लेखक परिचय

अरूण पाण्डेय

अरूण पाण्डेय

मूलत: इलाहाबाद के रहने वाले श्री अरुण पाण्डेय अपनी पत्रकारिता की शुरुआत ‘दैनिक आज’ अखबार से की उसके बाद ‘यूनाइटेड भारत’, ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘देशबंधु’, ‘दैनिक जागरण’, ‘हरियाणा हरिटेज’ व ‘सच कहूँ’ जैसे तमाम प्रतिष्ठित एवं राष्ट्रीय अखबारों में बतौर संवाददाता व समाचार संपादक काम किया। वर्तमान में प्रवक्ता.कॉम में सम्पादन का कार्य देख रहे हैं।

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shapeimage_3दूध दही का खाना , यही है हरियाणा । यह कहावत आम है और खेल की दुनिया में सटीक भी बैठता है लेकिन जब बात शिक्षा की होती है तो लोग चुप हो जाते है । क्योंकि शिक्षा  के प्रति जागरूकता अब आयी है नही तो लोग कुश्ती लडते थे और ज्यादा से ज्यादा दिल्ली पुलिस व सेना के बारे में सोचते थे । महिलायें शिक्षा के नाम पर टीचर की नौकरी करना चाहती थी । लेकिन इसी दौर में डा0 रवि प्रकाश आर्य ने प्रथम श्रेणी में महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय से करके एक नयी चीज लोगों को सामने पेश कर दी। उसके बाद एमए एक ऐसे विषय से किया जिसे दुर्लभ माना जाता है । संस्कृत में एमए कर गोल्ड मेडल हासिल किया और फिर पीछे मुडकर नही देखा। उन्होने 1985 में जर्मन भाषा से सार्टिफिकेट कोेर्स किया और फिर 1988 में संस्कृत से पीएचडी की । उसके बाद हरियाणा के कई सरकारी कालेजों में संस्कृत विभाग में शिक्षा कार्य करते रहे और सामाजिक कार्यो से जुडे रहे। इसके बाद सरकार ने उनकी उपलब्घियों को देखते हुए उन्हें राजकीय महाविद्यालय , बहादुरगढ का प्रधानाचार्य बना दिया।वहां भी वैदिक कार्यक्रम के लिये एक मंच पर देश व विदेश से आये प्रतिभागी का सफल कार्यक्रम कर हरियाणा में इतिहास बना दिया। इसके बाद वह राजकीय महिला महाविद्यालय , सफीदो, जींद के प्रधानाचार्य है और नवनिर्मित राजकीय महिला महाविद्यालय असंघ , करनाल का कार्य भी कार्यवाहक के रूप में देख रहें है। इसके अलावा विश्व के 28 देशों में बैदिक कालखंड पर अपनी बेबाक टिप्पणी व 40 किताबों के जरिये आज इस विषय की क्षितिज पर है। इसी कारण उन्हें अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना का अतिथि संपादक व लेखकों का मुखिया बनाया गया था और अब बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में बनने वाले भारत अघ्ययन केन्द्र के बोर्ड आफ स्टडीज का सदस्य बनाया गया है।
वास्तव में भारतीय दर्शन है क्या, भारतीय संस्कार है क्या, क्या रीति रिवाज है, वेदों की व्याख्या कैसे हो, सनातन परम्परा को लोगों तक कैसे पहुंचाया जाय  और क्यों आज तक इसे खत्म नही किया जा सकता , इस मत पर पूरे विश्व को एक मंच पर लाने वाले डा0 रवि प्रकाश आर्य का नाम किसी परिचय का मोहताज नही है। वैदिक रीतिकाल व उनके कार्य पर इन्ही से बातचीत के कुछ अंश है जो उन्होने प्रवक्ता के सहसंपादक अरूण पाण्डेय से कही।
प्र॰: आपके बारे में कहा जाता है कि कार्याे को लेकर कभी आप किसी के पास नही गये। लेकिन बाबजूद इसके आप भारतीय इतिहास संकलन योजना में आपका काफी योगदान रहा।
उ॰: देखिये , अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना अच्छा कार्य है और मेरी रूचि का काम है इसलिये मैने उसके लेखको की जिम्मेदारी ली, किन्तु बाद में मुझे अतिथि संपादक बना दिया गया। इस योेजना पर मैने 1998 से 2008 तक काम किया । लेकिन इसके बाद इसका काम ठंडा पड गया । इसके बाद यह जिम्मेदारी मेरे पास नही है। किन्तु अभी भी जो हो सकता है उसमें योगदान देता हूं।
प्र॰: भारत अध्ययन केन्द्र के बारे में बताइये। आप इससे कैसे जुडे ?
