लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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समाजवादी सरकार में कानून व्यवस्था को लेकर जंगलराज जैसी जो स्थिति बनी है,उससे प्रदेश की अमन-चैन पसंद जनता को माया राज की याद आने लगी थी। 2007 के विधान सभा चुनाव में बसपा ने ‘ जिस गाड़ी में होगा सपा का झंडा उसमें बैठा होगा गुंडा’ जैसे तमाम नारों के सहारे मुलायम की सत्ता का उखाड़ फेका था। अबकी से माया के हाथों अखिलेश का भी यही हश्र होता दिख रहा था। परंतु कुछ माह के भीतर नजारा पूरी तरह से बदल गया है। बसपा के दिग्गज नेताओं ने मायावती के तानाशाही रवैये और पैसे लेकर टिकट बांटने के खिलाफ बगावती रूख क्या अख्तियार किया पूरी पार्टी ही गर्दिंश में चली गई दिखती है। बसपा के अनेक दिग्गजों ने पार्टी छोड़ी तो सत्ता के लिये दम भर रहीं मायावती को अब अपनी साख बचाना मुश्किल लगने लगा है। हालात यह हो गये हैं कि बसपा के तमाम नेता सुरक्षित ‘ठिकानों’ की तलाश में सुबह-शाम अपनी निष्ठा और चोला बदलने लगे हैं। किसी को साइकिल की सवारी पसंद आने लगी है तो कोई भगवा रंग में नजर आने लगा है। सबकी एक ही चाहत है किसी भी तरह से 2017 उनकी और उनके परिवार अथवा चाहने वालों की विधान सभा में तादात ज्यादा से ज्यादा बढ़ जाये। वैसे सियासी भगदड़ से कोई भी दल अछूता नहीं रह गया है। एक दौर ऐसा भी था जब नेताओं की विचारधारा ही उसकी पंूजी हुआ करती थी,लेकिन आज के समय में अधिकांश नेताओं ने अपनी विचारधारा ‘खंूटी’ पर टांग दी है। सत्ता का सुख पाने के लिये अब नेतागण राजनैतिक बयार का रूख भांप कर पाला बदलते हैं। पहले समय में सफेदपोश चुनावी बेला में पाला बदलते थे, लेकिन जब से तमाम दलों में चुनाव से काफी पहलंे (साल-डेढ़ साल पूर्व) प्रत्याशी घोषित करने का चलन बढ़ा है तब से नेताओं के पाला बदलने की ‘गति’ में भी परिर्वतन हो गया है।

जैसे ही टिकट के दावेदारों को पता चलता है कि आलाकमान उनकी अनदेखी कर रहा है या टिकट नहीं दे रहा है तो ऐसे नेता झट से ‘नई मंजिल’ तलाश लेते हैं। नेताओं के पाला बदल के खेल में जनता के बीच जो सियासी संदेश जाता है उससे उन दलों को तो फायदा होता है जिसकी पार्टी में दूसरे दलों से नेता टूट कर आ रहे होते हैं,लेकिन खामियाजा उस दल को भुगतना पड़ता है जिसके नेता साथ छोड़कर ‘दुश्मन’ के गले मिल जाते हैं। वहीं सियासी दल अपने हिसाब से अपने फायदे के लिये पाला बदल के खेल का आकलन करते हैं। इसका असर भी चुनाव पर पड़ता है। जो मतदाता हवा का रूख भांप कर वोटिंग करते हैं वह अक्सर इसमें बह जाते हैं। यह वो मतदाता होते हैं जो अपना वोट खराब होता नहीं देखना चाहते हैं। भले ही ऐसे मतदाताओं का प्रतिशत कम हो लेंकिन जहां एक-एक वोट के लिये मारामारी होती है,वहां अक्सर ऐसे वोटर निर्णायक साबित होते हैं। इस हिसाब से कहा जाये तो प्रदेश में चुनावी बिसात पर बीजेपी मजूबत नजर आ रही है,वहीं कुछ माह पूर्व तक सत्ता की प्रबल दावेदार समझी जाने वाली बसपा को बड़ा नुकसान होता दिख रहा है। किसी भी दल में पार्टी से बड़ा नेता नहीं होता है,लेकिन सच्चाई यह भी है कि कुछ नेताओं के इधर-उधर आने-जाने से वोट बैंक की सियासत पर काफी प्रभाव पड़ता है। आज की तारीख में इस पीढ़ा से बसपा सबसे ज्यादा दो-चार हो रही है। कई बड़े नेताओं की बगावत से बसपा सुप्रीमों मायावती का सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला चरमरा गया है। पहले स्वामी प्रसाद मौर्य,उसके बाद आर के चैधरी और अब ब्रजेश पाठक का भी मायावती से मोह भंग हो गया। बसपा से नाता तोड़ने वाले ब्रजेश पाठक की पहचान बहुजन समाज पार्टी के प्रमुख ब्राह्मण चेहरे के तौर पर होती थी।

