लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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संदर्भः- जम्मू-कश्मीर एवं झारखण्ड चुनाव परिणाम-

 

आतंकवाद एवं अलगाववाद से ग्रस्त जम्मू-कश्मीर और नक्सली हिंसा का संत्रास झेल रहे झारखण्ड में विधानसभा चुनाव के आए परिणामों ने जता दिया है कि भारतीय संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का पूरा भरोसा है। जनादेश का जो स्वरुप सामने आया है, उसके अनुसार झारखण्ड में 14 साल बाद स्पष्ट बहुमत की सरकार बनने जा रही है। जबकि जम्मू-कश्मीर में नया इतिहास रचा जाएगा। वहां संभवतः पीडीपी और भाजपा गठबंधन की सरकार बनेगी। भाजपा का इस राज्य की सत्ता में किसी भी रुप में भागीदार होना, इस बात का प्रतीक है कि जम्मू-कश्मीर समरसता व साझा सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। एग्जिट पोल इन राज्यों में सत्तारुढ़ दल नेशनल कांफ्रेस और झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के बाबत सूपड़ा साफ हो जाने के जो अनुमान लगा रहे थे, वैसे परिणाम आए नहीं, ऐसा क्यों हुआ इस पर राजनीतिक विषलेशकों को पुनर्विचार की जरुरत है। इसके उलट यदि भाजपा के विरुद्ध कांग्रेस समेत अन्य क्षेत्रीय दल महाविलय करके चुनाव लड़ते तो भाजपा को जहां झारखण्ड की सत्ता में आना मुश्किल होता, वहीं उसे जम्मू-कश्मीर में भी सत्ता में भागीदारी के लायक सीटें नहीं मिलती ? इस विलय में कांग्रेस ने मट्ठा डालने का काम किया था, अब उसे दोनों ही राज्यों में गर्व करने लायक भी सीटें नहीं मिली हैं। जबकि वह दोनों ही राज्यों की सत्ता में भागीदार थी।

झारखण्ड से कहीं ज्यादा अहम् जम्मू-कश्मीर विधानसभा के चुनाव हैं। क्योंकि आतंक और अलगाव से प्रभावित इस राज्य में एक समय ‘जिस कश्मीर को खून से सींचा है, वह कश्मीर हमारा है’ का नारा गूंजा करता था। लेकिन चुनाव की घोषणा के बाद इसी घाटी में नरेंद्र मोदी के नारे ‘सबका साथ, सबका विकास’ और अमित शाह की रणनीति ने हालात बदल दिए। और चुनाव प्रचार के दौरान वहां नारा गूंजा ‘न दूरी है न खाई है, मोदी हमारा भाई है।’ बदलाव का यह नारा भाजपा, हिंदू संगठन या विस्थापित कश्मीरी पंडित नहीं, बल्कि देवबंद के जमात-ए-उलेमा हिंद के वे लोग लगा रहे थे, जो कश्मीर में सौहार्द का वातावरण चाहते थे। जाहिर है, जिस कश्मीर में राष्ट्रिय तिरंगा फहराने के लिए भाजपा को संघर्ष करना पड़ता था, उस राज्य में वह पीडीपी के बाद दूसरी बड़ी पार्टी के रुप में उभर आई है। लिहाजा मानना होगा कि देश में फिलवक्त मोदी के कद का कोई दूसरा नेता किसी भी दल में नहीं रह गया है।

देश इस राज्य में दूसरे भी कई राष्ट्रिय मकसदों को हासिल करने में सफल रहा है। राष्ट्रिय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने कहा भी है कि जम्मू-कश्मीर में शान्तिपूर्ण, पारदर्षी, स्वतंत्र व निष्पक्ष मतदान होना रणनीति के लिहाज से देश की संप्रंभूता व अंखडता के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह पहली मर्तबा हुआ कि 1989 में जब इस राज्य में आंतक व अशान्ति की शुरूआत हुई थी,तब से लेकर अब तक पहली बार 66 फीसदी भारी मतदान हुआ। मतदाताओं ने आंतकियों की चुनाव बहिष्कार संबंधी धमकी की परवाह किए बिना बेखौफ होकर मतदान किया। यह भी पहली बार हुआ कि भाजपा ने विधानसभा की सभी सीटों पर चुनाव लड़ा और वह अपना झंडा गांव-गांव फहराने में सफल रही। राज्य को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 को खत्म कर देने की वकालत करने और हिंदु बहुल पार्टी होने के कारण भाजपा अब तक घाटी में पैठ नहीं बना पाई थी, लेकिन इस दुर्गम क्षेत्र में ज्यादातर सीटों पर वही दूसरे स्थान पर रही है। यह पैठ राष्ट्रियता की दृष्टि से अहम् है।

