंने इंसान बनाने का काम किया है,इतना काम देश कि किसी भी बाल कल्याणकारी योजना ने किया हो,मुमकिन नहीं है। हां,योजनाओं का पैसा हजम करके काली-कमाई करने वाले नेता,आधिकारी और ठेकेदारों की साझा जमाते जरूर कई हैं। यही वजह है कि बुनियादी काम करके हजारों बच्चों का खुशहाल जीवन बनाने वाले सत्यार्थी को न तो कभी देश का प्रमुख सम्मान मिला और न ही उस मध्यप्रदेश ने उनका कोई सम्मान किया जिस प्रदेश के विदिशा में वे जन्में और बचपन बाचाओ आंदोलन की आधारशिला रखी।
प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान उसी विदिशा जिले से हैं,जिससे कैलाश सत्यार्थी आते हैं। लेकिन मुख्यमंत्री ने बाल कल्याण से जुड़ी किसी सरकारी योजना में कैलाश को सलाहकार बनाया हो,ऐसी जानकारी नहीं है। यही नहीं हाल ही में इंदौर में जो वैश्विक निवेशकों का तीन दिनी सम्मेलन संपन्न हुआ है,उनमें जाने-माने पूंजीपतियों को शिवराज सरकार ने भरोसा जताया है कि वे ऐसे श्र्रम कानूनों को या तो खत्म कर रहे हैं या शिथिल कर रहे हैं,जो उद्योग स्थापना में बाधा डालते हैं। प्रदेश में पत्थर खदानों,बारूद कारखानों,भवन व सड़क निर्माण,कचड़ा बीनने और शौचालय के गड्ढे साफ करने के काम में लाखों बाल व किशोर लगे हैं। सरकारी शिक्षा शालाओं का यह आलम है कि वहां बच्चे केवल भीख का कटोरा लिए मध्यान्ह भोजन लेने जाते हैं। इन विडंबनाओं के चलते मध्य प्रदेश ऐसे राज्यों में अव्वल है,जहां बाल अपराधों की संख्या सबसे ज्यादा है। जबकि भाजपा की शिवराज सरकार पिछले 11 साल से भयमुक्त राज का राग अपनाने में लगी है। राष्ट्रिय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक पिछले 10 साल में बच्चों से जुड़े साधारण अपराधों की बात तो छोडि़ए यौन दुष्कर्म से जुड़े 9465 मामले सामने आए हैं। मसलन बच्चों के बलात्कार के मामले में भी मध्यप्रदेश अव्वल हैं। इस अधिकृत जानकारी से साफ होता है कि सरकार को वंचित बचपन बचाने की चिंता नहीं है। यदि होती तो बचपन बचाने का इतना बड़ा अह्म और चुनौतीपूर्ण काम करने वाले कैलाश सत्यार्थी को जरूर सरकार ने अपनी बाल कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ा होता ?
समय अभी बीता नहीं है। कैलाश को मिला यह सम्मान एक ऐसा प्रकाश-पुंज लेकर आया है,जिसके आलोक में हम वंचित समाज के बच्चों और उनके बाल अधिकारों पर नई सोच विकसित करते हुए नए सिरे से सोचें। क्योंकि देश में बंधुआ मजदूरी को अपराध मानने,बाल मजदूरी को गैरकानूनी ठहराने और प्राथमिक शिक्षा को मूल अधिकार मानने संबंधी कानून बहुत पहले अस्तित्व में आ चुके हैं। लेकिन प्रषासनिक भ्रष्टाचार,व्यवस्थाजन्य अक्षमताओं और दोषपूर्ण बाल कानूनों के चलते बाल अधिकारों का पर्याप्त सरंक्षण नहीं हो पा रहा है। 1996 में बने बालश्रम उन्मूलन कानून में लोच के चलते बच्चे केवल ऐसे कारखानों में काम नहीं कर सकते,जिनमें मौत अथवा अंगभंग हो जाने का खतरा है। इस श्र्रेणी में केवल बारूद से फटाके बनाने और कीटनाशक कारखाने आते हैं। जबकि खतरा पत्थर खदानों,ईंट भट्टों और शौचालय के गड्ढो को साफ करने में भी बना रहता है। हर साल दर्जनों किशोर यह घृणास्पद सफाई करते हुए काल के गाले में भी समा जाते है। ऐसे विषम हालातों के चलते देश में करीब छह करोड़ बाल मजदूर वजूद में हैं। आमतौर से बालश्र्रम कानून 14 साल से कम उम्र के बच्चों को काम पर रखने की अनुमति नहीं देता। जबकि बच्चों के धन कमाने की हरेक मजबूरी को बाल मजदूरी मानने की जरूरत है। मजदूरी की यह विवशता बच्चों के नैसर्गिक विकास और नियमित शिक्षा में भी बाधा बनती है।
