लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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newspaper हे कल छपने वाले  अखबारों की ओर टकटकी लगाए देश वासियो ! छोड़ो कि कल के अखबार में वे क्या कहने वाले हैं तो परसों उसके बदले में वे क्या कहने वाले हैं। अखबार में कुछ देखना ही है तो छूट के, लूट के विज्ञापन देखो, देखो तो एक के साथ एक क्या क्या फ्री में कहां कहां मिल रहा है।  कुछ खरीद नहीं सकते तो विज्ञापन देखने में क्या जाता है। विज्ञापनों के साथ खड़ी नायिका को बेमतलब मुस्कराते हुए देख दिल बहलाना सीखो, मेरी तरह।  मेरी जिंदगी   में लाख तंगियों के बावजूद भी मुस्कुराहटों का राज़  इन विज्ञापनों में छिपा है।

शुक्र मनाओ! दो रूपए में  देश विदेश की ताजा तरीन खबरों के साथ फ्री में मुस्कुराता चेहरा तो दिख रहा है। वरना यहां तो जिस चेहरे से आस हो कि वह मुस्कुराता मिलेगा ,उससे मिलने की दुआ करते ही हैं कि दुआ कबूल होने से पहले ही उस चेहरे पर उदासी का ऐसा  मुलम्मा  चढ़ा होता है कि हटाए नहीं हटता। सच कहूं तो  मुझे तो पड़ोसी के घर से लाए अखबार के विज्ञापनों पर हाथ फेर कर ही इतना मजा आ जाता है कि विज्ञापन  के शब्द पढ़ने को मन ही नहीं करता।  शुक्र मनाओ कि अब मैं  साठ  पार गया हूं।  अगर गलती से युवा होता तो इन विज्ञापनों को देख  पागल हो जाता।

उनका क्या ? वे तो कहने की ही खाते हैं। कहते रहना उनका पेषा है, उनका धर्म है ,उनका सकाम कर्म है। जिस दिन वे कुछ नहीं कहेंगे उस दिन लगता  है प्रलय हो जाएगा। टीवी, अखबार उनके बयान के बिना सूना सूना लगेंगे। सच पूछो तो उस दिन किसीका  टीवी , अखबार  देखने तक को मन नहीं करेगा। टीवी, अखबार सब उनके बयानों के सहारे ही तो चल रहे हंै।

पर अपुन उन लोगों में से नहीं कि  जो बाजार में  सिकुड़े सीने पर भीतर से पैड पर पैड बांधे  उसे चौड़ा कर दिन रात  कहते घूमते हैं कि जैसे  हमारी तरह कोर्इ सरकार नहीं चला सकता वैसे ही  उन जैसों की तरह कोर्इ परिवार नहीं चला सकता। इनसे चाहे  ये समर्थन वापस ले लें ,चाहे वे। हम जानते हैं कि समर्थन देने की नहीं, देने से पहले वापस लेने की  चीज है।

वह समर्थन ही क्या जो बिना  वजह सोए सोए भी वापस न लिया जाए।  जय हो! आपने बंदे को अपने कंधे के सहारे कभी कंधा पीछे न हटाने का वादा कर खजूर पर चढ़ने को तैयार किया  और वह बेचारा खजूर खाने तो दूर, अभी खजूर पर अपना संतुलन ठीक से बना भी नहीं पाया  कि आपने  अपने कंधे झाड़ते हुए जोर से प्रेस में बयान दे मारा कि हमने समर्थन वापस ले लिया। कारण, हम खुद भी नहीं जानते।  अब बंदा  खजूर पर न इधर का  न उधर का! पर क्या करें साहब !  जब तक अगले चुनाव नहीं होते,  खजूर पर जैसे कैसे लटकना है तो लटकना है। देश की खातिर नहीं, नाक  की खातिर। ऐसे में बंदा  क्या ख्ुाद खाए, तो क्या देश को खिलाए? इसलिए कोसना छोडि़ए! सच का सामना कीजिए।

समर्थन वालों का क्या! कुछ दिया ही है साहब, लिया तो कुछ नहीं। लिया भी तो आपने ही अपनी मजबूरी का दिया था।  आपसी मजबूरियों से ही सरकार बनती है। मजबूरियां सरकार की जननी हैं। ये मजबूरियां न होतीं तो कोर्इ सरकार न होती।  कहीं पर धोती तो कहीं पर लंगोटी।   तो लो साहब, अब हम आपका दिया आपको लौटा देते हैं, अपना दिया वापस ले लेते हैं, हिसाब बराबर!  हमसे आपका ये थोड़ा बहुत खाना  अब और नहीं सहा जाता। सहने की भी कोर्इ  शर्त होती है। पहली बार उनसे ही पता चला कि सहने की भी कोर्इ  शर्त होती है। अरे साहब हमें भी देखो! बिना किसी शर्त के, हिल हुज्जत के  गंगू तेली की तरह सबका सब सहन किए जा रहे हैं,    समाजवादियों  की तरह   घुट घुट कर समर्थन दिए जा रहे हैं।  अब तो समर्थन देना  और लेना  घुट घुट कर मजबूरी की चीज रह गर्इ है सरकार में भी और परिवार में भी।

वैसे हम तो विवाह के चौथे रोज ही जान गए थे कि आज के दौर में अकेले दम पर न तो कोर्इ परिवार चला सकता है न सरकार। पर चलो, अब वे भी मान गए।

हे खुदा, बस इतना करना कि होता रहे  तेरी रहमत से इधर उधर से कुछ न कुछ जुगाड़। ये हाथ छोड़ें तो वे  गिरता दामन थामने को दौड़ें! बस यों ही सरकार चलती रहे। कभी समर्थन का सूरज उगता रहे तो कभी समर्थन की सांझ ढलती रहे।

कल भगवान से अचानक भेंट हुर्इ तो वह बोला- मैं किसी के साथ होऊं या न होऊं पर पर जुगाडि़यों के साथ हमेषा रहता हूं। इसलिए हे बंदे, तू जिंदगी में कुछ कर या न कर, जब भी दांव लगे, लोक लाज छोड़ कर  ,  जुगाड़ कर! जुगाड़ कर!! जुगाड़ कर!!!

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