लेखक परिचय

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

ललितपुर (उ0प्र0) मे जन्म, बी.ए., फिल्म एप्रीशियेशन कोर्स तक शिक्षा. प्रकाशनः कहानी, बालकहानी, बाल नाटक, व्यंग, कविताऐें तथा फीचर्स एवं राजनैतिक तथा सामाजिक रिपोर्ट. धर्मयुग, नवनीत, मनोरमा, सुलभ इण्डिया, उत्तर प्रदेश मासिक, हैलो हिन्दुस्तान, लोकमाया, अभय छत्तीसग़ढ, इतवारी पत्रिका, हिमप्रस्त, इस्पात भारती, सुगंध, प्रेरणा, प्रगति वार्ता, गुजंन, डायलोग इण्डिया, शुक्रवार, लोकायत, मध्यप्रदेश सन्देश, मड़ई, हरियाणा संवाद, प्रथम इम्पेक्ट, इण्डिया न्यूज, बुमेन ऑन टाप, प्रगति वार्ता, जागृति इण्डिया,विचारसाराशं, सार्त, मधुरिमा; रचनाकार आदि पत्रिकाओं के साथ नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक ट्रव्यून, पंजाब केसरी, नवज्योति, दो बन्धु, नवभारत, लोकमत, पूर्वाचंल प्रहरी, गांडीव, रांची एक्सप्रेस, प्रभात खबर, चौथी दुनिया, सन्डेमेल, महामेधा, आचरण, दैनिक कौसर, प्रातःकाल, श्री इण्डिया, जनप्रिय, भारतरंग टाइम्स, सत्तासुधार आदि में प्रकाशन। कृतियाँ : उ0प्र0 सिनेमा से सरोकार हंसवाहिनी पत्रकारिता पुरस्कार से इलाहाबाद में सम्मानित रामेश्वरम हिन्दी पत्रकारिता पुरस्कार 2007 से सम्मानित सम्प्रतिः लखनऊ ब्यूरो प्रमुख, दैनिक भास्कर झांसी/ नोएडा। सम्पर्कः राजसदन 120/132 बेलदारी लेन, लालबाग, लखनऊ। मोबाइलः 9415508695, 05222200134

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सुरेन्द्र अग्निहोत्री

14 सितम्बर राष्ट्रभाषा हिन्दी दिवस को ललितपुर मंे जन्में राष्ट्रभाषा के अमर गायक ‘रत्नावली’’, ‘राजुल’, ‘महावीर’ (महाकाव्य), सहित अनेक बुन्देली कृतियों के प्रणेता स्वर्गीय हरिप्रसाद ‘हरि’ ने ललितपुर को अपनी साधनास्थली बनाकर इस नगर का गौरव बढ़ाया, काव्य रचना के माध्यम से बुन्देली भूमि के गौरव से लेकर आजादी के शंखनाद के साथ समकालीन सरोवरों के प्रति संवेदन शील रहे हरि प्रसाद हरि ने अपनी कलम से अहिंसा के प्रर्वतक भगवान महावीर पर महाकाव्य रचकर सारी दुनियां में अहिंसा का जयगान किया।

‘मैं अपने को पूर्ण गौरवशाली मानता हूॅ कि मैंने उस पावन भूमि पर जन्म लिया है जहां को भावनातिक्त मिट्टी विचारां के अंकुरे उगाकर नेह जीवन को संदेशों की छनों प्राणवायु प्रदान करती रहती है जहॉ गीतों की गलियों, कौतूहलो के राजमार्ग, उमंगों के चौराहे, तथा ममता के पनघटे हैं, जहॉ न्याय के साथ साथ विवेक की कहानियां गढ़ी पढ़ी जाती है। जहां जीवन में धन से अधिक श्रम पर निष्ठा है फिर भी लघुता पहाड़ों से ऊंची है।’’

‘हरि’ जी की काव्य-साधना पर दृष्टिपात करने से उनकी पवित्र आत्मीयता को क्षेत्रीय संकीर्णता के भ्रम से विलग करने में उक्त स्पष्टीकरण की अपेक्षा भी नहीं रह जाती। जब अंतरिक्ष यात्री से धरती की ललना कहती हैः-

‘‘तुम चले जैहो पिया, तारन की छाउंन में,

चंदा के गांवन मंे, धरती के फूलन को का हुइयै?’’

