लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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शर्मा जी ने तय कर लिया है कि चाहे जो भी हो और जैसे भी हो; पर अपने प्रिय देश भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त करके ही रहेंगे। शर्मा जी छात्र जीवन में भी बड़े उग्र विचारों के थे। भाषण और निबन्ध प्रतियोगिताओं में वे भ्रष्टाचार के विरुद्ध बहुत मुखर रहते थे। कई पुरस्कार भी उन्होंने जीते। विद्यालय में उन्हें एक हीरो की तरह देखा जाता था। अध्यापकों को उनमें एक बड़े आदर्शवादी नेता के वायरस दिखाई देते थे। सबको बड़ी आशाएं थी उनसे।
corruptलेकिन सरकारी नौकरी और घर-गृहस्थी के जाल में शर्मा जी ऐसे फंसे कि भ्रष्टाचार से मुक्ति का विचार दब ही गया। असल में वे जिस कुर्सी पर थे, वहां भ्रष्टाचार का विरोध करना ठीक नहीं माना जाता था। 35 साल तक शर्मा जी जनता की सेवा में लगे रहे। उन दिनों बड़े व्यस्त रहते थे वे। मेज के ऊपर की फाइलें और मेज के नीचे से आने वाले लिफाफों को निबटाते हुए वे इतने थक जाते थे कि घर पहुंचते ही बिस्तर पर पड़ जाते थे।
वैसे शर्मा जी यह व्यवहार कुछ नया नहीं है। जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब हर कोई विचारों से क्रांतिकारी हो ही जाता है। बेटी के विवाह की भागदौड़ के दिनों में वे दहेज को समाज का कोढ़ बताते थे; पर जब बेटे के विवाह का नंबर आया, तो वे कहते थे कि भाई, घर में झगड़ा थोड़े ही करना है। मुन्ने की मां चाहती है कि पूरा जीवन स्कूटर का सफर करते बीत गया, अब कुछ दिन कार में भी बैठ लें। बड़ा टी.वी., ए.सी, फ्रिज.. आदि वे अपनी बेटी को ही तो देंगे। हमें उसमें क्या करना है ? जहां तक नकद की बात है, मैं इसे बिल्कुल पसंद नहीं करता; पर बेटे के कारोबार में अगर वे कुछ सहायता कर रहे हैं, तो यह उनका अधिकार है। आखिर अब मुन्ना हमारा बेटा ही नहीं, उनका दामाद भी तो है।
लेकिन अब अवकाश प्राप्ति के बाद शर्मा जी के मन में भ्रष्टाचार मुक्त भारत की बात फिर कुलबुला रही है। पिछले कई दिन से वे जब भी पार्क में मिलते, इसी विषय की चर्चा छेड़ देते थे। और भी कई लोग उनकी बात से सहमत थे। अतः इस बारे में एक सभा हुई और उसमें शर्मा जी के नेतृत्व में ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’ नामक संस्था बना ली गयी। कुछ दिन बाद शर्मा जी मेरे घर आये, तो उस पर चर्चा होने लगी।
– शर्मा जी, आपने बड़े नेक काम का बीड़ा उठाया है। बधाई।
– हां भाई, लोग भ्रष्टाचार से बहुत दुखी हैं। किसी भी सरकारी दफ्तर में जाओ, बिना दिये कुछ काम नहीं होता। अब तो अति हो गयी है। कोई न कोई तो इसके विरुद्ध आवाज उठाएगा ही। अन्ना हजारे अब थक गये हैं। केजरीवाल मोदी से लड़ने में व्यस्त हैं, तो फिर मैंने सोचा कि अब मैं ही आगे बढ़कर इस झंडे को थाम लूं।
– बहुत ठीक किया। इन चेहरों से लोग बोर भी हो गये हैं। उन्हें एक नये नेता की जरूरत है। लेकिन शर्मा जी, संस्थाओं के पंजीकरण में तो बहुत समय लगता है; पर आपने इतनी जल्दी… ?
– इसमें क्या खास बात है ? मैंने क्लर्क की जेब में पांच हजार रु.  डाले, उसने दो दिन में ही सब काम कर दिया।
– पर इस काम को बढ़ाने में तो बहुत लोग और पैसे लगेंगे ?
