लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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kanwarडा. राधेश्याम द्विवेदी
भारतीय संविधान सभी नागरिकों के लिए व्यिक्तिगत और सामूहिक रूप से कुछ बुनियादी अधिकार देता है। इन मौलिक अधिकारों की छह व्यासपक श्रेणियों के रूप में संविधान में गारंटी दी जाती है जो न्यातयोचित और न्यायालय में वाद योग्य हैं। संविधान के भाग 3 में सन्निहित अनुच्छे द 12 से 35 मौलिक अधिकारों के संबंध में है। अनुच्छेद (25-28) के अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार वर्णित हैं, जिसके अनुसार नागरिकों को प्राप्त है-

1- अंत:करण की और धर्म की अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्व्तंत्रता।

2 – धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्व-तंत्रता।

3. किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों के संदाय के बारे में स्व।तंत्रता।

4. कुल शिक्षा संस्थासओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्वंतंत्रता।
धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 25-28 में निहित है, जो सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है और भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य सुनिश्चित करता है। संविधान के अनुसार, यहां कोई आधिकारिक राज्य धर्म नहीं है और राज्य द्वारा सभी धर्मों के साथ निष्पक्षता और तटस्थता से व्यवहार किया जाना चाहिए। अनुच्छेद 25 सभी लोगों को विवेक की स्वतंत्रता तथा अपनी पसंद के धर्म के उपदेश, अभ्यास और प्रचार की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। हालांकि, यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य तथा राज्य की सामाजिक कल्याण और सुधार के उपाय करने की शक्ति के अधीन होते हैं। हालांकि, प्रचार के अधिकार में किसी अन्य व्यक्ति के धर्मांतरण का अधिकार शामिल नहीं है, क्योंकि इससे उस व्यक्ति के विवेक के अधिकार का हनन होता है। अनुच्छेद 26 सभी धार्मिक संप्रदायों तथा पंथों को सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता तथा स्वास्थ्य के अधीन अपने धार्मिक मामलों का स्वयं प्रबंधन करने, अपने स्तर पर धर्मार्थ या धार्मिक प्रयोजन से संस्थाएं स्थापित करने और कानून के अनुसार संपत्ति रखने, प्राप्त करने और उसका प्रबंधन करने के अधिकार की गारंटी देता है। ये प्रावधान राज्य की धार्मिक संप्रदायों से संबंधित संपत्ति का अधिग्रहण करने की शक्ति को कम नहीं करते। राज्य को धार्मिक अनुसरण से जुड़ी किसी भी आर्थिक, राजनीतिक या अन्य धर्मनिरपेक्ष गतिविधि का विनियमन करने की शक्ति दी गई है। अनुच्छेद 27 की गारंटी देता है कि किसी भी व्यक्ति को किसी विशेष धर्म या धार्मिक संस्था को बढ़ावा देने के लिए टैक्स देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 28 पूर्णतः राज्य द्वारा वित्तपोषित शैक्षिक संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा का निषेध करता है तथा राज्य से वित्तीय सहायता लेने वाली शैक्षिक संस्थाएं, अपने किसी सदस्य को उनकी (या उनके अभिभावकों की) स्वाकृति के बिना धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने या धार्मिक पूजा में भाग लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद (29-30) के अंतर्गत प्राप्त अधिकार-
1- किसी भी वर्ग के नागरिकों को अपनी संस्कृ्ति सुरक्षित रखने, भाषा या लिपि बचाए रखने का अधिकार।

