लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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amritlalडा. राधेश्याम द्विवेदी
जीवनी:-अमृत लाल नागर का जन्म 17 अगस्त 1916 ई0 को आगरा (उत्तर प्रदेश) में एक गुजराती ब्राह्मण परिवार में हुआ। आपके पिता का नाम राजाराम नागर था। आपके पितामह पं. शिवराम नागर 1895 से लखनऊ आकर बस गए थे। आपकी पढ़ाई हाईस्कूल तक ही हुई। फिर स्वाध्याय द्वारा साहित्य, इतिहास, पुराण, पुरातत्व व समाजशास्त्र का अध्ययन किया । बाद में हिन्दी, गुजराती, मराठी, बंगला, अंग्रेजी पर अधिकार किया । पहले नौकरी, फिर स्वतंत्र लेखन, फिल्म लेखन का खासा काम किया। ‘चकल्लस’ का संपादन भी किया। आकाशवाणी, लखनऊ में ड्रामा प्रोड्यूसर भी रहे। 1932 में निरंतर लेखन किया। शुरूआत में मेघराज इंद्र के नाम से कविताएं लिखीं। ‘तस्लीम लखनवी’ नाम से व्यंग्यपूर्ण स्केच व निबंध लिखे तो कहानियों के लिए अमृतलाल नागर मूल नाम रखा। आपकी भाषा सहज, सरल दृश्य के अनुकूल है। मुहावरों, लोकोक्तियों, विदेशी तथा देशज शब्दों का प्रयोग आवश्यकतानुसार किया गया है। भावात्मक, वर्णनात्मक, शब्द चित्रात्मक शैली का प्रयोग इनकी रचनाओं में हुआ है।
व्यक्तित्त्व:- नागर जी अपने व्यक्तित्व और सामाजिक अनुभवों की कसौटी पर विचारों को कसते रहते हैं और जितनी मात्रा में उन्हें ख़रा पाते हैं, उतनी ही मात्रा में ग्रहण करते हैं। उनकी कसौटी मूलभूत रूप से साधारण भारतीय जन की कसौटी है, जो सत्य को अस्थिर तर्कों के द्वारा नहीं, साधनालब्ध श्रद्धा के द्वारा पहचानती है। अन्धश्रद्धा को काटने के लिए वे तर्कों का प्रयोग अवश्य करते हैं, किन्तु तर्कों के कारण अनुभवों को नहीं झुठलाते, फलत: कभी-कभी पुराने और नये दोनों उन पर झुँझला उठते हैं। ‘एकदा नैमिषारण्ये’ में पुराणों और पौराणिक चरित्रों का समाजशास्त्रीय, अर्ध ऐतिहासिक स्वच्छन्द विश्लेषण या ‘मानस का हंस’ में युवा तुलसीदास के जीवन में ‘मोहिनी प्रसंग’ का संयोजन आदि पुराणपंथियों को अनुचित दुस्साहस लगता है, तो बाबा रामजीदास और तुलसी के आध्यात्मिक अनुभवों को श्रद्धा के साथ अंकित करना बहुतेरे नयों को नागवार और प्रगतिविरोधी प्रतीत होता है। नागर जी इन दोनों प्रकारों के प्रतिवादों से विचलित नहीं होते। अपनी इस प्रवृत्ति के कारण वे किसी एक साहित्यिक खाने में नहीं रखे जा सकते।
विचार:- अमृतलाल नागर हिन्दी के गम्भीर कथाकारों में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। वे विशिष्टता और रंजकता दोनों तत्वों को अपनी कृतियों में समेटने में समर्थ हुए हैं। उन्होंने न तो परम्परा को ही नकारा है, न आधुनिकता से मुँह मोड़ा है। उन्हें अपने समय की पुरानी और नयी दोनों पीढ़ियों का स्नेह समर्थन मिला और कभी-कभी दोनों का उपालंभ भी मिला है। आध्यात्मिकता पर गहरा विश्वास करते हुए भी वे समाजवादी हैं, किन्तु जैसे उनकी आध्यात्मिकता किसी सम्प्रदाय कठघरे में बन्दी नहीं है, वैसे ही उनका समाजवाद किसी राजनीतिक दल के पास बन्धक नहीं है। उनकी कल्पना के समाजवादी समाज में व्यक्ति और समाज दोनों का मुक्त स्वस्थ विकास समस्या को समझने और चित्रित करने के लिए उसे समाज के भीतर रखकर देखना ही नागर जी के अनुसार ठीक देखना है।
