लेखक परिचय

लालकृष्‍ण आडवाणी

लालकृष्‍ण आडवाणी

भारतीय जनसंघ एवं भाजपा के पूर्व राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष। भारत के उपप्रधानमंत्री एवं केन्‍द्रीय गृहमंत्री रहे। राजनैतिक शुचिता के प्रबल पक्षधर। प्रखर बौद्धिक क्षमता के धनी एवं बृहद जनाधार वाले करिश्‍माई व्‍यक्तित्‍व। वर्तमान में भाजपा संसदीय दल के अध्‍यक्ष एवं लोकसभा सांसद।

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लालकृष्ण आडवाणी

गत् सप्ताह (16 जून) नई दिल्ली स्थित बंगलादेश के उच्चायुक्त श्री अहमद तारिक करीम मेरे निवास पर मुझसे मिले और बंगलादेश-भारत-पाकिस्तान सम्बन्धों पर हमारी काफी ज्ञानवर्धक बातचीत हुई।

जब वह चलने लगे तो मैंने उन्हें अपनी आत्मकथा ‘‘माई कंट्री माई लाइफ, की प्रति भेंट की और उन्होंने वायदा किया कि वह हमारे बीच हुई चर्चा के विषयों पर अपने लेखन की प्रति भेजेंगे।

उच्चायोग द्वारा प्रेषित उनका पत्र धन्यवाद की अभिव्यक्तियों से भरा हुआ है। इस पत्र में उन्होंने मेरी आत्मकथा का संदर्भ देते हुए टिप्पणी की है कि: ”जैसे-जैसे मैं इसका अध्ययन कर रहा हूं, मुझे हमारे उप-महाद्वीप के साझा इतिहास की अनमोल अदंरुनी जानकारी मिल रही है।”

उपरोक्त वर्णित पत्र के साथ-साथ उच्चायुक्त द्वारा लिखे गए अनेक लेख भी संलग्न हैं। उच्चायुक्त महोदय बंगलादेश की विदेश सेवा से निवृत हो चुके हैं परन्तु उनकी सरकार ने उन्हें वर्तमान भारत सरकार के कार्यकाल पूरा होने तक रुकने को कहा है। मुझे भेजे गए लेखों के पुलिंदे में उनके द्वारा लिखित 19 पृष्ठीय पैम्फलेट भी है जिसका शीर्षक है: ”पाकिस्तान % स्टॉकिंग आर्मगेडन”।

इस पैम्फलेट में बगंलादेशी नेता कहते हैं:

”पाकिस्तान जो मिसाइलों और परमाणु दौड़ में भारत के साथ जैसे को तैसा करने के जुनून में रहता है, सामाजिक विकास से जुड़ी मूलभूत समस्याओं का समाधान अपने हिसाब से करने में असफल रहा है और इस प्रक्रिया में लगभग दिवालिया हो गया है। अनेक पाकिस्तानियों सहित वहां पर यह धारणा बलवती हो रही है कि देश स्वयं विनाश के अन्त: स्फोट की वक्ररेखा के मुहाने पर है।”

राजनीति और शासन के सम्बन्ध में भारत के दृष्टिकोण की पाकिस्तान से तुलना करते हेतु बंगलादेशी उच्चायुक्त अपने पैम्फलेट में लिखते हैं:

”पाकिस्तान से संघर्ष के बावजूद, भारतीय नेतृत्व ने लोकतंत्र के पथ को चुना और अपने लोकतांत्रिक तथा नागरी संस्थानों को मजबूत करने पर ध्यान दिया, तो पाकिस्तानी नेतृत्व ने अपने तानाशाही शासन के लिए कश्मीर के मुद्दे को हथियार बनाया। विडम्बना देखिए कि इस प्रक्रिया में उन्होंने उन्हीं संस्थानों, जो सामान्यतया उनकी सुरक्षा के संरक्षक हो सकते थे, के विस्थापन के बीज बो दिए। कश्मीर पर सशस्त्र झड़प को सेना द्वारा अपरिहार्य रुप से नवगठित मुस्लिम राष्ट्र के लिए स्थायी सुरक्षा खतरे में विस्तारित कर दिया गया।”

