लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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BJP3अभी कुछ दिनों से भाजपा लगातार चर्चा में है. निश्चित ही चर्चा में इसलिए कि सारा देश आज टकटकी लगाए भाजपा को उस ऊँट की तरह देख रहा है, जिसके बारे में आपको पता ही नहीं कि वह आखिर बैठेगा किस करवट. सही अर्थों में कहा जाए तो भाजपा को खुद भी नहीं पता है कि आखिर उसे जाना किस ओर है. जब-तक आप यह आलेख पढ़ रहे होंगे, तब तक भाजपा में उल्लेखनीय तब्‍दीली आ गयी होगी. हो सकता है तब तक आडवाणी जी की विदाई हो चुकी हो और राजनाथ युग भी समाप्ति की ओर हो. लेकिन सवाल किसी व्यक्ति के आने-जाने का है ही नहीं. सवाल तो यह है कि भाजपा को कहाँ जाना है. या कौन सा रास्ता ऐसा है जो पार्टी को उसके मंजिल तक पहुचा सकती है. या पहले तो पार्टी को यह भी तय करना बाकी है कि सत्ता प्राप्ति के अलावा उसकी कोई और मंजिल है भी या नहीं.

मोटे तौर पर देखा जाय तो भाजपा बुरी तरह द्वन्द्व का शिकार है. पूरी पार्टी में दो धारा तो साफ़ तौर पर दिखाई देती है. एक वह है जिसके अनुसार भाजपा हिंदुत्‍व की विचारधारा पर चले. तो दूसरी धारा मध्यमार्ग की बात करने वालों की है. वैसे निश्चित ही मध्यमार्ग हमेशा से अपनाए जाने योग्य रहा है. लेकिन विगत वर्षों में सत्ता के लिए किये लगातार समझौतों ने यह साबित किया है कि भाजपा का कथित उदारवादी चेहरा महज़ सता प्राप्ति के लिए किया जाने वाला अप्राकृतिक गठबंधन के अलावा कुछ नहीं है. तो जिस “परिवार” की बात पार्टी करती है, उसमें कम से कम किसी अप्राकृतिक संबंधों से आप और कुछ भले ही पा लें, परिवार बसाने और बनाने की उम्मीद तो बिल्कुल नहीं कर सकते. वैसे भी लगातार पार्टी द्वारा किये जा रहे समझौतों ने, केंद्र में सत्ता नहीं मिलने पर किये जाने वाले हायतौबा ने लोगों में पार्टी की साख को धक्का पहुचाया ही है. तो अब पार्टी के पास बस यही उपाय है कि अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए सत्ता का मोह कुछ दिनों के लिए छोड़े. अपना एक मार्ग तय करे और उस पर मजबूती से जमे रहने का सन्देश दें. तात्‍कालिक लाभ-हानि की चिंता बिल्कुल छोड़ कर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी की अपने गरिमा के अनुरूप व्यवहार कर विपक्ष में रहने के आधी सदी के अनुभव का उपयोग कर सकारात्मक एवं कल्याणात्मक विपक्ष की भूमिका का निर्वहन करने के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार करे.

