लेखक परिचय

पवन चौरसिया

पवन चौरसिया

RESEARCH SCHOLAR JAWAHARLAL NEHRU UNIVERSITY

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पवन चोरासिया

यह कहना बिलकुल भी अतिशियोक्ति नहीं होगा की उरी हमला भारत की आत्मा पे हमला है l 17 जवानों का शहीद हो जाना बहुत ही दुखद घटना है जिसकी पीड़ा को किसी भी शब्द में व्यक्त करना संभव नहीं हैl निश्चित ही अब सरकार के ऊपर बहुत ही दबाव होगा की कोई ठोस कदम उठाया जाए l पर इस देश की विडम्बना ये है की हमारे ठोस कदम इतने ठोस होते हैं की कभी उठ ही नहीं पाते हैं l पाकिस्तान-नीति हमारी विदेश-नीति का सबसे अप्रिय और अस्थिर हिस्सा रहा है और पंडित नेहरू से लेकर मोदी तक हर प्रधानमंत्री को इस से दो चार होना पड़ा है l जैसा की प्रधानमंत्री मोदी ने एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा था की समस्या यह है के पाकिस्तान में यदि शांति प्रक्रिया के लिए बात की भी जाए तो किस से ? चुनी हुई लोकतान्त्रिक सरकार से, या फिर सेना और isi से l दरसल इस घटना को स्पष्ट रूप से समझने के लिए हमे इतिहास के पन्नो को खंगालना होगा lभारत की ओर से किसी भी विश्वास बहाली के प्रयास का पाकिस्तान ने हिंसक रूप से उत्तर दिया है और भारत की पीठ में हमेशा छुरा ही भोका हैI 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी की ऐतहासिक लाहौर यात्रा का जवाब पाक ने कारगिल युद्ध के रूप में दिया, तो वही पिछले साल मोदी की अनियोजित पाक यात्रा का जवाब पठानकोट एयर बेस पर फिदायीन हमले से दिया है l
भारत में इस हमले के प्रति व्यापक आक्रोश हैI सोशल मीडिया में तो सरकार को व्यापक आलोचना झेलनी पड़ रही हैl सरकार की सबसे ज़्यादा आलोचना संघ और भाजपा समर्थकों द्वारा ही की जा रही हैl दरअसल 2014 लोक-सभा चुनाव के पहले तक मोदी तत्कालीन सप्रंग सरकार पर पाकिस्तान के प्रति ढुलमुल रवैया रखने और कोई कार्यवाही न करके महज़ “कड़ी निंदा ” करने का आरोप लगाते थेl अब समय बदल गया है और सत्ता का केंद्र वो स्वयं है l ऐसे में ये लाज़मी है की वो साबित करें की उनको जो विशाल जनादेश मिला है वे उसके साथ न्याय कर रहे हैं l पाकिस्तान-समर्थित और पोषित आतंकवाद और अलगाववाद ने 1990 से कश्मीर में एक खुनी जंग छेड़ रखी है जिसका सबसे ज़्यादा नुकसान कश्मीर के आम नागरिको को झेलना पड़ा हैl राज्य-प्रायोजित आतंकवाद पाकिस्तान की विदेश नीति का अभिन्न अंग है जिसका प्रयोग वो अपने पडोसी मुल्क – भारत और अफ़ग़ानिस्तान के विरुद्ध छद्म युद्ध छेड़ के करता रहा है l दरअसल उसकी कुंठा इस बात से भी बहुत बढ़ी हुई है की कश्मीर में इस बार जो भाजपा -पीडीपी गठबंधन की सरकार है उसने आतंकवाद के खिलाफ एक सख्त रवैया अपनाया हुआ है जो की बुरहान वानी की मौत के बाद देखने को भी मिलाl जिस प्रकार से जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री ने एक सिरे से आतंकवाद की आलोचना की है और सीधे-सीधे अलगाववादियों को कठघरे के ला के खड़ा कर दिया है उस से उन पर लगने वाले ‘नरम अलगाववाद ‘ के आरोपों की धज्जियाँ उड़ गई हैंl कई वर्षो बाद जम्मू कश्मीर में ऐसी सरकार आई है जिसमे घाटी , जम्मू और लद्दाख तीनो क्षेत्रो के विकास के ऊपर बल दिया जा रहा है, कश्मीरी पंडितो के पुनर्वास की सकारात्मक