लेखक परिचय

सुरेन्द्र नाथ गुप्ता

सुरेन्द्र नाथ गुप्ता

मेरठ के एक हिंदुनिष्ठ परिवार में जन्म, बचपन से रा. स्व. सं. में स्वयंसेवक शिक्षा: एम०एससी०(सांख्यकी), पी०एचडी०(ओपरेशन्स रिचर्स), एलएल०बी० अनुभव: मेरठ, लीबिया, यमन व् फिजी के विश्व विद्यालयों में ४६ वर्षों तक शिक्षण कार्य के बाद प्रोफेसर पद से सेवा निवृत अभिरुचियाँ: एतिहासिक, धार्मिक व समाजिक विषयों का पठन, पाठन व लेखन संपर्क सूत्र: मोबाइल: +91 9910078594,

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डा. सुरेंद्र नाथ गुप्ता

२०१७ के चुनाव में भाजपा की यह जीत केवल चुनावी हार-जीत की श्रृंखला की एक कड़ी नही है। आज अधिकाँश भारत में केसरिया ध्वज फहरा रहा है। डा. हेडगेवार और गुरु जी का यह विचार कि “भारत एक हिदू राष्ट्र है” आज साकार हो रहा है। पंडित दीन दयाल जी ने एकात्म मानववाद के रूप में जो एक सम्पूर्ण वैश्विक राजनैतिक दर्शन प्रस्तुत किया था, आज उसकी प्रमाणिकता स्पष्ट दिखाई दे रही है। सत्य का मार्ग लम्बा हो सकता है पर गलत नहीं। यही कारण है कि जनसंघ के दीपक से शुरू करके, जब ना साधन थे ना ही विचार की स्वीकार्यता थी, यह राजनैतिक दल शून्य से विपक्ष की भूमिका में आया, फिर विकल्प की भूमिका में, फिर सत्ता में और अब एक मात्र अखिल भारतीय दल बन गया है। इस यात्रा में अनेक व्यवधान आए परंतु  हम सतत आगे ही बढ़ते गए। हाँ एक बार पीछे भी हटना पड़ा था जब लोकसभा में हमारे दो सांसद रह गए थे परंतु यह तभी हुआ जब हम दीनदयाल जी और गुरु जी के बताये मार्ग से भटक कर अन्य राजनैतिक दलों की भांति छद्म धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने  थे।  इस बार मोदी ने उ. प्र. में एक भी मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया और फिर भी प्रचंड मतों से जीत हुई। पहली बार मुस्लिम मतदाताओं ने भी भाजपा को बड़ी संख्या में वोट दिया है। देश की राजनीति में एक नया एजंडा और नया विमर्श शुरू हो गया है। दीनदयाल जी के राजनितिक दर्शन की पुष्टी प्रमाणित  हुई है।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्य मंत्री बनाया गया है। मीडिया योगी को कट्टर हिंदूवादी कह रहा है और उन्हें मुख्य मंत्री बनाने को २०१९ के चुनाव के लिए हिंदु ध्रुवीकरण की भा.ज.पा. की रणनीति। विपक्षी दल भी इसे हिंदु साम्प्रदायिकता के अपने पुराने चश्मे से देख रहे हैं और जातिगत व् सांप्रदायिक आंकड़ों के गुणा-भाग की पुरानी विश्लेषण पद्धति के अनुसार २०१९ के लिए महागठबंधन की चर्चा कर रहे है। २०१४ और २०१७ के चुनावों में जो तथ्य  दो-दो बार दोहराया जा चुका है और जो इबारत दीवार पर स्पष्ट  लिखी है, विपक्षी दल उसे नज़रअंदाज़ करके आत्म मंथन करने के बजाय भा.ज.पा.की आगे की राह सरल बनाते प्रतीत होते है।

