लेखक परिचय

अरुण माहेश्‍वरी

अरुण माहेश्‍वरी

अरुणजी हिन्दी के महत्वपूर्ण वामपंथी आलोचक हैं और कोलकाता में रहते हैं।

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-अरुण माहेश्वरी

पूरे दस साल पहले की बात है। 26 जून 2000 के दिन जीव विज्ञान के क्षेत्र में खुशियों की एक लहर दौड़ गयी थी जब यह पता चला था कि मानव जेनोम के पूरे नक्शे को तैयार कर लिया गया है। जेनोम के तीन अरब अक्षरों को क्रमवार सजा कर यह दावा किया गया था कि अब आदमी के जीवन की किताब को पढ़ा जा सकेगा। हालांकि तब इसे किताब का एक मसौदा ही कहा गया था, क्योंकि अभी आगे और बहुत कुछ सामने आना बाकी था। तथापि, सरकारी, गैर–सरकारी – सभी स्तरों पर इस दिशा में वर्षों से चल रहा शोध तब एक मुकाम पर पहुंचा था और अमेरिका में सार्वजनिक क्षेत्र के फ्रांसिस कौलिन्स और निजी क्षेत्र के क्रैग वेंटर, दोनों ने एक साथ ही अपने इस अभूतपूर्व काम के एक बड़े पड़ाव तक पहुंच जाने की घोषणा की थी।

जिनोम का मतलब है आदमी के शरीर की प्रत्येक कोशिका के अंदर की जेनेटिक सामग्री का समग्र रूप। आदमी के शरीर की प्रत्येक कोशिका में 23 डीएनए मोलिक्यूल अर्थात क्रोमोजोम्स होते हैं जिनमें वे दो क्रोमोजोम्स भी शामिल हैं, जो उसे उसके माता–पिता से मिलते हैं। ऐसे प्रत्येक क्रोमाजोम में तीन अरब रासायनिक इकाइयां (बेस पेयर) होती है। इन रासायनिक इकाइयों के क्रमवार नक्शे को ही जेनोम कहते है। आदमी के शरीर में हर प्रकार का परिवर्तन निश्चित तौर पर इस नक्शे में हेर–फेर का कारण बनता है, इसीलिये मानव जेनोम के पूरे होजाने को मानव जिंदगी के रहस्य तक पहुंचने और इस प्रकार शरीर में हर प्रकार के विकार से निपटने की कुंजी के तौर पर देखा जारहा है। जाहिर है कि इससे चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में तो एक प्रकार का आमूल परिवर्तन आजाने की बात तक की जाती है।

बहरहाल, दस वर्ष पहले जब मानव जिनोम का नक्शा पूरा हुआ, उस समय नयी–नयी दवाओं, व्यक्ति–व्यक्ति पर लागू होने वाली खास जेनेटिक दवाओं के क्रांतिकारी उद्भव की जो सारी बातें कही गयी थी और ढेर सारी दवा कंपनियों ने इससे अपने लिये बेशुमार मुनाफे का पहाड़ तैयार करने के जो सपने देखने शुरू किये थे, दस वर्ष बीतते न बीतते बहती गंगा में हाथ धोने की ललक से इस दिशा में कूद पड़ने वाली कई निजी कंपनियां अब तक उसमें डूब कर शांत हो चुकी है। जिस सेलेरा कंपनी ने बड़ी भारी उम्मीदों से डा. वेंटर के जिनोम कार्य के लिये धन जुटा कर दिया था, उसने दो साल बाद, 2002 में डा.वेंटर को ही एक भारी घाटे का सौदा मान कर अपनी कंपनी से निकाल बाहर किया। सेलेरा से निकलने के बाद डा.वेंटर अपनी एक नौका में सारी दुनिया की समूद्री यात्रा पर निकल पड़े थे और ‘विश्व समुद्री नमूना संग्रह अभियान’ के अंतर्गत जगह–जगह के समुद्रों से बैक्टेरिया के नमूने इके करने के अलावा उन्होंने एक शोध संस्थान की स्थापना की, जिस संस्थान में एक महीने पहले ही पहली बार पूरी तरह से कृत्रिम जेनोम के जरिये जीव की रचना संभव हुई है। मानव जिनोम का पूरा नक्शा तैयार कर लिये जाने के एक दशक बाद, कृत्रिम जिनोम (सिंथेटिक जिनोम) के जरिये जीव की उत्पत्ति को जेनेटिक शोध के क्षेत्र की एक ऐसी असाधारण उपलब्धि कहा जा रहा है, जिसे जीव विज्ञान में गुणात्मक रूप से एक बिल्कुल नये दौर का प्रारंभ–बिंदु, बल्कि जीव विज्ञान मात्र का दूसरा चरण कहां जा सकता है।