उ॰: इस कार्यक्रम को लेकर बहुत कुछ कहना ठीक नही होगा। क्योंकि यह हमारे प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र दामोदर मोदी जी का मुख्य सपना है। उन्होने पूरे देश को घूमा है और सभी राज्यों की जानकारी उन्हें है । एक तरह से देखा जाय तो वह पहले हिन्दू प्रधानमंत्री  है जिन्होने हिन्दूओं के लिये कुछ किया है। वरना सारे मुस्लिम पंथी विचारघारा के थे। यह मेरा बहुत ही प्रिय विषय है और मेरी अब तक की जमापूंजी जो कुछ भी भारतीय दर्शन में है, उसे इसमें समाहित करने का प्रयास करूंगा।
प्र॰: आप इसमें किस भूमिका में है और इसमें क्या क्या कार्य होगें?
उ॰: मै इसमें बोर्ड का सदस्य हूं और दो साल में अपना कार्य करके देना है जिसके बाद देश व विदेश के लिये भारत अघ्ययन केन्द्र का रास्ता खुल जायेगा। इसके तहत यहां पर शोध कार्य होगा जो भारत पर किया जा सकेगा। कई तरह के फाउडेशन, डिग्री व शोध कार्य हों गेजो पूरी तरह से भारत पर आधारित होगे।
प्र॰: यह कहां पर बनेगा? कौन कौन से विभाग होगें?
उ॰:  बनेगा नही , प्रधानमंत्री जी के निर्वाचन क्षेत्र में  बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में बन रहा है और इसके प्रोफसरों व कर्मचारियों ने योजना पर काम करना भी शुरू कर देगे। शीघ्र ही यह नांलदा व तक्षशिला की श्रेणी में भारत की पहचान बनायेगा। भारत अध्ययन केन्द्र में सात विभाग होगे। पहला प्राचीन इतिहास का , दूसरा भाषाओं व साहित्य का जिसमें देश के सभी भाषा व साहित्य का समाकलन होगा। तीसरा विभाग घर्म व दर्शन का होगा । चैथा विभाग वैदिक सांइस , वेद और वेद विज्ञान , पांचवा आयुर्वेद रस व औषधि विज्ञान । छठवां विभाग लोकविद्या व मनो स्कीपोलोजी का होगा जबकि सांतवा विभाग पाडुलिपियों का संग्रह व अनुसंधान पर कार्य करेगा। इतना ही नही यह केन्द्र रिसर्च व फाउडेशन कोर्स भी चलायेगा, जो कि समय सीमा वाले होगे।
प्र॰: क्या इस कार्य के लिये सरकार कोई सहयोग दे रही है?
उ॰: इन कार्य के लिये यूजीसी ने 25 करोड रूप्ये की ग्रांट स्वीकार की है और जिसके तहत इस केन्द्र के लिये विजिटिंग फलोशिप , प्रोफेसर , सेटेनरी प्रोफेसर, स्थायी विभागीय कर्मचारी रखे जायेगें। इस पूरे कार्यक्रम के संयोजक सदाशिव द्विवेदी है जबकि संस्थापक सदस्यों में डा. रवि प्रकाश आर्य का नाम जुडा है।
प्र॰: क्या आपको किसी और पैनल में रखा गया है?
उ॰: राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपने विद्याभारती व संस्कार भारती के पैनल में शामिल किया और वह आये दिन होने वाले सम्मेलनों में अपनी वाणी से उन लोगों को आर्कषित कर रहें है जिन्होने ऐशो आराम में जिन्दगी बितायी और अब भारत ही क्या , भारतीय की मातृभाषा हिन्दी व संस्कृत को भी भूल चुके है। अंग्रेजी पसंद लोगों को जब मैने संस्कृत के भाव व शरीर की क्रिया के बारे में उससे जुडे तथ्य बताये तो आर्कषण इतना था कि विद्याभारती व संस्कार भारती जैसी संस्थायें चलाय मान हो गयी।
 प्र॰: आज का युवा समाज इस वैदिक काल के बारे में बहुत कुछ नही जानता । इसके क्या कारण है?
उ॰: दरअसल वह दोषी नही है दोष हमारा है कि हमने उसके बारे में जानने का प्रयास नही किया जो हमारे स्वर , जीव व अंतःचेेतना में निहित है। तो हम अपने वंशजों को क्या देकर जा रहे है। इसे विचार की कसौटी पर रखना होगा। पहले क्या होेता था हम संस्कार वान थे , तो कुछ संस्कार तो बच्चों में उसे देखकर विकसित हो जाते थे लेकिन अब हम संस्कारों के बारे  नही जानते तो वह कहां से सीखेगें।
प्र॰: यह एक आम सा शब्द है जिसे सभी बोलचाल की भाषा में प्रयोग में लाते है। वास्तव में संस्कार है क्या इसकी कोई व्याख्या नही है। न तो किताबों में है और न ही कोई इसे बताना या बात करना चाहता है।