जगत् के प्रति दृष्टिकोण:-नागर जी की जगत् के प्रति दृष्टि न अतिरेकवादी है, न हठाग्रही। एकांगदर्शी न होने के कारण वे उसकी अच्छाइयों और बुराइयों, दोनों को देखते हैं। किन्तु बुराइयों से उठकर अच्छाइयों की ओर विफलता को भी वे मनुष्यत्व मानते हैं। जीवन की क्रूरता, कुरूपता, विफलता को भी वे अंकित करते चले हैं, किन्तु उसी को मानव नियति नहीं मानते। जिस प्रकार संकीर्ण आर्थिक स्वार्थों और मृत धार्मिकता के ठेकेदारों से वे अपने लेखन में जूझते रहे हैं, उसी प्रकार मूल्यों के विघटन, दिशाहीनता, अर्थहीनता आदि का नारा लगाकर निष्क्रियता और आत्महत्या तक का समर्थन करने वाली बौद्धिकता को भी नकारते रहे हैं। अपने लेखक-नायक अरविन्द शंकर के माध्यम से उन्होंने कहा है, जड़-चेतन, भय, विष-अमृत मय, अन्धकार-प्रकाशमय जीवन में न्याय के लिए कर्म करना ही गति है। मुझे जीना ही होगा, कर्म करना ही होगा, यह बन्धन ही मेरी मुक्ति भी है। इस अन्धकार में ही प्रकाश पाने के लिए मुझे जीना है। नागर जी आरोपित बुद्धि से काम नहीं करते, किसी दृष्टि या वाद को जस का तस नहीं लेते।
साहित्यिक जीवन:- नागर जी किस्सागोई में माहिर हैं। यद्यपि गम्भीर उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के कारण कहीं-कहीं उनके उपन्यासों में बहसों के दौरान तात्विक विवेचन के लम्बे-लम्बे प्रंसग भी आ जाते हैं। तथापि वे अपनी कृतियों को उपदेशात्मक या उबाऊ नहीं बनने देते। रोचक कथाओं और ठोस चरित्रों की भूमिका से ही विचारों के आकाश की ओर भरी गयी इन उड़ानों को साधारण पाठक भी झेल लेते हैं। उनके साहित्य का लक्ष्य भी साधारण नागरिक है, अपने को असाधारण मानने वाला साहित्यकार या बुद्धिजीवी समीक्षक नहीं। समाज में ख़ूब घुल-मिलकर अपने देखे-सुने और अनुभव किये चरित्रों, प्रसंगों को तनिक कल्पना के पुट से वे अपने कथा साहित्य में ढालते रहे हैं। अपनी आरम्भिक कहानियों में उन्होंने कहीं-कहीं स्वछन्दतावादी भावुकता की झलक दी है। किन्तु उनका जीवन बोध ज्यों-ज्यों बढ़ता गया त्यों-त्यों वे अपने भावातिरेक को संयत और कल्पना को यथार्थाश्रित करते चले गये। अपने पहले अप्रौढ़ उपन्यास महाकाल में सामाजिक यथार्थ के जिस स्वच्छ बोध का परिचय उन्होंने दिया था, निहित स्वार्थ के विविध रूपों को साम्राज्यवादी उत्पीड़न, ज़मींदारों, व्यापारियों द्वारा साधारण जनता के शोषण, साम्प्रदायिकता वादियों के हथकंडों आदि को बेनकाब करने का जो साहस दिखाया था, वह परवर्ती उपन्यासों में कलात्मक संयम के साथ-साथ उत्तरोत्तर निखरता चला गया। ‘बूँद और समुद्र’ तथा ‘अमृत और विष’ जैसे वर्तमान जीवन पर लिखित उपन्यासों में ही नहीं, ‘एकदा नैमिषारण्ये’ तथा ‘मानस का हंस’ जैसे पौराणिक-ऐतिहासिक