लेखक परिचय

उमेश चतुर्वेदी

उमेश चतुर्वेदी

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। संपर्क: द्वारा जयप्रकाश, दूसरा तल, एफ-23 ए, निकट शिवमंदिर कटवारिया सराय, नई दिल्ली – 110016

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उमेश चतुर्वेदी
मनोविज्ञान की एक मान्यता है, अक्सर मितभाषी लोगों के व्यक्तित्व को समझ पाना आसान नहीं होता। अक्सर ऐसी शख्सियतें जटिल होती हैं। सामाजिक मान्यताओं के मुताबिक खुलकर बोलने वाले लोग अक्सर अपना दुश्मन बना लेते हैं। लेकिन हकीकत में ऐसे लोग दिल के बहुत साफ और छल-कपट से पूरी तरह दूर होते हैं। अशोक सिंघल के नजदीक जो लोग रहे हैं या फिर जिनका भी उनके व्यक्तित्व से पाला पड़ा है, उन्हें लेकर सबकी मान्यता एक ही है…कि अशोक सिंघल दिल के बहुत साफ थे। अस्सी के दशक के आखिरी दिनों और नब्बे के दशक के शुरूआती दिनों में देश का सबसे बड़ा आंदोलन खड़ा करने वाले अशोक सिंघल के व्यक्तित्व में घमंड छू भी नहीं गया था। पिछले साल गुजरे खड़ा करने वाले अशोक सिंघल के व्यक्तित्व में घमंड छू भी नहीं गया था। विश्व हिंदू परिषद की ख्याति भारतीय राजनीति में एक ऐसे संगठन के रूप में रही है, जिसका विश्वास हिंसा में है। विश्व हिंदू परिषद का आंदोलन आक्रामक जरूर रहा है। लेकिन उसकी इस आक्रामक तर्ज में पता नहीं कैसे हिंसा को भी समाहित कर दिया गया। जबकि आक्रामकता के बावजूद कभी-भी इस आंदोलन का मूल स्वरूप हिंसक नहीं रहा। जिन्होंने विश्व हिंदू परिषद के दो पुरोधाओं गिरिराज किशोर और अशोक सिंघल से मुलाकात की है, उन्हें पता है कि दोनों के यहां पहुंचना बेहद आसान था। बड़े आंदोलन की अगुआई करने के बावजूद दोनों ही शख्सियतों को किसी भी तरह का गुमान नहीं था। अलबत्ता उनका दरवाजा हमेशा खुला रहता था। इसे संयोग कहें या दुर्योग कि दोनों ही नेता महज एक साल के अंतराल पर उस राम के लोक की यात्रा पर निकल गए, जिनके लिए अयोध्या में भव्य मंदिर बनाने का सपना दोनों ने देखा था।
गिरिराज किशोर को राममंदिर आंदोलन में शामिल होने के बावजूद जेड श्रेणी की सुरक्षा हासिल नहीं थी। लेकिन अशोक सिंघल को जेड श्रेणी की सुरक्षा हासिल थी। उनके पास जाने वाले लोगों पर पुलिस और सुरक्षाकर्मियों की निगाह रहती तो थी, लेकिन सामान्यतया सुरक्षा के तामझाम के चलते विशिष्ट व्यक्ति से मिलने आने वाले लोगों को जैसी परेशानियां झेलनी पड़ती रही हैं, अशोक सिंघल के यहां कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ। सबसे बड़ी बात यह कि सिंघल के सामने ही उनकी आलोचना की जाती थी, लेकिन वे मंद मुस्कान के साथ सुनते रहते थे। जिस शख्सियत की दहाड़ से सरकारें हिलती रही हों, जिसकी आवाज पर एक दौर में लोगों का हुजूम सड़क पर उतर पड़ता हो, उस शख्सियत से ऐसी उम्मीद कम ही लोग कर सकते हैं कि वह अपनी आलोचना भी सहज भाव से सुनता होगा। अशोक सिंघल इसके अपवाद थे। इसलिए उनके नजदीक आने वाला व्यक्ति उनका मुरीद हो जाता था। सिंघल के निधन के बाद राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए सही ही कहा है कि वे अजातशत्रु थे। सोच और विचार से लगातार बौनी होती जा रही दुनिया में निंदक नियरे राखिए के सिद्धांत को जिंदा रखने वाले लोगों की लगातार कमी होती जा रही है। ऐसे में सिंघल को डायनासोर जरूर कहा जा सकता है, जिसके विराट व्यक्तित्व में इतना बड़ा दिल भी बसता था, जो अपनी कटु आलोचना को भी स्मित रस में डुबाकर सहजता से ना सिर्फ स्वीकार कर लेता था, बल्कि उस पर कोई प्रतिक्रिया भी नहीं देता था।
