लेखक परिचय

तेजवानी गिरधर

तेजवानी गिरधर

अजमेर निवासी लेखक तेजवानी गिरधर दैनिक भास्कर में सिटी चीफ सहित अनेक दैनिक समाचार पत्रों में संपादकीय प्रभारी व संपादक रहे हैं। राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रदेश सचिव व जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ राजस्थान के अजमेर जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। हाल ही अजमेर के इतिहास पर उनका एक ग्रंथ प्रकाशित हो चुका है। वर्तमान में अपना स्थानीय न्यूज वेब पोर्टल संचालित करने के अतिरिक्त नियमित ब्लॉग लेखन भी कर रहे हैं।

Posted On by &filed under राजनीति.


तेजवानी गिरधर

भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय महामंत्री व राजसमंद की विधायक श्रीमती किरण माहेश्वरी के आंसुओं के आगे आखिर भाजपा का नेतृत्व पिघल गया। पार्टी वरिष्ठ नेता एवं पूर्व गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया की प्रस्तावित लोक जागरण अभियान यात्रा को स्थगित कर दिया गया है। साफ तौर पर इस मामले में किरण माहेश्वरी की जीत हो गई है, मगर इसे कटारिया की हार भी करार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि अब फर्क सिर्फ इतना है कि ऐसी यात्राओं को पार्टी मंच पर तय किया जाएगा। जो कुछ भी हो, मगर इस विवाद के कारण पार्टी में बढ़े मनमुटाव को ठीक से दुरुस्त नहीं किया गया तो यह आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को भारी पड़ सकता है। ज्ञातव्य है कि कुछ इसी प्रकार मनमुटाव पिछली बार भी वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री बनने में बाधक हो गया था।

असल में सारा झगड़ा संघ लोबी और वसुंधरा खेमे का है। हालांकि पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी व पूर्व प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी साफ घोषणा कर चुके हैं कि अगला विधानसभा चुनाव वसुंधरा के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा, मगर संघ लोबी को यह मंजूर नहीं है। यही वजह रही कि पहले संघ लाबी से जुड़े पूर्व मंत्री गुलाब चंद कटारिया ने यह कह कर कि पार्टी ने अब तक तय नहीं किया है कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, विवाद को उजागर किया तो एक और दिग्गज पूर्व मंत्री ललित किशोर चतुर्वेदी ने भी उस पर मुहर लगाते हुए कह दिया कि आडवाणी ने राजस्थान दौरे के दौरान ऐसा कहा ही नहीं कि अगला चुनाव वसुंधरा के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। उन्होंने भी यही कहा कि चुनाव में विजयी भाजपा विधायक ही तय करेंगे कि मुख्यमंत्री कौन होगा।

पूर्व गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया की ओर से पार्टी से अनुमति लिए बिना ही 2 मई से जन जागरण यात्रा निकालने का ऐलान इसी विवाद की एक कड़ी है। यात्रा की घोषणा के बाद से ही पार्टी में संघनिष्ठ और गैर संघ भाजपा नेताओं के बीच तनाव की स्थिति बन गई। खासकर मेवाड़ में पार्टी दो खेमों में बंटी नजर आई। जाहिर सी बात है कि निजी स्तर पर निर्णय लेकर पार्टी के प्रचार का यह कदम अनुशासन के विपरीत पड़ता है, मगर चूंकि कटारिया को संघ लाबी का समर्थन हासिल है, इस कारण पार्टी हाईकमान के सामने बड़ी दिक्कत हो गई। दिक्कत तब और बढ़ गई जब कटारिया की यात्रा के सिलसिले में राजसंमद जिला भाजपा की बैठक में जम कर हंगामा हुआ। कटारिया की धुर विरोधी राजसमंद विधायक श्रीमती किरण माहेश्वरी और भीम विधायक हरिसिंह ने कड़ा विरोध किया और यात्रा को काले झंडे दिखाने तक की धमकी दी गई। हालात धक्का मुक्की तक आ गए तो किरण फूट-फूट कर रो पड़ी। किसी बात के विरोध तक तो ठीक है, मगर एक राष्ट्रीय महासचिव का इस प्रकार रोना कोई कम बात नहीं है। सीधी सी बात है कि जिस इलाके की वे विधायक हैं, वहीं की स्थानीय इकाई यदि उनके विरोधी कटारिया का साथ देती है, तो इससे शर्मनाक बात कोई हो ही नहीं सकती। मौके पर खींचतान कितनी थी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रदेश भाजपा महासचिव सतीश पूनिया तक मूकदर्शक से किंकर्तव्यविमूढ़ बने रहे गए। संघ लाबी के ही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी का रुख भी कटारिया की ओर झुकाव लिए रहा और उन्होंने कहा कि कुछ अंतर्विरोध हो सकते हैं, लेकिन गुलाब चंद कटारिया संगठन की धुरी हैं। ऐसे में किरण जान गईं कि अब तो दिल्ली दरबार का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा। उन्होंने जा कर पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी को शिकायत कर दी। कदाचित वहां भी उन्होंने रो कर अपना पक्ष रखा हो। यहां कहने की जरूरत नहीं है कि मेवाड़ अंचल में भले ही वे कटारिया की चुनौती से परेशान हैं, मगर दिल्ली में तो उनकी खासी चलती है। पार्टी अनुशासन के लिहाज से भी किरण की शिकायत वाजिब थी, इस कारण गडकरी को मजबूरी में कटारिया को दिल्ली तलब करना पड़ा। संघ कटारिया का पूरा साथ दे रहा था। गडकरी तो बड़ी मुश्किल में पड़ गए। हालांकि उन्होंने अन्य नेताओं की सलाह पर पार्टी हित में कटारिया की यात्रा को स्थगित करने का निर्णय किया, मगर संघ के दबाव की वजह से यात्रा को पूरी तरह से निरस्त करने का निर्णय वे भी नहीं कर पाए। यात्रा की रूपरेखा पार्टी मंच पर तय करने के लिए उसे जयपुर के कोर ग्रुप पर छोडऩा पड़ा।