तब तो समस्त धरती मां के प्रति उनके अनुराग का विस्तार सपष्ट हो जाता है। यही नहीं, उनके काव्य-कंठ से प्रथम स्वर ही ‘‘जहां भव्य भारती ही आरती उतारती हो। जन्म जन्म वही देश भारत हमारा हो’’ कहकर फूटा था। राष्ट्रप्रेम की इस घोषणा का क्रियात्मक वेग के साथ उनके जीवन एवं काव्य मंे निर्वाह हुआ है। 18 वर्ष की अल्प आयु में ही राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में प्राणाहूत कर देने का संकल्प देखे:-

‘अम्बिके! अधीर हो न पीर परतंत्रता में।

पूत हैं तुम्हारे, नहीं दूध को लजायेंगे।।

मोद से प्रमोद से भरेंगे मां तुम्हारी गोद।

सोध सोध श्रृंखला की धज्जियां उड़ायेंगे।।

खायेंगे न भय, अरु लायेंगे न लेश मोह।

जीवन भी मरके सजीवन बनायेंगे।।

मैया मर जायें चाहे लाखों तिहारे लाल।

भारत में विजयी तिरंगा फहरायेंगे।।

राष्ट्रप्रेम की भावना निकटतम वातावरण के प्रति साहचर्यमूलक प्रेम का ही विकसित रूप है। ‘हरि’ जी की राष्ट्रीय भावना को हम बुन्देली भूमि के ममताकुण्ड से ही अभिसिंचित हुआ पाते हैं। उनकी ममता बुन्देल-खण्ड की मिट्टी पर पागल है:-

‘सचमुच भारत भू पर जो बुन्देल भूमि है,

सौ स्वर्गो की आभा इस मिट्टी पर वारें,

एक ओर यमुना जिसका अभिषेक कर रही

एक ओर नर्मदा कि जिसके चरण पखारे,

विन्ध्य शिला से दृढ़ वक्षस्थल पर सुनियंत्रित

वेत्रवती संस्कार-सूत्र सी गायक निर्मल,

उभय बाहुओं में श्रमगत निष्ठा को साधे

सतत प्रवाहित टोस अथ कलहराती चम्बल!’’

 

बुन्देल भूमि के प्रति ‘हरि’ जी का यह प्रेम कहीं सौन्दर्य संवेदनों को मूर्त करता है कभी बुन्देली संस्कृति की झांकियों से हमारा साक्षात्कार कराता है, कहीं यह दर्द उभाड़ कर करुण रस की सृष्टि करता है तो कहीं वीर भावना को उत्तेजित करता है। अंग्रेजों द्वारा बुन्देल भूमि को हड़पने के प्रयास की प्रतिक्रिया स्वरूप ‘हरि’ जी ने जो चुनौती शत्रु को दी है वह आज भी हमारी धमनियों में सोए हुए गौरवशाली पूर्वजांे के रक्तकणों में उबाल लाने में समर्थ है:-

