लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

Posted On by &filed under समाज.


hindu-muslimआशा की जा रही है कि सरकार और सुरक्षाबलों ने मुजफ्फरनगर दंगों पर नियंत्रण कर लिया है, पर अभी मन में भरे घृणित रंगों पर नियंत्रण किया जाना शेष है। दंगों और इन ‘घृणित रंगों’ का चोली दामन का साथ है। भारत में पंथ निरपेक्ष शासन की स्थापना करने का उद्देश्य भी यही था कि मानव मन के घृणित रंगों को सदा सदा के लिए बाहर निकालकर उसके अंतर्मन में एक सुखद संसार के भावों की सृष्टि कर दी जाए। परंतु संविधान की इस मूल भावना और जनभावना के बीच ‘हत्यारी राजनीति’ आ खड़ी हुई, और उसने सारी स्थिति को लज्जास्पद बना दिया।

राजनीति में कई लोग ऊंचाईयों को छू लेते हैं, पर उनके अंतर्मन में प्रतिशोध और प्रतिरोध की ज्वालाएं धधकती ही रहती हैं, वो ऊंचाई पर जाकर भी नीचे जलती चिताओं पर ही ध्यान रखते हैं और उन पर ही अपनी जीविका चलाते हैं। इसलिए उनकी चाण्डाल दृष्टि या गिद्घ दृष्टि उन्हें बड़ा होने पर भी छोटा ही बनाये रखती है। मुजफ्फरनगर दंगों में अपनी-अपनी संलिप्तता को अब बड़े-बड़े नेता और जिम्मेदार लोग नकारते फिर रहे हैं। जबकि बात बहुत ही छोटी सी थी, दोषी लोगों के खिलाफ प्रारंभ में ही न्यायपूर्ण और पक्षपात शून्य कार्यवाही हो जानी चाहिए थी। वह कार्यवाही किसके संकेत पर नही हुई या किसने नही होने दी या किसका साया पुलिस प्रशासन को इतना आतंकित कर रहा था कि वह समुचित कार्यवाही नही कर पाया? खोजना बस उसी को है, गिद्घ का पता अपने आप चल जाएगा।

भारत के ही नही अपितु, किसी भी देश के विषय में यह सत्य है कि विभिन्न भाषा और विभिन्न सम्प्रदायों का होना कोई समस्या नही होती है। समस्या होता है अपनी साम्प्रदायिक मान्यताओं के प्रति व्यक्ति का पूर्वाग्रही होना और दूसरे व्यक्ति या सम्प्रदाय के प्रति असहिष्णु होना।

अथर्ववेद के पृथिवी सूक्त के 45वें मंत्र को ध्यान में लाने की आवश्यकता है :-

जन बिभ्रति बहुधा विवाचसं नाना धर्माणं पृथ्वी यथौकसम्।

सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां धु्रवेव धेनुरन स्फुरन्ती।।

अर्थात अनेक प्रकार की बोली बोलने वाले तथा नाना प्रकार की धार्मिक मान्यता वाले जनमानस को धारण करने वाली स्थिर (पृथ्वी) मातृभूमि मुझ  नागरिक को धन या भोग्य पदार्थों को सहस्र प्रकार से दे जैसे निश्चल गौ दूध की धारा देती है। वेद का यह मंत्र बता रहा है कि देश में विभिन्न बोली और भाषाएं या विभिन्न सम्प्रदाय हो सकते हैं, परंतु मातृभूमि सबकी एक होती है। उस मातृभूति के प्रति लगाव सबमें एक जैसा होना चाहिए। (यह राष्ट्र की अनिवार्य शर्त है) मंत्र यह भी स्पष्ट कर रहा है कि ऐसे एक समान विचार के और मातृभूमि से एक जैसा लगाव रखने वाले लोगों का अपने देश के संसाधनों पर सामूहिक अधिकार होता है। राष्ट्र एक गाय है और गाय जैसे निश्चल होकर दूध देती है वैसे ही मातृभूति भी सबके लिए भोग्य पदार्थ देती है। अत: वह सबके लिए समादरणीया है।