पीठिका पर रचित सांस्कृतिक उपन्यासों में भी उत्पीड़कों का पर्दाफ़ाश करने और उत्पीड़ितों का साथ देने का अपना व्रत उन्होंने बखूबी निभाया है। अतीत को वर्तमान से जोड़ने और प्रेरणा के स्रोत के रूप में प्रस्तुत करने के संकल्प के कारण ही ‘एकदा नैमिषारण्ये’ में पुराणकारों के कथा-सूत्र को भारत की एकात्मकता के लिए किये गये महान सांस्कृतिक प्रयास के रूप में, तथा ‘मानस का हंस’ में तुलसी की जीवन कथा को आसक्तियों और प्रलोभनों के संघातों के कारण डगमगा कर अडिग हो जाने वाली ‘आस्था के संघर्ष की कथा’ एवं उत्पीड़ित लोकजीवन को संजीवनी प्रदान करने वाली ‘भक्तिधारा के प्रवाह की कथा’ के रूप में प्रभावशाली ढंग से अंकित किया है।
अपराध बोध का अनुभव:- सामाजिक परिस्थितियों से जूझते हुए व्यक्ति के अंतर्मन में कामवृत्ति के घात प्रतिघात का चित्रण भी उन्होंने विश्वसनीय रूप से किया है। काम को इच्छाशक्ति गीत और सृजन के प्रेरक के रूप में ग्रहण करने के कारण वे उसे बहुत अधिक महत्व देते हैं। काम अपने आधारों (व्यक्तियों) के सत, रज, तम के अंशों की न्यूनाधिकता के कारण सहस्रों रूप धारण कर सकता है। अपने निकृष्ट रूप में वह बलात्कार या इन्द्रिय भोग मात्र बनकर रह जाता है तो अपने उत्कृष्ट रूप में प्रेम की संज्ञा पाता है। नागर जी ने कुंठारहित होकर किन्तु उत्तरदायित्व के बोध के साथ काम कि विकृत (विरहेश और बड़ी, लच्छू और उमा माथुर, लवसूल और जुआना आदि), स्वरूप (सज्जन और वनकन्या, रमेश और रानीवाला आदि) और दिव्य (सोमाहुति और हज्या, तुलसी और रत्नावली) एवं इनके अनेकानेक मिश्रित रूपों की छवियाँ अपनी कृतियों में आँकी हैं। पीड़िता नारी के प्रति उनकी सदा सहानुभूति रही है, चाहे वह कन्नगी के सदृश एकनिष्ठ हो, चाहे माधवी के सदृश वेश्या। स्वार्थी पुरुष की भोग-वासना ही नारी को वेश्या बनाती है। अत: पुरुष होने के कारण उनके प्रति नागर जी अपने मन में अपराध बोध का अनुभव करते हैं। जिसका आंशिक परिमार्जन उन्होंने सद्भावना पूर्ण भेंटवार्ताओं पर आधारित ये कोठेवालियाँ जैसी तथ्यपूर्ण कृति के द्वारा किया है।
ज़िन्दादिली और विनोदी वृत्ति:- नागर जी की ज़िन्दादिली और विनोदी वृत्ति उनकी कृतियों को कभी विषादपूर्ण नहीं बनने देती। ‘नवाबी मसनद’ और ‘सेठ बाँकेमल’ में हास्य व्यंग्य की जो धारा प्रवाहित हुई है, वह अनन्त धारा के रूप में उनके गम्भीर उपन्यासों में भी विद्यमान है और विभिन्न चरित्रों एवं स्थितियों में बीच-बीच में प्रकट होकर पाठक को उल्लसित करती रहती है। नागर जी के चरित्र समाज के विभिन्न वर्गों से गृहीत हैं। उनमें अच्छे बुरे सभी प्रकार के लोग हैं, किन्तु उनके चरित्र-चित्रण में मनोविश्लेषणात्मकता को कम और घटनाओं के मध्य उनके व्यवहार को अधिक महत्व दिया गया है। अनेकानेक एकायामी सफल विश्वसनीय चरित्रों के साथ-साथ उन्होंने बूँद और समुद्र की ‘ताई’ जैसे जटिल चरित्रों की सृष्टि की है, जो घृणा और करुणा, विद्वेष और वात्सल्य, प्रतिहिंसा और उत्सर्ग की विलक्षण समष्टि है।
