लेखक परिचय

अशोक मालवीय

अशोक मालवीय

लेखिका स्वेतंत्र टिप्प णीकार हैं।

Posted On by &filed under खेत-खलिहान, राजनीति.


 अशोक मालवीय

पिछले दिनों किसानों से जुड़ी दो महत्वपूर्ण खबरें हमारे सामने आर्इ। एक तो राज्य मानव अधिकार आयोग ने पिछले वर्ष किसानों की आत्महत्या को गंभीरता से लेते हुये 130112 को किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए राज्य सरकार को अपनी अनुशंसाएं सौंपी। आयोग की अनुशंसाओं में कुछेक प्रशंसा करने योग्य है, जैसे:- आत्महत्या का प्रयास करने वाले किसानों को एक लाख और आत्महत्या करने वाले किसानों के परिजनों को पांच लाख रूपये दिये जाये, अंतराष्ट्रीय समझौतों के आधार पर किसानों को खेती के लिए बाध्य न किया जाये, वायदा बाजार से कृषि पैदावार को पूरी तरह मुक्त रखा जाये, ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योग को बढ़ावा, छोटे किसानों द्वारा सामूहिक खेती को बढ़ावा, परामर्श केन्द्र, प्राकृतिक आपदा के समय सहायता के लिए कृषक कल्याण कोष की स्थापना आदि। वहीं दूसरी तरफ सोचने पर विवश कर देने वाली एक खबर यह है कि आयोग की अनुशंसा के महज तीन दिन बाद ही सरकार व भाजपा ने ”बलराम यात्रा” के रूप में एक जत्था को सजा-धजाकर गांव-गांव तक किसानों से मुलाकात करने के लिये हरी झंडी दिखा दी। इससे यह माना जाये कि आयोग की अनुशंसा पर इस कदर के अमल का क्या कहने या कुछ और!!

मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान व भाजपा अध्यक्ष का संदेश लेकर भाजपा के कार्यकर्ता बाइकों पर सवार होकर, प्रदेश में किसानों के ओंटले तक पहुचने के लिये कूच कर चुके हैं। इस यात्रा से किसानों को फायदा होगा या सत्ताधारी पार्टी को यह एक अलग बात है। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लक्ष्यपूर्ण यात्रा के बाइकसवारों को एक विशेष किट थमार्इ गर्इ है। जिसमें मुख्यमंत्री एवं प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का पत्र, एक कैलेन्डर जिसमें बलराम यात्रा का उद्देश्यक, दूसरा कैलेन्डर राज्य सरकार की उपलबिधयों व केन्द्र की नाकामी से भरपूर है। इसके अलावा बीस छोटे व इतने ही बड़े भाजपा के ध्वज भी किट में रख दिये है।

बलराम यात्रा में सौंपी गर्इ किट की सामग्री से ही जाहिर होता है, कि यह यात्रा किसानों की समस्याओं को निजात दिलाने के मकसद से की जा रही है अथवा किसानों के वोट को अपने पल्ले में लाने की नीयत से! स्पष्ट है कि इस दौरान किसानों के सामने जा-जाकर राज्य सरकार के बेहतर कामों का बखान किया जाऐगा, जिससे यह प्रतीत हो की इससे अच्छी कोर्इ सत्ताधारी पार्टी नहीं हो सकती है। वहीं दूसरी और केन्द्र की कमियों को चुन-चुनकर उनकी निन्दा होगी ताकि आगे सत्ता में पैर जमाऐ रखने की मंशा को अंजाम दिया जा सके। सोचिये कि यदि कांग्रेस सरकार इस तरह की यात्रा निकालेगी तो वो केन्द्र सरकार की उपलब्धियों का परोसेगी व राज्य सरकार की नाकामियों को गाली देगी। शायद किसी भी पार्टी के सत्ताधारियों को अब समझ जाना चाहिये कि अपने मुहं मियां-मिठ्ठू को मतदाता अच्छी खासी तरह समझ गये है। उदाहरण के तौर पर पिछले साल ही प्रदेश के किसानों ने अपने समस्याएं व मांगों को लेकर भोपाल में ढेरा डालकर छा गये थे, उस वक्त सरकार को कुछ हद तक घुटने टेकने पड़े थे। दरअसल मलार्इदार बतौलेवाजी से कुछ खासा नहीं होने वाला है, यदि कुछ सही में करना है तो सत्ता की राजनीति से बढ़कर आमजन के हित में कदम उठाने होंगे।

