लेखक परिचय

हिमकर श्‍याम

हिमकर श्‍याम

वाणिज्य एवं पत्रकारिता में स्नातक। प्रभात खबर और दैनिक जागरण में उपसंपादक के रूप में काम। विभिन्न विधाओं में लेख वगैरह प्रकाशित। कुछ वर्षों से कैंसर से जंग। फिलहाल इलाज के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से रचना कर्म। मैथिली का पहला ई पेपर समाद से संबद्ध भी।

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हिमकर श्याम

लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान अभी नहीं हुआ है, लेकिन बिहार की राजनीतिक सरगर्मी एकाएक तेज हो गई है. चुनाव से पहले हर संभावित गठबंधन के लिए दिल और दरवाजे खोल दिए गए हैं. पुराने राजनीतिक समीकरण टूटने और नए राजनीतिक समीकरण बनने का सिलसिला शुरू हो गया है. कहीं कुनबा बिखर रहा है तो कहीं बिखरा कुनबा फिर जुट रहा है. कोई अपना घर छोड़ कर जा रहा है तो कोई अपने पुराने घर में लौट रहा है. दोस्त दुश्मन बन रहे हैं और दुश्मन को गले लगाया जा रहा है. समझौते के लिए विचार-सिद्धांत, आदर्शों की तिलांजली दी जा रही है. भाव-ताव, मोल-तोल, टिकट-सीट को लेकर सौदेबाजी करने वालों का महत्व बढ़ गया है. बिहार की राजनीतिक गतिविधियों को देखकर लगता है कि बिहार का अगला आम चुनाव सकारात्मक मुद्दों के बजाय जाति और धर्म के दायरे में रह कर ही लड़ा जाएगा. फिलहाल यह कहना बड़ा मुश्किल है कि मतदाताओं का रूख़ क्या होगा.

आगामी चुनाव नीतीश-लालू-पासवान के लिए अग्नि परीक्षा के समान है. जे.पी. आन्दोलन से निकले इन तीनों नेताओं का सबकुछ दाँव पर लगा हुआ है. नीतीश के लिए यह अब तक का सबसे कठिन चुनाव है. लालू बिहार में अपना रुतबा फिर से कायम करना चाहते हैं और पासवान बिहार कि राजनीति में अपनी खोई प्रासंगिकता दोबारा बहाल करना चाहते हैं.  चुनावों के नतीजों से यह तय होगा की बिहार पर किसका राज होगा. इन तीनों नेताओं का सियासी कद विगत दिनों में घटा है. राजनीति के इस त्रिमूर्ति के लिए आनेवाला चुनाव ‘करो या मरो’ की तरह है.

बिहार की सियासत में अपनी खोयी जमीन तलाश रहे लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान को एनडीए का सहारा मिल ही गया है. 12 साल बाद पासवान एकबार फिर से एनडीए का हिस्सा बन गए हैं. गौरतलब है कि गुजरात दंगों के बाद सेक्युलरिम का हवाला देकर पासवान ने एनडीए से रिश्ता तोड़ लिया था. भाजपा और लोजपा में गठबंधन के लिए हुए समझौते के तहत लोक जनशक्ति पार्टी बिहार के 40 लोकसभा सीट में सात सीटों पर चुनाव लड़ेगी. उल्लेखनीय है कि 2009 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी के 12 उम्मीदवारों में से एक भी जीत हासिल नहीं कर पाया था. वह खुद भी अपना चुनाव हार गए थे. पासवान को राजद-कांग्रेस-राकांपा गठबंधन में अपने लिए कोई खास फायदा होता नहीं दिख रहा था. इसलिए उन्होंने एनडीए दामन थामना बेहतर समझा. वैसे भी हवा का रुख अभी एनडीए के पक्ष में ही बहता दिखाई दे रहा है. पासवान को लगता है कि नए गठबंधन और अपने वोटरों के दम पर इस बार वह कुछ सीटें निकाल सकते हैं. वक्त और हालात ने उन्हें अचानक मोदी का मुरीद बना दिया है. कल तक यही रामविलास पासवान भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी के कटु आलोचक थे. हालाँकि भाजपा-लोजपा का मेल-मिलाप भाजपा कार्यकर्ताओं और प्रदेश के कुछ नेताओं को रास नहीं आ रहा है.

