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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-निशा शुक्ला-
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भारत ने जब-जब भारत के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है, पाकिस्तान ने बदले में भारत की पीठ पर छुरा चलाया है। असल में यह पाकिस्तान की डीएनए में ही है, वह कभी दोस्ती और स्नेह को नहीं मान सकता है। 19 फरवरी 1999 को अटल बिहारी वाजपेई ने सदा-ए-सरहद नाम से दिल्ली से लाहौर तक बस यात्रा शुरू कि जिसका उद्घाटन करते हुए खुद वाजपेई ने प्रथम यात्री के रूप में उस बस पर सवार होकर पाकिस्तान की यात्रा की और नवाज शरीफ से मिलकर दोनों देशों के संबंधों को सुधारने की पहल की, जिसके कुछ ही समय पश्चात तत्कालीन सेनाध्यक्ष परवेज मुशर्रफ की शह पर पाकिस्तानी सेना व उग्रवादियों ने कारगिल हिल की कई पहाड़िय़ों पर कब्जा कर लिया और दोनों देशों को युद्ध की खाईं में ढकेल दिया। अब जब कि फिर से नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी है तो वह भी दोनों देशों के संबंधों को सुधारने के प्रयास में जुट गए हैं यही वजह है कि मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सभी पड़ोसी देशों के शीर्ष नेतृत्व को आमंत्रित कर आपसी संबंधों सुधारने की एक सकारात्मक पहल की। लेकिन नवाज शरीफ के भारत से वापस जाने के कुछ ही दिन के भी भीतर सीमापार से कई बार हुई फायरिंग व संघर्ष विराम का उल्लंघन कई सवाल खड़े करता है कि क्या वाकई पाकिस्तान भारत से संबंध सुधारने का इच्छुक है, या फिर वह बार-बार दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने की कोशिश महज दिखावा है।

कभी भारत का अहम अंग रहे पाकिस्तान को भारत फूटी आंख नहीं सुहाता। यही वजह है कि पाकिस्तान जब-तब भारत की संप्रभुता को नुकसान पहुंचाने में लगा रहता है। कभी सीमापार से घुसपैठियों को भेजकर तो कभी भारत में आतंकी घटनाओं को अंजाम देकर तो कभी युद्ध कर, लेकिन काश्मीर पर कब्जा करने की कोशिश में आज तक वह सफल नहीं हो पाया, फिर भी वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा। भारत में सत्ता परिवर्तन की लहर और मोदी के पीएम बनने से घबराए पाकिस्तान को उस समय शायद थोड़ी रात मिली होगी जब पीएम नरेन्द्र मोदी ने शपथ ग्रहण समारोह में भारत को पड़ोसी देशों के शीर्ष नेतृत्व को आमंत्रित कर दोस्ती और आपसी संबंधों को मधुर बनाने की पहल की। लेकिन पाकिस्तान और तमाम आतंकी संगठनों को मोदी का पीएम बनना रास नहीं आ रहा। यही कारण है कि पाक पीएम के भारत से वापस जाने के चन्द दिनों के भीतर ही पुंछ, राजौरी समेत अन्य इलाकों में संघर्ष विराम का उल्लंघन कर भारत को और मोदी सरकार को चुनौती दी गई कि पाकिस्तान को भारत से दोस्ती करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। मेरा मानना है की मोदी सरकार को पाक पर तनिक भी भरोसा नहीं करना चाहिए क्योंकि पाक की कथनी व करनी में जमीन आसमान का अंतर होता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब भारत ने पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है, तब-तब पाकिस्तान ने उसे धोखा दिया है और सीमा पार से सैन्य कार्रवाई कर भारत की संप्रभुता को चोट पहुंचाने की हर संभव कोशिश की है। हां, वह बात और है कि वह अपने मकसद में कभी भी कामयाब नहीं हो पाया, जब-जब भी उसने भारत पर चढ़ाई की तब-तब उसे मुंह की खानी पड़ी। चाहे वह कारिगल युद्ध हो या फिर 1948, 1965 व 1975 की लड़ाई।

जुम्मा-जुम्मा चार दिन भी नहीं हुआ, पाक प्रधानमंत्री को भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए और दोनों देशों संबंधों को मधुर बनाने का बयान दिए हुए। अभी दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने की प्रक्रिया ठीक से शुरू भी नहीं हो पाई थी कि जम्मू कश्मीर नियंत्रण रेखा पर गोली बारी उस समय शुरू हो गई जब भारत के रक्षा मंत्री जम्मू कश्मीर के दौरे पर आने वाले थे, ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान दोनों देशों के संबधों को सामान्य करने को लेकर तनिक भी गंभीर नहीं दिख रहा है, या फिर यह कहा जा सकता है कि नवाज शरीफ की सरकार पर आज भी सेना हावी है तभी तो सीमापार से हो रही सैन्य कार्रवाई नवाज शरीफ के भारत में दिए गए बयानों के विपरीत होती दिख रही है।

गौरतलब है कि भारत ने जब-जब भी पाक की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया और दोनों देशों के संबंधों को सुधारने की ओऱ सकारात्मक पहल की तब-तब पाकिस्तान ने उसे धोखा दिया। वजह साफ है 1947 में भारत पाक के बंटवारे के बाद से ही दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर तनातनी रही, जिसमें सबसे अहम मुद्दा था जम्मू कश्मीर, जिसे आधार मानकर पाकिस्तान जब-तब भारत पर हमला करने, या फिर आतंकी घटनाओं को अंजाम देने सा बाज नहीं आता। मालूम हो कि 1965 में दोनों देशों क बीच हुए संघर्ष की शुरूआत भी पाकिस्तान ने कंकर कच्छ में झड़प से शुरू की थी। शुरू में तो इस झड़प में सीमा सुरक्षा बल ही शामिल था, बाद में दोनों की सेना को भी इस लड़ाई में शामिल होना पड़ा।

इसी क्रम में 1971 में भारत पाकिस्तान के बीच एक बार फिर सैन्य युद्ध हुआ। इस लड़ाई की शुरूआत भी पाकिस्तान ने ही की थी। इस युद्ध को बांग्लादेश मुक्ति युद्ध भी कहा जाता है क्यों कि इसके बाद बंगलादेश पाक से अलग होकर एक अलग देश बना था। इसी तरह से 1999 में भी पाकिस्तान ने भारत के साथ धोखा किया था। मोदी की तरह 1999 में जब देश में अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार थी तो अटल ने भी दोनों देशो की बीच संबंध को सुधारने की कोशिश की थी जिसका जवाब पाक ने भारत को कारगिल युद्ध के रूप में दिया था। 1999 में जब देश में अटल बिहारी वाजपेई की सरकार थी तब उन्होंने भी दोनों देशो के बीच संबंधों को सुधारने के लिए लाहौर तक बस य़ात्रा शुरू कराई लेकिन पाकिस्तान ने उनके प्रयासों को कारगिल में घुसपैठ करके बेकार कर दिया।

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