लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

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‘ रिलीजियस फ्रीडम’ का अर्थ और ‘फ्रीडमहाऊस’ का अनर्थ
मनोज ज्वाला
भारत को विखण्डित करने और इसे नस्लीय रंग-भेद आधारित ‘श्वेत साम्राज्य’ के अधीन कर लेने को सक्रिय पश्चिमी-विदेशी संस्थाओं-संगठनों में “ फ्रीडम हाऊस ” भी एक शक्तिशाली नाम है । अमेरिका की जमीन पर स्थापित यह संस्था अपने कई सहयोगी संस्थाओं-संगठनों के साथ भारत भूमि पर विखण्डनकारी कार्यों को अंजाम देने में संलग्न है । ‘इण्डियन शोसल इंस्टिच्युट फार ह्यूमन राइट्स डाक्युमेण्टेशन सेण्टर’ , ‘आल इण्डिया क्रिश्चियन काउंसिल’ , ‘युनाइटेड क्रिश्चियन काउंसिल फार ह्यूमन राइट्स’ , ‘आल इण्डिया फेडरेशन आफ आर्गनाइजेशन्स फार डेमोक्रेटिक राइट्स’ तथा ‘कैथोलिक बिशप्स कान्फ्रेन्स आफ इण्डिया’ और ‘नेशनल अलावेन्स फार विमेन’  आदि अनेक ऐसी संस्थायें हैं ; जो  नाम से तो भारतीय (इण्डियन) प्रतीत होती हैं, किन्तु वास्तव में ये सब की सब अभारतीय हैं और ‘फ्रीडम हाऊस’ की सहयोगी हैं । इस फ्रीडम हाऊस का पूरा नाम ‘सेण्टर फार रिलीजियस फ्रीडम’ है । इस और इसकी तमाम सहयोगी संस्थाओं की ‘रिलीजियस फ्रीडम’ का मतलब ‘धार्मिक स्वतंत्रता’, जैसा कि इसका शाब्दिक अर्थ है , सो नहीं है ; बल्कि सनातन-वैदिक-हिन्दू धर्म से पृथक हो जाना और ईसाइयत को अपना लेना ही इनके अनुसार ‘फ्रीडम’ है । इन संस्थाओं के अनुसार जो व्यक्ति अथवा समुदाय  ईसाइयत से दूर है , वो ‘फ्री’ (स्वतंत्र) नहीं है , क्योंकि स्वतंत्रता तो ‘ईसाइयत’ में ही है । दूसरे शब्दों में यह कि पुराने सनातन धर्म से बंध कर रहना धार्मिक गुलामी है और नये धर्म अर्थात ईसाइयत में दीक्षित हो जाना धार्मिक स्वतंत्रता (रिलिजियस फ्रीडम) है । इस अनर्थ  वे खुल कर कहते-बताते नहीं हैं , किन्तु उनके काम इसी सिद्धांत पर आधारित और इसी की ओर प्रेरित हैं ।  ‘फ्रीडम हाऊस’ और इससे जुडी संस्थायें धार्मिक स्वतंत्रता की अपनी इसी अवधारणा पर भारतीय कानूनों की समीक्षा करती हैं और भारत सरकार पर दबाव कायम कर इस अवधारणा के अनुकूल कानून बनवाती हैं । इसके लिए ये संस्थायें तरह-तरह के मुद्दों का निर्माण करती हैं और तत्सम्बन्धी तरह-तरह के आन्दोलन प्रायोजित करती-कराती हैं । फ्रीडम हाऊस ने अभी हाल ही में  ‘हिन्दू एक्सट्रीमिज्म’ अर्थात ‘हिन्दू उग्रवाद’ नाम से  बे सिर-पैर का एक मुद्दा खडा किया था और इस तथाकथित कपोल-कल्पित प्रायोजित-सुनियोजित मुद्दे को मीडिया के माध्यम से दुनिया भर में प्रचारित करते हुए इस पर बहस-विमर्श के बहुविध कार्यक्रमों का आयोजन कर “ द राइजिंग आफ हिन्दू एक्सट्रीमिज्म ” (हिन्दू उग्रवाद का उदय ) नाम से एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी । भारत में कई तथाकथित बौद्धिक दलाल इसके अघोषित अभिकर्ता-कार्यकर्ता हैं ; जिनमें जान दयाल, टिमथी शाह , रेवरेण्ड सेंड्रीक प्रकाश , कुमार स्वामी तथा राम पुनयानी आदि शामिल हैं । ये वही लोग हैं जो कांग्रेस की मनमोहनी सरकार में सोनिया-प्रणित राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के प्रमुख सदस्य थे और भारत के बहुसंख्यक समाज को दंगाई घोषित करने वाला ‘साम्प्रदायिक व लक्षित हिंसा-रोधी विधेयक’ का मसौदा तैयार किया था, जो संस्द के दोनों सदनों से पारित नहीं हो सका । उक्त रिपोर्ट में हिन्दू-उग्रवाद का बे-सुरा, बे-तुका राग अलापते हुए इन लाल बुझक्कडों के सहयोग से ‘फ्रीडम हाऊस’ ने जो रिपोर्ट प्रकाशित की थी , उसके कुछ अंशों पर ही गौर करने से आप इसकी नीति-नीयत और इसके निहित उद्देश्यों को समझ सकते हैं ।

