लेखक परिचय

सरिता अरगरे

सरिता अरगरे

१९८८ से अनवरत पत्रकारिता । इप्टा और प्रयोग के साथ जुडकर अभिनय का तजुर्बा । आकाशवाणी के युववाणी में कम्पियरिंग। नईदुनिया में उप संपादक के तौर पर प्रांतीय डेस्क का प्रभार संम्हाला। सांध्य दैनिक मध्य भारत में कलम घिसी, ये सफ़र भी ज़्यादा लंबा नहीं रहा। फ़िलहाल वर्ष २००० से दूरदर्शन भोपाल में केज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टर और एडिटर के तौर पर काम जारी है। भोपाल से प्रकाशित नेशनल स्पोर्टस टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता अपनी कलम की धार को पैना करने की जुगत अब भी जारी है ।

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mpमध्यप्रदेश में बीजेपी के फ़रमान ने कई मंत्रियों की नींद उड़ा दी है। पिछले लोकसभा चुनावों की कामयाबी दोहराने के केन्द्रीय नेतृत्व के दबाव के चलते प्रदेश मंत्रिमंडल की बेचैनी बढ़ गई है। कॉरपोरेट कल्चर में डूबी पार्टी ने सभी को टारगेट दे दिया है। ‘टारगेट अचीवमेंट’ ही मंत्रिमंडल में बने रहने के लिये कसौटी होगी। प्रदेश में पचास ज़िले हैं और मंत्रियों की संख्य़ा महज़ बाइस है। ऎसे में सभी मंत्रियों को कम से कम दो – दो ज़िलों में अपना सर्वोत्तम प्रदर्शन देना ज़रुरी है, ताकि बीजेपी केन्द्र में सत्ता के करीब पहुँच सके। पार्टी ने क्षेत्रीय विधायकों को भी “लक्ष्य आधारित काम” पर तैनात कर दिया है। प्रत्याशियों को जिताने का ज़िम्मा सौंपे जाने के बाद से इन नेताओं की बेचैनी बढ़ गई है।

हाईप्रोफ़ाइल मानी जा रही विदिशा, गुना, रतलाम और छिंदवाड़ा सीट पर सभी की नज़रें लगी हैं। हालाँकि विदिशा में राजकुमार पटेल की ‘मासूम भूल’ के बाद परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। सूत्रों का कहना है कि सुषमा की जीत पक्की करने के लिये विकल्प भी तय था यानी सुषमा का दिल्ली का टिकट कटाओ या मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली करो। और फ़िर राजनीति में “साम-दाम-दंड-भेद” की नीति ने रंग दिखाया। अब सुषमा स्वराज के साथ ही बीजेपी भी पूरी तरह निश्चिंत हो गई है।

मध्यप्रदेश में बीजेपी के फ़रमान ने कई मंत्रियों की नींद उड़ा दी है। पिछले लोकसभा चुनावों की कामयाबी दोहराने के केन्द्रीय नेतृत्व के दबाव के चलते प्रदेश मंत्रिमंडल की बेचैनी बढ़ गई है। कॉरपोरेट कल्चर में डूबी पार्टी ने सभी को टारगेट दे दिया है। ‘टारगेट अचीवमेंट’ ही मंत्रिमंडल में बने रहने के लिये कसौटी होगी। प्रदेश में पचास ज़िले हैं और मंत्रियों की संख्य़ा महज़ बाइस है। ऎसे में सभी मंत्रियों को कम से कम दो – दो ज़िलों में अपना सर्वोत्तम प्रदर्शन देना ज़रुरी है, ताकि बीजेपी केन्द्र में सत्ता के करीब पहुँच सके। पार्टी ने क्षेत्रीय विधायकों को भी “लक्ष्य आधारित काम” पर तैनात कर दिया है।

कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और कांतिलाल भूरिया को घेरने के लिये मुख्यमंत्री ने खुद ही मोर्चा संभाल लिया है। दिल्ली और मध्यप्रदेश की चार सर्वे एजेंसियों ने छिंदवाड़ा, गुना-शिवपुरी, रतलाम, बालाघाट, दमोह ,टीकमगढ़, भिंड, धार, होशंगाबाद और खरगोन सीट पर नज़दीकी मुकाबले की बात कही है। जीत सुनिश्चित करने के लिये काँटे की टक्कर वाले इन क्षेत्रों में मुख्यमंत्री ने सूत्र अपने हाथ में ले लिये हैं।

अपने चहेतों को टिकट दिलाने के कारण मंत्रियों की प्रतिष्ठा भी दाँव पर लगी है। मंत्री रंजना बघेल के पति मुकाम सिंह किराड़े धार से उम्मीदवार हैं। बालाघाट से के. डी. देशमुख को टिकट मिलने के बाद मंत्री गौरी शंकर बिसेन और रीवा से चन्द्रमणि त्रिपाठी को प्रत्याशी बनाने के बाद मंत्री राजेन्द्र शुक्ला पर दबाव बढ़ गया है। होशंगाबाद से रामपाल सिंह और सागर से भूपेन्द्र सिंह की उम्मीदवारी ने मुख्यमंत्री की ज़िम्मेदारी बढ़ा दी है।

उधर खेमेबाज़ी और आपसी गुटबाज़ी ने काँग्रेस को हैरान कर रखा है। आये दिन की फ़जीहत से बेज़ार हो चुके नेता अब चुप्पी तोड़ने लगे हैं। अब तक चुप्पी साधे रहे दिग्गज नेताओं का दर्द भी ज़ुबान पर आने लगा है। प्रदेश काँग्रेस चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष अजय सिंह का कहना है कि इस तरह की राजनीति उनकी समझ से बाहर है। वे कहते हैं, “पार्टी हित में सभी नेताओं को मिलजुल कर आपसी सहमति से फ़ैसले लेना होंगे।”

विधान सभा चुनाव में काँग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद आलाकमान ने सभी नेताओं को एकजुटता से काम करने का मशविरा दिया था। लेकिन पाँच महीने बाद भी हालात में सुधार के आसार नज़र नहीं आने से कार्यकर्ता निराश और हताश हैं। जानकारों की राय में प्रदेश काँग्रेस इस वक्त अस्तित्व के संकट के दौर से गुज़र रही है। संगठन में नेता तो बहुत हैं, नहीं हैं तो केवल कार्यकर्ता।

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