दस वर्ष पहले जब मानव जिनोम का नक्शा तैयार हुआ उसके साथ मनुष्य के बारे में कुछ ऐसी महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई जिन्होंने सिफ‍र् जीव विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि समाज विज्ञान, नृतत्वशास्त्र और राजनीति शास्त्र के क्षेत्र में भी कई प्रकार की प्रचलित अवधारणाओं और पूर्वाग्रहों को उलट–पुलट कर रख दिया था। मसलन्, समाज विज्ञान के क्षेत्र में मानवीय जेनोम से यह बात निर्विवाद तौर पर साबित होगयी कि पूरी मानव जाति जिसमें गोरे, काले, भूरे सब रंग के लोग शामिल हैं, जीव विज्ञान की दृष्टि से बिल्कुल एक, और समान है। मनुष्य की अलग–अलग नस्लों की बातें कह कर आदमी आदमी में भेद करने के नस्लवाद के अब तक जो तमाम सिद्धांत गढ़े जाते रहे हैं, वे शैतान दिमागों की कपोल कल्पनाओं से अधिक और कुछ नहीं रहे हैं। मानवीय जिनोम की पहचान के बाद आगे के शोध के ताजा नतीजों से यह बात और भी पुष्ट हुई है कि मनुष्यों में रंग और व्यवहार संबंधी सारी विविधताओं से उनकी जेनेटिक संरचना का कोई संबंध नहीं है। इन विविधताओं का गहरा और बुनियादी संबंध आदमी के परिवेश, मौसम, प्राग–ऐतिहासिक बैक्टीरिया और संस्कृति आदि से है।

इस शोध से दूसरी, और भी महत्वपूर्ण बात यह साबित हुई है कि जीव विज्ञान के पूरे मामले में किसी बाहरी, सर्वशक्तिमान के लिये कोई जगह नहीं है। जीव के प्राणों को लेकर भौतिकी और रसायनशास्त्र से इतर, ईश्वरीय शक्ति को लेकर जितने प्रकार की दार्शनिक अटकलपच्चियां की जाती रही है, जेनोम प्रकल्प ने उन्हें पूरी तरह से निराधार और बेतुका साबित कर दिया है।

जिस प्रकार टेलिस्कोप ने नक्षत्र विज्ञान के क्षेत्र में क्रांति की, माइक्रोस्कोप ने जीव विज्ञान में तथा स्पेक्ट्रोस्कोप ने रसायन शास्त्र में उसी प्रकार यह जिनोमिक क्रांति कमप्यूटर की ताकत पर निर्भर है। कमप्यूटर भी तो उसके अंदर की लगातार बदलती भौतिक स्थितियों के कुल योग के अलावा कुछ नहीं है, जिन स्थितियों को कमप्यूटर के प्रोसेसर के अंदर विद्युत आवेगों की तेजी से बदलती आकृतियों से स्वतंत्र रूप में सूचना विज्ञान नामक ज्ञान की एक शाखा के जरिये प्रत्ययों में कल्पित और प्रसंस्करित किया जा सकता है। नये जीव विज्ञान में किसी भी कोशिका के अंदर के रसायन को हार्डवेयर माना जा रहा है। डीएनए में निहित सूचना उसमें पहले से उपस्थित(प्रीलोडेड) साफ्टवेयर की तरह है। कोशिकाओं के अंदर रसायनों की अंतक्र्रिया प्रोसेसिंग और मेमोरी चिप्स की लगातार परिवर्तनशील स्थितियां है। लेकिन गौर करने लायक बात यह है कि जेनोम के बारे में पूरी समझ का विकास आशा से कहीं ज्यादा जटिल और पेचीदा साबित हुआ है। यद्यपि अब तक की किसी भी खोज ने इसके अलावा और कुछ नहीं बताया है कि किसी भी कोशिका को बनाने के लिये जरूरी सारी सूचनाएं डीएनए में निहित होती है। लेकिन इन सबका योगफल दो और दो चार की तरह सीधा और सरल नहीं है। अलग–अलग हिस्सों के कुल योग की तुलना में उनका इका और समग्र रूप कहीं ज्यादा बड़ा होता है।

मसलन्, आदमी की तरह के सबसे उन्नत और जटिल समझे जाने वाले प्राणी की कोशिकाओं में जीन्स की संख्या अन्य प्राणियों की तुलना में बहुत ज्यादा नहीं है। सबसे तुच्छ प्राणी मानी जाने वाली एक किरमी में 18हजार जीन्स पाये जाते हैं जबकि सबसे उन्नत प्राणी मनुष्य में इनकी संख्या 31 हजार के करीब है। संख्या के लिहाज से किरमी की तुलना में बहुत अधिक जीन्स न होने पर भी मानवीय जेनोम के चमत्कारी कार्य की वजह यह है कि ये जीन्स अलग–अलग नहीं बल्कि आपस में मिल कर एक नेटवर्क के रूप में काम करते हैं। अरबों रासायनिक इकाइयों की तरह ही जीन्स की आपसी नेटवर्किंग के अरबों रूप हो सकते हैं। यही वजह है कि जल्दबाजी में इनसे कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना विवेकसंगत नहीं है, जो चट मंगनी पट ब्याह की मानसिकता से रातो–रात दवाओं की नयी पौद तैयार करके जेनेटिक विज्ञान को अपने मुनाफे के लिये तत्काल दूह लेने को आकुल लोगों के रास्ते की बाधा बन गया है।