गतवर्ष फसल बर्बाद होने की वजह से दमोह जिले के हर्रर्इ गांव के नंदकिशोर ने कर्ज के जहर से मुकित पाने के लिये मौत को गले लगा लिया था। आज एक साल बाद भी उसकी पत्नी विमला छोटी-छोटी तीन लड़कियों के साथ दर-दर भटक रही है। क्या बलराम यात्रा के सिपाही इन जैसे लोगों के घर पहुच कर इनकी खबर लेंगे। तथा उन्हें आज तक कोर्इ सहायता क्यों नहीं मिली, किसी ने भी उनकी सुध क्यों नहीं ली। ऐसी बातों जानकर प्रदेश की जनता को बताने साहस करेंगे।

बलराम यात्रा में ऐसी एक सूची क्यों नहीं सौंपी गर्इ जिसमें यह लिखा हो कि प्रदेश में किसानों ने पिछले साल ही आत्महत्या नहीं की है, बलिक पिछले 10 वर्ष में किसानों की आत्महत्या का ग्राफ बढ़ा है। पिछले 10 वर्षो में 14,155 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। एक जानकारी के मुताबिक प्रदेश में 80-90 प्रतिशत किसान कर्ज की चपेट में है। प्रदेश में हरेक किसान पर औसतन 14,298 रूपये के लगभग कर्ज चढ़ा हुआ है। किसानों की आत्महत्या की वजह कर्ज व सरकार की दोशपूर्ण नीतियां ही है। इन कारणों से उठने वाले सवालों के जबावों को किसानों के बीच में पहुचाने के लिये किट में शामिल क्यों नहीं किये गये? जैसे जमीनी उन्मुलन कानून एवं सीलिंग एक्ट के बाद भी आज तक देश-प्रदेश में ठीक वितरण नहीं होने की वजह से लघु-सीमान्त किसान, खेतीहर मजदूर व खेती पर क्या-क्या प्रभाव पड़ा। नर्मदा व अन्य नदी पर बंधने वाले 906 बांधों सहित विकास के नाम पर बन रही छोटी-बड़ी तमाम परियोजनाओं पर कितनी उपजाऊ जमीन की बली चढ़ार्इ जा रही है। नेशलन पार्क, अभ्यारण, सेज, बायोफ्यूल्स, पावर प्रोजेक्ट के नाम पर कितनों की खेती झपट ली गर्इ है। संविधा खेती व नगद फसल को बढ़ावा देने के नाम पर लघु-सीमान्त किसानों की कितनी खेती कम्पनियों के हवाले कर दी गर्इ है। कितनी कृषि योग्य जमीन अनुत्पादक काम कार्य में झोंक दी। कितनी खाद्यान्न फसल की जगह नगद फसल ने ली, जिसकी वजह से पारम्परिक खाधान्न फसलेंबीज की नस्ल खत्म होने की कगार पर है। खेती में पिछले वर्षों में कितनी लागत बढ़ी है, उस हिसाब से समर्थन मूल्य क्यों बढ़ाया गया। भारत सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण 2007-08 की एक जानकारी बताती है कि भारत में कुछ राज्यों में गेहूं का समर्थन मूल्य लागत से कम है। विकास के नाम पर कितने दलित, आदिवासी व महिलाओं किसानों को भूमिहीन बना दिया गया। कितनी खेतीहर मजदूरी बड़ी है। कितने किसान खेती छोड़ने को तैयार है। कितनी कम्पनियां व पूंजीपति अब किसान बन गये हैं। कितने आदिवासियों से राजस्व व वनविभाग के आपसी झगड़े में खेती छीन ली गर्इ। रासायनिक उर्वरकों के कारोबार में कितनी कम्पनियां उतरी व कितना पैसा कमा रही है।