‘पाकिस्तान के सात घातक पाप‘-शीर्षक के अन्तर्गत श्री करीम ने पाकिस्तान की अदूरदर्शिता के परिणामों के बारे में अपना आकलन इन शब्दों में बध्द किया है:

 

एक प्रकार से, पाकिस्तान पर शासन करने वाला उत्तरोत्तर नेतृत्व इसके जन्मकाल से ही और अपने ही बनाए मित्रों की दुनिया में रहा, जिससे अपरिहार्य रुप से वह भारत के साथ तीसरे, सर्वाधिक विनाशकारी युध्द की ओर ले गया। सन् 1971 में भारत के हाथों अपमानजनक पराजय के बावजूद, पाकिस्तान लगता है इन गलतफहमियों से दृढ़तापूर्वक चिपका रहा जिसने इसे भारत के साथ 1999 में कारगिल की पहाड़ियों पर स्थानीय परन्तु बर्बर युध्द पर पहुंचा दिया। यह गलतफहमियां जिसे पाकिस्तान के ‘सात घातक पाप निरुपित किये जा सकते हैं, निम्न हैं:

1- काफिर हिन्दुओं पर इस्लामिक अपराजेयता का सिध्दान्त : इस्लामी राज्य का प्रतिमान होने के कारण पाकिस्तान, प्रत्येक पाकिस्तानी योध्दा काफिर हिन्दुओं के दस सैनिकों से आसानी से लड़ सकता है, हिन्दुओं के बस में लड़ना नहीं है।

2- निम्न बंगालियों पर पश्चिमी पाकिस्तानी उच्चता का सिध्दान्त : पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली निम्न वर्ग से सम्बन्धित है और इनका नेतृत्व हिन्दू भारतीयों के साथ सांठ गांठ में है तथा इसलिए इन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

3- और अन्य तत्वों के अलावा अमेरिका के सामरिक सहयोगी की अपरिहार्यता का सिध्दांत : अमेरिका, पाकिस्तान के साथ सुरक्षा, सहयोग, समझौतों के चलते, भारत के साथ सशस्त्र संघर्ष की स्थिति में पाकिस्तान की सैन्य सहायता के लिए आएगा, भले ही पाकिस्तान ‘सेंटो‘ और ‘सीटो‘ से हट चुका है। दुर्भाग्य से, उत्तरोत्तर अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान की सरकारों की सच्चाई बताने से कतराते रहे; तथ्यत: अमेरिका का पाकिस्तान के साथ सैन्य सहयोग ऐसा नहीं है कि जिसमें यह निहित हो कि भारत से संघर्ष के चलते अमेरिका किसी भी रुप पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा होगा।

 

4- चीन कार्ड: भारत से एक युध्द लड़ चुका चीन और कम्युनिस्ट दुनिया में नेतृत्व करने की प्रतिस्पर्धा में सोवियत संघ का विरोधी होने के कारण वह पाकिस्तान का स्वाभाविक सहयोगी है।

चीन द्वारा भारत से सम्बन्ध सामान्य बनाने के तुरंत बाद उसने अन्य दक्षिण एशियाई देशों को एक स्पष्ट संदेश दिया कि वह उन्हें छोड़ने वाला नहीं है, लेकिन भारत से सम्बन्ध सुधारना उनके हित में है। चीन ने यह भी साफ कर दिया है कि उनमें से कोई भी भारत के साथ अपने झगड़े में उसे पार्टी न बनाए। नेपाल और बंगलादेश ने इस मैत्रीपूर्ण सलाह को तुलनात्मक रूप से शीघ्रता से आत्मसात कर लिया, लेकिन पाकिस्तान ने या तो इसे नजरअंदाज किया या पूरी तरह से गलत समझा।