बिहार में अगड़ी जातियां भाजपा समर्थक मानी जाती हैं. भाजपा पिछड़ी जाति के नेता उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी से गठबंधन कर पिछड़ी जातियों में अपनी पहुंच बढ़ाने की जुगत में है. भाजपा की नज़र दलित और महादलित मतदाताओं पर भी है. बिहार में 16 फीसदी दलित वोट हैं जिसमें से सबसे ज्यादा दलित पासवान जाति के हैं. पासवान जाति की आबादी करीब चार फीसदी है. 2009 के लोकसभा चुनावों में पासवान को दलित वोट बैंक में से 29 फीसदी वोट मिले थे. पासवान से हाथ मिलाने से यदि दलित मतदाता भाजपा की तरफ रुख करते हैं तो बिहार में पार्टी तगड़ी स्थिति में होगी. 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान जदयू के साथ गठबंधन करने वाली भाजपा को बिहार में सभी ऊंची जातियों के वोट मिले थे,  लेकिन यादव,  मुस्लिम और पासवान समाज के वोट नहीं मिले थे. लोजपा और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के साथ गठबंधन के बाद एनडीए को ऊंची जातियों, वैश्यों,  पासवान और कोइरी समाज के वोट मिल सकते हैं.

चुनाव को लेकर राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव बेहद बेचैन दिखाई दे रहे हैं. उनके पास बेचैन होने के कई कारण मौजूद हैं. राजद में सबकुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है. राजद में फूट और चुनाव के ठीक पहले रामविलास के पाला बदल लेने से लालू की नींद उड़ गयी है. पासवान का एनडीए के साथ जाने का फैसला लालू के लिए सबसे बड़ा झटका है. लालू की नजर बिहार में पिछड़ी और दलित जातियों पर थी. कांग्रेस के साथ गठबंधन का मसला भी फंसता नजर आ रहा है. कांग्रेस ने उनके सामने 15 सीटों की मांग रखकर उन्हें उलझन में डाल दिया है. कांग्रेस ने कहा है कि उसने अपने सभी विकल्प खुले रखे हैं. गठबंधन में हो रही देरी से लालू प्रसाद यादव नाराज दिख रहे हैं. लालू प्रसाद ने कांग्रेस से खुलकर अपनी नाराजगी जताई है. उन्होंने कहा है कि अब गठबंधन नहीं,  लठबंधन का समय है. उन्होंने अपनी तरफ से कांग्रेस के लिए 11 और राकांपा के लिए एक सीट छोड़ने का ऐलान किया है. समझौता नहीं होने पर लालू अकेले चुनावी मैदान में उतरेंगे. लालू की अब यही कोशिश होगी कि यादव और मुस्लिम समीकरण का साथ उन्हें किसी तरह मिल जाये. वहीँ यादव मतदाताओें के पास ये एक तरह से आख़िरी मौका है कि उनके अपने नेता लालू यादव राजनीतिक तौर पर प्रासंगिक बने  रहें. इसके अलावा लालू बिहार में सत्ता विरोधी लहर को अपने पक्ष में करने की कोशिश करेंगे. कयास लगाया जा रहा है कि लालू का जो समर्थक वर्ग है वो भावनात्मक तौर पर उनसे जुड़ सकता है. अगर ऐसा होता है तो वह कोई बड़ा उलटफेर कर पाने में सफल हो सकते हैं.

