लेखक परिचय

अविनाश वाचस्‍पति

अविनाश वाचस्‍पति

14 दिसंबर 1958 को जन्‍म। शिक्षा- दिल्ली विश्वविद्यालय से कला स्नातक। भारतीय जन संचार संस्थान से 'संचार परिचय', तथा हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम। सभी साहित्यिक विधाओं में लेखन, परंतु व्यंग्य, कविता एवं फ़िल्म पत्रकारिता प्रमुख उपलब्धियाँ सैंकड़ों पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। जिनमें नई दिल्ली से प्रकाशित दैनिक नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, जनसत्ता अनेक चर्चित काव्य संकलनों में कविताएँ संकलित। हरियाणवी फ़ीचर फ़िल्मों 'गुलाबो', 'छोटी साली' और 'ज़र, जोरू और ज़मीन' में प्रचार और जन-संपर्क तथा नेत्रदान पर बनी हिंदी टेली फ़िल्म 'ज्योति संकल्प' में सहायक निर्देशक। राष्ट्रभाषा नव-साहित्यकार परिषद और हरियाणवी फ़िल्म विकास परिषद के संस्थापकों में से एक। सामयिक साहित्यकार संगठन, दिल्ली तथा साहित्य कला भारती, दिल्ली में उपाध्यक्ष। केंद्रीय सचिवालय हिंदी परिषद के शाखा मंत्री रहे, वर्तमान में आजीवन सदस्य। 'साहित्यालंकार' , 'साहित्य दीप' उपाधियों और राष्ट्रीय हिंदी सेवी सहस्त्राब्दी सम्मान' से सम्मानित। काव्य संकलन 'तेताला' तथा 'नवें दशक के प्रगतिशील कवि कविता संकलन का संपादन। 'हिंदी हीरक' व 'झकाझक देहलवी' उपनामों से भी लिखते-छपते रहे हैं। संप्रति- फ़िल्म समारोह निदेशालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली से संबद्ध।

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 अविनाश वाचस्परति

 वे अपने वोटरों को भिखारी कह रहे हैं। यह जानते हुए भी कि उनका गुजारा वोटरों के वोटों के बिना नहीं होने वाला हे और वोट मांगने की चाहत में वे उनकी गरीब कुटिया में कई बार खाना खाने का ड्रामा कर चुके हैं। जबकि असली भिखारी तो यह खुद ही हैं। खाना भी उनसे मांग यही खा रहे हैं और वोट भी उनसे यही मांगेंगे। इससे तो यह जाहिर होता है कि इनकी ऊपर की मंजिल खाली है या भूसे से लबालब भरी हुई है। घास फूस यूं तो बहुत काम की होती है लेकिन वह इंसानों की नहीं, जानवरों की खुराक होती है।

दर्शनशास्त्र के अनुसार माना जाता है कि दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया। अब वे राहुल तो हैं पर रा से राम नहीं हैं और सबको भिखारी बतलाकर उन्होंखने यह भी कह दिया है कि मर्यादा से तो वह कोसों दूर हैं। आप ही मांग रहे हैं और देने वाले को भिखारी बतला रहे हैं। जबकि सृष्टि में कोई ऐसा नहीं है जो मांगता न हो, या जिसने कभी मांगा न हो। आप वोटों की भीख मांगते हैं तो वे नोटों की क्योंगकि आप वोट के बल पर सत्ताी हथिया लेते हैं और नोट खुद ब खुद आपके पास आने लगते हैं। वैसे भ्रष्टावचारी और बेईमान होने से मांगना बेहतर कहा गया है। कहा भी गया है कि जिसने की शर्म उसके फूटे कर्म और जिसने लादी बेशर्माई उसने खाई दूध मलाई। मांगने वाले तो जान की भीख भी मांगते हैं और पा लेते हैं। आपको समझना होगा कि जब जहाज में आतंकवादी कब्जाभ कर लेते हैं तो सभी उनसे अपनी जान की भीख मांग रहे होते हैं। मंदिर के बाहर भिखारी भीख मांग रहे होते हैं तो अंदर आप जैसे अपनी जीत की जो कामना कर रहे होते हैं, वह भी भगवान से भीख मांगना ही माना जाता है। आप गाड़ी में सवार होकर मंदिर पहुंच भीख मांग रहे होते हैं तो आपसे पैदल चल रहे भिखारी भीख मांग रहे होते हैं।

आप पीएम पर के लिए दावेदारी भी असल में भीख मांगना ही है। आप जानते हैं कि जिन कृष्णए एवं शिवाजी ने अखंड भारत का सपना देखा था उन्हों ने उत्तनर प्रदेश और महाराष्ट्रे में ही जन्म लिया था। आपसे आरटीआई के तहत पूछा जा सकता है कि महाराष्ट्र में यूपी के कितने और यूपी में महाराष्ट्र के कितने भिखारी हैं।

