लेखक परिचय

अमिताभ त्रिपाठी

अमिताभ त्रिपाठी

एक स्‍वतंत्र पत्रकार, जो देश, समाज व धर्म के लिए पूर्णत: समर्पित है।

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-अमिताभ त्रिपाठी

बिहार में बहुप्रतीक्षित विधानसभा चुनाव सम्पन्न हो गये और अब उस पर विश्लेषणों का दौर चल रहा है। इन चुनावों में जिस प्रकार असाधारण जनादेश आया है उसके बाद इन बारीकियों का विश्लेषण करने का कोई अर्थ नहीं है कि किस जाति या बिरादरी ने किसे कितना मत दिया या फिर किस मजह्ब ने किसे मत दिया और किसे नहीं। जिस अनुपात में जनादेश आया है उसने इन विश्लेषणों को मह्त्वहीन कर दिया है अब केवल चर्चा इस बात पर हो सकती है कि बिहार के जनादेश के निहितार्थ क्या हैं और राष्ट्रीय राजनीति के लिये इसमें क्या सन्देश छुपा है।

बिहार चुनाव परिणाम आने के बाद भी सेक्युलरिज्म बनाम साम्प्रदायिकता पर बहस चल रही है और अनेक लिख्खाडों ने लालू प्रसाद यादव की तर्ज पर जनता दल युनाइटेड को बधाई तो दी है पर भाजपा पर साम्प्रदायिकता का ठप्पा लगाने से नहीं चूके हैं। लेकिन जैसा कि चुनाव परिणाम आने के बाद शालीन अन्दाज में राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि कुछ लोग दीवार पर लिखी साफ लिखावट को पढ नहीं पाये वही बात इन तथाकथित सेक्युलर लोगों पर भी लागू होती है। बिहार चुनाव परिणाम को गुजरात में पिछले दिनों हुए नगर निगम और पंचायत चुनाव परिणामों से अलग कर देखा नहीं जा सकता। जो संदेश उस चुनाव परिणाम में था वही संकेत बिहार चुनाव परिणाम में भी है। यदि राजनीति को न्यायपूर्ण विकास को केन्द्र में रखकर किया जाये और जनता को अपना वर्तमान जीवन स्तर उठाने का और अपनी पीढी का भविष्य सँवरने का भरोसा जग जाये तो वह उसी अनुपात में अपना समर्थन व्यक्त करती है।

बिहार के चुनाव परिणाम को दो तरीके से देखने की आवश्यकता है पहला, बिहार की क्षेत्र्रीय आकाँक्षा का विस्फोट इन परिणामों में दिखाई देता है जहाँ वर्षों की कुंठा और बिहारीपन की हीनभावना से बाहर निकल कर एक स्वाभिमान प्राप्त करने की उत्सुकता प्रकट होती है तो दूसरा, वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में अपने क्षेत्रीय हितों को देखते हुए एक ईमानदार और कर्मठ नेतृत्व प्राप्त करने की ललक भी देश के लोगों में दिख रही है।

इस चुनाव परिणाम का देश की राजनीति के संदर्भ में एक बडा मह्त्व है। पिछ्ले दो दशक से देश की राजनीति में सेक्युलरिज्म के नाम पर जिस प्रकार वंशवाद, परिवारवाद , भ्रष्टाचार और साम्प्रदायिकता का खुला खेल खेला जा रहा था उसके लिये देश की जनता ने एक खतरे की घन्टी बजा दी है। बिहार के चुनाव में इस बार जिन शक्तियों को जनता ने नकार दिया है वे एक बार फिर सेक्युलरिज्म के सहारे अपने सारे पापों को धुलने की पुरानी प्रवृत्ति का कार्ड खेलना चाहते थे। बिहार के चुनाव परिणाम से छ्द्म सेक्युलरिज्म की राजनीति करने वाली शक्तियों को सावधान हो जाना चाहिये क्योंकि हिंदू साम्प्रदायिकता का भय दिखाकर परिवारवाद और भ्रष्टाचार को राजनीति की संस्कृति बना देने वालों को अब अल्पसंख्यकों ने भी नकार दिया है।