कैलाश के साथ पाकिस्तान में महिला शिक्षा के लिए संघर्षरत 17 वर्षीय मलाला युसूफजई को यह साझा पुरस्कार मिला है। मलाला बीबीसी की उर्दु सेवा की वेवसाइट पर अपने ब्लाॅग के मार्फत बालिकाओं को शिक्षा-अर्जन के लिए प्रेरित करती रही हैं। उन्होंने पाक की आतंक प्रभावित स्वात घाटी में लड़कियों के लिए शिक्षा का अभियान उस समय चलाया जब तालिबानी आतंकवादियों ने इस वादी में 400 विद्यालय बंद कर दिए थे। आतंकियों की इच्छा के विरूद्ध इस मुहिम को छेड़ने का दुष्परिणाम मलाला को आतंकी हमले के रूप में भी झेलना पड़ा था। तालिबानियों ने उनके सिर में गोली मार दी थी। लेकिन अपनी जीवटता के चलते वे बच गईं। संयुक्त राष्ट्र ने उनके पुनीत कार्य को विश्वव्यापी पहचान दिलाने की दृष्टि से और बालिका शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करने के लिए ‘मलाला दिवस‘ भी मनाया। बावजूद मलाला को मिले नोबेल के सिलसिले यह सवाल उठता है कि नोबेल की शर्तों के मुताबिक यह पुरस्कार ऐसे लोगों को दिया जाता है,जिन्होंने किसी क्षेत्र विशेष में उल्लेखनीय कार्य के साथ असाधारण योगदान दिया हो। मलाला इन दोनों ही उदेश्यों पर खरी नहीं उतरतीं ? हां, उनका दुस्साहस जरूर अभिनंदनीय है।
कैलाश सत्यार्थी के संदर्भ में भी यह सवाल उठता है कि शान्ति का यह पुरस्कार किसी ऐसे विरले व्यक्तित्व को दिया जाता है,जिसने संघर्षरत दो राष्ट्रों के बीच भाईचारा बढ़ाने ,युद्धरत सेनाओं को शांत करने अथवा उनकी संख्या कम करने और सम्मेलनों के जरिए शान्ति का पैगाम जन-जन में पहुंचाया हो। इस नाते 12 साल से अनशन कर रही इरोम शर्मिला इस सम्मान के लिए कहीं ज्यादा आधिकारिक पात्र थीं। लेकिन उनके तो नाम पर भी विचार नहीं किया गया।
कैलाश सत्यार्थी को पुरस्कार की अनुशंसा करते हुए समिति ने उनके कार्यों और सरोकारों में महात्मा बांधी के सत्य,अंहिसा व अपरिग्रह के सिद्धांतो की प्रासंगिकता स्वीकार की है। लेकिन विरोधाभास देखिए कि नोबेल समिति ने गांधी को नोबेल शान्ति पुरस्कार नहीं दिया। जबकि उन्होंने शान्ति के प्रयासों में ही प्राण गंवाए थे। इस सिलसिले में यह भी विचित्र विडंबना है कि बराक ओबामा जब अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो उन्हें शान्ति का दूत मानकर दुनिया का सबसे ज्यादा प्रतिष्ठित शान्ति का नोबेल दे दिया था। तमाम सवाल और षंकाएं उठने के बावजूद इस बार के निर्णय की प्रशंसा इसलिए हो रही है कि दो विकासशील देश के ऐसे नागरिकों को पुरस्कार दिया गया है,जिनका अपने-अपने क्षेत्रों में योगदान निर्विवाद है। पुरस्कार विजेताओं में एक हिंदू और दूसरे को मुस्लिम कहकर जिस तरह से संयुक्त रूप से पुस्कृत किया है,उससे सांप्रदायिक सौहार्द का भी संदेश जाता है। ऐसे में मलाला का यह आग्रह कि 10 दिसंबर को जिस दिन यह पुरूस्कार दिया जाएगा,उस दिन भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व नवाज शरीफ मौजूद रहें तो दोनों देशों के दरम्यान अच्छा महौल बनेगा। निसंदेह ऐसा होता है तो आतंकवादियों के हौसले पस्त होंगे। शायद इस पुरस्कार का उद्देश्य भी यही है। लेकिन इस निवेदन को प्रधानमंत्री स्वीकारेंगे ऐसा लगता नहीं है।

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