आप जैसे सत्ता के भूखे जो गंदगी और कीचड़ भरी सड़कों पर पैदल चलकर, गांवों में गरीबों के घर पर वोट के लालच में खाना खा खाकर सुर्खियों में आ रहे हैं, उन्हेंं खाना खिलाने वाले नहीं जानते हैं कि आप उनके रहनुमा नहीं लुटेरे हैं और देश को बेदर्दी से लूटने में जुटे हुए हैं। आपके ऊपर देश का न जाने कितना धन सुरक्षा इत्याैदि के नाम पर बरबाद किया जा रहा है और आप जिनके दिए गए टैक्से के बल पर यह सुविधाएं पा रहे हैं, उन्हेंन ही भिखारी बतला रहे हैं। आपकी जानकारी के लिए यह बतलाना भी मुफीद रहेगा कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विस्टंन चर्चिल ने हिंदुस्ताहनी नेताओं को सत्ता सौंपते समय कहा कि हम लुटेरों के हाथ सत्ताट सौंप रहे हैं और अगले सौ साल में इस देश के सौ टुकडे हो जाएंगे।

ऐसा कोई नहीं हुआ जिसने कभी किसी से कुछ नहीं मांगा हो। प्रेमिकाएं अपने प्रेमी से मोबाइल फोन और उसमें बैलेंस मांगने लगी हैं। वैसे वे बिना मांगे ही बात करने के लालच में खुद ही रिचार्ज करवा देते हैं, अरे भाई, मोबाइल की बैटरी नहीं, टॉक टाइम बैलेंस। सैलफोन के आने से मांगने का दायरा खूब बढ़ गया है। मांगने को रोग तो कहा नहीं जा सकता। मांगने की शैलियां सबकी अपनी अपनी तरह की यूनीक होती हैं।

आप देश के प्रदेश के टुकड़े करने में जुटे हुए हैं कि पी एम न सही, सी एम ही बन जाएं, आखिर कोई कुर्सी तो पाएं। ऐसा लगता है कि आपको अपने सिर पर हाथ रखकर खाक होने का श्राप मिला हुआ हो और आपने मारक मंत्र का पाठ शुरू कर दिया है। ऐसा लगता है कि आप अपने बयानों से राज्योंर में खाई खोद रहे हैं बिजली, पानी, गैस पाईपों की तर्ज पर। आप जनता के मन में भी गहरी खाईयां बना दे रहे हैं। कभी भिखारी कह देते हैं कभी किसी प्रदेश को लड्डू के माफिक फोड़ने-बांटने को तैयार हो जाते हैं। एक भिखारी कह रहा है, दूसरा खाई खोद रहा है। मानो प्रदेश नहीं, फ्रूट हो गया है और इस फ्रूट को लूटने के लिए आप जैसे शातिर सक्रिय हो चुके हैं, क्याी इसे देश का सौभाग्यह माना जाए ?

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5 Comments on "भिखारी भी तुम, लुटेरे भी तुम – ज़रा नहीं किसी से कम"

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Jeet Bhargava
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दर असल आज देश का सबसे बड़ा भिखारी नेहरु-गांधी परिवार है.
नेहरू ने इलाहबाद का सिर्फ एक मकान देश को दिया और उसके बदले में पूरे देश को लूट लिया. और ६० साल से नेहरू की ही औलादे देश को लूट रही है.
जबकि आम उत्तर भारतीय जहां भी है, वहां खुद्दारी से कमाता है, खाता है और जीता है.
गोरी चमड़ी के अभारतीय राहुल आज उत्तर भारतीय को उसी नजर से देखते हैं, जैसे धर्मांतरण को उतारू ईसाई मिशनरिया गरीब लोगो को देखती हैं.

एल. आर गान्धी
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भिखारी उसे कहते हैं जो कोई काम न करे और मांग कर गुज़ारा करे … अपने ही यु.पी के भाइयों को भिखारी कहने वाले खुद क्या कोई ‘काम-धाम’ करते हैं ? …नहीं !… तो ?

sanjay rastogi
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राहुल बाबा को जेड श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त है इसलिए वोह कार रुकवाकर किसी भिखारी से मिल सकते है ऐसा कहकर वोह जनता को धोका दे रहे हैं

डॉ. मधुसूदन
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भारत के किसी भी प्रदेश में जाने का समान अधिकार सभी नागरिकों को है|
किसी भी प्रदेश में, भारत के किसी प्रदेश में रहने वाला नागरिक भिखारी नहीं माना जाएगा | क्या संविधान ऐसा नहीं कहता?
प्रादेशिक निष्ठां गलत है| समग्र भारत के प्रति, उत्कट भक्ति ही भारत को महान बना सकती है| प्रादेशिक निष्ठां देशके तुकडे कर के रख देगी|यह बात राहुल को पता होनी चाहिए|
वैसे राहुल का छाया चित्र और हंसी कृत्रिम दिखाई दे रहा है| “फोटू” निकलवाने के लिए पोज़ लिए खड़ा लगता है|

Sanjay
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१००% सही. खरी खरी.पवित्र परिवार के खिलाफ बोलना व लिखना बड़े साहस का काम है. आपने दर्पण दिखला कर अच्छा काम किया.कडवा सच बयान कर दिया.अति उत्तम. बहुत बहुत साधुवाद.

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