यह ध्यान देने का विषय है कि जिस प्रकार गुजरात में सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड मामले को लेकर मुस्लिम समाज ने ना तो नरेंद्र मोदी के प्रति अविश्वास व्यक्त किया उसी प्रकार तथाकथित “ हिंदू आतंकवाद” या “ भगवा आतंकवाद” जैसे जुमलों को लेकर बिहार की जनता ने भी कांग्रेस को कोई पुरस्कार नहीं दिया इसी के साथ लोकसभा चुनावों में वरुण गाँधी पर रोलर चलवाने की बात करने वाले लालू प्रसाद यादव या फिर पिछले बिहार विधान सभा चुनाव में ओसाम बिन लादेन की शक्ल के व्यक्ति को लेकर घूमने वाले या फिर बाँग्लादेशी घुसपैठियों को नागरिकता दिलाने की बात करने वाले रामविलास पासवान को जो धूल बिहार की जनता ने चटाई है उससे यह सिद्ध हो गया है कि यदि विकास के नारे के साथ हिंदुत्व के नाम पर नकारात्मक और अनाप शनाप अतिरंजना को जनता पचा नहीं पा रही है तो सेक्युलरिज्म की आड में किसी भी हद तक हिंदू विरोध की राजनीति से न तो मुस्लिम एकजुट होता है और न ही सेक्युलर हिंदू के एकजुट होने का मिथ सफल होता है।

नीतीश कुमार ने अत्यंत सहज और शालीन भाव से अपने शासन में न्याय की भावना को अभिव्यक्त होने दिया और बिहार की समस्त जनता को एक इकाई मानकर उन्हें विकास की मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया और इस क्रम में जाति और मजहब के दायरे से बाहर एक बिहारी स्वाभिमान की बात करने में वे सफल रहे।

लेकिन यह बात जानना अत्यंत आवश्यक है कि मुस्लिम समाज की भावना में क्या अंतर आया है? पहले गुजरात के स्थानीय निकाय के चुनाव में और बिहार विधानसभा चुनाव में एक सामान्य बात देखने को मिली कि गुजरात राज्य में वर्षों के दुष्प्रचार के बाद भी वहाँ की मुस्लिम जनता को यह आभास हो गया कि विकास की मुख्यधारा में उसे लाने के प्रयास में किसी प्रकार का भेदभाव उसके साथ नहीं हो रहा है और इस्लाम के राजनीतिक उपयोग से उत्पन्न आतंकवाद की विश्वव्यापी समस्या ने उसे समाज में अलग थलग कर दिया है जिसका प्रभाव उसके दिन प्रतिदिन के जीवन पर पड रहा है और भारत में पिछले दो दशक में जिस प्रकार हिंन्दुत्व आंदोलन ने अपने विरुद्ध हुए अपप्रचारों के बाद भी हिंदू स्वाभिमान और उसके राष्ट्रीय संदर्भ को प्रासंगिक बनाये रखा उसने इन दो दशकों में शक्ति संतुलन का कार्य किया और मुस्लिम समाज को यह बात समझ में आने लगी है कि हिंदुत्व इस्लाम विरोधी विचारधारा नहीं है विशेष रूप से तब जब कि वे स्वयं उस इस्लामी आतंकवाद की छाया से भयभीत होने लगा हैं जिसके विरुद्ध मुखर विरोध हिंदुत्व समर्थक शक्तियाँ करती हैं।

इस नये घट्नाक्रम से अब मुस्लिम समाज में एक छोटा वर्ग सेक्युलरिज्म के दुष्प्रचार से बाहर आकर विकास की मुख्यधारा में आने का साहस दिखा रहा है और छोटे से वर्ग के इस बदलाव का चमत्कारिक परिणाम हमें सीटों के संदर्भ में देखने को मिल रहा है। लेकिन इस परिवरर्तन के प्रति किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। आने वाले समय में ऐसे आश्चर्यजनक परिणाम हमें और भी देखने को मिलेंगे।