– लोगों की तो कोई समस्या नहीं है। किसी भी नये काम में लोग जुड़ ही जाते हैं। थोड़ा सा मीडिया को भी साधना होगा। कुछ लोग वेतन पर भी रखेंगे। जहां तक धन की बात है, तो हम हर सरकारी कार्यालय से एक-एक लाख रु. लेंगे। यदि किसी ने नखरे किये, तो सबसे पहले उनके भ्रष्टाचार के विरुद्ध ही मोर्चा खोल देंगे।
– और जो लोग पैसा दे देंगे ?
– उन्हें क्या कहना; आखिर वे सब अपने ही तो भाई हैं।
– फिर.. ?
– फिर हम देश भर के समाजसेवी और युवा नेताओं से सम्पर्क कर उन्हें अपने अभियान से जोडें़गे।
– ऐसे तो हजारों लोग हैं। उन्हें पत्र भेजने में ही लाखों रु. लग जाएंगे ?
– तो क्या हुआ; कई सम्पादक मेरे मित्र हैं। उनके पास डाक से हर दिन दस-बीस अखबार आते हैं। हम उन अखबारों में अपना साहित्य रखकर, पता बदलकर ‘पुनप्र्रेषित’ कर देंगे। इस तरह पांच रु. वाला पत्र पचीस पैसे में ही चला जाएगा। डाकघर में भी मेरे कई मित्र हैं। वहां हर दिन सैकड़ों ऐसे पत्र आते हैं, जिनके टिकटों पर मोहर नहीं लग पाती। वे लोग उन्हें उतारकर बेच देते हैं। हमें वे टिकट आधे मूल्य पर ही मिल जाएंगे। एक प्रेस हमारी रसीद छाप देगी। सारे सरकारी काम वहीं होते हैं; और तुम्हें तो पता ही है कि कागज में जरा सा उन्नीस-इक्कीस कर देने से लाखों रु. बच जाते हैं।
– कुछ तो शर्म करो शर्मा जी। ऐसे दो नम्बरी लोगों के बल पर आप भ्रष्टाचार मुक्ति का अभियान चलाएंगे ?
– देखो वर्मा, किसी भी बड़े काम को करते समय ये नहीं देखा जाता कि उसमें कैसे लोग जुड़ रहे हैं। उद्देश्य अच्छा हो, तो फिर सब माफ है। गंगा जी में कितने गंदे नाले गिरते हैं; पर साथ-साथ बहते हुए वे सब भी गंगा ही हो जाते हैं। तुमने सुना होगा कि कई डाकू लूट का धन गरीबों में बांट देते थे। आज उनके भले काम याद किये जाते हैं, लूट नहीं। इसलिए इन छोटी-छोटी बातों पर दिमाग खराब करेंगे, तो भ्रष्टाचार मुक्ति का अभियान नहीं चल सकेगा। कीचड़ साफ करने के लिए कीचड़ में घुसना जरूरी है।
– शर्मा जी आप धन्य हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि ‘’चोर चोरी से जाय, हेराफेरी से न जाय।’’ इतने सालों की आपकी आदत छूटना असंभव है। यह भ्रष्ट अभियान आप को ही मुबारक हो।
– बेकार की बात मत करो वर्मा। चूंकि तुम एक लेखक हो। कुछ तुकबन्दी भी कर लेते हो, तो इस अभियान के लिए एक गीत लिख दो, जो जन-जन में लोकप्रिय हो जाए।
– इसके लिए नया गीत लिखने की जरूरत नहीं है शर्मा जी। फिल्म ‘बेइमान’ का ये गीत आपके अभियान के लिए ठीक रहेगा।
ना इज्जत की चिंता, ना फिकर कोई अपमान की
जय बोलो बेइमान की जय बोलो।
शर्मा जी ने लाल-लाल आंखों से मुझे देखा और पैर पटकते हुए बाहर निकल गये।

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1 Comment on "व्यंग्य बाण : जय बोलो बेइमान की"

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Laxmirangam
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