लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव ने अपने ताजा बयान में बैंकिंग सेवाओं का लाइसेंस लेने के लिए इच्छुक औघोगिक घरानों को कहा है कि उन्हें कमजोर वर्गों तक बैंकिंग की हर सुविधा मुहैया करवाने के शर्त पर ही लाइसेंस मिल पाएगा। उन्होंने यह भी कहा है कि यदि विदेशी बैंक भारत में अपना विस्तार करना चाहते हैं तो उन्हें इसके लिए भारत में सहायक बैंकों की स्थापना करनी होगी। तत्पश्चात् उन्हें गरीबों के बैंक की तरह काम करना होगा। अर्थात उन्हें ऐसे लोगों को बैंकिंग सुविधा देनी होगीे, जिनसे वे मुनाफा नहीं कमा सकेंगे। इस संदर्भ में ॔वित्तीय समग्रता’ की संकल्पना ऐसा ही एक सिंद्घात है।
ज्ञातव्य है कि ॔वित्तीय समग्रता’ की नीति को सरकारी बैंक भी भार के रुप में देखते हैं। निजी बैंक के लिए तो यह संकल्पना एक अनिवार्य बुराई की तरह है। लब्बोलुबाव के रुप में कहा जा सकता है कि समाज के कमजोर वर्ग के प्रति बैंक फिलवक्त अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं समझते हैं। जबकि सैंद्घातिक रुप में सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक समाज के हर तबके तक बैंकिंग की सुविधाएँ पहुँचाना चाहते हैं।
गौरतलब है कि श्री डी सुब्बाराव का यह बयान ऐसे समय में आया है जब बैंकिंग लाइसेंस देने हेतु नए नियमों को अमलीजामा पहनाने की कवायद अपने अंतिम दौर में है।
समझा जाता है कि अब बैंकिं्रग लाइसेंस उन्हीं वित्तीय संस्थानों को दिया जाएगा जो देश के दूरदराज प्रांतों में अवस्थित हर गाँव के हर व्यक्ति को ‘वित्तीय समग्रता’ की नीति के तहत बैंकिंग सुविधा उपलब्ध करवायेंगे। संभावना है कि आगामी दोचार महीनों के अंदर नये बैंकिंग लाइसेंस जारी कर दिये जायेंगे।
घ्यातव्य है कि बैंकों के भारी नानुकर के बाद भी ॔नो फ्रिल’ योजना का शुभारंभ किया गया है। इस योजना के अंतगर्त बचत खाता शून्य राशि से खोली जाती है और इसके लिए केवाईसी के नियमों के अनुपालन पर भी जोर नहीं दिया जाता है। जाहिर है इस योजना का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा लोगों को बैंकों से जोड़ना है।
सरकार और बैंकों की उदासीनता के कारण ही अभी भी देश की 40 फीसदी आबादी की पहुँच बैंक तक नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति सबसे अधिक गंभीर है। बीमा की सुविधा लेने के मामले में तो हालत और भी शोचनीय है। अधतन आंकड़ों के अनुसार महज 10 फीसदी से कम आबादी के पास बीमा की सुविधा है। जबकि बैंक और बीमा को सामाजिक सुरक्षा का बेजोड़ हथियार माना जाता है।
बैंकों के राष्ट्रीयकरण के चार दशक बीत जाने के बाद भी बैंकिंग सुविधा को समाज के हर स्तर तक पहुँचाने के मामले में देश के सरकारी बैंकों का पिछड़ना नि:संदेह शर्मनाक है। इसमें दो मत नहीं है कि हालत पहले से सुधरे हैं, पर उसे संतोषजनक नहीं माना जा सकता है।
जहाँ तक निजी और विदेशी बैंकों का सवाल है तो उनका घ्यान हमेशा से नगरों व महानगरों की ओर ही रहा है। इसका मूल कारण येन केन प्रकारेण लाभ अर्जित करना और सामाजिक बैंकिंग से सरोकार का नहीं होना है।
उल्लेखनीय है कि हमारे देश में 1991 से उदारीकरण की प्रकि्रया शुरु हुई। उसके बाद निजी तथा विदेशी बैंकों को धड़ल्ले से लाइसेंस दिए गए। इस वजह से औघोगिक घरानों की संपित्तयों में जबर्दस्त इजाफा हुआ।
बदले परिवेश में भी सरकार सबकुछ जानकर अनजान बनी रही। उदारीकरण के तहत नये कारखाने स्थापित करने या सेज के विकास के नाम पर जल, जंगल और जमीन को आदिवासियों से छीन करके औनेपौने दामों पर औघोगिक घरानों को उपलब्ध करवा दिया गया।
कई तरह की दूसरी सुविधाएँ भी नि:शुल्क कॉरपोरेट घरानों को मुहैया करवाई गई और सरकार अपने हर कदम को विकास की आड़ में तार्किक और सही बताती रही।