धार्मिक मान्यताओं में विभिन्नताओं का अर्थ अपने-अपने विचारों या मान्यताओं के प्रति पूर्वाग्रह का प्रदर्शन करना नही है, अपितु आत्मा-परमात्मा संबंधी मतों या दार्शनिक विचारों की विभिन्नता से है। भारत में सदियों से विभिन्न सम्प्रदाय अपनी-अपनी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर जीवन यापन करते आए हैं। यहां तक कि पुराणों में एक पुराण ने दूसरे पुराण के किसी देवता की या इष्ट देव की इतनी निंदा कर डाली है कि पढ़ने में ही ऐसा लगने लगता है कि उक्त देवता की पूजा करने से तो अनर्थ हो जाएगा। परंतु इसके उपरांत भी देश में सामाजिक समन्वय बना रहा। बौद्घों, जैनियों, शैवमत, पारसियों, सिक्खों आदि ने कई बातें वेदों के विरूद्घ जाकर भी प्रतिपादित कीं परंतु इस देश की आत्मा से जुड़े रहे और इसे अपनी मानते रहे। धार्मिक मतभिन्नता को हमने राष्ट्र निर्माण में या राष्ट्र के मूल्यों के आड़े नही आने दिया। अथर्ववेद के उक्त मंत्र को हमने घोट कर पी लिया था। यदि हिंदू उग्रवादी होता या उसके भीतर दूसरों के प्रति असहिष्णुता का भाव कहीं होता तो वह इतने सारे मतों के साथ सदियों तक समन्वय बनाने में सफल नही होता। उसे तो केवल इतना ही चाहिए कि इस देश की मूल और मुख्यधारा से आप जुड़ेंगे और उसमें कहीं व्यवधान उत्पन्न नही करेंगे। साथ ही इस देश की पुण्यभूमि को अपनी पुण्यभूमि तथा पितृभूमि मानोगे।

इस्लाम के साथ सभी देशों केा समन्वय स्थापित करने में यही कठिनाई आई। इस्लाम के व्याख्याकारों ने कहा कि हमसे बस ये ही नही हो सकता कि हम इस देश की मातृभूमि को अपनी पुण्यभू और पितृभू स्वीकार करें। फलस्वरूप साम्यवादी रूस और चीन जैसे देशों में मुस्लिमों की धार्मिक आध्यात्मिक स्वतंत्रता पर भी प्रतिबंध  लगा दिया गया। उनके धर्मस्थलों को ढा दिया गया और उनका स्वतंत्र अस्तित्व नष्ट कर दिया गया। समरकंद (बुखारा) की प्रसिद्घ मस्जिद में जूते का कारखाना स्थापित कर दिया गया। चीन ने अपने यहां मुस्लिम बहुल प्रांतों में अपने नागरिकों को बसा बसाकर वहां चीनियों को बहुसंख्यक बना दिया और ऐसी दस कठोर शर्तें मुस्लिमों पर थोप दीं कि उनकी धार्मिक आजादी पूर्णत: समाप्त हो गयी। ऐसी ही स्थिति कुछ अन्य देशों में आयी। भारत ने कठोरता से हृदय परिवर्तन को सदा ही गलत माना है (यद्यपि इस नियम के भी कुछ अपवाद हैं और निश्चय ही हमने इस नियम की अति का प्रदर्शन कर अपने राष्ट्रीय हितों को चोट पहुंचाई है। हमें चाहिए था कि हम विभिन्न बोलियों और विभिन्न दार्शनिक, आध्यात्मिक मान्यताओं के लोगों का तो सम्मान करते पर देश की मातृभूमि के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने हेतु सबको प्रेरित ही नही बल्कि बाध्य भी करते।) हम राष्ट्र के विषय में ये भूल गये कि राष्ट्र का पहला नियम है कि वह सभी बातों का राष्ट्रीयकरण अनिवार्यत: करता है। अत: व्यक्ति के निजी कानून नही हो सकते, निजी नियम नही हो सकते। उनकी अपनी सीमाएं हैं और एक सीमा पर जाकर उनका राष्ट्रीयकरण हो ही जाना चाहिए। लोकतंत्र और शासन की उदारता भ्ी इस नियम को मानती है। हां, दार्शनिक चिंतन को इस प्रकार के राष्ट्रीयकरण से भी उन्मुक्त रखा जा सकता है। क्योंकि यदि दार्शनिक चिंतन पर भी प्रतिबंध लगाया गया तो सत्य का अनुसंधान निर्बाध नही चल सकेगा। दूसरे, दार्शनिकता कभी पूर्वाग्रही नही होती, वह तो स्वामी दयानंद जी महाराज के इस आदर्श पर कार्य करती है कि सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सदा उद्यत रहना चाहिए। अपनी मानवतावादी और उदार नीतियों को अपनाकर भी हम राष्ट्र निर्माण के प्रति कठोरता के प्रदर्शन में चूक कर गये। फलस्वरूप संवैधानिक और वैदिक आदर्श हमारा मार्गदर्शन नही कर पाए।

