लेखक परिचय

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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biharसुरेश हिंदुस्थानी
बिहार विधानसभा के चुनावों में चल रहे टिकट वितरण की प्रक्रिया के बाद आरोप प्रत्यारोप की राजनीति शुरू हो गई है। लालू प्रसाद यादव और नीतीश की पार्टी में घमासान मचा हुआ है, तो भाजपा और कांग्रेस भी इस समय अंदरखाने की लड़ाई से जूझ रहीं हैं। इन सभी दलों की अंदरूनी लड़ाई का फायदा निश्चित रूप से मुलायम सिंह की पार्टी को मिलेगा। सपा को बिहार में तीसरे मोर्चे के रूप में देखा जा रहा है। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के गठबंधन से अलग होने के बाद अब लड़ाई के तौर तरीकों में बदलाव आ रहा है। चुनावी मैदान में मुलायम सिंह यादव के खुलकर सामने आने से दिग्गजों को पसीना आने लगा है।

वर्तमान हालातों में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के लिए प्रतिष्ठा का पर्याय बन चुका विधानसभा चुनाव किस परिणति को प्राप्त करेगा, यह आने वाला समय ही बता पाएगा, लेकिन इतना अवश्य ही दिखाई देने लगा है कि जिस समाजवादी पार्टी को राजद और जदयू कमजोर मानकर व्यवहार कर रहे थे, आज उसी समाजवादी पार्टी ने उनको रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। बिहार की वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि सपा की ओर से महाधुरंधर मुलायम सिंह यादव हैं तो दूसरी ओर भाजपा के नरेंद्र मोदी हैं। भाजपा का सहयोग अन्य तीन पार्टियां भी कर रहीं हैं। जिसके कारण यहा कहा जा रहा है कि भाजपा को भी सहारे की तलाश करनी पड़ी।
बिहार विधानसभा का चुनाव इसलिए प्रतिष्ठा और महत्व का है कि क्षेत्रीय नेताओं से लेकर राष्ट्रीय नेताओं का राजनैतिक भविष्य दांव पर लग गया है। नीतीश और लालू यादव के साथ कांग्रेस है और उन्होंने आपस में सौ-सौ सीटों की बंदरबांट कर ली है। इसी प्रकार कांग्रेस को 40 सीटें दी गई है। शेष तीन सीटों की खुरचन अन्य क्षेत्रीय दलों को देने का निर्णय लिया है। इसी से अपमानित होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस और मुलायमसिंह की समाजवादी पार्टी ने इस गठबंधन से रिश्ते तोड़ लिए है। इस गठबंधन में केवल नीतीश कुमार और लालू यादव ही प्रभारी नेता है, कांग्रेस तो इन दोनों के पीछे दुम हिलाती पार्टी बनकर रह गई है।

सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बिहार में राजनीतिक स्थिति को भांप कर ने नाराज होकर अपना अलग गठबंधन बना लिया है। जिसे बिहार में तीसरा मोर्चा का नाम दिया जा रहा है। सपा मुखिया मुलायम सिंह के राजनीतिक अस्तित्व को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि वे राजनीति के ऐसे सितारे हैं जिनको हर कोई पसंद करता है। उल्लेखनीय है कि राजद के लालू प्रसाद यादव और जनता दल यूनाइटेड के नीतीश कुमार ने मुलायम सिंह को आगे रखकर ही महागठबंधन बनाया था। बाद में इन दोनों स्वार्थी नेताओं ने मुलायम को अस्तित्वहीन मानकर जो कुठाराघात किया, उससे वर्तमान दृश्य का उपस्थित होना लाजिमी ही था। इन नेताओं ने जब महागठबंधन के मुखिया के साथ विश्वासघात किया, तब आगे इन पर कितना विश्वास किया जाएगा, यह सवाल उठना स्वाभाविक है। इतना तय है कि बिहार में सपा के लिए खोने के लिए कुछ नहीं है, उसे अगर एक सीट भी मिल गई तो वह व्यक्तिगत सपा की उपलब्धि ही कही जाएगी।

