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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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निर्मला कुमारी 

आर्थिक स्‍तर पर मजबूती और बढ़ते औद्योगिकीकरण के प्रधान देश के रूप में ही माना जाता है। यही कारण है कि आज भी इसपर विशेष ध्यान दिया जाता रहा है। कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें लगातार प्रयासरत हैं। इसके लिए समय-समय पर प्रभावी नीतियां लागु करने का प्रयास भी किया जाता रहा है। परिणामस्वरूप कभी खाद्यान्न संकट से गुजरने वाला भारत आज इतना आत्मनिर्भर हो चुका है कि वह अब दूसरे देशों को निर्यात भी करता हैं। यह खबर वास्तव में सभी भारतीयों के लिए एक सुखद एहसास दिलाता है। लेकिन खुशी के इस क्षण में हम हमेशा देश को कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने वाले किसान को भूल जाते हैं। जो आज भी आत्मनिर्भरता की बाजाए गुरबत की जिंदगी गुजारने पर मजबूर रहता है। देश का पेट भरने वाला यह किसान स्वंय का पेट भरने के लिए जिंदगी भर संघर्ष करता रह जाता है और कभी-कभी इतना मजबूर हो जाता है कि उसके सामने आत्महत्या के अलावा और कोई रास्ता नहीं रह जाता है। औसत सीमांत किसान की हालात यह है कि अगर बेटी की शादी हो जाये या वह एक कमरा बनवा ले तो उसकी अर्थव्यवस्था एक दशक पीछे चली जाती है। किसी क्षेत्र में अकाल तो कहीं बाढ़ की समस्या के कारण किसानों को हमेशा नुकसान ही उठाना पड़ा है।

बिहार के दरभंगा से केवल 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कमलपुर गांव कृषि से संबंधित अनेक समस्याएं ग्रसित है। जिससे किसानों की स्थिति अत्यंत दयनीय है। किसानों की सबसे बड़ी समस्या बाढ़ है, जो प्रति वर्ष यहां सैकड़ों एकड़ की तैयार फसल बर्बाद कर जाती है। कोसी, कमला बालान और गेंहुंआ नदी से घिरा होने के कारण प्रत्येक वर्श इस गांव में बाढ़ का खतरा बना रहता है। नदियों का जलस्तर बढ़ने के साथ ही बाढ़ का पानी खेतों में प्रवेश कर जाता है। कृषि में होने वाली कठिनाईयों के कारण गांव से युवाओं का पलायन हो रहा है। नौजवान रोजी रोटी के लिए परदेस जाने को मजबूर हैं। गांव के 55 वर्षीय किसान राज किशोर यादव के अनुसार हमारा गांव नदी के किनारे पर होने के कारण यहां प्रति वर्ष बाढ की समस्या उत्पन्न होती है। जिससे फसल को पूर्णत: या अंशत: क्षति होती है। बाढ़ के कारण जिंदगी गुजारना तक कठिन हो जाता है। सरकार की ओर से मिलने वाली सहायता राजनीति की शिकार होकर रह जाती हैं। कागजों पर इस गांव को बाढ़ रहित क्षेत्र दर्शाकर इसे सहायता से वंचित कर दिया जाता है। वहीं खेतों के लिए खाद की व्यवस्था तब की जाती हैं जब फसल तैयार हो जाता हैं।

वास्तव में देखा जाए तो गांववाले सरकार से सहायता की अपेक्षा बाढ़ के स्थाई निवारण की उम्मीद करते हैं। उनकी मांग है कि बाढ़ के स्थाई उपाय किए जाएं जिससे उन्हें सदा के लिए राहत मिल सके। हालांकि राज्य सरकार क्षेत्र में आने वाली बाढ़ के लिए पड़ौसी देश को जिम्मेदार ठहराती है और इसपर नियंत्रण के लिए बांध के निर्माण की योजना को मूर्त रूप देने पर विचार कर रही है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश जहां देश की 70 प्रतिशत आबादी इसी पर आश्रित हैं, यदि कृषि को प्राकृतिक आपदा से बचाने के दीर्घकालिक उपायों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो स्थिति भयानक हो सकती है। संभव है कि किसान रोजी रोटी के लिए अन्य क्षेत्रों की ओर रूख कर जाएं। ऐसे में हमें गंभीर खाद्यान्न संकट का सामना भी करना पड़ सकता है। आवश्‍यकता है सरकार प्रति वर्ष बाढ़ सहायता के नाम पर करोडों रुपये खर्च करने की बजाए इसका स्थाई हल निकाले ताकि किसान स्वयं और देश का पेट भर सकें। (चरखा फीचर्स) 

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