इस चुनाव में जिस तरह से आतंक के प्रतीक अलगाववादियों को चौतरफा मुंह की खानी पड़ी है, उससे तय है, कश्मीर में पाकिस्तान का नापाक हस्तक्षेप कालांतर में अप्रासंगित होता चला जाएगा। जबकि पाक आंतकियों की सीमा पर घुसपैठ कराने व हिंसक वारदातों को अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश पूरे चुनाव के दौरान करता रहा। लेकिन मतदाताओं ने भारी मतदान करके उसकी मंशाओं पर पानी फेर दिया। निष्पक्ष व स्वतंत्र निर्वाचन प्रक्रिया के तहत जो जनमत संग्रह भारतीय लोकतंत्र के पक्ष में हुआ है, उससे साफ है कि कश्मीरियों की आस्था देश की संवैधानिक व्यवस्था में है ? गोया, अब पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र संघ में यदि जनमत संग्रह का मुद्दा उठाता है, तो यह उसकी हठधर्मिता है। वरना मतदाता ने तो अपनी इच्छा व्यक्त कर दी है।

जिस तरह से मतदाता ने जम्मू-कश्मीर में खंडित जनादेश दिया है, उससे तय है, वहां किसी भी दल के लिए एकाएक सरकार बना लेना पेचीदा मसला होगा। नतीजों के बाद मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेत्त्व वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी सबसे बड़े दल के रुप में उभर जरुर आई है, लेकिन अब समर्थन किससे ले यह उसके लिए बड़ा धर्म संकट है ? हालांकि कांग्रेस से समर्थन लेकर पीडीपी सत्ता पर काबिज हो सकती है ? लेकिन ऐसा होगा तो राज्य को केंद्र का भरपूर सहयोग नहीं मिलेगा,ये आशंका राज्य सरकार को बनी रहेगी। क्योंकि केंद्र में राजग गठबंधन की सरकार है। लिहाजा उम्मीद है कि इस राज्य में पीडीपी और भाजपा गठबंधन की सरकार बनेगी। पीपुल्स कांफ्रेस के अलगाववादी नेता सज्जाद लोन ने भी यही उम्मीद जताई है। भाजपा को सत्ता में शिरकत की स्थिति इसलिए मिलने जा रही है, क्योंकि जम्मू-कश्मीर में सभी प्रमुख दल स्वतंत्र रुप से चुनाव लड़े हैं।

झारखण्ड में भाजपा 42 सीटें जीतकर चुमाचुम बहुमत ही हासिल कर पाई है। यह उसके लिए एक उपलब्धि भी है और झटका भी है। क्योंकि सभी राजनीतिक परिस्थितियां उसके अनुकूल थीं और एग्जिट पोल उसे 2 तिहाई बहुमत के करीब पहुंचा रहे थे। फिर भी वह जनता की उम्मीदों पर खरी उतरने जा रही है,क्योंकि स्वतंत्र राज्य के रुप में वजूद में आने के बाद पहली बार झारखण्ड को स्पष्ट बहुमत की सरकार मिली है। और जनता को आए राम, गए राम से मुक्ति मिल गई है। वरना यह राज्य गठबंधन का दंश झेलता रहा है। इस नए राज्य के गठन के पीछे राजनीतिक मंशा थी कि यह राज्य सुशासन और विकास के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित करके देश में आदर्श राज्य की भूमिका रचेगा। इसके समृद्धशाली बन जाने की कल्पना इसलिए थी, क्योंकि यहां अकूत प्राकृतिक संपदा है। लेकिन इन 14 वर्षों में जो राजनीति पतन और भ्रष्टाचार का बोलवाला इस राज्य में देखने में आया, वैसा उदाहरण देश में दूसरा नहीं है।

इस दौरान यहां 9 मुख्यमंत्री रहे और 3 मर्तबा राष्ट्रपति शासन रहा। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के चलते, कई मुख्यमंत्री जेल के सींखचों के पीछे रह आए हैं। शिबू सोरेन को तो तीन बार मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला, लेकिन गठबंधन की सरकारों के चलते वे कभी छह माह से ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री नहीं रह पाए। झारखण्ड में पहली बार लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार मिलकर चुनाव लड़े है। उनका यह प्रयोग उनके लिए तो कारगर साबित नहीं हुआ, लेकिन शायद भाजपा को दो तिहाई बहुमत से दूर रहने का काम जरूर इस जोड़ी ने कर दिया है। क्योंकि ये दोनों नेता इस प्रांत के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में यह संदेश फैलाने में सफल रहे कि प्रदेश में भाजपा की सरकार बन गई तो आदिवासियों की जमीनें उद्योगों के लिए छीन ली जाएंगी। भूमि अधिग्रहण और कोयला अधिनियम में संशोधन इसीलिए किए जा रहे हैं। सत्तारुढ़ झारखण्ड मुक्ति मोर्चा भी यही संदेश प्रचारित करके मतदाताओं को डराने में लगी रही। संयोग से मतदान प्रक्रिया के दौरान ही संसद चली और उसमें भी भूमि अधिग्रहण संशोधन मुद्दा गर्माता रहा। आदिवासी बहुल क्षेत्रों में ही भाजपा पिछड़ी है। लिहाजा यह भाजपा के लिए सबक भी है कि वह एफडीआई के लिए आम आदमी के हक से जुड़े कानूनों को शिथिल करने की भूल न करे, अन्यथा उसे अन्य राज्यों में भी झारखण्ड जैसे हालातों का सामना करना पड़ सकता है ?

 

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