आज जिस तरह पूरे देश में अलग-अलग बहानों से अलगाव की रोटी सेंकी जा रही है. सभी राजनीतिक दल, जिस तरह भाषा, प्रांत और अन्य आधार पर दूकान चलाने को प्रेरित या मजबूर हैं. चाहे इन बहानों के आधार पर गुंडागर्दी करने वाला राज ठाकरे हो, जाति के आधार पर अपने मंसूबे पूरे करने वाले लालू, मुलायम, मायावती, पासवान जैसे लोग, (अ)धर्मं के आधार पर विद्वेष फैलाने वाले करूणानिधि या छत्तीसगढ़ में जातिवाद के नए खैरख्वाह ताराचंद जैसे लोग हों. विभिन्न आधारों पर भावना भड़का कर जहां “लोकतंत्र” सस्ती लोकप्रियता हासिल करने वाले लोगों का जमावड़ा हो गया हो, वहाँ पर तो वास्तव में सद्भाव और राष्ट्रवाद की बातें करना टेढ़ी खीर ही साबित होगी, जैसा कि हो भी रहा है. ऐसे हालत में सवाल केवल राष्ट्रवाद को अपनी स्वाभाविक प्राणवायु मानने वाली भाजपा पर ही है. देश तो जब हजारों वर्षों के विभिन्न जयचंदों को झेल कर भी खड़ा ही रहा तो ये मुट्ठी भर लफंगे क्या बिगाड़ लेंगे लोकतंत्र का? लेकिन हाँ भाजपा जैसी पार्टी के पास सबसे बड़ी जिम्मेदारी ये है कि वह “संतुलन” साधने का प्रयास छोड़ कर वास्तविक अर्थों में “सद्भाव” एवं “सच्चाई” का ही पक्ष ले. “लाख बदल जाए जमाने का चलन, पर ना मेरे दोस्त तू सहरा को समंदर कहना.” हो सकता है ऐसा करते हुए पार्टी को थोड़ा नुकसान होता दिखाई दे, लेकिन विभिन्न ऐतिहासिक एवं पौराणिक आख्यान इसकी गवाही देते हैं कि जीत अंततः सच्चाई की ही होती है, और भाजपा जब कभी भी सफल हुआ है तो अपने इसी अस्त्र की बदौलत.किसी भी तरह के तुष्टिकरण से तो कम से कम भाजपा को दूर ही रहना होगा.

अमेरिका का एक उदाहरण समीचीन है. अब्राहम लिंकन ने राष्ट्रपति के रूप में गुलाम प्रथा को समाप्त करने का निर्णय लिया था. उसको यह मालूम था कि जनमत इसके पक्ष में नहीं है. ऐसे निर्णय से गृह युद्ध की स्थिति पैदा हो सकती है, लेकिन लिंकन ने इमानदारी से मानवता के पक्ष में खड़ा होने का निर्णय लिया, देश का दक्षिणी इलाका जलने लगा, देश में ही युद्ध हो गए, वहाँ लोगों ने अपनी सरकार तक बना ली. लेकिन लिंकन झुके नहीं और अंततः विजय हासिल कर देश के दामन से दास-प्रथा के दाग को धो कर ही दम लिया, सही अर्थों में वे एक राजपुरुष साबित हुए. इस उद्धरण का आशय केवल यह है कि भाजपा को सदा की तरह अपने राष्ट्रीय सरोकारों का ही परिचय देना होगा. बाकी कुकुरमुत्ते की तरह उग कर एवं वोटों का बटवारा कर परिणामों को बदल देने वाले समूह तो रहेंगे ही. भारतीय लोकतंत्र में कभी दो दलीय प्रणाली लादना संभव भी नहीं होगा. लेकिन भाजपा के लिए अपना रास्ता इन्ही अवरोधों के बीच से निकालना होगा, और वो रास्ता वही होगा जो पंडित दीनदयाल उपाध्याय का था. वे एक बार चुनाव मैदान में खड़े थे, सलाहकारों ने कहा कि आप ब्राम्हण हैं, और उस क्षेत्र में पंडितों की संख्या ज्यादे है, अतः आप अगर एक बार जाति के आधार पर वोट मांग लें तो जीत निश्चित है. उन्होंने हार जाना मुनासिब समझा लेकिन ऐसे किसी भी आह्वान को तूल देने का ज़रूरत नहीं समझी, वो तात्कालिक रूप से हार भी गए लेकिन उन्ही के पुण्य-प्रताप की बदौलत एक समय ऐसा आया जब केसरिया प्रवाह पूरे देश को आप्लावित कर गया. तो निश्चय ही भाजपा के लिए एक वही मार्ग है, उसी का अनुसरण कर वो फिर से देश को एक सूत्र में पिरोने का कार्य कर सकती है. अन्य दलों को भले ही साम-दम-दंड-भेद रास आता हों लेकिन भाजपा के लिए तो उसका अपना ही मार्ग पाथेय है. तो राष्ट्रीय स्तर पर अब भाजपा के लिए समय आ गया है कि वह अपने मार्ग का निर्धारण करे. दीनदयाल की तरह राष्ट्रवाद के अपने मौलिक रूख पर दमदारी से कायम रहे ,बिना किसी परिणाम की चिंता किये हुए.अब कम से कम भाजपा का कोई भी द्वंद पार्टी पर भारी पड़ेगा.