2- अल्पनसंख्यएक-वर्गों के हितों का संरक्षण।

3- शिक्षा संस्थािओं की स्था पना और प्रशासन करने का अल्प संख्योक-वर्गों का अधिकार।
मौलिक अधिकार, राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत और मौलिक कर्तव्य भारतीय संविधान के अनुच्छेद हैं जिनमें अपने नागरिकों के प्रति राज्य के दायित्वों और राज्य के प्रति नागरिकों के कर्तव्यों का वर्णन किया गया है।इन अनुच्छेदों में सरकार के द्वारा नीति-निर्माण तथा नागरिकों के आचार एवं व्यवहार के संबंध में एक संवैधानिक अधिकार विधेयक शामिल है। ये अनुच्छेद संविधान के आवश्यक तत्व माने जाते हैं, जिसे भारतीय संविधान सभा द्वारा 1947 से 1949 के बीच विकसित किया गया था। मौलिक अधिकारों को सभी नागरिकों के बुनियादी मानव अधिकार के रूप में परिभाषित किया गया है। संविधान के भाग III में परिभाषित ये अधिकार नस्ल, जन्म स्थान, जाति, पंथ या लिंग के भेद के बिना सभी पर लागू होते हैं। ये विशिष्ट प्रतिबंधों के अधीन अदालतों द्वारा प्रवर्तनीय हैं। राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत सरकार द्वारा कानून बनाने के लिए दिशानिदेश हैं। संविधान के भाग IV में वर्णित ये प्रावधान अदालतों द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, लेकिन जिन सिद्धांतों पर ये आधारित हैं, वे शासन के लिए मौलिक दिशानिदेश हैं जिनको राज्य द्वारा कानून तैयार करने और पारित करने में लागू करने की आशा की जाती है। मौलिक कर्तव्यों को देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देने तथा भारत की एकता को बनाए रखने के लिए भारत के सभी नागरिकों के नैतिक दायित्वों के रूप में परिभाषित किया गया है। संविधान के चतुर्थ भाग में वर्णित ये कर्तव्य व्यक्तियों और राष्ट्र से संबंधित हैं। निदेशक सिद्धांतों की तरह, इन्हें कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
श्रावण मास में कांवड़ लेकर पदयात्रा का आयोजन:- हर साल श्रावण मास में लाखों की तादाद में कांवडिये सुदूर स्थानों से आकर गंगा जल से भरी कांवड़ लेकर पदयात्रा करके अपने गांव वापस लौटते हैं। श्रावण की चतुर्दशी के दिन उस गंगा जल से अपने निवास के आसपास शिव मंदिरों में शिव का अभिषेक किया जाता है। कहने को तो ये धार्मिक आयोजन भर है, लेकिन इसके सामाजिक सरोकार भी हैं। कांवड के माध्यम से जल की यात्रा का यह पर्व सृष्टि रूपी शिव की आराधना के लिए है। पानी आम आदमी के साथ साथ पेड पौधों, पशु – पक्षियों, धरती में निवास करने वाले हजारो लाखों तरह के कीडे-मकोडों और समूचे पर्यावरण के लिए बेहद आवश्यक वस्तु है। उत्तर भारत की भौगोलिक स्थिति को देखें तो यहां के मैदानी इलाकों में मानव जीवन नदियों पर ही आश्रित है। नदियों से दूर-दराज रहने वाले लोगों को पानी का संचय करके रखना पडता है। हालांकि मानसून काफी हद तक इनकी आवश्यकता की पूर्ति कर देता है तदापि कई बार मानसून का भी भरोसा नहीं होता है। ऐसे में बारहमासी नदियों का ही आसरा होता है। और इसके लिए सदियों से मानव अपने इंजीनियरिंग कौशल से नदियों का पूर्ण उपयोग करने की चेश्टा करता हुआ कभी बांध तो कभी नहर तो कभी अन्य साधनों से नदियों के पानी को जल विहिन क्षेत्रों में ले जाने की कोशिश करता रहा है। लेकिन आबादी का दबाव और प्रकृति के साथ मानवीय व्यभिचार की बदौलत जल संकट बडे रूप में उभर कर आया है। धार्मिक संदर्भ में कहें तो इंसान ने अपनी स्वार्थपरक नियति से शिव को रूष्ट किया है। कांवड यात्रा का आयोजन अति सुन्दर बात है। लेकिन शिव को प्रसन्न करने के लिए इन आयोजन में भागीदारी करने वालों को इसकी महत्ता भी समझनी होगी। प्रतीकात्मक तौर पर कांवड यात्रा का संदेश इतना भर है कि आप जीवनदायिनी नदियों के लोटे भर जल से जिस भगवान शिव का अभिषेक कर रहे हें वे शिव वास्तव में सृष्टि का ही दूसरा रूप हैं। धार्मिक आस्थाओं के साथ सामाजिक सरोकारों से रची कांवड यात्रा वास्तव में जल संचय की अहमियत को उजागर करती है। कांवड यात्रा की सार्थकता तभी है जब आप जल बचाकर और नदियों के पानी का उपयोग कर अपने खेत खलिहानों की सिंचाई करें और अपने निवास स्थान पर पशु पक्षियों और पर्यावरण को पानी उपलब्ध कराएं तो प्रकृति की तरह उदार शिव सहज ही प्रसन्न होंगे।