समाज के विविध वर्गों के बीच ब़ती खाई को शुरु से ही सरकार अनदेखा करती आई है। समाज के एक वर्ग के पास जहाँ दो जून रोटी खाने के लिए पैसा नहीं है तो दूसरे वर्ग के पास अकूत संपदा है। स्पष्ट है कि लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद भी हमारे देश में लोक कल्याणकारी योजनाओं का अनुपालन ईमानदारी पूर्वक नहीं किया जा रहा है।
शायद इन्हीं कारणों से हाल के वर्षों में मघ्यम और उच्च मघ्यम वर्ग की आय में तेजी से ब़ोत्तरी हुई है। ध्यातव्य है कि उनकी आय पर नजर बहुत सारी कंपनियों की है। वित्तीय कंपनियाँ भी उनमें शामिल हैं। दरअसल निजी व विदेशी बैंक, बैंकिंग को विशुद्ध व्यवसाय समझते हैं।
इसी दृष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में निजी वित्तीय कंपनियाँ मसलन, अनिल घीरुभाई अंबानी समूह की रिलायंस कैपिटल, श्रीराम ट्रांसपोर्ट फाइनेंस, रेलिगेयर इंटरप्राइजेज की निगाह बैंकिंग लाइसेंस हासिल करने की है।
वर्तमान संदर्भ में ॔वित्तीय समग्रता’ की संकल्पना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके माध्यम से बचत को प्रोत्साहन मिलती है। साथ ही बैंक खाता होने से काफी हद तक किसान या अन्य कामगार सूदखोरों के चंगुल से बच पाते हैं। बैंकों में खाता होने से खाताधारकों की पहचान स्थापित होती है एवं वे बहुत सारी सरकारी योजनाओं का हिस्सा बनकर लाभान्वित होते हैं।
मनरेगा के अंतगर्त बैंक के माध्यम से मजदूरों को उनका मेहताना देने की नीति से काफी हदतक मजदूरों को उनका हक मिला है। वैसे भ्रष्टाचार अभी भी है। पर इतना तो माना ही जा सकता है मनरेगा से कुछ मजदूरों को फायदा तो हो ही रहा है।
सरकारी योजनाओं जैसे, मनरेगा, पीएमजी, (पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री रोजगार योजना या पीएमआरवाई) स्वर्ण जयंती शहरी स्वरोजगार योजना, स्वर्ण जयंती ग्रामीण स्वरोजगार योजना इत्यादि में निजी व विदेशी बैंकों की भागीदारी का न होना निश्चित रुप से दुःखद है।
21 वीं सदी का एक दशक बीत जाने के बाद भी निजी व विदेशी बैंकों का गांवों व अलाभकारी स्थानों पर उपस्थिति नहीं के बराबर है। गाँवों व तहसील में निजी व विदेशी बैंकों के प्रतिनिधि केवल ट्रेक्टर बेचते हैं, क्योंकि इस धंधे में लाभ का मार्जिन अधिक होता है। किसानों को अल्पकालिक ऋण या किसान क्रेडिट कार्ड देने में अभी भी उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। अस्तु भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में औधोगिक घरानों को इस तरह से सिर्फ मलाई खाने की छूट नहीं दी जानी चाहिए।
विकास के नाम पर जिस तरह से सरकारी संपित्तयों को सरकार के द्वारा औघोगिक घरानों को कौड़ियों के दाम पर बेचा जा रहा है। उसे कदापि जायज नहीं ठहराया जा सकता। हाल ही में कोयला के खानों को कॉरपोरेट घरानों को बेचा गया है। पहले भी उदारीकरण के बयार में अनगिनत सरकारी संपित्तयों को इसी तर्ज पर बेचा जा चुका है। इस संदर्भ में घ्यान देने वाली बात यह है कि निजी कंपनियाँ मजदूरों की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम नहीं करती हैं। भविष्य निधि का पैसा ग़प करने में भी उनको सकुचाहट नहीं होती है। फिर भी कॉरपोरेट कंपनियों को सरकारी बैंकों के द्वारा रेवाड़ियाँ बेरोकटोक बाँटी जा रही है।
यहाँ विडम्बना यह है कि जब ऐसी रियायत किसानों को देने की बात कही जाती है तो उसे नाजायज मांग कह कर आमतौर पर खारिज कर दिया जाता है। हाँ, कभीकभी अपना उल्लू सीधा करने के लिए राजनीतिज्ञ उन्हें ॔ऋण माफी’ जैसा लालीपॉप जरुर पकड़ा देते हैं।
पड़ताल से स्पष्ट है कि निजी व विदेशी बैंकों का सामाजिक दायत्वि के अनुपालन के प्रति रुचि नगण्य है। जाहिर है ऐसे में केवल बैंकिंग लाइसेंस प्राप्त करने के लिए निजी व विदेशी बैंक सामाजिक बैंकिंग के दायत्विों का निर्वाह करने का ोंग कर सकते हैं।
जैसा कि हम जानते हैं कि भारत जुगाड़ का देश है। लिहाजा एक बार ऐसी मतलबी कंपनियों को लाइसेंस देने के बाद भारतीय रिजर्व बैंक के लिए भी उसे रद्द करना आसान नहीं होगा।

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