सामाजिक परिदृश्य को उभारने की चेष्टा:- कई समीक्षकों की शिकायत रही है कि नागर जी अपने उपन्यासों में ‘संग्रहवृत्ति’ से काम लेते हैं, ‘चयनवृत्ति’ से नहीं। इसीलिए उनमें अनपेक्षित विस्तार हो जाता है। वस्तुत: नागर जी के बड़े उपन्यासों में समग्र सामाजिक जीवन को झलकाने की दृष्टि अद्यतन है। अत: थोड़े से चरित्रों पर आधारित सुबद्ध कथानक पद्धति के स्थान पर वे शिथिल सम्बन्धों से जुड़ी और एक-दूसरे की पूरक लगने वाली कथाओं के माध्यम से यथासम्भव पूरे सामाजिक परिदृश्य को उभारने की चेष्टा करते हैं। महाभारत एवं पुराणों के अनुशीलन ने उन्हें इस पद्धति की ओर प्रेरित किया है। शिल्प पर अनावश्यक बल देने को वे उचित नहीं मानते। उनका कहना है कि फ़ॉर्म के लिए मैं परेशान नहीं होता, बात जब भीतर-भीतर पकने लगती है तो वह अपना फ़ॉर्म खुद अपने साथ लाती है। मैं सरलता को लेखक के लिए अनिवार्य गुण मानता हूँ। जटिलता, कुत्रिमता, दाँव-पेंच से लेखक महान नहीं बन सकता। इसीलिए केवल ‘फ़ॉर्म’ के पीछे दौड़ने वाले लेखक को मैं टुटपँजिया समझता हूँ।
जीवित चरित्र की दास्तान: खांटी लखनवी छाप:- अमृतलाल नागर पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ा था मुंशी प्रेमचंद और शरद चंद चटोपाध्याय का. वो उनके दर्शन करने ख़ास तौर से कोलकाता जाते थे. अपनी आत्मकथा टुकड़े टुकड़े दास्तान में अमृतलाल नागर लिखते हैं, “शरद बाबू हिंदी मज़े की बोल लेते थे. उन्होंने मुझे एक सीख दी थी, जो लिखना अपने अनुभव से लिखना.” नागर जी के निकट सहयोगी रहे और उनकी कहानियों पर शोध करने वाले प्रोफ़ेसर एस पी दीक्षित बताते हैं, “उन्होंने अपने लेखन के तीन सूत्र बनाए थे. एक तो ये कि जो सलाह उन्हें प्रेमचंद से मिली थी कि जो लिखो वास्तविक लिखो. दूसरी बात उन्होंने शरद चंद्र से सीखी थी कि पहले फ़ील करो, फिर लिखो और तीसरी बड़ी बात उनके बाबा रामजी ने कही थी कि अपनी कलम से किसी की निंदा कभी मत करना. इन तीनों चीज़ों का निर्वाह वो आजीवन अपने लेखन में करते रहे.”लखनऊ के जनजीवन और बोली का जितना शानदार चित्रण अमृतलाल नागर की रचनाओं में मिलता है उतना शायद कहीं नहीं.प्रोफ़ेसर एस पी दीक्षित कहते हैं, “उन्होंने लखनऊ के जनजीवन को ओढ़ा, बिछाया. इसको पूरी तरह से जिया. उसके पूरे इतिहास और पूरी सामाजिक संरचना को समझा और हर वर्ग से निकट संबंधित स्थापित कर तब उसे लेखन में परिणित किया. बूंद और समुद्र के बारे में लोग बोलते हैं कि उसमें चौक की गलियाँ बोलती हैं. घरों से वही आवाज़ आती है. वही संवाद. उसी तरह के पात्र.” उनके मानवतावाद का उदाहरण देते हुए अचला नागर बताती हैं,”वो हमसे कहते थे हमारे यहाँ पूजा होती है, होती रहेगी. अच्छी बात है लेकिन कोई तुम्हारा धर्म पूछे तो हमेशा कहना मानवता. एक बार मेरे स्कूल के फ़ार्म में धर्म के कॉलम में उन्होंने लिखा था मानवता. वो हमेशा कहते थे कि किसी से मिलते समय हमेशा जय हिंद बोलो क्योंकि इससे धर्म बोध नहीं होता.”