“ द राइजिंग आफ हिन्दू एक्सट्रीमिज्म ” नामक उक्त रिपोर्ट में ‘रिलीजियस फ्रीडम’ की वकालत करने वाली इस संस्था ने जिन बातों पर जोर दिया है , सो तो वास्तव में हिन्दुओं के धर्मान्तरण में मिशनरियों के समक्ष खडी बाधाओं पर उसकी चिन्ता की ही अभिव्यक्ति है । उस रिपोर्ट में धार्मिक स्वतंत्रता सम्बन्धी भारतीय कानूनों की गलत व्याख्या करते हुए भारत को ‘एक धार्मिक उत्पीडक देश’ घोषित कर इसके विरूद्ध यहां अमेरिका के हस्तक्षेप की आवश्यकता पर बल दिया गया है । मालूम हो कि हमारे देश के ‘धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम’ और तत्सम्बन्धी अन्य कानून धोखाधडी से अथवा बहला-फुसला कर या जबरिया किये जाने वाले धर्मान्तरण को रोकते हैं , न कि स्वेच्छा से किये जा रहे धर्मान्तरण को । किन्तु उस रिपोर्ट में इसकी व्याख्या इन शब्दों में की गयी है- “ भारतीय कानून के तहत किसी धर्म अथवा पन्थ विशेष के आध्यात्मिक लाभ पर बल देना गिरफ्तारी का कारण हो सकता है । भारत में धर्मान्तरण आधारित टकराव इस कारण है , क्योंकि ईसाइयत के माध्यम से दलितों की मुक्ति से अगडी जाति के हिन्दू घबडाते हैं ” । इस व्याख्या में ‘आध्यात्मिक लाभ’ और ‘मुक्ति’ शब्द का गलत इस्तेमाल किया गया है , जिससे फ्रीडम हाऊस और उसकी सहयोगी संस्थाओं की मंशा और मान्यता दोनों स्पष्ट हो जाती है । इन संस्थाओं की वास्तविक मंशा धर्मान्तरण है और मान्यता यह है कि धर्मान्तरण से धर्मान्तरित व्यक्ति को ‘आध्यात्मिक लाभ’ मिलता है , जबकि ईसाइयत में धर्मान्तरित होने  से तो ‘मुक्ति’ भी सुनिश्चित है । फ्रीडम हाऊस ने भारत के दलितों के आध्यात्मिक लाभ और उनकी मुक्ति के लिए धर्मान्तरण अर्थात ईसाइकरण को आवश्यक माना है और भारतीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम में तत्सम्बन्धी संशोधन करने अथवा उसे पूरी तरह समाप्त कर देने पर जोर देते हुए इस बावत अमेरिका से हस्तक्षेप की मांग की है ।

यह विडम्बना ही नहीं धूर्त्तता भी है कि जिन लोगों को आध्यात्मिक ज्ञान का ककहरा-मात्रा भी नहीं मालूम है वे दलितों को आध्यात्मिक लाभ देने में लगे हुए हैं और इस तथाकथित लाभ के नाम पर उनके गले में गुलामी का फंदा डालने वाले वे लोग उस फंदे को ही मुक्ति का माध्यम व स्वयं को मुक्तिदाता भी बता रहे हैं । इतना ही नहीं, इसकी पूरी अनुकूलता नहीं मिल पाने के कारण वे भारत के कानून-व्यवस्था को धार्मिक स्वतंत्रता का उत्पीडक बताते हुए इसके विरूद्ध अमेरिका से हस्तक्षेप की मांग भी कर रहे हैं ।

दर-असल यह सब अमेरिकी सरकार और वेटिकन-चर्च के पोप की चाल है । ‘दलित फ्रीडम नेटवर्क’ तथा ‘फ्रीडम हाऊस’ एवं ऐसी अन्य तमाम संस्थाये ‘श्वेत साम्राज्य’ के विस्तार की विश्वव्यापी दूरगामी योजना के तहत भारत में धर्मान्तरण और अमेरिकी हस्तक्षेप की जमीन तैयार करने और इसका औचित्य सिद्ध करने के बावत वेटिकन व अमेरिका के एजेण्ट के रूप में काम कर रही हैं । तभी तो फ्रीडम हाऊस की उक्त रिपोर्ट में अमेरिका के राजनीतिक हितों के आधार पर भारत में अमेरिकी हस्तक्षेप की मांग की गई है और कहा गया है कि  “ जिन देशों में धार्मिक स्वतंत्रता के रिकार्ड अच्छे हैं , उन्हें  अमेरिका से अच्छे सहयोग की सम्भावना है ” ।  फ्रीडम हाऊस की रिपोर्ट के अनुसार  उन देशों में धार्मिक स्वतंत्रता के रिकार्ड अच्छे हैं , जिनमें अमेरिकी हस्तक्षेप ज्यादा है; जैसे खाडी के देश । उसकी रिपोर्ट पर टिप्प्णी करते हुर राजीव मलहोत्रा ने अपनी पुस्तक ‘ब्रेकिंग इण्डिया’ में लिखा है- “ अनेक ‘अच्छे अमेरिकी सहयोगी’ धार्मिक स्वतंत्रता-हनन के सर्वाधिक खराब रिकार्ड वाले सैनिक तानाशाह हैं ; फिर भी अमेरिका द्वारा उन्हें बच्चों की तरह सम्भाल कर रखा जाता है , जबकि भारत जैसे लोकतंत्र उसकी कडी आलोचना के शिकार होते रहते हैं ।”  अमेरिकी हस्तक्षेप की वकालत करने वाली फ्रीडम हाऊस की उक्त रिपोर्ट के पूर्वाग्रह पर टाइम्स आफ इण्डिया (०५ मार्च’२००२) में एक सटीक टिप्पणी आई थी- “ धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में जहां भारत जैसे पन्थ-निरपेक्ष और लोकतान्त्रिक देश प्रशंसा के पात्र हैं , वहीं सऊदी अरब जैसे देश पर , जो विश्व के सबसे कम स्वतंत्रता वाले देशों में से एक है , ३२ पृष्ठों में चर्चा की गई है । संयुक्त राज्य अमेरिका अपने उन सहयोगियों को दण्दित करने के प्रति कोई रुचि नहीं दिखाता , जिन्हें वह धन देता है , जैसे- मिस्र , तुर्की और पाकिस्तान ;  जबकि उन देशों को फटकारते-धमकाते रहता  है , जहां उसका हस्तक्षेप कम से कम है ”।
फ्रीडम हाऊस की तरह एक नहीं अनेक संस्थायें हैं , जो       ‘एक दमनकारी गणराज्य’ , ‘विफल लोकतंत्र’ तथा ‘अल्पसंख्यकों के उत्पीडक देश’ के रूप में भारत की आपत्तिजनक तस्वीर निर्मित करने और अमेरिकी हस्तक्षेप की आवश्यकता व औचित्य सिद्ध करने के लिए यहां के विभिन्न राजनीतिबाजों , बुद्धिजीवियों , शिक्षाविदों एवं छोटी-छोटी स्वयंसेवी संस्थाओं को धन व मंच दोनों उपलब्ध कराती हैं  । इतना ही नहीं , इस बावत इनके लिए वे तरह-तरह के पुरस्कार-सम्मान , यात्रा-अनुदान और उपाधियां-पदवियां  भी प्रदान करती रहती हैं । इन विदेशी अमेरिकी संस्थाओं की भारत में चल रही गतिविधियों की व्यापक छान-बीन किये जाने की जरुरत है । यह काम आसान कतई नहीं है , क्योंकि ये संस्थायें अपने उपरोक्त गुप्त एजेण्डों का क्रियान्वयन भारतीय लोगों और संस्थाओं के माध्यम से करती-कराती हैं । अतएव , विदेशी संस्थाओं से सम्पर्क-सरोकार वाले भारतीय लोगों की गतिविधियों पर निगरानी रखना जरुरी है

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