लेखक परिचय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के हिंदी लेखक हैं। लम्बे अर्से तक बी.बी.सी. रेडियो हिन्दी सेवा से जुड़े रहे। उनके लेख भारत की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। पुस्तक रूप में उनके लेख संग्रह 'उस पार इस पार' के लिए उन्हें पद्मानंद साहित्य सम्मान (2002) प्राप्त हो चुका है।

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नरेश भारतीय

दिल्ली में हुए चुनावों में अपनी घोर पराजय की सम्यक समीक्षा करते समय भाजपा को यह ध्यान में लेने की महती आवश्यकता है कि वह किसी भी परिस्थिति में अपने स्थानीय नेतृत्व की उपेक्षा करने से बचे. स्पष्ट है कि पहले से ही विभाजित दिल्ली के भाजपा नेताओं का मनोबल चुनाव से मात्र कुछ दिन पहले उनके ऊपर बाहर से किसी को लाद देने से मज़बूत होने वाला नहीं था. भले ही दिल्ली के भाजपा नेता पार्टी अनुशासन का आदर करते हुए किरन बेदी के साथ यदा कदा दिखाए दिए लेकिन वस्तुत: दिल से उनके साथ थे ऐसा परिणामों से आभास नहीं मिलता.

यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि भाजपा का विजयरथ एक के बाद एक विजयश्री प्राप्त करते हुए सम्भवत: आत्ममुग्ध अवस्था में मार्ग में उभरते अवरोधों को देख कर भी सजग होकर सही निर्णय नहीं ले पाया. उम्मीद की जानी चाहिए कि इस पराजय से सबक लेकर पार्टी का नेतृत्व अब अपनी भविष्यक रणनीति का निर्धारण करेगा. कांग्रेसमुक्त भारत का नारा तो भाजपा ने ही दिया था लेकिन वह दिल्ली के इन चुनावों में स्वयम इसे पूरा नहीं कर पाई. काफी हद तक लोकसभा चुनावों में उसे भाजपा के द्वारा पूरा करने के बाद दिल्ली में उसे पूर्णता देने में आआपा सफल रही. आआपा की चक्की में भाजपा भी पिस गई. आखिर क्यों?

कांग्रेस का शून्य में लुप्त हो जाना समझ में आता है क्योंकि उसमें लड़ने के लिए जान नहीं बची है. लेकिन भाजपा जिसने प्रधानमंत्री श्री मोदी को आगे रख कर जान लड़ा दी मात्र तीन सीटों तक सिमट कर रह जाए? मतदान से पूर्व प्रदर्शित उसकी हताशा जनता के मन में उसके प्रति बने उत्साह को भी शंका के घेरे में ले गई. भाजपा के स्थानीय नेतृत्व की प्रचार अभियानों में भूमिका नगण्य रही और देश से बहुत दूर बैठे इस उभरते परिदृश्य को देख कर लगा कि प्रधानमंत्री मोदी के बिना इस अभाव की पूर्ति कोई भी करने को या तो उत्सुक नहीं था या फिर पार्टी नेतृत्व के पास और कोई विकल्प नहीं बचा था. विजय के लिए लड़ने की शक्ति का प्रदर्शन नहीं था यह. अपितु हार मान कर बैठ जाने का आभास जनता को देने के सिवा और अधिक कुछ इतने कम समय में करने को बचा ही नहीं था. चुनाव घोषणापत्र पर सहमति के अभाव का सामने आना, स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित न होना और राष्ट्रीय स्तर पर कार्ययोजनाओं की ही अधिक चर्चा इन सबमें मुंह छुपाते झांकती हुई पराजय के मुख को देख सकना मुश्किल नहीं था. फिर मुख्मंत्री पद के भाजपा उम्मीदवार की भूमिका पर भी प्रश्नचिह उभरे हैं जो जल्दबाजी में लिए गए निर्णय की पुष्टि ही करते हैं.