नीतीश सरकार की लोकप्रियता और पार्टी का जनाधार विगत दिनों में घटा है. भाजपा से अलग होने के बाद नीतीश को अगड़ी जातियों का समर्थन खोने का डर है. बिहार की अगड़ी जातियों के लोग नीतीश की आरक्षण नीति के कारण नाराज हैं क्योंकि पंचायतों में इससे अगड़ी जातियों का वर्चस्व टूट सा गया है. जदयू की चिंताएँ उसकी सांगठनिक कमज़ोरी और कार्यकर्ताओं, सांसदों और विधायकों के असंतोष की वजह से भी बढ़ रही हैं. नीतीश के पुराने साथी उन्हें छोड़ कर जा रहे हैं कुछ का साथ पार्टी खुद छोड़ रही है. हाल ही में नीतीश सरकार की  मंत्री परवीन अमानुल्लाह पार्टी छोड़कर आम आदमी पार्टी में शामिल हो गयी हैं. वहीँ पार्टी ने अपने पाँच सांसदों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए निष्कासित कर दिया है. निष्कासित नेताओं में शिवानंद तिवारी, पूर्णमासी राम, मंगनी लाल मंडल, सुशील कुमार सिंह और जय नारायण निषाद जैसे बड़े नाम हैं. भाजपा उसके लिए राजद से भी बड़ी चुनौती बनकर उभरी है. जदयू पूरी तरह पिछड़ी, अति पिछड़ी और मुस्लिम वोटों पर निर्भर है, जो कि राजद का भी मुख्य वोट बैंक है. जदयू अपना पूरा जोर राजद के वोट बैंक में सेंध लगाने और नेताओं को तोड़ने में लगा रही है. जातीय समीकरण के अलावा नीतीश कुमार अपने विकास कार्यों और विशेष राज्य के हथियार के सहारे चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी में हैं. नीतीश केन्द्र में अनिश्चित सियासी स्थिति बनने पर तीसरे मौर्चे के समर्थन से दिल्ली के तख़्त तक पहुँचने का सपना भी पाल रहे हैं. तीसरे मोर्चे का सारा दारोमदार जदयू सुप्रीमो और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हैं. इससे इतर राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि कांग्रेस और जदयू के बीच पर्दे के पीछे गठबंधन की तैयारी चल रही है. राहुल गांधी और उनके करीबी लालू की बजाय नीतीश कुमार के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहते हैं. जदयू ने इस गठबंधन के लिए कवायद भी शुरू कर दी है. हालांकि, जेडीयू इस संभावना से फिलहाल इनकार करती दिख रही है. बिहार को विशेष राज्य का दर्ज़ा दे कर कांग्रेस नीतीश को अपने खेमे में ला सकती है. वैसी स्थिति  में नीतीश के पास भी यह  बहाना रहेगा कि राज्य को विशेष राज्य का दर्ज़ा दिलवाने के लिए उन्हें यूपीए से हाथ मिलाना पड़ा.

बिहार में इस वक़्त सियासी खलबली मची हुई है. सूबे की सियासी तस्वीर पल-पल नया रंग ले रही है. आलेख आप तक पहुँचने तक सियासत और गठबंधन का कोई नया रूप आपके सामने हो सकता है. सत्ता की आपाधापी और सिद्धांत विहीन गठबंधन का रोज नया रूप सामने आ रहा है. जिसके पास सत्ता है वह अपनी सत्ता बचाए रखना चाहता है और जो सत्ता से दूर वह हर हाल में सत्ता पाना चाहता है. आनेवाले लोकसभा चुनाव में वोट बटोरने के लिए सभी पार्टियां रणनीति बनाने और उसे अमलीजामा पहनाने की कवायद में जुट गई हैं. राजनीति में जातिवाद का दखल कोई नई बात नहीं है. प्रायः सभी दल पूरी प्रतिबद्धता के साथ अपने-अपने वोट बैंक को बढ़ाने के लिए इस हथियार का इस्तेमाल करते रहे हैं. बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण को दरकिनार नहीं किया जा सकता. ऐसा लगता है कि अगामी लोकसभा चुनाव में एक बार फिर बिहार में जातीय समीकरण हावी रहेगा.

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1 Comment on "बिहार : बनते बिगड़ते सियासी समीकरण"

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महेश वर्मा
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महेश वर्मा

अच्छा विश्लेषण. बिहार के चुनाव वाकई दिलचस्प होने जा रहे हैं, क्योंकि नेता, पार्टी और गठबंधन के रंग बदल पल-पल बदल रहे हैं. एक के बागी दूसरे के सहयोगी बन रहे हैं. बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण को भी दरकिनार नही जा सकता है.

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