उ॰: देखिये जन्म जिस तरह सच है उसी तरह मृत्यु भी सच है । हमारे कर्मो के फल यही मिलते है देखने की जरूरत है जिस दिन देख लेगें उस दिन कर्म अपने आप बदल जाता है। उसी तरह से हमारी शिक्षा यह बात बता देती है कि हमने क्या पढा , हमारी औलाद को क्या पढना चाहिये जिससे वह आगे जा सके। इसी तरह से कुछ कर्म व जिम्मेदारियां उस अजीम शक्ति से मिली है जिसे हमें निभाना चाहिये। जो निभातेे है उनका अंत देखिये और जो नही निभाते उनका देखिये , दोनो में कितना अंतर है समझ में नही आयेगा। जिस दिन आ गया यही संस्कार बन जायेगा जो आपके रास्ते आपकी अगली पीढी के बीच जायेगा।
प्र॰:आपने संस्कृत विषय में महारत हासिल की और पश्चिमी देशों में आप इस वैदिक कालखंड पर लिखी किताबों को लेकर सबसे ज्यादा चर्चित है। ऐसा क्यों हुआ आप इसका आघार किसको मानते है?
उ॰: किसी भी भाषा में उतनी शक्ति नही जो संस्कृत से मुकाबला कर सके। ऐसा इसलिये हुआ कि सनातन काल से ही संस्कृत ही सभी भाषाओं की जननी रही है। लोगों को मेरी बात अटपटी लग सकती है लेकिन सही यही है इस बात का पता उनको चल जायेगा। वैसे मेरी सारी किताबें जो लगभग 53 भागों में है । उसमें से ज्यादातर अंग्रेजी लिपी में है । जो कि यूएसए , जर्मनी व न्यूयार्क से प्रकाशित हुई है। इसमें जो भी प्रकाशित है वह वेदों , वैदिक साइंस , वैदिक दर्शन व संस्कृति , भारतीय सामाजिक व्यवस्था, भारतीय इतिहास , घर्म  आदि पर है और ऐसा भी नही है कि सिर्फ अंग्रेजी में है जर्मन , हिन्दी व संस्कृत में भी जिसके 17 भाग भारत में काफी चर्चित है।
प्र॰: आपने वैदिक काल को ही जीवन का लक्ष्य क्यों बनाया?
उ॰: कई कारण हैं , वेदों को लेकर जिज्ञासा शुरू से रही लेकिन वह संस्कृत में थे , तो संस्कृत का पूरा ज्ञान अर्जित किया। उसके बाद इसे जीवन का लक्ष्य बनाया और अपना इतिहास जानने के प्रयास में जुट गये। जो बातें इस दौरान पता चली , तो लगा कि जीवन को इससे बेहतर बनाया जा सकता है। मैने कनाडा के यूनिवर्सिटी में जब इस विषय पर लेक्चर देकर निकला तो लोगों ने मुझे रोक लिया और इच्छा जाहिर की मै उनके घर चलूं और अन्य लोगों को भी इस बारे में उनके अपने जुबान में बताउं। मैं उनके साथ गया , उन्होने भारतीय वैदिक काल के बारे में बृहद चर्चा की , तभी मैने समझ लिया था कि मुझे अपना जीवन इसी में बिताना है।
प्र॰: इसे लेकर आपने क्या क्या प्रयास किया?
उ॰: मुझे इस बात का आभास हो गया था कि विदेशों में भारतीय इतिहास, सामाजिक व्यवस्था व संस्कारों को लेकर काफी कुछ करने को है । इसलिये मै इसके गहराता में चलता गयां। जब मेरी पहली किताब वैदिक व्यवस्था को लेकर आयी तो उसे विदेशों में अपार सफलता मिली, उसके बाद मैने एक एक करके 40 किताबें लिखी जिसके 53 अंक आज भी बाजारों में बिक रहें है।इसमें से पूरे विश्व में 28 किताबे बिक रही है । भारत में 17 किताबें जो हिन्दी में है, दो किताबे विदेशी प्रकाशन के लिये लिखा जा रहा है। जबकि दो अन्य किताब लिखने की योजना पर काम हो रहा है। इसके अलावा विश्व की 28 यूनिवर्सिटी में अब तक मैने लेक्चर इसी विषयों पर दिया है। और फिर कुछ दिनों के लिये कनाडा जा रहा हूं।
प्र॰: देश के लिये कुछ कहना चाहेगें?
उ॰: हमारे प्रधानमंत्री जी का कार्यकाल कैसा होगा , यह मैं नही जानता लेकिन अब तक का जो कार्यकाल रहा है वह एक नजीर की तरह रहा है। देश व विदेशों में हिन्दूओं के लिये एक आक्सीजन का काम कर रहा है । वरना कहां मुमकिन था कि विश्व के सबसे शक्तिशाली देश व अराजक देश में हिन्दूओं का विशाल मंदिर बने और उसे बनवाने के लिये वहां की सरकार जमीन दे। इसलिये हर भारतीय को चाहिये कि जिस तरह वह हर बात में सवा सौ करोड भारतीयों को श्रेय देते है उसी तरह देश वासियों को भी उनके साथ खडा होना चाहिये। भारत अध्ययन केन्द्र पूरे विश्व में एक नयी तरह की पहचान बनायेगा यह मेरा विश्वास है। बने , इस विश्वास को अपने में जगायें।

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