हम साम्प्रदायिकता को मिटाने चले थे और साम्प्रदायिकता की दल दल में ही जा फंसे। जिस देश का प्रधानमंत्री कहता है कि इस देश के आर्थिक संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है, उस देश से साम्प्रदायिकता कैसे विदा हो सकती है? वेद विरूद्घ बोलोगे तो अव्यवस्था उत्पन्न होगी ही। प्रदेश का मुख्यमंत्री एक वर्ग की वोट लेने के लिए उस वर्ग की लड़कियों  को 30,000 रूपये बांट रहा है, जबकि उसी विद्यालय में एक गरीब हिंदू की लड़की भी पढ़ती है, पर वह उस 30,000 की धन राशि की पात्र नही है। तब क्या यह माना जाए कि उसका हिंदू होना ही उसके लिए आफत है या दुर्भाग्य है? आज मुजफ्फरनगर में दोषियों की गिरफ्तारी हो रही है पर क्या असली दोषियों तक किसी की नजर जा रही है? दोषी दरोगा है, और निर्दोष उसकी गिरफ्त में है। क्या बढ़िया निजाम है मेरे देश का। फिर भी सब कहे जा रहे हैं कि संवैधानिक मशीनरी को फिर से ठीक करेंगे और सबको अच्छा माहौल देने का प्रयास किया जाएगा। यह अलग बात है कि संवैधानिक मशीनरी को पहले ऐसा कहने वालों ने ही फेल कर दिया था। रूसो ने कहा था कि धार्मिक असहिष्णुता अत्यंत घातक होती है। सहिष्णुता के उद्बोध के कारण एक राष्ट्र में विभिन्न धर्मवालों का सह अस्तित्व संभव है पर सामाजिक नियमों को जो न माने राज्य उन्हें देश से निकाल दे। आगे वह कहता है कि जो व्यक्ति सामाजिक नियमों को मानने की घोषणा तो करे पर दैनिक क्रियाकलापों में उन्हें माने नही तो उन्हें मृत्युदंड तक दिया जा सकता है। क्योंकि नागरिकता इन्हीं नियमों पर ठहरी हुई है। कुल मिलाकर मातंधता पर सरकार को कठोरता के प्रदर्शन से पीछे नही हटना चाहिए। हिंदू पुन: अपनी उदारता का परिचय देकर माहौल को शांत होने दें और मुस्लिम नेता इस बात को समझें कि आवाम को शांतिपूर्वक साथ साथ रहने देने में ही लाभ है। दूरियां मिटाने के लिए नजदीकियां बढ़ाने वाले सूत्र खोजने और स्थापित करने अनिवार्य होते हैं। यदि दूरियों के सूत्रों को पकड़कर बैठा गया तो अनर्थ हो जाएगा। समय का तकाजा है कि हम अपने अनिष्ट की ओर न बढ़कर अभीष्ट (राष्ट्र निर्माण) की ओर बढ़ें। 1947 को न दोहरायें क्योंकि उसे गुजरे 67 वर्ष हो गये हैं। जिन्ना को गये भी इतने ही वर्ष हो गये हैं, उसका जिन्न बार बार निकालकर देश की खुशबूदार वादियों में जहर न घोला जाए।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz