लेखक परिचय

अरूण पाण्डेय

अरूण पाण्डेय

मूलत: इलाहाबाद के रहने वाले श्री अरुण पाण्डेय अपनी पत्रकारिता की शुरुआत ‘दैनिक आज’ अखबार से की उसके बाद ‘यूनाइटेड भारत’, ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘देशबंधु’, ‘दैनिक जागरण’, ‘हरियाणा हरिटेज’ व ‘सच कहूँ’ जैसे तमाम प्रतिष्ठित एवं राष्ट्रीय अखबारों में बतौर संवाददाता व समाचार संपादक काम किया। वर्तमान में प्रवक्ता.कॉम में सम्पादन का कार्य देख रहे हैं।

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suryakant kelkarभारत में कितने बांग्लादेशी है और कहां -कहां है। इसको लेकर एक शुरूआत की गयी और जिसके तहत अब तक लाखों की संख्या में बांग्लादेश से घुसपैठ करके आये लोगों को पहचान लिया है जिसपर केन्द्र सरकार शीध्र ही निर्णय लेगी। इस कार्यक्रम को तेजी से विस्तार देने के लिये भारत रक्षा मंच एक विशाल कार्यक्रम का आयोजन दिल्ली में करने के लिये योजना बना रहा है, जिसमें भारतीय  विचार धारा के नेता हिस्सा लेगें।  किन्तु इससे पहले जन्तर मन्तर पर एक वृहद कार्यक्रम के आयोजन के साथ साथ आमरण अनशन भी होगा। यहा बात भारत रक्षा मंच के संयोजक सूर्यकान्त केलकर ने एक वार्ता के दौरान प्रवक्ता के सहसंपादक अरूण पाण्डेय से कही। इसी संस्था को लेकर उनसे की गयी बातचीत के अंश प्रस्तुत हैं।

प्र.: बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर संस्था बनाने की क्यों पडी ?

उ.  जब घुसपैठ अपने चरम पर थी, तब सवाल यह उठा कि उसे कैसे रोका जाय, उस समय की केन्द्र सरकार इस मामले पर मौन थी , जब असम के लोग बाहर से अपने प्रांत आने लगे तो सभी को चिन्ता होने लगी, कि मामला क्या है, तब पता चला कि बांग्लादेशी घुसपैठ ने वहां के लोगों का जीना हराम कर रखा है। वह इतने ज्यादा हो गये कि वहां भी कश्मीर वाली स्थित हो गयी। चूंकि चैनलों पर पूर्वात्तर राज्यों की खबरे दिखायी नही जाती इसलिये प्रकृति के इस स्वर्ग को वह बिगाड रहे थे । इस मामले को लेकर एक कार्यक्रम बनाया गया और मध्यप्रदेश के विदिशा में इस बात को लेकर अभ्यास किया गया। इसके बाद  जून 2010 को भोपाल में एक कार्यक्रम हुआ जिसमें 15 राज्यों से लोग आये और जिसमें सबसे ज्यादा पूर्वात्तर राज्यों से थे। इसके बाद भारतीय रक्षा मंच का गठन किया गया।

 

 

प्र.: किन बातों पर उस कार्यक्रम में चर्चा हुई?

उ.: बहुत सी बातों पर चर्चा हुई , जिसमें सबसे प्रमुख था कि मुस्लिम घुसपैठ जहां जहां हुई है वहां पर अन्य धर्मों के लोग पलायन करते गये है। इस बात का उदाहरण कश्मीर से दिया गया, जहां से कश्मीरी पंडित अभी भी पलायन कर रहें है। यही हाल पूर्वांेत्तर राज्यों का था। जिस जगह उनकी संख्या बढी वहां से उनके अलावा रह रहें सभी लोगों का जीना दूभर हो गया। चाहे वह गली हो , मोहल्ला हो , या फिर जिला , सभी जगह उनका ही बोलबाला होना लगे , मालदा मे जो हुआ वह उसी का ट्रेलर था । जिसे सरकार को देखना चाहिये। पूवोत्तर राज्यों की हालत तो इससे भी खराब है , वहां आज भी बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा भारतीयों का दमन जारी है। दरअसल पूर्ववर्ती सरकार की गलत नीतियों या कह लें कि उनके दो बडे नेता फकरूद्दीन अली अहमद , व अब्दुल गनी खा चौधरी  के समर्थन के वजह से इन राज्यो के लोगों का जीना दूभर हो गया था। बाबजूद इनके  कांग्रेस सरकार भी एक लम्बे समय तक इन राज्य के लोगों का दोहन करती रही , बाद में जब लोगों ने विद्रोह किया तो असम गण परिषद की सरकार बनी । तब कुछ जीने लायक माहौल बना। अभी भी वहां से 18 विधायक इन्ही बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण है , इस सब पर विचार हुआ और मंच वहां के राज्यों के लिये क्या कर सकता है , इसका उद्देश्य तय किया गया, जिस पर काम हो रहा है और हमें उम्मीद है कि इस समस्या का हम जल्द निराकरण कर लेगें।

 

प्र.: कितने राज्यों में भारत रक्षा मंच विस्तार कर चुका हैं?

उ.:  सभी हिन्दी भाषी राज्यों  में मंच खड़ा हो चुका है और जहां कही भी बांग्लादेशी रह रहें है, वहां वहां इसे विस्तार दिये जाने का प्रयास हो रहा है। वैसे दिल्ली , मध्यप्रदेश , छत्तीसगढ , हरियाणा , झारखंड , पश्चिमी बंगाल , बिहार व उडीसा में कार्यकारणी बना ली गयी है। निकट समय में हम दक्षिण भारत पर फोकस कर रहें है। आने वाले समय में आप देखेंगे कि भारत रक्षा मंच हर जगह आपको मिलेगा ।

 

प्र.: भारत रक्षा मंच का उद्देश्य क्या है?

उ.: भारत रक्षा मंच का उद्देश्य बिल्कुल साफ है।  हमें पहले बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान करनी है और फिर अगर वह शरणार्थी है तो उन्हें शरणार्थी का कार्ड और यदि वह शरणार्थी नही है तो वर्क परमिट जारी किया जाय। यह हमारा पहला उद्देश्य है। दूसरा उद्देश्य है कि समान नागरिक संहिता भारत को एक सूत्र में पिरोने के लिये बनाया जाय। तीसरा उद्देश्य है कि हिन्दू को मुखर बनाया जाय तभी वह प्रबल राष्ट्र का निर्माण कर सकता हैं। अभी यह देखा जाता है कि कुछ भी हो वह प्रतिक्रिया नही करता। चौथा उद्देश्य यह है कि हिन्दू को जागृत की जरूरत है क्योंकि यही भारत की शक्ति व पहचान है , इसे प्रखर करने की आवश्यकता है। पांचवा हिन्दूओं में व गैर मुस्लिम लोगों के आत्मविश्वास को जगाना है।

 

प्र.: आप पिछले पांच सालों से मेहनत कर रहें है आपको कितनी सफलता अब तक मिली हैं।

उ.: भारत बांग्लादेश समझौता एक अभूतपूर्व समझौता है, जिससे वहां के राज्यों को फायदा हुआ है । सीमा बन जाने से अब घुसपैठ कम हो गयी है। गायों का जाना और उनके दो कसाईखाने बंद हो जाने से उनके रोजगार पर भी असर पडा है। पहले होता यह था कि जो बंटवारा हुआ था उसमें उनके कई गांव भारत में आते थे और भारत के कई गांव बांग्लादेश में आते थे जिसके कारण लोग अपने गांव के नाम पर इघर उघर आसानी से चले जाते थे लेकिन अब जब गांवों की अदला बदली हुई है तो उससे आवागमन बंद हो गया है। मुस्लिम लोगों उघर चले गये और अब हिन्दू लोग इघर आ गये , इससे घुसपैठ भी कम हो गयी है।उघर से आने वाले नकली नोटों का खेप, आतंकी व ड्रग्स आदि भी बंद हो गया है। बांग्लादेश अब इस सीमा समझौता प्रभावित है और दिन ब दिन वहां के हालात बदतर होते जा रहें है।

 

प्र.: अब तक मंच ने बांग्लादेशियों की पहचान के लिये क्या  किया हैंय़

उ.: हमने सिर्फ सरकार से एक मांग की थी कि 1971 से पहले जो लोग यहां के नागरिक थे उनका प्रमाण लेकर एक रजिस्टर बनाया जाय । हालाकि आधार कार्ड से यह काम हो सकता था लेकिन घुसपैठ की पहचान होना इसलिये जरूरी थी क्योंकि इससे पता चलता कि जो लोग यहां आज रह रहें है वह वाकई पहले यहां के थे या बांग्लादेश से आये हैं । दोनो रजिस्टर इसी बजट सत्र में तैयार हो जायेगें, ऐसी मंच को उम्मीद है।इसके बाद दोनों का मिलान करने पर पता चल जायेगा कि पूर्वीतर राज्यों से देश के कई हिस्से में रहने वाले व आधार कार्ड बनवाने वाले वास्तव में भारतीय हैं या नही।

 

प्र.: मंच की आगे की क्या योजना है? जिन लोगों का मिलान नही होगा , उनके लिये क्या कोई योजना मंच ने बनायी है?

उ.: पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय में आईएमडीआई  एक्ट 1984 में लाया गया था , बीस वर्ष बाद सुप्रीम कोर्ट ने उसे स्कैवश कर दिया, यह पूरा वाद भाजपा के केन्द्रीय मंत्री सोनोवाल ने लडा। बांग्लादेश से आने वाले कोई सम्पन्न आदमी नही है।  गरीब तबके के लोग हैं जो यहां आकर अपना जीवन यापन कर रहें है। उन्हे यहां की राजनीति या क्षेत्र से कुछ नही लेना । उनके लिये शरणार्थी कार्ड बने किसी को कोई आपत्ति नही है लेकिन जो घुसपैठ कर आतंक फैलाने के उद्देश्य से आये है उनकी पहचान होने पर उन्हें सजा देना जरूरी है।

 

प्र.: आपकी कुछ मांग भी है?

उ.: हमारी मांग पर ही एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई थी जिसमें असम में नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजन बनाने का आदेश हुआ था।  ऐसा नही है हम कोई नयी मांग कर रहे हैं ,इससे पहले भी 1950 में इस तरह का काम हुआ था, जिसे अब अपग्रेड किया जा रहा है। यह काम भी सुप्रीम कोर्ट की देख रेख में हो रहा है। हां, इतना जरूर है कि अब अपग्रेड वही होगें जो 1971 के पहले के कागजात प्रस्तुत कर पायेगें।

 

 

 

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