संघ परिवार का ही एक अंग विश्व हिंदू परिषद है, जिसकी स्थापना अशोक सिंघल ने की। बेशक परिषद संघ परिवार का अंग है। लेकिन उसका एक मात्र घोषित मकसद हिंदू समाज को एकजुट करना था। सिंघल अपने समधर्मियों के साथ लगातार अपने मकसद में जुटे रहे। हिंदू समाज को उसके जातीय स्तर पर विखंडित स्वरूप के लिए जाना जाता है। हिंदुओं में दलितों के मंदिर प्रवेश पर पाबंदी रही है। लेकिन सिंघल को पता था कि जब तक हिंदुओं के बीच जारी इस भेदभाव को दूर नहीं किया जाएगा, हिंदू समाज को एकजुट नहीं बनाया जा सकेगा। सिंघल ने इस दिशा में भी कोशिश की और देशभर में करीब दो सौ ऐसे मंदिर बनवाए, जहां दलितों के दाखिल होने पर कोई रोक नहीं है। आदिवासी समुदाय के विकास और उनकी शिक्षा-दीक्षा के लिए कार्यरत वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यक्रमों में लगातार हिस्सेदारी और उन्हें प्रोत्साहन देना अशोक सिंघल की जिंदगी का जैसे अहम मकसद रहा। आदिवासी और दूरदराज के इलाके में एकल विद्यालयों के जरिए मजलूम, दलित और आदिवासी समुदाय के बच्चों को अक्षरज्ञान कराने की दिशा में सक्रिय एकल विद्यालय के पच्चीस साल पूरे होने मौके पर इसी साल मार्च में धनबाद में आयोजित कार्यक्रम में अशोक सिंघल लगातार दोनों दिन ना सिर्फ मौजूद रहे, बल्कि खराब स्वास्थ्य के बावजूद मंच पर बैठकर एकल विद्यालय की प्रगति यात्रा का जायजा लेते रहे। बेशक सिंघल की ख्याति दुनियाभर में राममंदिर आंदोलन के तौर पर बढ़ी। इसके चलते उनका विरोधी वर्ग उन्हें हिंसक तक मानने लगा। उनके साथ यह छवि जो चस्पा हुई, वह उनके आखिरी वक्त तक लगी रही। जबकि उनके अंदर के कोमल भाव, दलित-आदिवासी उत्थान को लेकर किए गए उनके कार्यों की तरफ न तो ध्यान दिया गया और न ही उनकी छवि में इसे जोड़ने की कोशिश की गई। खुद उन्होंने भी इसके लिए प्रयास भी नहीं किया। उनका मानना था कि उनका अंतस जब शुद्ध है तो इसे लेकर दुनिया चाहे जो सोचे।
भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी का उभार सिर्फ राजनीतिक परिघटनाओं पर ही आधारित नहीं है। बल्कि संघ परिवार में अशोक सिंघल पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने मोदी को प्रधानमंत्री का दावेदार बनाने की घोषणा की थी। प्रयाग के कुंभ में आयोजित संत समागम के मंच से सिंघल ने ही पहली बार मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की मांग की थी। इसलिए अगर प्रधानमंत्री कहते हैं कि सिंघल का निधन उनकी व्यक्तिगत क्षति है तो दरअसल उस संत मना शख्सियत के प्रति सच्ची कृतज्ञता ही व्यकत कर रहे होते हैं। भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के उभार में राममंदिर आंदोलन का बड़ा योगदान है। निश्चित तौर पर इसके पीछे सिंघल का मेहनत-पसीना भी काफी रहा। लेकिन सिंघल ने भारतीय जनता पार्टी या उसकी सत्ता से कभी कोई अपेक्षा नहीं रखी। सिंघल अब हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन उनकी याद यह जताती रहेगी कि बौने लोगों के समाज में निश्चित तौर पर वे बड़े दिल वाली शख्सियत थे।

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1 Comment on "बौनों के समाज में उदारमना व्यक्तित्व: अशोक सिंघल"

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डॉ. मधुसूदन
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अशोक जी के चारित्र्य को वास्तव में उजागर करनेवाला, आलेख लिख कर लेखक ने बहुत बडी सेवा की है।
अशोक जी के चारित्र्य का यह अजातशत्रुता का पहलू (शायद?) बहुत कम लोग जानते होंगे।
अंतरंग कार्यकर्ता और मित्रों को यह पहलू अवश्य पता होगा।
अशोक जी के इस विशेष पहलुका मुझे कुछ प्रसंगो पर वैयक्तिक अनुभव है।
राम के आत्मीय भक्त को राम के चरणों में सदैव शान्ति प्रदान हो, यही प्रार्थना ।

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