अमृतलाल नागर 1940 में मुंबई गए थे जहाँ वो सात साल रहे. इस बीच उन्होंने 18 फ़िल्मों की पटकथाएं लिखीं. डबिंग का काम करने वाले वो पहले लेखक थे. वहाँ उन्हें कई बड़े बड़े लोगों के सानिध्य का मौका मिला. उन दिनों उनकी कवि नरेंद्र शर्मा से बहुत दोस्ती हुआ करती थी. जब नरेंद्र शर्मा का विवाह हुआ तो उन्हें मशहूर गायिका सुब्बालक्ष्मी की नई कार पर बैठा कर ले जाया गया.अमृतलाल नागर लिखते हैं, “दूसरे दिन मेरे घर पर श्री व श्रीमति नरेंद्र शर्मा का विधिवत स्वागत किया गया. मशहूर अभिनेत्री नलिनी जयवंत और सुब्बालक्ष्मी ने मांगलिक गीत गाए. लेकिन सबसे अधिक प्रभावशाली पंत जी का काव्यपाठ रहा. मैंने पंत जी को ऐसे तन्मय होकर काव्य पाठ करते हुए न तो कभी पहले सुना और न कभी बाद में ही. उस दिन धोती कुर्ता पहने हुए पंतजी बड़े ही भव्य लग रहे थे.”
उन दिनों को याद करते हुए अचला नागर बताती हैं,”मुझे शिवाजी पार्क के उस कमरे की बड़ी याद है. इतने बड़े बड़े सितारे उस कमरे में बैठे हैं. भारत रत्न सुब्बालक्ष्मी, रबींद्र नाथ टैगोर के भतीजे अबनींद्रनाथ टैगोर जो शर्मीला टैगोर के दादा थे. बहुत बड़े चित्रकार थे वो. शर्मीला मुझसे ढाई साल छोटी होगी. तब हमारे घर के पास ही रहती थी. वो केन का कैप लगाती थीं और अबनींद्रनाथ टैगोर उसका हाथ पकड़ कर हमारे यहाँ आया करते थे.कवि प्रदीप, नरेंद्र शर्मा, अनिल विश्वास सभी हमारे यहां आते थे. दिलीप कुमार के पिता की बहुत बड़ी ड्राई फ़्रूट्स की दुकान हुआ करती थी. वो पहले भगवतीचरण वर्मा के संपर्क में आए और फिर उनके ज़रिए बाऊजी से मिले. जब मैंने बाद में दिलीप साहब को बताया कि मैं नागर जी की बेटी हूँ तो वो बहुत प्यारी स्माइल दे कर बोले, अरे भाई आप उनकी बिटिया हैं. हम तो उनके हुक्काबर्दार थे… नागर साहब के. जब दिलीप साहब हमारे यहाँ आते थे तो मेहमानों को कोल्ड ड्रिंक सर्व करने की ज़िम्मेदारी खुद उठा लिया करते थे.”
मुंबई से वापस आ जाने के बाद भी अमृतलाल नागर का संबंध फ़िल्मों से छूटा नहीं. उनके लखनऊ वाले घर में पहले सत्यजीत रे की शतरंज के खिलाड़ी फ़िल्म की शूटिंग हुई और उसके बाद श्याम बेनेगल की जुनून की.अमृतलाल नागर की पौत्री दीक्षा नागर याद करती हैं, “जुनून की शूटिंग हमारे घर में 12-14 दिन चली थी. जिस हिस्से में हम रहते थे वहाँ फ़िल्म यूनिट का मेस बनाया गया था. बीच का दरवाज़ा खोलो तो मर्दानख़ाना आता था. वहां फ़िल्म के बहुत से दृश्यों की शूटिंग हुई थी. ये वो घर था जहाँ नफ़ीसा अली और जेनेफ़र कपूर ने पनाह ली थी. जिस दिन ये शूटिंग शुरू हुई मैं स्कूल में थी.” अमृतलाल नागर की रचनाओं की ख़ास बात होती थी उसकी विषय वस्तु पर किया गया शोध. एक तरह से वो उपन्यासों के माध्यम से हमारे कई सौ सालों का सामाजिक इतिहास लिख रहे थे.
