लेखक परिचय

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

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लाला पीतांबरलाल धरमपुरा रियासत के दीवान थे|पचास गांव की इस छोटी सी रियासत के राजा शिवपालसिंह एक कर्तव्य निष्ठ दयालु और प्रजा के हित में काम करने वाले धर्म प्रिय राजा थे|दीवान पीतांबर लालजी का रियासत में बहुत सम्मान था क्यॊंकि वे न्याय प्रिय और जनता के सुख दुख में सदा सहायता करने के लिये तत्पर रहने वाले व्यक्ति थे|अंग्रेजों का राज्य था,किंतु इस रियासत के सभी मामले राजा शिवपाल की ओर से नियुक्त दीवान पीतांबर लालजी ही निपटाते थे|इसके लिये जिलाधीश के कार्यालय में एक कुर्सी अलग से रखी रहती थी,जहां दीवान साहब नियमित रूप से सप्ताह में तीन दिन बैठकर मामलों पर फैसले लेते थे|राज्य का हर काम दीवानजी की सलाह पर ही होता था| एक दिन देर रात्रि में राजा के दूत ने दीवान साहब को सूचित किया कि वे दूसरे दिन बड़े तड़के ही उठकर पड़ौस के राज्य की ओर प्रस्थान कर वहां के राजा की पुत्री के विवाह में शामिल हों|चूंकि वहां पहुँचते पहुँचते शाम हो जायेगी इसलिये सुबह चार् बजे निकलना ही होगा|लाला साहब ने हुक्म की तामील की और भोर चार बजे उठकर अपनी बग्गी तैयार कराई और अपने दो सुरक्षा सैनिकों को लेकर चल पड़े|मंजिल दूर थी इस कारण पहुँचते पहुँचते शाम हो गई|थोड़ा सा विश्राम करने के बाद दीवान साहब विवाह स्थल पर जा पहुँचे|विवाह कार्यक्रम आरंभ हो चुका था और दूसरे राज्यों के राजा अथवा उनके प्रतिनिधी अपने साथ लाये उपहार राजकुमारी को दे रहे थे|कोई स्वर्ण आभूषण लाया था ,तो कोई हीरों का हार लाया था, कोई थाल भरकर स्वर्ण मुद्रायें लिये कतार में खड़े थे तो कई राजे विदेशी घोड़े अथवा रथ जैसे बहुमूल्य उपहार लेकर आये थे|

तभी दीवान पीतांबरलाल की बारी आ गई|दीवान साहब परेशान हो गये क्योंकि वे इस तरह की तैयारी से नहीं आये थॆ|राजा साहब की तरफ से विवाह में जाने की जो सूचना उन्हें मिली थी वह रात्रि को बहुत देर से मिली थी,राजा साहब से उपहार के संबंध में कोई सलाह मशविरा भी नहीं ले सके थे, न ही राजा साहब ने ऐसा कोई संदेश भेजा था|वह केवल रास्ते में होने वाले व्यय के हिसाब से थोड़ा बहुत धन तो रखे थे परंतु इतना नहीं कि विवाह के उपहार में दिया जा सके|अचानक बिना किसी झिझक के उन्होंने अपनी रियासत के दो गांव उपहार में देने की घोषणा कर दी|दूसरे राज दरवारी कानाफूसी करने ,इतनी छोटी सी रियासत ने दो पूरे गांव उपहार में दे दिये|कहीं यह दीवान पागल तो नहीं हो गया है|

खैर दूसरे दिन दीवान साहब वापिस धरमपुरा प्रस्थान कर गये|रास्ते भर सोचते रहे की राजा साहब अवश्य ही नाराज होंगे कि उनसे बिना पूछे दो गांव उपहार में दे आया|भगवान को स्मरण करते करते वे वे घर पहुँच गये|

वैसे उन्हें इस बात की आशंका थी कि राजा साहब जरूर क्रोधित होंगे,कुल पचास गांव में से दो गांव उपहार में देना मूर्खता ही तो थी|दूसरे दिन वे दरवार में उपस्थित हुये|राजा साहब ने” पूछा कहिये दीवान साहब कैसा रहा विवाह समारोह,अरे आप कुछ उदास दिख रहे हैं क्या बात है?”राजा साहब ने उनके चेहरे कॊ भाँपकर पूछा|

“महाराज एक बहुत बड़ी भूल हो गई|” दीवान जी ने डरते डरते कहा|

“ऐसी क्या भूल हो गई जो हमारे चतुर दीवानजी के चेहरे पर हवाईयां उड़ रहीं हैं|”

“महाराज मैं विवाह में गया तो आपसे सलाह मशविरा भी नहीं कर पाया था कि वहां उपहार में क्या देना है|”

“अरे फिर आपने क्या किया?”राजा को अपनी भूल का अहसास हुआ|

“महाराज गुस्ताखी माफ हो मैंने अपनी रियासत के दो गांव उपहार में दे दिये|इज्जत का सवाल था……..|’

‘वाह लाला साहब आपने तो मेरी नाक बचा ली,राजपूती शान क्या होती है आपसे अच्छा और कौन जान सकता है|”राजा साहब ने खुद उठकर दीवानजी को गले लगा लिया|”दो गांव तो क्या आप पांच गांव भी दे आते तो मुझे दुख न होता|”ऐसा कहकर राजा साहब ने एक गांव की कर बसूली की संपूर्ण आय प्रति माह दीवानजी को देने की घोषणा कर दी|आखिर उन्हें बफादारी और अपनी आन बान शान को बचाने का पुरस्कार मिलना ही था|

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