महादेव में मंदिर शिव की विशेष पूजा-अर्चना:- भगवान परशुराम ने अपने आराध्य देव शिव के नियमित पूजन के लिए पुरा महादेव में मंदिर की स्थापना कर कांवड़ में गंगाजल से पूजन कर कांवड़ परंपरा की शुरुआत की, जो आज भी देशभर में काफी प्रचलित है। कांवड़ की परंपरा चलाने वाले भगवान परशुराम की पूजा भी श्रावण मास में की जानी चाहिए । भगवान परशुराम श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को कांवड़ में जल ले जाकर शिव की पूजा-अर्चना करते थे। शिव को श्रावण का सोमवार विशेष रूप से प्रिय है। श्रावण में भगवान आशुतोष का गंगाजल व पंचामृत से अभिषेक करने से शीतलता मिलती है। भगवान शिव की हरियाली से पूजा करने से विशेष पुण्य मिलता है। खासतौर से श्रावण मास के सोमवार को शिव का पूजन बेलपत्र, भांग, धतूरे, दूर्वाकुर आक्खे के पुष्प और लाल कनेर के पुष्पों से पूजन करने का प्रावधान है। इसके अलावा पांच तरह के जो अमृत बताए गए हैं उनमें दूध, दही, शहद, घी, शर्करा को मिलाकर बनाए गए पंचामृत से भगवान आशुतोष की पूजा कल्याणकारी होती है। भगवान शिव को बेलपत्र चढ़ाने के लिए एक दिन पूर्व सायंकाल से पहले तोड़कर रखना चाहिए। सोमवार को बेलपत्र तोड़कर भगवान पर चढ़ाया जाना उचित नहीं है। भगवान आशुतोष के साथ शिव परिवार, नंदी व भगवान परशुराम की पूजा भी श्रावण मास में लाभकारी है। शिव की पूजा से पहले नंदी व परशुराम की पूजा की जानी चाहिए। शिव का जलाभिषेक नियमित रूप से करने से वैभव और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस पवित्र यात्रा संतों और शुरुआती दिनों में पवित्र संतों, जो बाद में बुजुर्ग लोगों को, जो करने के लिए इस्तेमाल की एक अतिरिक्त मिला द्वारा लिया गया थातीर्थयात्री हर साल, लेकिन अब सैकड़ों और हजारों लोगों को, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब से बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश, औरत और कभी-कभी बच्चों सहित वृद्धावस्था, करने के लिए युवा की, यात्रा में भाग लेने शुरू कर दिया है, और कंवर मेला। अपने रास्ते पर, कांवड़िए ‘बोल बेम, बेम बेम’, ‘बेम बेम भोले या हर हर महादेव’ एक साथ मंत्र।
कांवड़ के पीछे की कहानी:- पुराणों, समुद्र मंथन के दौरान के अनुसार, समुद्र मंथन, जो श्रावण या सावन के महीने में जगह ले ली है, माणिक के चौदह प्रकार यह है, जो देवताओं और राक्षसों के बीच वितरित किए गए से बाहर आया, जहर के पीछे है, जो भस्म हो गया था छोड़ने भगवान शिव के द्वारा, और उसके गले में संग्रहीत है, उसे नीलकंठ का नाम दे रही है (नीला गले अर्थ)। यह माना जाता है कि राक्षसों के राजा रावण, गंगा की पेशकश शिव पवित्र जल है, जो जहर के प्रभाव को कम, और इसी प्रकार, यह देवताओं द्वारा के रूप में अच्छी पेशकश की है। यात्रा के दौरान बजने वाले डीजे पर बैन, साध्वी प्राची ने विरोध किया है:- 20 जुलाई से सावन की शुरुआत हो रही है और इसी के साथ कांवड़ यात्रा की भी शुरुआत हो जाएगी दो कि हरिद्वार जाती है। इस कांवड़ यात्रा के दौरान कांवड़िए डीजे और बैंड बाजे के साथ टोली में जाते हैं. इस बार यूपी-उत्तराखंड सरकार ने कांवड़ यात्रा में डीजे बजाने पर बैन लगा दिया है. वहीं इससे पहले यूपी और उत्तराखंड की सरकार ने कांवड़ यात्रा के दौरान बजने वाले डीजे पर बैन लगा दिया है। बीते सालों में इस यात्रा के दौरान कई तरह के विवाद सामने आए थे, इसी को देखते हुए डीजे को बैन कर दिया गया है.राज्य सरकारों के इस फैसले पर विश्व हिंदू परिषद की सदस्य साध्वी प्राची ने कांवड़ यात्रा के दौरान डीजे बैन किए जाने का विरोध किया है. इसका कांवड़िए समेत हिंदूवादी नेता जमकर विरोध कर रहे हैं. वीएचपी नेता साध्वी प्राची ने चुनौती दी है। साध्वी का कहना है कि इस बार तो मै खुद डीजे बजाऊंगी, जिसने मां का दूध पिया है वो मुझे रोककर दिखाए । साध्वी ने कहा कि दोनों राज्यों की सरकारें हिंदुओं को परेशान करने की साजिश रच रही हैं, इसिलिए उन्होंने डीजे पर बैन लगाया है। साध्वी ने आगे कहा कि ये सरकारें प्रदेश को इस्लामिक स्टेट बनाने की साजिश रच रही हैं। साध्वी ने सरकार से मांग की है कि यदि सावन में डीजे बंद होता है तो ईद में लाउडस्पीकर भी बंद होना चाहिए। साध्वी ने कहा कि मस्जिदों को काले लबादे ओढ़ाकर उसे ढक देना चाहिए। साध्वी प्राची कहती हैं, ‘पिछले साल जब यह नियम लागू किया गया था तब मैं बीमार थी और अस्पताल में थी। इस बार मैं खुद यात्रा में निकलूंगी और डीजे बजवाऊंगी।’ उन्होंने कहा, ‘जिसने मां का दूध पिया है वह मुझे रोक कर दिखाए। साध्वी प्राची ने सोमवार को प्रदेश 18 से बातचीत में कहा कि कांवड़ यात्रा के दौरान डीजे भी बजेगा और डांस भी होगा, जिस किसी में हिम्मत है वो मुझे रोककर दिखाए. उन्होंने सवाल उठाया कि इस तरह के प्रतिबंध केवल हिंदू त्योहारों में ही लगाए जाते हैं।

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