प्रोफ़ेसर एस पी दीक्षित बताते हैं, “मैंने ये पाया कि वो होमवर्क बहुत करते थे. किसी भी ऐतिहासिक कथा को लिखने से पूर्व वो पचासों पुस्तकें पढ़ते थे. उनसे नोट्स बनाते थे और इससे भी बड़ी बात जिस घटना को वो लिख रहे होते थे, वहीं जा कर वो बस जाते थे.उदाहरण के लिए जब वो खंजन नैन लिख रहे थे तो ढ़ाई तीन महीने वो मथुरा में, वृंदावन में, पारसौली में किराए का मकान ले कर रहे. एक बार जब वो बृज से लौट कर आए तो मैंने उनसे पूछा बाबूजी इन दिनों क्या चल रहा है तो उन्होंने कहा डाक्टर अंधा उंगली नहीं पकड़ने दे रहा है. उनका कहने का तात्पर्य था कि जब तक पात्र भीतर स्पंदित न हो, खुद न बोले तब तक वो चरित्र जीवित नहीं होता है.”
साहित्यिक रचनाएँ :- उपन्यास : महाकाल (1947) (1970 से ‘भूख’ शीर्षक प्रकाशित), बूँद और समुद्र (1956), शतरंज के मोहरे (1959), सुहाग के नुपूर (1960), अमृत और विष (1966), सात घूँघट वाला मुखड़ा (1968), एकदा नैमिषारण्ये (1972), मानस का हंस (1973), नाच्यौ बहुत गोपाल (1978), खंजन नयन (1981), बिखरे तिनके (1982), अग्निगर्भा (1983), करवट (1985), पीढ़ियाँ (1990)।
कहानी संग्रह : वाटिका (1935), अवशेष (1937), तुलाराम शास्त्री (1941), आदमी, नही! नही! (1947), पाँचवा दस्ता (1948), एक दिल हजार दास्ताँ (1955), एटम बम (1956), पीपल की परी (1963), कालदंड की चोरी (1963), मेरी प्रिय कहानियाँ (1970), पाँचवा दस्ता और सात कहानियाँ (1970), भारत पुत्र नौरंगीलाल (1972), सिकंदर हार गया (1982), एक दिल हजार अफसाने (1986 – लगभग सभी कहानियों का संकलन)।
नाटक : युगावतार (1956, बात की बात (1974), चंदन वन (1974), चक्कसरदार सीढ़ियाँ और अँधेरा (1977), उतार चढ़ाव (1977), नुक्कड़ पर (1981), चढ़त न दूजो रंग (1982)।
व्यंग्य : नवाबी मसनद (1939), सेठ बाँकेमल (1944), कृपया दाएँ चलिए (1973), हम फिदाये लखनऊ (1973), मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ (1985), चकल्लस (1986) : उपलब्ध स्फुट हास्यँ-व्यंग्य रचनाओं का संकलन।
अन्य कृतियाँ : गदर के फूल (1957 – 1857 की इतिहास-प्रसिद्ध क्रांति के संबंध में महत्त्वपूर्ण सर्वेक्षण), ये कोठेवालियाँ (1960 – वेश्याओं की समस्या पर एक मौलिक एवं अनूठा सामाजिक सर्वेक्षण), जिनके साथ जिया (1973 – साहित्यकारों के संस्मरण), चैतन्य महाप्रभु (1978 – आत्म परक लेखों का संकलन), टुकड़े-टुकड़े दास्तान (1986 – आत्मोपरक लेखों का संकलन), साहित्यत और संस्कृति (1986 – साहित्यिक एवं ललित निबंधों का संकलन), अमृत मंथन (1991 – अमृतलाल नागर के साक्षात्कार (संपादक : डॉ. शरद नागर एवं डॉ. आनंद प्रकाश त्रिपाठी), अमृतलाल नागर रचनावली (संपादक : डॉ. शरद नागर, 12 खंडों में, 1992), फिल्मरक्षेत्रे रंगक्षेत्रे (2003 – नागरजी के फिल्मी, रंगमंच तथा रेडियो नाटक संबंधी लेखों का संकलन), अत्र कुशलं तत्रास्तु (2004 – नागरजी एवं रामविलास शर्मा के व्यक्तिगत पत्राचार का संग्रह)।
बाल साहित्य: नटखट चाची (1941), निंदिया आजा (1950), बजरंगी नौरंगी (1969), बजरंगी पहलवान (1969), बाल महाभारत (1971), इतिहास झरोखे (1970), बजरंग स्मडगलरों के फंदे में (1972), हमारे युग निर्माता (1982), छ: युग निर्माता (1982), अक्ल बड़ी या भैंस (1982), आओ बच्चोंं नाटक लिखें (1988), सतखंडी हवेली का मालिक (1990), फूलों की घाटी (1997), बाल दिवस की रेल (1997), सात भाई चंपा (1998), इकलौता लाल (2001), साझा (2001), सोमू का जन्म-दिन (2001), शांति निकेतन के संत का बचपन (2001), त्रिलोक विजय (2001)।
अनुवाद : बिसाती (1935 – मोपासाँ की कहानियाँ), प्रेम की प्याकस (1937 – गुस्तामव फ्लाबेर के उपन्यास ‘मादाम बोवरी’ का संक्षिप्त भावानुवाद), काला पुरोहित (1939 – एंटन चेखव की कहानियाँ), आँखों देखा गदर (1948 – विष्णु भट्ट गोडसे की मराठी पुस्ताक ‘माझा प्रवास’ का अनुवाद), 5. दो फक्‍कड़ (1955 – कन्हैकयालाल माणिकलाल मुन्शी के तीन गुजराती नाटक), सारस्वत (1956 – मामा वरेरकर के मराठी नाटक का अनुवाद)।
संपादन : सुनीति (1934), सिनेमा समाचार (1935-36), अल्ला कह दे (20 दिसंबर, 1937 से 3 जनवरी 1938, साप्ता्हिक), चकल्लस (फरवरी, 1938 से 3 अक्टूबर, 1938, साप्ताहिक), नया साहित्य (1945), सनीचर (1949), प्रसाद (1953-54) मासिक पत्रों का संपादन किया।।
संस्मरण : ‘गदर के फूल’, ‘ये कोठेवालियां’, ‘जिनके साथ जिया।’
अन्य : मोपासां, चेखव, लाबेयर, के. एम. मुंशी, मामा वरेरकर की रचनाओं के अनुवाद व विपुल बाल-साहित्य। नाटक, रेडियो नाटक व फीचर भी अनेक। 1940 से 1947 तक फिल्म सेनेरियो का लेखन कार्य किया। 1953 से 1956 तक आकाशवाणी लखनऊ में ड्रामा प्रोड्यूसर रहे।
पुरस्कार:- 1.‘बूँद और समुद्र’ पर काशी नागरी प्रचारिणी सभा का विक्रम संवत 2015 से 2018 तक का बटुक प्रसाद पुरस्का्र एवं सुधाकर पदक,; 2. ‘सुहाग के नूपुर’ पर उत्तर प्रदेश शासन का वर्ष 1962-63 का प्रेमचंद पुरस्कार,; 3. ‘अमृत और विष’ पर वर्ष 1970 का सेवियत लैंड नेहरू पुरस्कार,; 4. ‘अमृत और विष’ पर वर्ष 1967 का साहित्य अकादेमी पुरस्काकर,; 5. ‘मानस का हंस’ पर मध्य प्रदेश शासन साहित्य परिषद का वर्ष 1972 का अखिल भारतीय वीरसिंह देव पुरस्कार, 6. ‘मानस का हंस’ पर उत्तर प्रदेश शासन का वर्ष 1973-74 का राज्य साहित्यिक पुरस्कार,7. हिंदी रंगमंच की विशिष्ट सेवा हेतु सन 1970-71 का उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार,8. ‘खंजन नयन’ पर भारतीय भाषा, कलकत्ता (कोलकाता) का वर्ष 1984 का नथमल भुवालका पुरस्कार, 9. वर्ष 1985 का उ.प्र. हिंदी संस्थान का सर्वोच्च भारत भारती सम्मान (22 दिसंबर, 1989 को प्रदत्त), 10. हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग द्वारा ‘साहित्य वाचस्पति’ उपाधि से विभूषित। 11. आपको भारत सरकार द्वारा १९८१ में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

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