लेखक परिचय

देवेन्द्र कुमार

देवेन्द्र कुमार

स्वतंत्र पत्रकार

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-देवेन्द्र कुमार-
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दशकों तक दक्षिण बिहार के किसानों को कथित आधुनिक खेती की तकनीक अपनाये जाने की प्रेरणा दी जाती रही, परंपरागत तकनीक और बीजों को पिछड़़ा और अलाभकर बतलाते हुए छोड़ने की सलाह दी जाती रही। पईन, पोखर, आहर, नाला की परंपरागत व्यवस्था के बदले डीजल इंजन, पम्प सेट लगवाने पर जोर दिया जाता रहा। जैविक खेती के बदले रासायनिक खेती को प्रोत्साहित-प्रसारित किया जाता रहा और आज भी यह प्रक्रिया जारी है। किसानश्री से लेकर न जाने कितने प्रकार की उपाधियों और इनामों से नवाजते हुए पीढ़ी दर पीढ़ी से प्रयुक्त होते रहे परंपरागत बीजों और जैविक खाद के बदले हाइब्रीड बीज और रासायनिक खाद के प्रचार-प्रसार की आक्रामक रणनीतियां बनाई जाती रही, पर आज सच्चाई यह है कि मात्र तीन दशकों की इस आधुनिक खेती से अब दक्षिण बिहार के किसानों का दम घुटने लगा है। इस आधुनिक खेती से सामाजिक आर्थिक संरचना में आये बदलाव से इनकी सांसें उखड़ने लगी हैं। आधुनिक खेती के कारण आए फुड हैविट में बदलाव ने कई मुसीबतों को पैदा कर दिया है। किसानों पर कर्ज का बोझ निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है। अब किसानी सम्मान और स्वालंबन का पेशा नहीं रहा। इलाके के सजग किसान कहते हैं कि कथित आधुनिक खेती की ओर बढ़ने की यदि यही रफ्तार रही तो वह दिन दूर नहीं जब दक्षिण बिहार से भी सामूहिक आत्महत्या या आत्महत्या की खबरें आने लगेगी।
सबसे बड़ा सवाल तो मघ्य बिहार की जैविक विविधता पर खडा़ हो गया है। देसी बीज, मछलियों का लोप हो गया है, गांव-गांव, आहर-पोखर में सहजता से मिलने वाला बुल्ला, गरई, बहिरा गरई, औंधा, ईचना, पत्थल चटवा, धंधी, बोआरी, चलहवा, डोरी मछलियां अब खोजे नहीं मिलती। आहर पोखर में अब सिर्फ रेहु-मांगुर पोषे-पाले जा रहे हैं। किसानों का कहना है कि जिस आहर में मांगुर का बीया डाला जाता है, उसमें दूसरी मछलियां तो क्या मेंढक-ढास भी पनप नहीं पाता। बड़े-बड़े मेंढक, ढास, सांप को भी मांगुर चटकर जाता है। और इसके कारण धान के खेतों में विचरण करते रहने वाला धामन, डोरवा, हरहोरवा आदि सांप समाप्त होते जा रहे हैं।
पीढ़ी दर पीढ़ी से प्रयुक्त होते रहा देसी बीज जिसके स्वाद का मुकाबला आज का हाईब्रीड बीज नहीं कर सकता, अब बड़े-बूढ़ों की स्मृतियों में ही शेष बचा है। साठी, सिरहठी, बलदेवा, चार सौ अठावन, जौंजिया, लौगिंया, कोदो, फुलभन्टवा, डुब्बा, पिअरवा, हल्दी मोहन, दूध ग्लास, भन्टवा, कारीबाक, शेरमार आदि देसी प्रजातियों का लोप हो चुका है। इन धान की देसी प्रजातियों में न तो खाद की जरूरत होती थी और न ही कीटनाशकों की। इसका कारण है रासायनिक खादों का अन्धाधुंध प्रयोग। खेत की मछली तो क्या बिल बिअर में रहने वाला, किसानों का मित्र माना जाता रहा केकड़े भी अब दिखाई नहीं पड़ते, जबकि आज से दो दशक पूर्व तक इन केकड़ों से गरीब-गुरबा को कैल्सियम की प्राप्ति तो होती ही थी, मुंह का जायका भी बदलता था। पाला जा रहा हाईब्रीड मछलियां मात्र कुछ सम्पन्न किसानों के लिए ही है। गांव-समाज का स्थापित प्रभू समूह ही इसे आहर-पोखर में डालता है और खरिदने की सामर्थ भी रखता है, मछली अब खेत से सिमट आहर-पोखर में अटक गया है। जबकि आज से मात्र तीन दशक पूर्व तक, जब देसी प्रजाति की मछलियों का वजूद था, मछलियां धान के खेतों में बिखरा रहता था, तब यह आम किसानों और भू-मजदूरों के लिए सहज उपलब्ध था। अब तो सीमांत किसानों और भू-मजदूरों के लिए आहर पोखर में पलने वाला हाईब्रीड मछलियां खाने की नहीं, देखने की चीज बन गई है।