मुलायम सिंह की पार्टी सपा बिहार के चुनावों में कितनी सफलता हासिल करेगी, यह तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा, लेकिन बिहार में उनका कद पहले से काफी बड़ा दिखाई दे रहा है। राजनीतिक स्थिति परिस्थिति का आंकलन करने से जो वास्तविकता उजागर होती है, उसके अनुसार लालू और नीतीश बैसाखी के सहारे राजनीतिक भविष्य का ताना बाना बुन रहे हैं। लेकिन मुलायम सिंह एक शेर की भाँति चुनावी परिदृश्य को प्रभावित करते हुए दिखाई दे रहे हैं। मुलायम सिंह के प्रयासों से नीतीश और लालू के प्रभाव को लेकर सवालों का पुलिंदा स्थापित होने लगा है। खैर उन्होंने जिस प्रकार से विश्वास घात किया है उसकी परिणति इसी प्रकार की होनी थी।

भाजपा के एनडीए गठबंधन के अंदर सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान चल रही थी, लेकिन गठबंधन के नए-पुराने नेताओं ने मिलकर सीटों का मामला सुलझा लिया है। प्रमुख दल के नाते भाजपा 160 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, तो लोकजनशक्ति पार्टी को चालीस सीटें दी गई है। इसी प्रकार उपेन्द्र कुशवाह की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को 23 सीटें और जीतनराम मांझी की हिन्दुस्तान अवाम पार्टी को बीस सीटें दी गई है। कुल मिलाकर सीटों के बंटवारे को लेकर किसी प्रकार की खींचतान देखने को नहीं मिली। इसके अलावा इन दलों को जो सीटें दी गई हैं, उनमें आपस में कुछ बेमेल स्वर निकलते दिखाई दे रहे हैं।

बिहार के चुनाव के बारे राजनीतिक विद्वान अभी से कयास लगाने लगे हैं। राजनैतिक पंडितों का आंकलन है कि नीतीश-लालू के सामने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का ही मुकाबला होगा। बिहार विधानसभा चुनाव की असलियत यह भी है कि यह चुनाव पूरी तरह से जातीय समीकरण पर ही लड़े जाते हैं। बिहार में जातिवाद की राजनीति के सूत्रधार लालू यादव और नीतीश कुमार को अपनी जाति के वोट मिलने की संभावना है। लेकिन यह बात भी सही है कि नीतीश कुमार ने जिस प्रकार से दलित मुख्यमंत्री रहे जीतनराम मांझी के साथ जो राजनीति की है, उसका खामियाजा भी नीतीश को भुगतना होगा। इसके अलावा लालू प्रसाद यादव के समक्ष एक सबसे बड़ा राजनीतिक पेच मुलायम सिंह यादव को लेकर पैदा हो गया है। लालू के खिलाफ जो भी यादव हैं वे बदली हुई परिस्थिति में समाजवादी पार्टी के साथ खड़े नजर आएंगे। ऐसे में लालू और नीतीश के लिए सत्ता प्राप्त करना दिवास्वप्न ही साबित होगा।

बिहार विधानसभा के लिए चुनावी मुद्दों के भी संकेत मिल गए हैं। एनडीए गठबंधन नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता के आधार पर चुनाव का अभियान चलाएगी और नीतीश-लालू का गठबंधन नीतीश के बिहार में किए गए विकास कार्यों को लेकर चुनाव-प्रचार करेगी। इस तरह केंद्र और राज्य सरकार के विकास कार्यों पर यह चुनाव केंद्रित होगा। भाजपा के गठबंधन को प्रारंभिक चुनाव अभियान में बढ़त मिल गई है, क्योंकि जिस महागठबंधन का राग अलापा जा रहा था, जिस सांप्रदायिक विरोधी महागठबंधन का लालू-नीतीश ने जोर-शोर से प्रचार किया था, सपा के मुलायम यादव के गठबंधन से नाता तोड़ने से इस महागठबंधन की हवा निकल गई है।

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