आजादी के कुछ दिन बाद की कहानी है. पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ पंजाब के मुख्य मंत्री प्रताप सिंह कैरो, भाखड़ा नांगल बाँध का निरीक्षण करने जा रहे थे. एक गिलहरी उनकी गाड़ी के नीचे आ कर मर गयी. उसपर नेहरू जी का कहना था कि, गिलहरी अपनी ऊर्जा एवं चौकन्नेपन के वाबजूद इसलिए गाड़ी के नीचे आ गयी क्यूंकि वह तय ही नहीं कर पायी कि उसको जाना किधर है, यही द्वंद उसके लिए प्राण-घातक हुआ. तो राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के लिए अब तय करने का वक़्त है कि वह किसी एक राह को पकड़ कर चले, अब किसी भी तरह के द्वैध का समय नहीं है. राह पकड़ तू एक चला जा, पा जाएगा मधुशाला. और वो राह शायद वही है कि बिना किसी बात कि चिंता किये हुए अपनी शक्ति भर राम राज्य के स्वप्न को साकार करने, सदभाव के राम-सेतु का निर्माण करने-भले ही रेत को इकठ्ठा कर ही- लेकिन गिलहरी की तरह जुट जाए. कोई छोटा-मोटा हार-जीत किसी चिंता की बात नहीं है. सही कहा है किसीने “कुछ चेहरे की नाराजगी से दर्पण नहीं मरा करता है”.

– पंकज झा.

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4 Comments on "भाजपा : उस पार ना जाने क्या होगा."

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nirmla.kapila
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मुझे तो भाजपा का भविश्य नज़र नहीं आता और न ही लोगों मे अब उसकी विचार्धारा का कुछ अर्थ या प्रभाव रह गया है ज बाजपेयी जी जैसे दिग्गज़ और इमानदार व्यक्ति कुछ नहीं कर पाये तो और किस से उमीद रखी जा सकती है। जवाहर लाल जी नंगल मे भाकरा बनने के दौरान १४ बार आये थे। नेहरु जैसा दूर्दरशी नेता की आज जरूरत है न की धर्म के नाम पर लडाने वाले नेताओं की। इस पर अधिक नहीं कहूँगी। हम तो आज भी नंगल मे हैं। मैं ५ साल की थी जब नेहरु नंगल पहली बार आये थे।… Read more »
dhiru singh
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राजनाथ रुपी शनि की छाया से आज भाजपा मुक्त हो गई है . और भाजपा के लिये दुर्भाग्य है उसे अपने नये अध्यक्ष का परिचय भी अपने कार्यकर्ताओ से कराना पडेगा . बंगारु लक्ष्मण से जो गिरावट चालु हुयी आज भी वादस्तूर जारी है . नितिन गडकरी को तो फ़ेल करने के लिये भाई लोग बैठे है . भाजपा तो डूब ही रही है संघ को भी ले डूबेगी .

और गिलहरी की तरह दुविधा मे है भाजपा . अन्ज़ाम तो आपने लिख ही दिया गिलहरी का

दिनेशराय द्विवेदी
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इस आलेख में भाजपा के लिए बहुत अधिक आशावाद है। भाजपा किसी रास्ते पर चले, क्या उस से जनता को कुछ आशाएँ हो सकती हैं? देश की जनता के जीवन स्तर को सुधारने का उस के पास कोई कार्यक्रम नहीं, केवल नारे हैं, जनता केवल विकल्पहीनता की स्थिति में उसे ढो सकती है।

Jitendra Dave
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अच्छा विश्लेषण. दरअसल जातिवाद और तुष्टिकरण की राजनीति के बीच भा ज पा आशा की एक किरण हो सकती है. क्योंकि एनी के मुकाबले भा ज पा शासित राज्य बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. लेकिन इसके लिए भा ज पा को खुद को दुरूस्त करना होगा. और नि:संदेह गडकरी बड़ा पार लगाने में सक्षम व्यक्ति हैं लेकिन उन्हें व्यक्ति की बजाय राष्ट्र-समाज केन्द्रित निर्णय लेने होंगे.

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