कोशिश, और राज्य को देश के और करीब लाने की पहल की जा रहीl यह सब पाकिस्तान को बर्दाश होता नहीं दिखाई दे रहा है और ऐसे में जिस प्रकार से मोदी ने पाक के कश्मीर में तथाकथित मानवाधिकार हनन के आरोपों को ख़ारिज करते हुए उससे बलूचिस्तान में पाक सेना द्वारा किये जा रहे अत्याचारों के हिसाब मांग लिए है वो एक बड़ा कूटनीतिक तख्तापलट हैl फिर बीते दिनों भारत और अफ़ग़ानिस्तान ने पाक को आतंकवाद के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में घेरा और गुटनिरपेक्ष सम्मलेन और G -20 में पाक की नापाक हरकतों को उजागर किया, उस से पाक के बौखलाहट में कई गुना वृद्धि हुई है l हो सकता है ये हमला उसी झुंझलाहट के परिणाम होl
हमको यह भी समझना होगा की इस समय में हमारे पास विकल्प क्या-क्या हैं और जो हैं भी उनकी सीमाएं क्या हैl पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी कहा करते थे की हम अपने दोस्त तो चुन सकते हैं लेकिन अपने पडोसी नहीं l ऐसे में हमको हर कदम बिलकुल फूंक-फूंक के रखना पड़ेगाI कूटनीतिक स्तर की बात की जाए तो सबसे पहले भारत को संयुक्त-राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में परिवर्तन और सुधार की अपनी मुहीम को और तेज़ करना होगा l जब तक भारत को उसमे प्रवेश नहीं मिलता, ऐसा संभव है की हर नाजायज़ मुद्दे पर चीन पाकिस्तान को सरपरस्ती देता रहे जैसी की हफ़ीज़ सईद मामले में हुआ थाl विश्व बिरादरी के ऊपर दबाव बढ़ाना पड़ेगा और उसे यह समझाना पड़ेगा के आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है और ” एक के आतंकवादी , दूसरे के शहीद ” जैसा समय अब नहीं रहा हैl आतंकवाद पूरी मानवजाति का दुश्मन है और इस से लड़ने के लिए इसकी जड़ को काटना होगा जो के पाकिस्तान में छुपी हुई हैं l आर्थिक स्तर पर में हमे पाकिस्तान को अलग-थलग करना होगाl इसकी शुरुवात भारत पाकिस्तान को 1996 में दिए हुए “मोस्ट फेवर्ड नेशन ” (MFN) को रद्द कर के कर सकता हैl विश्व पटल पर ये समझाना ज़रूरी है की पाक को दी हुई कोई भी सहायता राशि आतंक के पोषण के लिए ही इस्तेमाल होता रहेगी l पश्चिमी-एशियाई देशो को, जो के मुस्लिम बाहुल्य हैं, उन्हें इस बात के एहसास दिलाना होगा के इस्लाम के नाम पे जो पैसे पाक को दिए जा रहे हैं वो दरसल इस्लाम के वहाबी रूप को प्रस्तुत कर रहे हैं जिस से पूरी दुनिया में शांति के धर्म को अहिंसा फ़ैलाने वाले के रूप में देखा जा रहा है lसामरिक स्तर पर हम अपनी सीमाओं को और ज़्यादा सुरक्षित और मज़बूत कर सकते हैं और ख़ुफ़िया जानकारी को और अधिक व्यापक और विश्वसनीय बनाने की ओर प्रयास कर सकते हैंI राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर कोई भी राजनीती न हो, ये भी हमारे राजनितिक कुलीन वर्ग को सुनिश्चित करना होगाl हमारे मीडिया को भी सरकार और सेना के मनोबल बढ़ाना होगा और ध्यान देना होगा के हर मुद्दे को साम्प्रदायिकता के चश्मे से देखने वाले बुद्धजीवियों और मीडिया हाउसेस को हतोत्साहित किया जाए ताकि पूरा राष्ट्र एक स्वर में अपनी आवज़ रख सके और इस आतंक और खून के नंगे खेल को सदा के लये विराम दिया जा सकेI वरना तो फिर और कई पठानकोट और उरी होते रहेंगे ..

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