लेखक परिचय

डा. अरविन्द कुमार सिंह

डा. अरविन्द कुमार सिंह

उदय प्रताप कालेज, वाराणसी में , 1991 से भूगोल प्रवक्ता के पद पर अद्यतन कार्यरत। 1995 में नेशनल कैडेट कोर में कमीशन। मेजर रैंक से 2012 में अवकाशप्राप्त। 2002 एवं 2003 में एनसीसी के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित। 2006 में उत्तर प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ एनसीसी अधिकारी के रूप में पुरस्कृत। विभिन्न प्रत्रपत्रिकाओं में समसामयिक लेखन। आकाशवाणी वाराणसी में रेडियोवार्ताकार।

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secrets of the floating world compound eye
अथाह समुद्र की गहराइयों में, न जाने कितने रहस्य दफन हैं। सागरों की लहरों में अठखेलियां करते न जाने कितनी जिज्ञासाओं और घटनाओं ने अक्सर मानव का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट किया है। कुछ ऐसे भी क्षेत्र  हैं, महासागरो में जिनका रहस्य उनकी गुत्थियां आज तक कोई सुलझा नहीं सका। पूर्वी-पश्चिमी अटलाटिंक महासागर में ऐसा ही एक रहस्यमयी क्षेत्र है’ बरमूडा त्रिकोण। इस इलाके में आज तक अनगिनत समुद्री और हवाइ जहाज आश्चर्यजनक रूप से गायब हो गये हैं। कुछ लोग इसे किसी पालौकिक ताकत की करामात मानते हैं, वहीं कुछ लोग ऐसी मान्यता के भी हैं जो इसे प्राकृतिक घटना से ज्यादा महत्व नहीं देते।
सदियों से इस विषय पर चर्चायें होती रही हैं। हम इस विषय के विस्तार में प्रवेश करें, इसके पूर्व यह आवश्यक है कि हम उस रहस्यमयी त्रिकोण के स्थान को स्पष्ट करें। महासागर में उसकी सिथती कहा है? लेकिन यह बताने के पूर्व एक विमान चालक की बातचीत के कुछ हिस्से का हम यहा उल्लेख करना चाहेंगे- ‘ हम नहीं जानते कि पशिचम किस दिशा में है, सब कुछ गलत हो गया है। हमें कोई भी दिशा समझ में नहीं आ रही है। हमें अपने अड्डे से 225 मील उत्तर पूर्व में होना चाहिये, लेकिन ऐसा लगता है कि…। और उसके बाद आवाज आनी बन्द हो गयी। यह आवाज रिकॉर्ड की गयी थी, 5 सितम्बर 1945 को। बरमूडा त्रिकोण की यह सबसे विख्यात दुर्घटना थी, जिसमें पाच तारपीडो यान नष्ट हो गये थे। इन यानो का पता लगाने के लिये तुरन्त ही मैरिनर फलाइंग बोट भेजी गयी थी जिसमें 13 लोग सवार थे। लेकिन वो बोट भी कहा गयी, इसका भी पता नहीं चला।
दरअसल यह दुर्घटना क्षेत्र संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिणी पूर्वी अटलाटिंक महासागर के 25 से 45 डिग्री उत्तर तथा देशान्तर 55 से 85 डिग्री के बीच फैले 3900,000 वर्ग किमी के बीच सिथत है। जो एक काल्पनिक त्रिकोण जैसी आकृति में दिखती है। इसे ही बरमूडा त्रिकोण के नाम से जाना जाता है। इस त्रिकोण के तीन कोने बरमूडा, मियामी तथा सेन जआनार, पुतौरिका को स्र्पश करते है। वर्ष 1854 से इस क्षेत्र में कुछ ऐसी रहस्यमयी घटनाए घटित होती रही है कि इस क्षेत्र को मौत के त्रिकोण के नाम से पहचान मिल गयी। बरमूडा त्रिकोण पहली बार विश्व स्तर पर  उय समय चर्चा में आया जब 1964 में आरगोसी पत्रिका में इस पर लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख को विसेंट एच गोडिस ने लिखा था। इसके बाद लगातार सम्पूर्ण विश्व में इस पर इतना कुछ लिखा गया कि 1973 में इनसाइक्लोपीडिया बि्टानिका में भी इसे जगह मिल गयी।
इस मामले में ऐरिजोना स्टेट विश्वविद्यालय के शोध लाइब्रेरियन और ‘ द बरमूडा ट्रायंगल मिस्ट्री : साल्व्ड  लारेंस डेविड कुशे ने गहन शोध कार्य किया। उनका नतीजा बाकी लेखकों से अलग था। उन्होंने प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा विमानों के गायब होने की बात को गलत करार दिया। कुशे ने लिखा कि विमान प्राकृतिक आपदाओं के कारण दुर्घटनाग्रस्त हुए।
इसी सन्दर्भ में आस्ट्रेलिया में शोध किया गया। शोध के अन्र्तगत पाया गया इस क्षेत्र विशेष में मिथेन हाइड्राइड की अत्यधिक मात्रा पायी जाती है। इससे उठने वाले बुलबुले किसी भी जहाज के डूबने के कारण बन सकते हैं। इसके अलावा अत्यधिक चुम्बकिय क्षेत्र होने के कारण जहाजों में लगे उपकरण काम करना बन्द कर देते है। इसकी वजह से कम्पास ( दिशा सूचक यन्त्र ) इस क्षेत्र विशेष में कार्य करना बन्द कर देते है। अत: जहाजों का रास्ता भटक जाना और दुर्घटनाग्रस्त हो जाना यहां के लिये आम बात है। 16 सितम्बर 1950 को पहली बार इस बारे में अखबार में लेख छपा। दो साल बाद फैट पत्रिका में ‘ सी मिस्ट्री एट अवर बैक डोर ” नामक शीर्षक से जॉर्ज एक्स सेंड का एक संक्षिप्त लेख छपा। इस लेख में वायुयानों, तथा समुद्री जहाजों सहित अमेरिकी जलसेना के पांच टीबीएम बमवर्षक विमानो  फलार्इट 19 के लापाता होने का विवरण था। विवरण के अनुसार चालको को यह कहते हुए सुना गया था कि – ‘हमें नहीं पता है कि पानी नीला है या हरा। कुछ भी सही होता हुआ नहीं नजर आ रहा है।’ जलसेना के अधिकारियो के हवाले से लिखा गया कि विमान किसी दूसरे ग्रह पर चले गये।
इतना ही नहीं मशहूर अन्वेषक क्रिस्टोफर कोलंबस पहले लेखक थे, जिन्होंने यहां के अजीबो-गरीब घटनाक्रम के बारे में विस्तार से लिखा। बकौल क्रिस्टोफर – उन्होंने  और उनके साथियों ने आसमान में बिजली का अनोखा करतब देखा, उन्हें आकाश में आग की लपटें भी दिखार्इ दी। उनकी बातों को बाद में समुद्री यात्रा पर निकले दूसरे लेखकों ने भी तस्दीक की। बहरहाल, तमाम शोध और जाच पड़ताल के बाद भी इस नतीजे पर नहीं पहुचा जा सका है कि आखिर जहाजों का पता क्यों नहीं लग पाया… उन्हें आसमान निगल गया, या समुद्र लील गया… यदि दुर्घटना हुयी तो मलबा क्यों नहीं मिला… ये प्रश्न आज के तारीख में भी अनुत्तरित है।

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1 Comment on "बरमूडा ट्रायंगल दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहां"

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bipin kishore sinha
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एक ज्ञानवर्धक लेख. बधाई.

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