‘‘फिरत करम के मारे तुम कां जाओ फिरंगी जाओ रे।

जा माटी नई मिले करौ तुम कोटिन भाँति उपाव रे।।

तुम इतनी आसान न समझो ई माटी को खेलिवो,

ई माटी मंे परजै तुमखों उल्टो पापर बेलिवो।

वीर बुन्देलन की जा माटी, जा माटी कछु और है,

साँसी सुनलों चबै न तुमसे ई माटी को कौर है।

जेई भले की बात मानके धरलों उल्टे पांव रे,

जा माटी नई मिले करो तुम कोटिन भाँति उपाव रे।

‘हरबोलन’ की है जा माटी जा माटी ‘हरदौल’ की,

जा माटी ‘आल्हा-ऊदल’ के रक्त रक्त के हौल की।

‘छत्रसाल’ अरु ‘चम्पत’, परमावर’ के भरे हुजूम की,

विन्ध्यवासिनी खप्परवारी रखवारी ई भूम की।

अपनी मांद परे सिंहन खांे, सोवत नहीं जगाओं रे,

जा माटी नई मिलै करौ तुम कोटिन भाँति उपाव रे।।

बुन्देलखण्ड की शक्ति के प्रतीकों को देखकर क्या कोई भी बुन्देलखण्डी अपने आत्म विश्वास को खो सकता है? बुन्देलखण्ड की अपरिमित शक्ति को दर्शाते है:-

‘‘ई धरती पै किलो गवालियर दतिया झांसी से बड़े,

और कालपी, सिमिथर, पन्ना, डांड ओरछे से डड़े।

टेरी, बैट, बानपुर, खनियांधानी और चंदेरियां,

सुगर, मदनपुर और कुम्हैड़ी पालीगढ़ की टौरियाँ।

नरियावली सुने का तुमने गढ़पैरा को नांव रे,

जा माटी नई मिलै करौ तुम कोटिन भाँत उपाव रे।’’

भारतीय संस्कृति ने जिन नदी पहाड़ों की गोद में जन्म लिया है, जिन त्योहारों मंे भारतीय संस्कृति अपनी अभिव्यक्ति पाती है, उनका संदेश था कि परतंत्रता की अवस्था में सामान्य रूढ़ियेां का पालन मात्र अपर्याप्त है। इस संदेश को कोई भावुक कवि ही सुन सकता है, गुन सकता है और जनता से कह सकता है:-

‘‘लाल ललिमा से टकरा कर

आज वसंती राग कह रहा,

और शिशिर भी पतझारों का

लूट लूट कर भाग कह रहा।

भभक भभक ग्रीषम कहता है

सावन का अनुराग कह रहा।

निशि अंधियारी दीपावलि की,

जलती आग अमाँ की बोली,

अभी खेलना बाकी होली।

‘‘रूंधी हुई सत्तावन से

भारत की प्रति राह कह रही।

लगी हुई वह अरमानों की,

अब तक भीषण दाह कह रही।

दिनकर और निशाकर कहता,

धूप और यह छांह कह रही।

बेटे का दायित्व कह रहा,

आह बंदिनी माँ की बोली।

अभी खेलना बाकी होली।’’

स्वतंत्रता के पश्चात् ‘हरि’ जी के राष्ट्रीय काव्य मंे देश विभाजन का अवसाद, गरीबी से ग्रस्त जनता का उत्पीड़न, राष्ट्र के कर्णधारों के प्रति श्रद्धा तथा विदेशी आक्रमणों से क्षुब्ध क्रूद्ध मनोवेगों का प्रकाशन हुआ है। देश में विभाजन की पीड़ा तथा सामान्य जनता की साधनहीनता तो उनको आजादी के स्वप्न को खण्डित हुआ अनुभव कराती है। ‘स्वप्न’ नामक कृति में गांधी युग कहे जाने वाले भारतीय इतिहास की स्वर्णिम पंक्तियों को स्वयं गांधी कंे द्वारा मिटाया जाना चित्रित करके सहज ही एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह उन्हांेने स्वतंत्र भारत के कर्णधारों के समक्ष प्रस्तुत किया है। गांधी जी की आजाद भारत की कल्पना को ‘हरि’ जी ने निम्न शब्दों मंेे दर्शाया हैः-