राष्ट्रीय संदर्भ में यदि इस जनादेश की व्याख्या की जाये तो एक और मह्त्वपूर्ण बात सामने आती है कि भारत के मूल स्वरूप के साथ स्वयं को जोड्ने की लोगों की अवचेतन मन की आकाँक्षा प्रकट हो रही है। भारत मूल रूप में एक विकेंद्रित भाव का विविधतावादी देश है जहाँ बहुत्व में एकत्व की भावना सर्वत्र दिखाई देती है और प्राचीन काल में महाजनपद काल में भी हमें गणराज्यों की भूमिका का ज्ञान है जिसका भारत को लाभ और क्षति दोनों हुई परन्तु वास्तविकता यही है कि भारत मूल रूप में सशक्त केंद्र के मूल में विकेन्द्रित राजनीतिक शक्ति का देश रहा है और आस्था के स्तर पर भी भारत का यही स्वभाव रहा है जहाँ आध्यात्मिक मूल के केंद्र में उपासना पद्धतियों की स्वतंत्रता रही है। आज हमें भारत में उसी मूल स्वरूप को प्राप्त करने की चेतना के दर्शन हो रहे हैं जब भारत में सशक्त केंद्र के नाम पर एक परिवार या वंश के शासन में रहने की प्रवृत्ति को नकारा जा रहा है और क्षेत्रीय आधार पर अपनी क्षेत्रीय आकँक्षाओं को पूरा करने वाले मुख्यपंत्रियों को सम्मान दिया जा रहा है। इस रुझान को देखें तो यही स्पष्ट होता है कि अब न्याय और लोकतन्त्र के सिद्धान्तों को ध्यान में रखकर अपनी राजनीति को चलाने वाले राजनीतिक दलों को जनता का विश्वास प्राप्त होगा।

जहाँ तक देश में नये नेतृत्व के प्रति लोगों की ललक का प्रश्न है तो इस आकाँक्षा के दर्शन भी इन परिणामों में हो रहे हैं। इस आकाँक्षा के आधार पर इतना कहा जा सकता है कि आने वाले दो तीन वर्षों में हमें भारत की राजनीति में कुछ और चमत्कारों के लिये तैयार रहना चाहिये। वास्तव में तो यह चमत्कार नहीं होगा लेकिन सेक्युलरिज्म और वामपंथी विचारधारा की पट्टी आंखों पर बाँधे लोगों को होने वाले परिवर्तन भी किसी चमत्कार से कम नहीं लगेंगे।

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3 Comments on "बिहार जनादेश के निहितार्थ"

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Anil Sehgal
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बिहार जनादेश के निहितार्थ – by – अमिताभ त्रिपाठी ………………………………. प्रतक्ष को प्रमाण की आवश्कता ………………………………. ……………………………….. RSS और BJP को एक सुझाव ……………………………….. (१) RSS अपनी शाखाओं एवं अन्य संस्थाओं के मुस्लिम अधिकारियों का सार्वजनिक प्रदर्शन करें. जैसे अभी जो धरना आदि दिए गए, उनमें ऐसे अधिकारीयों का परिचय / व्याख्यान और अधिक करवाते तो सोने पर सुहागा होता. (२) RSS और इसकी दूसरी संस्थाओं में मुस्लिम बढ़ चढ़ कर भाग ले रहें हैं – इसका खुलम-खुला एलान होना चाहिए (३) BJP की टिकिट पर देश भर से चुने पंच, सरपंच, पार्षद, MLAs, MPs, पार्टी पदाअधिकारीयों को देश भर… Read more »
डॉ. सी. पी. राय
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बिहार में ये फिर सिद्ध हुआ है की सांप्रदायिक ताकते जो लोकतंत्र को केवल तब तक स्वीकार कर रही है जब तक मजबूरी है ,वरना उनका इरादा भी हिटलर की तरह वोट से आकर तानाशाही और कुछ खास लोगो का शासन स्थापित करने का ही है ठीक हिटलर की तरह | बिहार में भी इन ताकतों ने बेईमानी करने में कोई कसर नहीं छोड़ा ,उनकी पूरी कोशिश थी की नितीश की सीटें उनसे कम हो जाये और उन्होंने जो भी उनके पास वोट था उसका प्रयोग केवल अपने लिए किया ,नितीश को उनके बिलकुल वोट नहीं पड़े पर ये चुनाव… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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लेखसे सहमत। सही विश्लेषण।

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