बहरहाल, इतना तो साफ है कि लगातार बढ़ रही कमप्यूटरों की ताकत के चलते वह दिन दूर नहीं, जब व्यक्ति–व्यक्ति के जिनोम को तैयार करके उसके हर क्रोमोजोम की तीन अरब रसायनिक इकाइयों का तुलनात्मक अध्ययन करना पूरी तरह से संभव होगा और इससे चिकित्साशास्त्र के क्षेत्र में संभावनाओं के अकल्पनीय दरवाजे खुलेंगे। पिछले सिर्फ एक दशक के काल में कमप्यूटर की ताकत 30 गुना से ज्यादा बढ़ी है। इसके चलते अब आगे के जिनोम प्रकल्पों पर तुलनात्मक रूप में बेहद कम खर्च पड़ रहा है। अमेरिका में डीएनए का नक्शा तैयार करने में लगे सबसे बड़े केंद्र ब्रोड इंस्टीट्यूट, कैम्ब्रिज, मैस्चुशेट्स के प्रमुख एरिक लेंडर के अनुसार उनके संस्थान में डीएनए को क्रमवार सजाने का खर्च एक दशक पहले के खर्च की तुलना में लाख हिस्से के बराबर रह गया है। आज यह अनुमान किया जाता है कि आने वाले तीन वर्षों में सिर्फ हजार डालर की लागत पर पंद्रह मिनट में एक मानव जिनोम तैयार हो जायेगा।

यह जीव विज्ञान के इस दूसरे चरण की शक्ति का ही परिचय है जिसके चलते मनुष्य से सबसे निकटवर्ती माने जाने वाली प्रजाति, नियेनडर्टल मैन के चालीस हजार साल पुराने डीएनए के लगभग एक अरब तीस लाख हिस्सों को सजा कर उनका नक्शा तैयार कर लिया गया है। जिस दिन लिपजिग के मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट के स्वाते पाबो ने अमेरिकन एशोसियेशन फार द एडवांस साइंस की एक सभा में यह घोषणा की थी कि नियेनडर्टल मैन का जेनोम तैयार होगया है, यह संयोग की बात है कि 12 फरवरी 2009 का वह दिन युगांतकारी प्राणीविज्ञानी चाल्र्स डार्विन का 200वां जन्मदिन था। नियेनडर्टल मैन से आज के मनुष्य के जेनोम का तुलनात्मक अध्ययन कितना महत्वपूर्ण होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है। इससे एक प्रकार से मनुष्य के जेनेटिक विकास के पूरे इतिहास की रचना संभव हो पायेगी। डार्विन के निरीक्षणों, संग्रह, अनुशीलन और सैद्धांतिक परिकल्पनाओं में उनकी समूद्री यात्राओं का बड़ा योगदान माना जाता है। अपनी इन यात्राओं के जरिये ही वे जीवित और लुप्त जातियों के संबंधों, उनके भौगोलिक वितरण आदि के बारे में इतना कुछ जान पाये थे जो विकासवाद के उनके सिद्धांत का कारक बना। इसीप्रकार, आज दुनिया की नजर डा.वेंटर द्वारा तैयार किये गये कृत्रिम जिनोम और इसके साथ ही जगह–जगह से संग्रहीत बैक्टीरिया के नमूनों को लेकर किये जाने वाले परीक्षणों पर है। इन सबसे सिफ‍र् चिकित्साशास्त्र के क्षेत्र में नहीं, पूरे मानव समाज के विकास के बारे में ऐसे चौंकाने वाले नतीजे सामने आयेंगे, जिनकी अभी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। मानव समाज की गति–प्रकृति पर नजर रखने के लिये ज्ञान–विज्ञान के क्षेत्र की ऐसी सभी युगांतकारी खोजों के बारे में जागरूक रहना जरूरी है।

इस बात का भी ख्याल रखने की जरूरत है कि विश्व–पूंजीवाद के चलते विज्ञान की यह महान उपलब्धि दुनिया में विषमता की खाई को और ज्यादा चौड़ा करने का सबब न बने। जिस प्रकार आज की दुनिया में डिजिटल डिवाइड की बात की जाती है, उसी प्रकार आगे किसी जेनोमिक डिवाइड का खतरा पैदा न होने पायें।

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3 Comments on "जीव विज्ञान के दूसरे चरण की दहलीज पर"

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sunil patel
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बहुत रोचक और महत्वपूर्ण जानकारी. महेश्वरी जी धन्यवाद. आगे भी लिखते रहे. प्रवक्ता संपादक को भी धन्यवाद की हिंदी भाषा में विज्ञानं की जानकारी मिल गई.

arvind mishra
Guest

महत्वपूर्ण और गंभीर लेख -शुक्रिया !

संगीता पुरी
Guest

पूंजीवाद के चलते विज्ञान की यह महान उपलब्धि दुनिया में विषमता की खाई को और ज्यादा चौड़ा करने का सबब न बने।
हर उपलब्धि का आज यही हश्र है .. गरीबों को कुछ काम नहीं आता !!

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