माना कि किरण माहेश्वरी कटारिया की यात्रा को स्थगित करवाने में कामयाब हो गईं हैं, मगर दूसरी ओर यह बात भी कम नहीं है कि कटारिया भी अपनी यात्रा की चर्चा राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने करवाने में सफल रहे हैं। यात्रा का स्वरूप भले ही अब बदल दिया जाए और उसमें सभी धड़ों को भी साथ लेने पर सहमति बने, मगर इससे यह पूरी तरह से साफ हो गया है आगामी विधानसभा चुनाव में संघ वसुंधरा को फ्री हैंड नहीं लेने देगा और ऐसे में वसुंधरा को संघ को साथ लेकर चलना होगा। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कहां तो वसुंधरा अपने दम पर पूरे प्रदेश की यात्रा की योजना बना रही थीं और खुद को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने वाली थीं और कहां अब पार्टी मंच पर तय हो कर यात्राएं निकाली जाएंगी। ऐसा लगता है कि सब कुछ संघ की सोची समझी रणनीति के तहत हुआ है।

Leave a Reply

6 Comments on "किरण के आंसुओं के आगे पिघले गडकरी"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
डॉ. मधुसूदन
Guest

हर टिका टिपण्णी और निंदासे भी सीख ली जाए.
नरेंद्र मोदी से इस बिंदु पर सिखना चाहिए.
===>आप उनकी त्रुटियाँ बताएं—-उन्हें यदि बात तर्क पूर्ण लगी, तो त्वरित वे बदलाव लाते हैं.
यह गुण मैं ने उन में अनुभव किया है.
जब दूसरे सफाई ढूंढते है, वे उसीका उपयोग कर सुधार.
स्वार्थ तो है नहीं. न भ्रष्टाचार.
तुकाराम महाराज कहते हैं, निन्दकाचे घर असावे शेजारी. अर्थ: निंदक पडौसी होना चाहिए.
बी जे पी को अपने ही एक सक्षम नेतासे सीखने में क्या कठिनाई हो सकती है?
तेजवानी जी धन्यवाद.

तेजवानी गिरधर
Guest

आप काफी हद तक सही कह रहे हैं, आपका बहुत बहुत शुक्रिया

tapas
Guest
बीजेपी वालो को ४ बेलो की कहानी सुनानी चाहिए जो प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थी पढ़ते है… ये लोग आपस में लड़ कर अपनी शक्ति का हास कर रहे है .. और सामने वाले बिना किसी परिश्रम के जीत जाते है .. जब तक ये लोग मिल कर नहीं रहेंगे कुछ नही हो सकता . वसुंधरा के कार्यकाल में जो विकास हुआ .. कांग्रेस के हितेषी भी स्वीकार करते है. संघ को अपना महिला विरोधी नजरिया बदलना होगा इसे राजस्थान की बदकिस्मती कहे की क्या कांग्रेस की और से सबसे प्रतिभावान मंत्री CP जोशी चुनाव हार गए और गहलोत को मुख्य… Read more »
तेजवानी गिरधर
Guest

प्रतिक्रिया के लिए आपका शुक्रिया

तेजवानी गिरधर
Guest

आपके विचारों का मैं समर्थन करता हूं

ram naresh gupta
Guest

राजनीती में सब कुछ होता हे ,इन लोगो के मुख में सत्ता और दादागिरी का चस्खा लग जाता हे और इसको बरक़रार रखने के लिए ये नियम कायदे नहीं मानते ,धन सम्पदा तो अपार हे ,राजनीती में आने के बाद ये काला धन सुरक्षित हो जाता हे और ये मजे करते हे

wpDiscuz