यात्रा के शुभारम्भ अवसर पर यह घोषणा की गर्इ है कि प्रदेश में किसानों को एक प्रतिशत ब्याज पर कर्ज उपलब्ध कराया जाऐगा। इस तरह के छुन-छुने से जरा-बहुत फायदा जरूर हो सकता है। दरअसल सालों से हो रही किसान आत्महत्या की वजह किसानों द्वारा कर्ज माना जाता है, लेकिन इसकी वजह इतनी सी नहीं है और भी ऐसे तमाम कारण है। कर्ज के ब्याज में कमी थोड़ी राहत कितना फायदा मिलेगा वो एक अलग बात हैं, क्योंकि किसान की मेहनत की उपज का अधिकतर भाग तो बाजारपूंजीपतियों की झोली में चला जाता है, और किसान की किस्मत में बचता है घाटे का चांटा। अत: इस घाटे व कर्ज के गणित को समझने की जरूरत होगी। एक तर्क यह दिया जाता है कि केन्द्र सरकार राज्य में भाजपा होने की वजह से सौतेला व्यवहार करती है। यदि किसानों की आत्महत्या की बात करें तो मध्यप्रदेश सहित आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्रआ, छत्तीसगढ़, पंजाब, राजस्थान आदि राज्यों में भी घटनाएं दिनों-दिन बढ़ती जा रही है, जहां पर राज्य व केन्द्र की सत्ताधारी पार्टी का तर्क निरर्थक साबित होता है। अत: किसानों की आत्महत्या व खेती की दुर्दशा को समझने के लिये कारणों की तह में जाने की आवश्य कता होगी। शायद इस तरह के सवालों के जबाव दलित, आदिवासी व महिला को खेती से बेदखल करने के परिणाम को सामने लाकर रख देंगे, और चुनाव मिशन खतरे की खटार्इ में पड़ जाऐगा। इसलिये इन बातों प्रदेश की जनता के सामने करने से कतराया जाता है।

ऐसा नहीं है कि मध्यप्रदेश में खेती से संबंधित कोर्इ ठीक कदम नहीं उठाये गया। हमें याद है प्रदेश में जब जीएम (जैनेटिकली मोडिफाइड) फसलों का विरोध हुआ, उस वक्त राज्य के कृषि मंत्री कुसमरिया ने केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को लिखे पत्र में ऐलान किया था कि प्रदेश में जीएम फसलों के ट्रायल नहीं होगें। इस रूख से बहुराष्ट्रीय कम्पनी मोनसेंटो द्वारा राज्य में किए जाने वाले जीएम मक्का के फील्ड ट्रायल खटार्इ में पड़ गए है। यह कदम उठाने वाला मध्यप्रदेश केरल के बाद दूसरा राज्य था। सरकार को यदि खेती व किसानों को बचाना है तो कम्पनियों व पूजीपतियों के चुंगुल से बचाने के लिये ठोस कदम उठाने होगें। उदारीकरण की नीतियों के कारण कृषि क्षेत्र में सरकारी निवेश घटता जा रहा है, वही दूसरी ओर निजी पूंजी निवेश का ग्राफ ऊपर चढ़ा जा रहा है। खेती-किसानी बाजारवाद के जंजाल में फसती चली जा रही है। किसान गरीब व भूमिहीन होता जा रहा है, बिचौलिये, नेता, देशी-विदेशी कम्पनियां मालामाल होती जा रही है। जिसके चलते भारतीय कृषि संकट की स्थिति में है।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz