लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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अशोक गौतम

अरी ओ ममता दीदी! तुमने तो हद कर दी! हमें औरों से तो ये उम्मीद थी पर कम से कम तुमसे ये उम्मीद न थी। अब हमें मंझधार में किसके सहारे छोड़ दिया री दीदी! ऐसे तो अपने भार्इ के साथ दुश्मन भी नहीं करता। तुम्हारे लिए हमने क्या क्या नहीं किया दीदी? तुम्हें हमने क्या क्या नहीं दिया दीदी! जो तुम कहती रहीं, हम चुपचाप करते रहे, तुमसे ही नहीं, सच पूछो तो सपने में भी तुम्हारे साए से डरते रहे। तुम्हारे साथ के लिए तुम्हारे बंदों को क्या क्या नहीं दिया? पर हाय रे भाग हमारे! हम कहते रहे जिन्हें कि वे है हमारे, पर सब सह उनके नखरे वे हुए न हमारे। हम कितनी शिददत से कहते नहीं अघाते थे कि जब तक हमारी दीदी जैसे हमारे सनम हैं, हमें विपक्ष का रत्ती भर भी नहीं गम है। देखो न! तुम रूठती रही, हम मनाते रहे! जैसे कैसे सरकार चलाते रहे।

तुम्हारे निर्दयी हो हमें छोड़ कर जाने के बाद देखो तो मुलायम भी कितने कठोर हो रहे हैं दीदी! माया के जाल में हम न चाहते हुए भी हिरण से उलझे जा रहे हैं। माया के जाल को सुलझाने की जितना कोशिश करते हैं, जाल है कि हमें उतना ही उलझा रहा है। करूणा के निधि हमें सपने में भी डरा रहे हैं।

अरी दीदी, कुछ ही महीनों की तो बात थी। गिरना तो हमें है ही। आज नहीं तो कल! जोड़ तोड़ की टांगों पर भरोसा कब तक रखे निर्बल! औरों की टांगों के सहारे कौन भला कबतक चल सकता है? पर कम्बखत ये कुर्सी का मोह है न! गधे को भी मामा कहने के लिए मजबूर किए रहता है।

दीदी! अपने सिर हमें गिराने का लांछन क्यों ले रही हो! वैसे भी अपनी टांगों में अब चलने का दम ही कहां बचा है री दीदी? सच कहें, जबसे एक सरकारी स्कूल के ड्राइंग मास्टर जी ने हमारी रोनी सी सूरत बनार्इ है तबसे हम रो ही रहे हैं।

अरे! है कोर्इ देश में ऐसा खानदानी हाकिम जो शादी से पहले और शादी के बाद के कमजोरों के इलाज का सफलता से दावा करने के बाद हमारा भी इलाज कर सके। हमारी बदनसीबी! हम सत्ता में आने से पहले भी कमजोर थे और सत्ता में आने के बाद भी कमजोर ही रहे।

अरी दीदी! पहली बार तो दमखम के साथ एक कदम उठाया है और तुम हो कि… क्या तुम नहीं चाहती कि इस देश में कम से कम सरकार एक कदम तो अपने पैरों से ले। तुमने साल में चौबीस गैस सिलेंडरों की मांग कर हमारी भी गैस निकाल दी। री दीदी! अकेली हो, जरा सोचो! क्या करोगी साल भर में इतने गैस सिलेंडर लेकर? कहां रखोगी उन्हें? घर से हर कोर्इ उठा चुरा ले जाएगा तो। मुहल्ले में बांटने हैं क्या! छोड़ो जनता की पैरवी करना! जनता को तो अब दिन को भी अंधेरे में रहने की आदत पड़ चुकी है। अगर गलती से उसे दिन में रोशनी दिखने लगती है तो उसकी आंखें चौंधिया जाती हैं। असल में उसे अंधेरों से प्यार हो गया है। उसे क्या, उसे एक सिलेंडर भी न दो। घर में कौन सा आटा दाल है जो उसे पकाने हैं। दर्द पकाने के लिए गैस की जरूरत थोड़े ही होती है। वे तो बिन गैस सिलेंडरों के भी पक जाते हैं। अरी तुम क्यों एफडीआर्इ का विरोध कर रही हो! दलालों को जीने के सारे हुनर आते हैं।

प्यारी दीदी, न्यारी दीदी मान जाओ! छोड़ो भी ये गुस्सा जरा हंस के दिखाओ! हमने काल किया था, एसएमएस भी किया था, कसम कुर्सी की न झूठा बनाओ। प्यारी दीदी, हमारी दीदी मान जाओ! हठ कर देश को न और अस्थिर बनाओ!

अंदर की बात कहें दीदी, हम राजनीति में जनता का भला करने थोड़े ही आए हैं । हम तो बस घोटाले करने आए हैं। अपने घर भरने आए हैं। अपनों को मालामाल करने आए हैं। लोकतंत्र का अव्यक्त मतलब ही यह है कि माल जनता का, पेट नेता का। जनता र्इमानदारी से बस वोट पाए और चुनाव के बाद नेता माल खाए। ये अपने देस की जनता है न! देख लिया, ये तो मरने के बाद भी खुश नहीं होती। देस में जबतक लोकतंत्र है ,ये गरीब ही रहेगी। इसे हमें गरीब ही रहने देना होगा।

देख लो दीदी! आगे तुम्हारी मर्जी! जब जन सेवा का जनूं संग छोड़ दे!जब दिमाग अकेले चलने का मोह तोड़ दे! तो तुम हमारे यूपीए में आना ओ दीदी! दर हमारा खुला है खुला ही रहेगा, तुम्हारे लिए….

 

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