वहीं स्वामी प्रसाद मौर्य ओबीसी थे तो आरके चैधरी दलित नेता थे। इन तीन नामों के अलावा भी कई बड़े बसपा नेताओं ने इस बीच पार्टी छोड़ी थी। इनमें बाला प्रसाद अवस्थी, अब्दुल मन्नान, जुगुल किशोर, रोमी साहनी सहित कई नाम शामिल हैं। 2007 में बसपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई तो पार्टी की इसी सोशल इंजीनियरिंग को श्रेय मिला था दलित, मुसलमान और ओबीसी के साथ सवर्णों वोटरों को भी पार्टी ने जोड़ने के लिए पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के अलावा ब्रजेश पाठक को भी अहम माना जाता था। हालांकि, सतीश चंद्र मिश्र अब भी बीएसपी के साथ हैं लेकिन ब्रजेश के जाने को बड़ा झटका माना जा रहा है। दरअसल,आजकल मायावती के कई दांव उलटे पड़ते नजर आ रहे हैं। दलितों के अतिरिक्त मोह के चक्कर में सवर्ण नेताओं की पार्टी से बेरुखी बढ़ती जा रही है। भाजपा नेता दयाशंकर मुद्दे के बयान को हवा देकर उनके परिवार की महिला सदस्यों पर अपमाजनक टिप्पणी से क्षत्रीय समाज मायावती से नाखुश हो गया है। इसके अलावा भी कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जो सवर्णों की बसपा से नाराजगी का कारण बन सकती हैं। बात ब्रजेश पाठक के बसपा छोड़ने के कारणों की कि जाये तो पाठक राज्यसभा जाने की उम्मीद लगाए थे। मगर उन्हें टिकट नही मिला, जिससे वह नाराज चल रहे थे।ऐसे में उनके भाई राजेश पाठक और साले अरविंद त्रिपाठी उर्फ गुडडू त्रिपाठी को हटाए जाने के बाद यह नाराजगी और बढ़ गई थी। आज की तारीख में बसपा के अंदर पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्र अकेले बड़े ब्राह्मण नेता हैं। ऐसे में उनका कद और बढ़ सकता है। बसपा सुप्रीमों के लिये परेशानी का कारण यह भी है कि अभी भी कई और बड़े नेताओं के बगावत करने की खबरें आ रही हैं।

पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय और जयवीर सिंह का नाम इस चर्चा में जोरों पर चल रहा है। ब्रजेश पाठक की बगावत की चर्चा तो खासकर हो रही है। 21 अगस्त को आगरा में बसपा की जो रैली हुई थी ब्रजेश उसके संयोजक थे। उनकी ओर से बाकायदा रैली के लिए निमंत्रण पत्र भी भेजे गए थे, लेकिन दूसरे ही दिन 22 अगस्त को उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया। बीजेपी में शामिल होने के बाद जब उनसे इस बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि वे जिस पार्टी में जब तक रहते हैं, तब तक वे तन मन धन से रहते हैं। वैसे, ब्रजेश बसपा के सबसे बड़े ब्राह्मण चेहरे सतीश चंद्र मिश्र के खास माने जाते थे। बात भाजपा की कि जाये तो बसपा का ब्राहमण चेहरा माने जाने वाले ब्रजेश पाठक को साथ लाकर बीजेपी ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। पिछड़ा अध्यक्ष से लेकर स्वामी और दूसरे नेताओं की पार्टी में इंट्री के बीच ब्राह्मण चेहरा ब्रजेश पाठक को शामिल कर बीजेपी ने जहां जातीय समीकरण सुधारा है, वहीं माया को झटका भी दिया। चुनावी मौसम में नेताओं के पार्टी छोड़ने का सिलसिला सपा-कांगे्रस में भी दिखाई दे रहा है, लेकिन ऐसा नहीं जैसा बसपा में देखने को मिल रहा है। कांगे्रस में तो पहले से ही चुनाव जीतने की हैसियत रखने वाले नेताओं का टोटा है,इसलिये इस दल के नेताओं की अन्य दलों में कोई खास ‘मांग’ भी नहीं है। बात समाजवादी पार्टी की कि जाये तो यहां पार्टी छोड़ने की हिम्मत रखने वाले नेताओं की तुलना में उन नेताओं की संख्या काफी अधिक है जो पार्टी छोड़ने की घुड़की से काम चला लेते हैं। सपा में तो पार्टी से अधिक परिवार में कलह-कलेश दिखाई दे रहा है। यहां से अक्सर कलह और उसके बाद सुलह की खबरें मीडिया को मिलती रहती हैं। सपा प्रमुख के भाई शिवपाल यादव की धमकी के बाद इस्तीफा देने की धमकी देने वाले नेताओं में ताजा नाम कुछ माह पूर्व सपा में वापसी करने वाले अमर सिंह का जुड़ गया है जो पार्टी में अपनी अनदेखी से नाराज है।