कहाँ कहाँ रहेंगे मोदी जी? हर कहीं खींचे जाएंगे तो पार्टी के अंदर नेतृत्व का विकास रुक कर अचानक थम जाएगा. आज देश को राष्ट्र समर्पित हज़ारों लाखों सक्रिय उत्साही कार्यकर्ताओं और उनमें से ही उभरते भविष्यक नेतृत्व की आवश्यकता है. मोदीजी में देश को भाग्य से एक श्रेष्ठ शीर्ष नेतृत्व प्राप्त हुआ है जो अहोर्रात्रि अपने कर्तव्य पालन में जुटे हुए हैं. उनके हाथ में देश का भविष्य सुरक्षित है. भारत को महान बनाने के स्वप्न पल रहे हैं. उन्हें संघठन के अंदर उनके अपने और बाहर उनके हितैषी कहलाने वाले उनके पद की मर्यादाओं के अनुरूप उन्हें काम करने दें. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भाजपा के और उससे सम्बंधित संगठनों के कुछ लोगों के हठपूर्ण स्वर उनके काम में सहयोग के स्थान पर जाने अनजाने बाधाएं खड़ी करने की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं. इसके फलस्वरूप वर्तमान भाजपा सरकार की छवि को देश के अंदर और विदेशों में धूमिल बनाने की चेष्ठाएं बलवती होने लगीं हैं. अब तक भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि बनाने के लिए जो कुछ किया गया है उसके फीका पड़ जाने की सम्भावनाएं मंडराने लगी हैं. निरर्थक विवाद उभर सकते हैं. इनसे भारत के विकास का निर्धारित मार्ग अवरुद्ध होगा, या फिर गति धीमी होने लगेगी.  समस्याओं के समाधान सशंकित होने लगेंगे और किए गए वादे समय पर पूरे न हुए तो जन असंतोष उभरेगा. परिवर्तन के इस महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंचे भारत में यह किसे और क्योंकर स्वीकार्य होगा कि ऐसी दुर्दशा का सामना करना पड़े? इसलिए यही समय है कि भाजपा, संघ और उससे जुड़े वे अनुवांशिक संगठन जरा थम कर सोचें कि उनकी अपनी योजनाओं में से क्या कुछ, कब, कहाँ और किस चरण पर करना आवश्यक और अधिक परिणामकारक सिद्ध हो सकता है. लेकिन उनके अपनों की ही राष्ट्रवादी सरकार जो अद्भुत आत्मविश्वास के साथ कदम आगे बढ़ रही है उसके कदमों को अपने उतावलेपन में काटने की भूल न करें. कभी कभी सोचता हूँ कि ऐसे मोड़ पर पहुंचते ही इतना उतावलापन क्यों उमड़ने लगता है. जब यह दिख रहा हो कि अभीष्ट दूर नहीं है और ऐसे में पूर्वापेक्षा कहीं अधिक सतर्कता, संयम और संतुलन बनाए रखते हुए रणनीती निर्धारण की आवश्यकता होती है लक्ष्य से हटने क्यों लगती है दृष्टि.

देशहित में राष्ट्रवाद को सफल बनाना है तो राष्ट्रवादी संगठनों संयम से काम लें. यदि यह दिख रहा है कि भाजपा सरकार मोदीजी के नेतृत्व में राष्ट्रहित को सर्वोपररि बनाए रखते हुए आगे बढ़ रही है तो उसके साथ सहयोग करें. यदि जनापेक्षा उनसे राजधर्म के सम्यक पालन की है तो उन्हें उसे पूरा करने दिया जाना चाहिए. सामाजिक और सांस्कृतिक धरातल पर निष्काम भाव से व्यक्ति निर्माण का अद्वितीय कार्य करने वालों को कभी भी राजनीतिक संरक्षण की आवश्यकता नहीं रही है. लेकिन यह भी युक्तियुक्त प्रतीत नहीं होता कि सब बंधन तोड़ कर उनसे जुड़े कुछ लोग अपनी वाणी और व्यवहार पर इसलिए नियंत्रण खो दें क्योंकि उनके किसी अपने की सरकार है. मैं आजीवन संगठन के साथ जुड़ा रहा हूँ और आज भी गर्व के साथ स्वयं को राष्ट्रवादी और संघ का स्वयंसेवक मानता हूँ. लेकिन, यह कहने में किसी प्रकार की हिचक महसूस नहीं करूंगा कि कुछ वर्ष पूर्व जैसा श्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रीत्व कार्यकाल में होते देखा था ठीक वैसा ही परिदृश्य एक बार फिर से उभरते देखना मुझे अखर रहा है. कोई भी उठ कर कुछ भी बोल दे और इस प्रकार नई समस्याओं को जन्म देते हुए सांगठनिक अनुशासन की भी धज्जियाँ भी उड़ाता रहे ऐसा व्यवहार न तो देश और समाज के हित में है और न ही संघ और भाजपा के हित में.