योगी आदित्यनाथ को कट्टर हिदूवादी कहना कुत्सित मानसिकता का ही परिचायक है। उन्हें प्रखर हिंदूवादी तो कह सकते है लेकिन कट्टर नहीं। हिन्दू तो कट्टर हो ही नहीं सकता क्योंकि विश्वबंधुत्व, वसुधैवकुटुम्बकम और एकम सद विप्र बहुधा वदन्ति जैसे उदात्त विचार उसकी जीवन शैली का हिस्सा हैं। इसके इतर भी, योगी जी का नाथ संप्रदाय तो विशेष रूप से जाति-पाति और पंथों व् सम्प्रदायों के भेदों को मानता ही नहीं। योगी जी की गोरक्ष पीठ द्वारा संचालित अस्पताल और शिक्षण संस्थानो को जा कर देखा जा सकता है कि उन में कितनी अधिक संख्या में अहिन्दू लाभान्वित हो रहे हैं।

योगी को कट्टर हिंदूवादी यानी मुस्लिम विरोधी के रूप में दर्शा कर एक निश्चित राजनितिक एजेंडे के तहत मुस्लिम समाज को भयभीत करने की कोशिश  हो रही है, बिल्कुल उसी तरह जैसे मोदी के नाम से १२ वर्ष तक किया गया था। १५ प्रतिशत मुस्लिम समाज को भयभीत करके उन्हें गोलबंद करना और ८५ प्रतिशत हिंदु  समाज को जातियों, उपजातियों, अगड़ों, पिछड़ों, अतिपिछड़ों, दलितों में विभक्त करना ताकि मुस्लिमों के साथ हिन्दुओं के कुछ समूहों को मिला कर सत्ता प्राप्त की जा सके यही अब तक भारतीय राजनैतिक दलों की रीति नीति रही है। छोटे-छोटे समूहों की छोटी-छोटी निष्ठाओं, आशाओं और आकाँक्षाओं को उकसा कर उन्हें एकत्र करना ही ध्रुवीकरण है जो अब तक भारतीय राजनीति में होता रहा है। देश के बहुसंख्यक समाज की छोटी निष्ठाओं को किनारे करके उन्हें सम्पूर्ण समाज के विकास और राष्ट्र निर्माण के उदात्त लक्ष्य की ओर प्रेरित करना राष्ट्रनीति है न कि ध्रुवीकरण। २०१४ और २०१७ के चुनावों में भा.ज.पा. की जीत उसके इसी एजेंडे का परिणाम है| भारत का अंग्रेजी पढ़ा लिखा संभ्रांत वर्ग और राजनीतिक विश्लेषक संभवतः निहित स्वार्थों के कारण जानबूझ कर इस तथ्य की अनदेखी कर रहे है।

भारत की एकता और अखंडता के लिए  आवश्यक है कि बहुसंख्यक हिन्दू समाज में एकता स्थापित हो। यदि ८५ प्रतिशत बहुसंख्यक हिन्दू समाज छोटे-छोटे समूहों में विभक्त होता है तो यह भारत की एकता और अखंडता के लिए अनिष्टकारक है। पुरातन काल में भी अनेक बार हिन्दू समाज के ये विभेद ही विदेशी आक्रांताओं के समक्ष भारत की पराजय का कारण बने थे। अतः हिंदुओं के सभी वर्गों, पंथों और सम्प्रदायों में एकता निर्माण करना यह एक पुनीत राष्ट्रीय कर्तव्य है। रा.स्व.से. संघ और भा.ज.पा. सहित अन्य सभी अनुसांघिक संगठन इसी पुनीत लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सतत प्रयासरत हैं। पंचवर्षीय चुनाव भा.ज.पा. के लिए मार्ग के पड़ाव मात्र हैं, मंजिल नही। योगी आदित्य नाथ की ताजपोषी भा.ज.पा. की २०१९ के चुनाव की रणनीति नहीं वरन दीर्घकालिक एजेंडे का हिस्सा है।

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