दलित, सीमांत किसान और भू-मजदूर आज भी उन दिनों को याद कर रोमांचित होते हैं, जब खेतों में कीटनाशकों का प्रयोग नहीं होता था और आहर-पोखर की कौन कहे, घान के खेतों में भी विभिन्न प्रकार की देसी मछलियां फैली रहती थी, जब जी चाहा उपछा और मुंह का जायका बदल लिया। जरूरत है इस कथित आधुनिक खेती के घुड़दौड़ से बाहर निकल पूरी परिस्थिति का सही सोच और समझ के साथ समग्र मुल्यांकन की, क्योंकि सिर्फ अधिक और अघिक उपज ही हमारा उद्देश्य नहीं हो सकता।
बोघगया भू-आन्दोलन का केन्द्र में रह कर इस इलाके के दलित भूमिहीनों के बीच करीबन 10 एकड़ जमीन का वितरण करवाने में सफल रहे कौषल गणेष आजाद कहते है कि इस कथित आधुनिक खेती से खाद्य सुरक्षा भी तो हासिल नहीं की जा सकी, 70 का दशक में जब हमारा आन्दोलन अपने चरम पर था तब गरीबी तो थी पर दलित-मुसहर कम से कम सड़ा मांस खाने को विवश नहीं था, उसे अपने खेतो से ही प्रयाप्त मछलियां मिल जाती थीं। आज हालत यह है कि 2006- 2007 में मोहनपुर थाने के बोंगीया गांव के मुसहरों ने पेट की आग को शान्त करने के लिए जमीन में गड़े हुए जानवर को दो दिन बाद निकाल कर खा लिया और इससे 14 दलितों की मौत हो गई, यह उनकी विवशता थी कोई शौक से सड़ा-गला मांस तो नहीं खाता। 70 का दशक और आज की आधुनिक खेती में बेहतर कौन है, तब इन मुसहरों को कम से कम मड़ुआ, मकई तो मिलता था। खसारी का दाल ही सही खाता तो था अब तो दाल उनके लिए एक सपना है, हमारा सारा जोर चावल ओर गेहूं पर केन्द्रित हो गया है। यही है आधुनिक खेती, खाद्य विविधता की पूरी तरह अनदेखी की गई।
परंपरा से जैविक विविधता की एक समृ़द्ध विरासत हमें मिली है। इसे सहेजना और अगली पीढ़ी को सौंपना हमारी नैतिक जिम्मेवारी हैं। हमें यह भी सोचना है कि इस घुड़दौड़ से कहीं हमारी जमीन ही बंजर नहीं हो जाय। धरती से सबकुछ एक साथ नीचोड़ लेने की होड़, हमें आज दो रोटी अधिक भले ही दे दे, कल निश्चित रूप से भूखमरी ही देगी। सपाट शब्दों में कहा जाय तो यह आने वाले पीढ़ी के साथ डकैती है, वह पीढ़ी जो अभी आई ही नहीं और उसे हम लूट रहे हैं।
आज, तो हालात यह है कि बगैर रासायनिक खाद के खेती करने की सोच को ही एक दुःसाहस माना जा रहा है, ठीक यही हाल कीटनाशकों की है। इन कीटनाशकों का घातक प्रभाव चारों ओर साफ दिखाई दे रहा है। अचम्भा भले ही लगे पर यह सच्चाई है कि पूरे दक्षिण बिहार में कौवे दिखाई नहीं पड़ते, गीद्ध कहीं रुठकर चले गए हैं, कोयल की कूक सुने अरसा हो गया है, गीद्ध पलायन करने को विवश हो गये और भी ना जाने कितने पंछी या तो अपना अस्तित्व खो दिया, या यहां के भू-मजदूरों की तरह पलायन को विवश हो गए। आज से तीन दशक पूर्व की वह रंग-रंगेली दुनिया कहीं खो गई। आज हम अपनी ही जमीन पर खड़े हो उसका अस्तित्व खोज रहे हैं। पर वह है की खोजे नहीं मिलता, क्या अघिक उपज की इस अंधी दौड़ में हम अपना सबकुछ भूला जायेंगे या एक बार इस दौड़ से हटकर आत्मचिंतन, आत्म-मूल्याकंन, पुनर्मूल्याकंन का जोखिम लेंगे।

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1 Comment on "जैविक विविधता का सिमटता दायरा"

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swatantra kumar
Guest

Bhai devendra apne such likha hai jaiv vividhta bachana sajhi jimmedari hai. Iske hras se sabse jyada nuksan kiasano ko ho raha hai.

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