अमर सिंह की कुंठा ठीक उसी समय सामने आई जिस वक्त सपा प्रमुख मुलायम सिंह अपने पूरे परिवार के बीच सुलह कराने के लिये परिवार के सदस्यों के साथ बैठक कर उन्हें नसीहत दे रहे थे कि अगर किसी के मन में मतभेद या मनभेद है भी तो उसे सार्वजनिक न करे। कुछ दिनों पूर्व समाजवादी पार्टी में मतभेद की खबरें तब आई थीं जब लोक निर्माण मंत्री शिवपाल यादव ने मैनपुरी में इस्तीफा देने की घोषणा कर दी थी। लब्बोलुआब यह है कि विधानसभा चुनाव की नजदीक आते देख न केवल नेताओं के पाला बदलने की गति में तेजी आई है,बल्कि चुनावी बयार में और तरह के भी तीर छोड़े जाने का सिलसिला जारी है। दलबदल के साथ दूसरे दल और उसके नेताओं का दामन दागदार दिखाने के लिये आरोपों की बौछार तेज हो गई है। पुराने मामले जो ठंडे बस्ते में पड़े हुए थे उस पर फिर से सियासी पाॅलिश चढ़ाई जा रही है। अखिलेश सरकार ने उन स्मारक घोटालों की फाइलें फिर से खोल दी है जिसकी छींटे मायावती पर पड़ती हैं और जो 2012 के विधान सभा चुनाव में बसपा की हार का कारण बने थे। पिछले विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरन समाजवादी पार्टी ने लखनऊ और नोएडा में बने बसपा स्मारकों में व्यापक धांधली का आरोप लगाया था। तब सपा के सत्ता में आने पर इन घोटाले की जांच और देषियों को सख्त सजा के वादे किये गए थे। मुलायम सिंह,शिवपाल यादव आदि पार्टी के सभी बड़े नेताओं ने तमाम चुनावी सभाओं में स्मारक घोटाले के आरोपियों को सरकार बनते ही जेल में डालने की घोषणाएं की थीं, जिस कारण यह एक बड़ा चुनावी मुद्द्ा बना था। सपा सरकार के चार वर्षो के ठंडे रूख के बाद ही अब भाजपा इसे सपा-बसपा दोंनो के खिलाफ हथियार बनाना चाहती है। इसलिए साढ़े चार साल बाद यह घोटाला फिर खबरों में है। भाजपा अब तक कार्रवाई कव हिसाब मांग रहीं है तो राज्य सरकार ने भी जवाब देने की तैयारी कर ली है। यह मसला इस लिये और भी उछला क्योंकि हाल ही में लखनऊ हाई कोर्ट ने भी अखिलेश सरकार से पूछा था कि वह इस मामले में क्या कर रहे हैं। वहीं जनता की अदालत में जाने से पहले समाजवादी पार्टी स्मारक घोटाले में कुछ ठोस करना चाहती है। गौरतलब हो, स्मारक घोटाला लगभग 14 अरब रूपये का था और जनवरी 2014 को बसपा नेताओं नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा सहित 19 अधिकारियों के खिलाफ लखनऊ में एफआईआर दर्ज हुई थी। तत्कालीन लोकायुक्त ने तीन आइएएस अफसरों सहित कुल 199 लोगों की घोटाले में पहचान की थी लेकिन, ढाई साल बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हो सकी तो इसका कारण था बाबू सिंह के सपा के प्रगाढ़ रिश्ते हो गये थे। इसी आधार पर भाजपा ने बसपा और सपा में मीठें संबंधों की दुहाई देती रहती है।

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