किसी भी कारण अन्यत्र ध्यान दिए जाने से राष्ट्रहितार्थ समर्पण का व्रत किसी भी चरण पर और किसी भी कारण से भंग न होने दिया जाए. श्रेष्ठ राष्ट्रीयता के निर्माण में राष्ट्रधर्म का यही मर्म है. लगता है आज विज्ञापन के जरिए कार्य को आगे बढ़ते दिखाने की प्रवृत्ति अधिक जोर मार रही है. एक के बाद एक ऐसे ब्यान, मत, वक्तव्य सुनने देखने को मिल रहे हैं जो निश्चय ही उन नारों से मेल नहीं खाते जो मोदीजी ने देश की जनता से एक राष्ट्रवादी सरकार बनाने के लिए उभारे थे. मेरा ऐसा मानना है कि राजनीतिक धरातल पर ‘सबका साथ सबका विकास” का नारा देकर देश को उस छद्म सेकुलरवाद के शिकंजे से निश्चित ही मुक्त करा सकता है जिसने अब तक देश और उसके राष्ट्रियों को परस्पर जुड़ने ही नहीं दिया. एक राष्ट्र की अवधारणा को पनपने ही नहीं दिया. एक ही समाज के अंगभूत होकर परस्पर प्रेम की डोर में बंधने नहीं दिया. अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए बुरी तरह से बांटा. कोई हरिजन बना कर अलग कर दिया गया तो बाद में कोई कहलाया पिछड़ा, अति पिछड़ा और अति अति पिछड़ा. पिछड़ों के नाम पर मांगे गए वोट. मुसलमानों के बने वोट बैंक जिन्हें खूब भुनाया इन कथित सेकुलरवादियों ने. सेकुलरवाद के नाम पर खंड खंड हुआ भारत और निर्बाध पलता रहा कांग्रेस का यह पाखण्ड. इसके चलते देश के संविधान में संशोधन कर इसे जोड़ दिया गया. इस पाखण्ड का सशक्त खंडन अब किए जाने की आवश्यकता है ताकि इसके स्थान पर देश के हर नागरिक के मन मस्तिष्क में एक राष्ट्रीयता के गौरव का अहसास उभरे. इसके लिए सहज, सतर्क और सही कदम उठाए जाने की आवश्यकता है जिसके लिए सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर परस्पर सहयोगी वातावरण निर्माण की दिशा में सोचा जाना चाहिए.

भाजपा की विजय रथ यात्रा रुके नहीं, आगे बढ़े और कांग्रेस का कोई एक योग्य विकल्प निखर कर विपक्ष के नाते सामने आए ताकि एक संयत एवम् संतुलित लोकतंत्र देश में और मजबूत हो. सद्भावना पनपे. प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली क्षेत्र में बनने जा रही नई सरकार को अपने सहयोग की पूर्ण आश्वस्ति प्रदान करके अपने पद की गरिमा और अपने व्यक्तित्व के अनुरूप अनुपम सद्भावना का परिचय दिया है. विश्वास है कि दिल्ली के भावी मुख्यमंत्री श्री केजरीवाल इसका स्वागत करते हुए ऎसी सद्भावना को अधिक पुष्ट करेंगे और दिल्ली एक सुरक्षित, स्वस्थ, सुंदर और सुव्यवस्थित और सुशासित नगर बन कर विश्व की आकर्षक राजधानियों में स्थान प्राप्त करेगा. दिल्ली भारत की शोभा बने और भारत विश्व की एक महाशक्ति बन कर विश्वगुरु पद पर पुन: प्रतिष्ठित हो.

 

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2 Comments on "भाजपा सबक ले और आगे बढ़े…."

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Arun Kumar Upadhyay
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भाजपा की सबसे बडी कमजोरी है कि वह सत्ता में आते ही अपने को समाप्त करने के लिए बेचैन हो जाती है। कांग्रेस वाले पैसा बनाने में ख्याल रखते हैं कि अपने समर्थकों द्वारा ही काम करे। पर भाजपा पैसे के पीछे इतना पागल है कि कांग्रेस के जो सबसे भ्रष्ट अफसर थे वे मोदी जी के प्राणों से भी प्रिय है। यह अक्षरशः सत्य है। केवल दिल्ली की हार के डर से गृह सचिव को हटाना पड़ा। किंतु पूर्व सचिव भी मतंग सिंह के ही आदमी थे और दिन रात सीबीआई को धमकाते थे कि मोदी को हत्या केस… Read more »
sureshchandra.karmarkar
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sureshchandra.karmarkar
भाजपा नेता और अनुषांगिक संस्थाओं के नेताओं का बड़बोलापन भापा की हार के लिए जिम्मेदार है. भाजपा ने यह नियम बनाना चाहिए की चुनाव के समय किसी बाहरी श स कियत को किसी पद का उम्मेदवार न बनाया जावे और न उसको चुनाव का टिकट दिया जाय. जो कार्य करता बरसों से दल की सेवा और संगठन को सुदृढ बनाने में लगे हों उनकी उपेक्षा ऐसे परिणाम ही लाएगी. दूसरे भाजपा का मार्गदर्शी मंडल यह विचार करे की साधु संतों और सन्यासी। सन्यासिनिओं को टिकट और पद देना कहाँ तक लाभप्रद होगा?गर्वोक्तियां और चुभनेवाली आपत्तिजनक टिप्णियां भी नेता लोग कम… Read more »
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