लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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नई दिल्ली। अधिकारियों के बूते राजनीतिक पायदान चढ़ने वाले राजनेताओं, अधिकारियों के मुंह में राजनीति का खून लगाने से नहीं चूके हैं। सियासत के दलदल में ब्यूरोक्रेट्स को उतारने में हरियाणा ने बाजी मारी है। इस सूबे में चौधरी देवी लाल द्वारा लगाए गए पौधे ने अब बट वृक्ष का स्वरूप धारण कर लिया है।

ज्ञातव्य है कि 1972 में तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी देवी लाल ने सबसे पहली बार लंदन में कार्यरत एक शिक्षक को राजनीति के दलदल में उतारा था। यह अलहदा बात है कि उस दौर में राजनीति का स्वरूप इतना घिनौना नहीं हुआ करता था। देवी लाल के सहारे श्यामलाल नामक यह शिक्षक सोनीपत से विधायक चुने जाने के बाद लाल बत्ती प्राप्त कर सके थे।

सूबे में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी कृपा राम पुनिया, डॉ.रघुबीर कादियान, रघुवीर सिंह, ए.एस.रंगा, श्री सिसोदिया, बी.डी.ढलैया, आई.डी.स्वामी, आर.एस.चौधरी, आबकारी महकमे के अधिकारी राधेश्याम शर्मा, हरियाणा राज्य सेवा के डॉ.के.वी.सिंह, एम.एल.सारवान, विरेंद्र मराठा, बहादुर सिंह, पुलिस महानिदेशक एच.आर.स्वान, ए.एस.भटोटिया, महेंद्र सिंह मलिक, एडीजी रेशम सिंह, के अलावा डॉ.सुशील इंदौरा और बैक अधिकारी हेतराम आदि ने भी सरकारी नौकरी के बाद राजनीति का पाठ सीखा है।

देश भर में अफसरान के राजनीति में कूदने के उदहारण बहुतायत में हैं, किन्तु हरियाणा में सर्वाधिक सरकारी कर्मचारियों ने अपने कर्तव्यों को तिलांजलि देकर (नौकरी से त्यागपत्र देकर) राजनीति के माध्यम से ”जनसेवा” का मार्ग चुना है। हरियाणा के राजनैतिक परिदृश्य को देखने से साफ हो जाता है कि यहां अफसरशाह जब भी राजनीति में आए हैं, वे अपने आकाओं के कभी विश्वास पात्र बनकर नहीं रह पाए हैं।

पूनिया को देवीलाल राजनीति में लाए, बाद में अनबन होने पर पूनिया ने देवी लाल का साथ छोड़ दिया। डॉ. कदियान को देवी लाल लाए थे, बाद में वे उनका साथ छोडकर कांग्रेस का दामन थाम अपनी राह में आगे बढ़ गए।

-लिमटी खरे

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