स्वप्न मेरा था धरा पर स्वर्ग धर दूं,

स्वप्न मेरा था मनुज को देव कर दूं।

स्वप्न मेरा था कि मानव की विषमता तोड़ दूं,

अरे, शोषित और शासक की कड़ी मैं जोड़ दूं।

कल्पना में फिर न कोई दीन था,

कल्पना मंे फिर नही कोई पतित था हीन था।

कल्पना मेरी नगर से दौड़ती थी गांव,

और नगरों का अमित वैभव अमित हलचल

अमित झिलमिल।

गांव में आकर कि उसके छू रही थी पांव,

और सपना था कि तोडूंगा अरे मैं,

मानवों में पड़ी मिथ्या दंभ की दीवार।

स्वप्न की बस कल्पना होती कि केवल जागरण की हार।।

भागवत विविधता से सम्पन्न ‘हरि’ जी के काव्य की दूसरी प्रधान प्रवृत्ति प्रणयाभिव्यक्ति है। परात्मक तथा आत्माभियंजक दोनों ही शैलियों में इन्हांेने प्रणय भावना का निरूपण किया है। परात्मक प्रकाशन शैली में प्रणय भावना को प्रकट करने वाली उनकी अमर रचनायें ‘राजुल’, ‘रत्नावली’ तथा ‘वियोगिनी’ है। ‘राजुल’ तथ ‘रत्नावली’ खण्ड काव्य कृतियां है। इन दोनों मंे भारतीय अतीत के दो चरित्र-रत्न क्रमशः राजुल (तीर्थकर नेमिनाथ की प्रणयाकांक्षिणी) तथा ‘रत्नावली’ (महाकवि तुलसी की परणीता) के प्रेम विगलित हृदय में बैठने का प्रयास किया है। कल्पनाशक्ति की महाकाव्यात्मक सर्जनात्मक तथा प्रगीत की भावविव्हलता दोनों का ऐसा अपूर्व सामंज्स्य इन रचनाओं में हुआ है कि वे खण्ड काव्य होते हुए भी प्रगीत है और प्रगीत होते हुए भी प्रबन्ध काव्य की उदात्त गरिम से मंडित है। सर्वनात्मक शक्ति की इस प्रखरता को देखकर ही मर्मज्ञ समीक्षक आचार्य नंददुलारे बाजपेयी ने राजुल की समीक्षा करते हुए लिख है कि इसमें कवि को जो सफलता मिली है वह एक चावल के दाने पर गीता के श्लोक कुरेद देने की भांति कष्टसाध्य है। राजुल मंे तो केवल नायिका पक्ष के प्रेमोत्थान की विविध सरणियाँ उद्घाटित है। ‘‘नहीं हृदय की दे पाए दे दो चरणों की छाया’’ कहकर राजुल स्वयं लोक-मंगसकारी सूत्रों की खोज में अपने प्रणय का मार्गान्तरीकरण कर देती है। रत्नावली मंे प्रेम के दोनों पक्ष नायक तथा नायिका व उसकी दोनों अवस्थायें संयोग तथा वियोग की मनोरम झाँकियां होने के कारण प्रेम वर्णन की बहुरूपता विद्यमान है। रत्नावली तथा तुलसी की संयोगावस्था का एक मधुर वार्तालाप दृष्टव्य हैः-

‘‘नाथ !

कहो क्या मैं इतनी ही छोटी हूँ,

बार बार कहते जो-

रत्ने तू पुतलियो मंे समा गयी!

और फिर उत्तर जो मिलता है,

छोटी नहीं!

पर क्या तुझे भ्रम है, जो कि मेरा पुतलियाँ ही-

इतनी छोटी तुझे लगती हैं।

जो सृष्टि के इतने महान फैलाव से अपनी,

इस रत्ना को खोज परख पायी थी।

तभी मैं कभी की निरुत्तर हो जाती हूँ,

जैसे सच छोटी हूँ।’’

 

 

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