5- ईरान कार्ड : अपनी आजादी के बाद से ही पाकिस्तान ने ईरान के साथ प्रगाढ़ सम्बन्ध बनाए हैं। ईरान के साथ इसके सम्बन्ध साझा संस्कृति, मजहब और भौगोलिक निकटता पर आधारित हैं। ईरान पाकिस्तान के साथ अमेरिकी नेतृत्व वाले सेंटो गठबंधन का भागीदार रहा है, साथ ही ईरान, पाकिस्तान और तुर्की के बीच एक त्रिपक्षीय सामाजिक और आर्थिक गठबंधन ‘विकास हेतु क्षेत्रीय सहयोग‘ (Regional Cooperation For Development) में भी रहा है।

ईरान भी चीन की तरह इस क्षेत्र में बाहरी हस्तक्षेप सम्बन्धी आशंकाओं से ग्रसित है। ईरान दक्षिण एशिया में किसी भी लड़ाई में नहीं उलझना चाहता। उल्टे, वह भारत को सुविधाजनक रूप से निकटवर्ती एक विशाल संभावित बाजार के रूप में देखता है जिसमें वह अपने तेल और गैस को बेच सकता है और अत्याधुनिक तकनीक जो वह लेना चाहता है की खिड़की के रूप में देखता है और पाकिस्तान से इसलिए खिन्न भी है कि उसने भारत के साथ पाइपलाइन सौदे को बिगाड़ने के प्रयास किए।

6- यह विश्वास कि कश्मीर के अधिसंख्य लोग पाकिस्तान के साथ मिलना चाहते है : पाकिस्तान दृड़तापूर्वक यह विश्वास करता है कि घाटी के अधिसंख्य लोग पाकिस्तान के साथ आना चाहते हैं और सिर्फ भारत की कट्टरता ही उन्हें इससे रोक रही है।

7- पूर्वी पाकिस्तान की आड़ की योजना पंजाब के मैदानों में है:

हालांकि, 1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान युध्द का क्षेत्र बना हुआ था, तब चीन ने इसे अपनी दूरी बनाए रखी, यद्यपि इसने पाकिस्तान को हथियार अपने मुनाफे के लिए आपूर्ति किए जैसाकि 1965 के युध्द के दौरान किया था वैसे ही भारत की उत्तर-पूर्वी सीमाओं पर कुछ नकली मुक्केबाजी की थी।

यद्यपि 1965 में युध्द का मुख्य स्थल पश्चिम में था। 1971 में चीन और अमेरिकियों द्वारा पाकिस्तान की एकता का समर्थन करते हुए भी, वे याह्या खान शासन द्वारा राजनीतिक समस्याओं को सैन्य ढंग से सुलझाने के विरोधी थे, जिसने पाकिस्तान सेना की पूर्वी कमाण्ड को न केवल बाहर के शत्रुओं अपितु अंदर के शत्रुओं से भी लड़ने को खड़ा कर दिया: एक गृहजनित धारणा कि समूचे लोग पूर्णत: इसके विरोधी हैं।

कुल मिलाकर यह पैम्फलेट पाकिस्तान के साथ उसकी स्थापना के तीन वर्षों में घटित गलतियों में एक अनुबोधक सार जोड़ता है। इस पैम्फलेट की प्रस्तावना में अहमद तारिक करीम ने चेतावनी दी है कि ”पाकिस्तानी सेना प्रतिष्ठान की स्वार्थी कॉरपोरेट मानसिकता अंतत: भारत के साथ परमाणु झड़प की ओर ले जाएगी।”

करीम ने पैम्फलेट की समाप्ति अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विशेष रूप से सार्क देशों से इस शक्तिशाली अपील से की है कि वे शीघ्र ही पाकिस्तान में लोकतंत्र की वापसी हेतु उपायों को प्रोत्साहित करें।

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