लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

Posted On by &filed under व्यंग्य.


-विजय कुमार-

summer

इन दिनों गर्मी काफी पड़ रही है। कल शाम छींटे पड़ने से मौसम कुछ हल्का हुआ, तो मैं शर्मा जी के घर चला गया। वहां वे छुट्टियों में आयी अपनी नाती गुंजन को कहानी सुना रहे थे।

एक गांव में मन्नू नामक लड़का रहता था। जब वह पांच साल का हुआ, तो पढ़ने जाने लगा। इससे उसे लगा कि वह अब बड़ा हो गया है। वह बार-बार अपनी मां से जिद करता कि उसे भी कुछ काम दिया जाए, जिससे उसे पूरा कर वह अपने बड़ेपन और जिम्मेदार होने को सिद्ध कर सके।

उसकी जिद देखकर मां ने शाम को सब्जी लाने की जिम्मेदारी उसे दे दी; पर मन्नू को चैन कहां ? वह शाम होने से पहले ही सब्जी वाले के पास पहुंच गया। सब्जी वाले ने पूछा, ‘‘क्या सब्जी दूं ?’’ मन्नू चुप। यह तो उसने मां से पूछा ही नहीं था। दुकानदार समझदार था। उसने मन्नू के उत्साह को भंग करना उचित नहीं समझा और आलू, प्याज, बैंगन आदि चीजें तोल कर कहा, ‘‘लाओ थैला, सब्जी डाल दूं।’’ अब मन्नू फिर गुमसुम। क्योंकि वह थैला भी नहीं लाया था। दुकानदार ने प्लास्टिक की थैली में सब्जी देकर तीस रु. मांगे; पर मन्नू के पास तो पैसे भी नहीं थे। दुकानदार मन्नू की मां को जानता था। क्योंकि वे रोज सब्जी लेने आती थीं। प्रायः मन्नू भी उनके साथ में आता था। इसलिए उसने बिना पैसे लिये ही सब्जी दे दी।

मन्नू सिर झुकाए घर पहुंचा, तो सारी बात जानकर मां ने उसे डांटा, ‘‘बाजार जा रहे थे, तो पैसे और थैला लेकर जाना चाहिए था। क्या सब्जी लानी है और कितनी लानी है, सब पूछ कर जाना चाहिए था। बुद्धु कहीं का।’’ मन्नू बेचारा क्या कहता, चुपचाप बिस्तर पर जाकर लेट गया। वह इतना गुस्से में था कि मां ने कुछ खाने को दिया, तो उसने मना कर दिया।

 

लेकिन खुद को बड़ा और जिम्मेदार तो सिद्ध करना ही था। तीसरे दिन मां ने दूध लाने को कहा, तो उसने एक लीटर दूध के लिए मां से चालीस रुपये लिये और खूंटी से थैला उतारकर बाजार चला गया। दुकानदार ने दूध नापकर डोलची मांगी, तो मन्नू ने थैला आगे कर दिया। ये दुकानदार भी उन्हें जानता था, सो उसने भी अपनी तरफ से एक डोलची में दूध दे दिया।

घर पहंुचने पर फिर उसकी कान खिंचाई हुई, ‘‘मन्नू, तुम निरे बुद्धु ही हो। दूध के लिए थैला नहीं, ढक्कन वाली डोलची लेकर जाना चाहिए। जिससे दूध जरा भी न छलके। पता नहीं तुम्हें अकल कब आएगी।’’ मन्नू फिर बिस्तर पर जाकर लेट गया और रोने लगा।

ऐसे ही कई दिन बीत गये। मन्नू बहुत दिन से एक पिल्ला लेना चाहता था। रात में पिताजी ने बताया कि उनकी कालोनी में रहने वाले गुप्ता जी की कुतिया ने तीन पिल्ले दिये हैं। मेरी उनसे बात हो गयी है। अगले रविवार को वहां से एक पिल्ला ले आएंगे।

 

पर मन्नू को चैन कहां ? गुप्ता जी के घर वह कई बार गया था। वह अगले ही दिन ढक्कन वाली डोलची लेकर वहां पहुंच गया और पिल्ले को डोलची में रखकर, अच्छी तरह ढक्कन लगा लिया, जिससे वह जरा भी न छलके, और घर आ गया। बेचारे पिल्ले का तो जो हुआ, सो हुआ; पर मन्नू की इस बार अच्छी पिटाई हो गयी।

शर्मा जी कहानी को आगे बढ़ाते, इससे पहले ही गुंजन ने उनके मुंह पर हाथ रख दिया। वह शैतान की आंत की तरह बढ़ रही इस कहानी को और अधिक झेलने के मूड में नहीं थी। उसने कहा, ‘‘ पर नाना जी इस कहानी का अर्थ क्या है ?

– इसका अर्थ है कि कोई भी जिम्मेदारी लेने से पहले व्यक्ति को चाहिए कि वह उसके योग्य बने। बच्चे को बाप बनने की जिद नहीं करनी चाहिए। वरना मन्नू जैसा हाल हो जाता है।

गुंजन की समझ में कहानी तो कुछ आयी थी; पर उसका अर्थ पल्ले नहीं पड़ा। मैंने देखा, शर्मा जी की मेज पर जो अखबार रखा था, उसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और उपराज्यपाल नजीब जंग में अधिकारों के लिए हो रही खींचतान की खबरें  मुखपृष्ठ पर बड़े-बड़े शीर्षक में छपी थीं।

मैंने अखबार उठाया ही था कि गंुजन ने मेरा हाथ पकड़ लिया, ‘‘बाबा जी, अब आप एक कहानी सुनाइये।’’

मैं अचानक हुए इस हमले से सहम गया। फिर कुछ संभलकर बोला, ‘‘अच्छा गुंजन बेटी, मैं तुम्हें एक गीत-कहानी सुनाता हूं।’’

 

– गीत-कहानी क्या होती है ?

 

– इसमें गीत भी होता है और कहानी भी। या यों कहो कि कहानी को गीत के रूप में सुनाते हैं।

 

– अच्छा सुनाइये।

 

मैं गीत-कहानी सुनाने लगा।

 

चल चमेली बाग में मेवा खिलाएंगे।

मेवे की डाली टूट गयी, चद्दर बिछाएंगे

चद्दर का कोना फट गया, दर्जी बुलाएंगे।

दर्जी की सुई टूट गयी, लोहार बुलाएंगे

लोहार की नानी मर गयी, ढम-ढम बजाएंगे।।

 

गंुजन को ‘ढम-ढम बजाएंगे’ वाली बात बहुत पंसद आयी। वह ताली बजाकर हंसने लगी। तभी नानी ने उसे शिकंजी पीने के लिए बुला लिया।

 

शर्मा जी बोले – क्यों वर्मा, दिल्ली में आजकल जो बिना पैसे की कुश्ती हो रही है, तुम उसे देख रहे हो ?

 

– जी हां।

 

– तो तुम्हारी इस पर क्या प्रतिक्रिया है ?

 

– प्रतिक्रिया क्या होनी है शर्मा जी। बंदर के हाथ में उस्तरा थमा दिया है, तो यही होगा।

 

– पर हमें क्या करना चाहिए ?

 

– कुछ नहीं, अब तो अगले पांच साल तक हम और आप मिलकर ‘‘ढम-ढम बजाएंगे।’’

 

शर्मा जी खिसियाकर शिकंजी लेने अंदर चले गये। मैं फिर केजरी ‘आपा’ और नजीब जंग के ‘जंगी समाचार’ पढ़ने लगा।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz