लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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-लिमटी खरे

मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के शासन के सात साल पूरे होने को आ रहे हैं। इन सात सालों में 2010 में सत्ता और संगठन में तालमेल की कमी जबर्दस्त परिलक्षित हो रही है। मामला चाहे निगम मण्डलों में लाल बत्ती बांटने का हो अथवा केंद्र में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के मंत्रियों के साथ जुगलबंदी का, हर मामले में सत्ता और संगठन का रूख अलग अलग ही साफ तौर पर दिखाई देता है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और लोक कर्म मंत्री नागेंद्र सिंह भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की तारीफों में न केवल कशीदे गढ़ते हैं, वरन् मंत्री मुख्यमंत्री की छवि निर्माण का काम संभालने वाला जनसंपर्क महकमा भी कमल नाथ एवं अन्य मंत्रियों के साथ ‘‘सोजन्य भेंट‘‘ की अनेकानेक तस्वीरें बारंबार भेजता है, जिसमें उभय पक्ष मुस्कुराते हुए एक दूसरे का अभिवादन करते दिखते हैं। कभी मध्य प्रदेश भाजपा द्वारा राष्ट्रीय राजमार्गों की दुर्दशा के लिए कमल नाथ को घेरने का कार्यक्रम बनाकर उसे अमली जामा नहीं पहनाया जाता है, तो अब एक बार फिर एमपी के निजाम शिवराज सिंह चौहान अपने मंत्रीमण्डल सहयोगियों के साथ वजीरे आजम डॉ. मनमोहन सिंह से मिलकर भूतल परिवहन मंत्रालय के द्वारा किए जाने वाले पक्षपात की शिकायत करने का तान छेड़ रही है। आशंका व्यक्त की जा रही है कि कहीं मध्य प्रदेश भाजपा के कमल नाथ घेरो अभियान की तरह इस बार भी यह कार्यक्रम टांय टांय फिस्स न हो जाए, होता भी है तो हो इससे जनसेवकों को क्या लेना देना, अंत्तोगत्वा पिसना तो निरीह जनता जनार्दन को ही है। मजे की बात तो यह है कि इस मर्तबा शिवराज मंत्रीमण्डल सिर्फ और सिर्फ नर्मदापुरम के दो राष्ट्रीय राजमार्ग की दुर्दशा के लिए पीएम से मिलने जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि मध्य प्रदेश में जिस जिस जिले से होकर नेशनल हाईवे गुजरता है, उन जिलों में शिवराज सरकार की केबनेट की बैठक रख दी जाए तो कम से कम इन जिलों की किस्मत चमकने के मार्ग ही प्रशस्त होने की उम्मीद जग जाएगी।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मण्डली ने नर्मदापुरम को जोड़ने वाले दो राष्ट्रीय राजमार्गों की बदहाली पर अफसोस जाहिर किया जाना आश्चर्यजनक माना जा रहा है। देखा जाए तो शिवराज मंत्रीमण्डल में समूचे सूबे के हर क्षेत्र को प्रतिनिधित्व दिया गया है, इन क्षेत्रों में से अनेक विधायक एसे भी हैं, जिनके विधानसभा क्षेत्र से नेशनल हाईवे होकर गुजर रहा है। इसके अलावा जब भी मुख्यमंत्री या मंत्री सड़क मार्ग से विचरण करते हैं, तब वे सड़कों की बदहाली से दो चार हुए बिना नहीं रहते हैं। बावजूद इसके मंत्रियों ने अपने अपने क्षेत्र या अन्य नेशनल हाईवे की दुर्दशा पर मौन ही साध रखा है।

संसदीय कार्य और विधि विधाई मंत्री एवं शिवराज सरकार के प्रवक्ता नरोत्तम मिश्रा ने भोपाल में मीडिया से रूबरू होते हुए कहा कि 15 नवंबर के पहले मंत्रीमण्डल के सदस्य शिवराज सिंह की अगुआई में प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह से भेंट कर मध्य प्रदेश के नेशनल हाईवे की दुर्दशा का कच्चा चिट्ठा उनके समक्ष रखेंगे। राष्ट्रीय राजमार्ग का संधारण एवं निर्माण केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय की महती जवाबदारी है, जाहिर है यह मामला भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के खिलाफ ही जाएगा।

इसके पहले सितम्बर माह में मध्य प्रदेश भाजपा का कहना है कि वह 5 से 7 अक्टूबर तक नेशनल हाईवे पर पड़ने वाले कस्बों और ग्रामों में हस्ताक्षर अभियान चलाएगी फिर 22 से 24 अक्टूबर तक इन्ही ग्रामों में मानव श्रंखला बनाई जाने के उपरांत 10 नवंबर को भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपेंगे। भाजपा के इस निर्णय से कमल नाथ और भाजपा के बीच नूरा कुश्ती और तेज हो गई थी। अब जबकि पांच से सात अक्टूबर और 22 से 24 अक्टूबर की तिथि भी निकल चुकी है, तब भाजपा में राष्ट्रीय स्तर पर यह बहस तेज हो गई है कि आखिर वे कौन से हिडन रीजन और वेस्टेज इंटरेस्ट (छिपे हुए कारण, और निहित स्वार्थ) हैं जिनके चलते भाजपा जनता से सीधे जुड़े मुद्दे पर भी कमल नाथ को घेरने में अपने आप को असफल ही पा रही है।

जब मध्य प्रदेश में सत्ताधारी और केंद्र में विपक्ष में बैठी भाजपा का आलम यह है तो गरीब गुरबों की कौन कहे, वह भी तब जबकि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की आसनी पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा सालों साल सींची गई मध्य प्रदेश की विदिशा संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीती सुषमा स्वराज विराजमान हों, तब भी मध्य प्रदेश की सड़कें इस तरह से बदहाल हो रही हो, केंद्र के मंत्री मध्य प्रदेश के साथ अन्याय कर रहे हों, इस अन्याय के बाद भी पता नहीं किस बात से उपकृत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और सूबे के लोक निर्माण मंत्री दोनों ही केंद्र सरकार को कोसकर भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की तारीफों में तराना गा रहे हों, साथ ही साथ भाजपा द्वारा कमल नाथ के द्वारा प्रदेश के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करने के आरोप में सड़कों पर उतरने की बात की जाए तो यह तथ्य निश्चित तौर पर शोध का ही विषय माना जाएगा।

दरअसल सड़कों या आवागमन के साधनों का राज्य, जिला, विकासखण्ड, कस्बों के विकास में महत्वपूर्ण रोल रहता है। राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण दो सूबों को आपस में जोड़ने की गरज से किया गया था। जब भी कोई व्यक्ति एक सूबे से दूसरे सूबे में उद्योग धंधे के लिए जाता है तो सबसे पहले वह आवागमन के साधनों पर नजरें इनायत करता है। पूर्व में राजा दिग्विजय सिंह के शासनकाल मंे पर्यटकों को मध्य प्रदेश लाने वाली संस्थाओं ने यहां की बदहाल सड़कों को देखकर हाथ खड़े कर दिए थे। राजा दिग्विजय सिंह ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल के अंतिम सालों में पांच सौ करोड़ के बांड सड़कों के लिए जारी किए थे, जिन्हें भुनाया था शिवराज सरकार ने।

बहरहाल, इसके पहले मध्य प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री ने दिल्ली में एक समारोह में केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की तबियत से तारीफ की और यहां तक कहा कि मध्य प्रदेश को सिर्फ और सिर्फ सड़कों के मामले में केंद्र से पर्याप्त सहयोग और समर्थन मिल रहा है। मध्य प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री के कथन के बाद मध्य प्रदेश की ओर से दिल्ली में बैठे जनसंपर्क महकमे के अधिकारियों ने भी एमपी के चीफ मिनिस्टर शिवराज सिंह और केंद्रीय राजमार्ग मंत्री कमल नाथ के बीच मुस्कुराकर बातचीत करने वाले छाया चित्र और खबरें जारी कर दीं। मजे की बात तो यह है कि बारंबार शिवराज सिंह चौहान ने भी कमल नाथ को एक उदार मंत्री होने का प्रमाण पत्र जारी किया है।

बुरदलोई मार्ग स्थित मध्य प्रदेश भवन में पत्रकारों से रूबरू मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जब केंद्र पर भेदभाव का आरोप मढ़ा तब पत्रकारों से शिवराज से पूछा था कि उनके लोक निर्माण विभाग के मंत्री तो कमल नाथ के पक्ष में कोरस गा रहे हैं, तब चिढकर शिवराज ने कहा था कि लोक निर्माण मंत्री क्या वे (शिवराज सिंह चौहान) भी कमल नाथ से मिलते हैं और कमल नाथ मध्य प्रदेश की मदद कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके लोक निर्माण मंत्री द्वारा कांग्रेस नीत संप्रग सरकार में कांग्रेस के कोटे के मंत्री कमल नाथ द्वारा उदार भाव से अपने प्रदेश की भाजपा सरकार को मुक्त हस्त से मदद करने की बात जब फिजा में तैरी तो कमल नाथ की छवि दलगत राजनीति से उपर उठकर मदद करने वाले राजनेता की बन गई।

दिल्ली में हुई इसी पत्रकार वार्ता में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दंभ भरकर कहा था कि केंद्र सरकार सिवनी जिले के साथ भेदभाव कर रही है। सिवनी जिले से होकर गुजरने वाला उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारे का काम भी केंद्र सरकार की गलत नीतियों के कारण ही रूका हुआ है। बाद में जब उनकी जानकारी में यह लाया गया कि काम 18 दिसंबर 2008 को तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि के एक आदेश के तहत रोका गया है, न कि केंद्र सरकार की नीतियों के कारण। तब शिवराज सिंह चौहान ने एसे किसी आदेश के बारे में अनिभिज्ञता ही प्रकट की थी।

बहरहाल कल तक केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की तारीफों में कशीदे गढ़ने वाले मध्य प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री नागेंद्र सिंह को अब अचानक (संगठन के कड़े रूख के उपरांत) दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। अब उन्हें भान हुआ है कि सबसे बड़े ‘‘सियासी जादूगर‘‘ कमल नाथ ने उन्हें अब तक जो सपने दिखाए थे, वे महज छलावा ही थे। सियासत के अखाड़े के स्वयंभू अपराजित अजेय (1997 में उपचुनाव में सुंदर लाल पटवा के हाथों जबर्दस्त पटकनी खाने को छोड़कर) योद्धा कमल नाथ ने एक ही धोबी पाट में प्रदेश की भाजपा सरकार के मंत्रियों को धूल चटवा दी है। अपने पत्र में नागेंद्र सिंह लिखते हैं कि प्रदेश से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गो का रखरखाव पूरी तरह एनएचएआई के हवाले कर दिया जाए या फिर इसके संधारण का काम पूरी तरह से मध्य प्रदेश सरकार को सौंप दिया जाए।

वैसे नागेंद्र सिंह की पीड़ा जायज है। कमल नाथ को लिखे पत्र में उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार द्वारा न तो मई 2010 में केंद्र को भेजे गए राष्ट्रीय राजमार्गों के प्रस्तावों को मंजूरी दी जा रही है, और न ही केंद्र द्वारा खुद ही उसका संधारण किया जा रहा है, नतीजतन ये राजमार्ग बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। नागेन्‍द्र सिंह को चाहिए कि वे इस बात को भी जनता के सामने लाएं कि उन्होंने लोक कर्म मंत्री रहते हुए मध्य प्रदेश की किन किन सड़कों को राष्ट्रीय राजमार्ग में तब्दील करने के प्रस्ताव कंेद्र को भेजे थे।

सियासी गलियारों में इस बात को लेकर भी तरह तरह की चर्चाएं हैं कि क्या कारण था कि बहुत ही कम यातायात दबाव वाले एवं कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा से गुजरने वाले नरसिंहपुर, हर्रई, सिंगोड़ी, छिंदवाड़ा, उमरानाला, सौंसर, सावनेर, नागपुर मार्ग को राष्ट्रीय राजमार्ग में तब्दील करने का प्रस्ताव उनके द्वारा केंद्र सरकार को भेजा गया था? जिस प्रस्ताव पर योजना आयोग ने कम यातायात दबाव के चलते अपना अडंगा लगा दिया है। सियासी जादूगर कमल नाथ ने एक एसा तीर चलाया था, जिसमें भाजपा के कुशाग्र बुद्धि के धनी समझे जाने वाले जनसेवक उलझकर रह गए हैं। राज्य की अनेक सड़कों को राष्ट्रीय राजमाग में तब्दील कराने का प्रस्ताव भेजकर प्रदेश सरकार ने इन सड़कों का संधारण बंद कर दिया था।

राज्य सरकार को लगने लगा था कि ये सड़कें जल्द ही राष्ट्रीय राजमार्ग में तब्दील हो जाएंगी और फिर इनके रखरखाव या निर्माण का सरदर्द केंद्र के भरोसे ही होगा, जिससे इसमें व्यय होने वाले धन से राज्य सरकार पूरी तरह मुक्त होगी। वस्तुतः ऐसा हुआ नहीं, ये सड़कें राष्ट्रीय राजमार्ग में तब्दील नहीं हुई और आज भी ये प्रदेश सरकार की संपत्ति ही हैं। इतना ही नहीं दीगर राष्ट्रीय राजमार्गों का संधारण भी केंद्र द्वारा नही किए जाने से, संधारण के अभाव में इन सड़कों के धुर्रे पूरी तरह से उड़ चुके हैं। आम जनता को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि ये सड़कें किसके स्वामित्व में हैं, वह तो राज्य से गुजरने वाली हर सड़क की दुर्दशा के लिए राज्य सरकार को ही पूरी तरह दोषी मानती है, भले ही केंद्र सरकार द्वारा इसका पैसा नहीं दिया जा रहा हो।

सड़कों बदहाली पर जनता के गुस्से को देखकर भाजपा की शिवराज सिंह के नेतृत्व वाली सरकार बुरी तरह खौफजदा साफ दिखाई दे रही है। यही कारण है कि केंद्र सरकार को घेरने के लिए वह अब राष्ट्रीय राजमार्गों पर जगह जगह नोटिस बोर्ड लगाने का मन बना रही है, जिसमें इस बात का उल्लेख होगा कि इन सड़कों की बदहाली के लिए राज्य की भारतीय जनता पार्टी की सरकार कतई जवाबदार नही है। सूबे की सरकार मान रही होगी कि एसा करके कम से कम इन मार्गों पर चलने वालों को सच्चाई से रूबरू तो करवा ही दिया जाएगा।

जनता को इस बात से कतई लेना देना नहीं है कि सड़कें किसकी संपत्ति हैं, या इसके रख रखाव का जिम्मा किसका है। राज्य सरकार अगर बोर्ड लगा रही है तो फिर राज्य सरकार को उस नोटिस बोर्ड पर इस बात का उल्लेख भी करना चाहिए कि इसका संधारण करने वाला लोक कर्म विभाग का राष्ट्रीय राजमार्ग महकमा मूलतः किस राज्य की सेवा का अंग है। वस्तुतः इसके मातहत मध्य प्रदेश सरकार के कर्मचारी ही होते हैं। कर्मचारी मध्य प्रदेश के जिम्मेदारी केंद्र सरकार की अगर दोनों ही जगह एक दल की सरकार है, तब तो सामंजस्य बना रह सकता है, किन्तु अगर सरकारें अलग अलग दलों की हैं तो फिर सामंजस्य का अभाव निश्चित तौर पर परिलक्षित ही होगा।

सबसे अधिक आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि दीनदयाल उपाध्याय के बताए सिद्धांत पर चलने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी द्वारा अपने ही आदर्श पुरूष और मौखटे की अघोषित संज्ञा पाने वाले तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी योजना स्वर्णिम चतुर्भुज और उसके अंग उत्तर दक्षिण तथा पूर्व पश्चिम गलियारे में फच्चर फंसाने वाली कांग्रेस के मंत्रियों के खिलाफ जनता को दिखाने के लिए तो तलवारें पजा ली जातीं है, पर जब रण में उतरने की बारी आती है तो तलवारें रेत में गड़ाकर शतुर्मुग के मानिंद अपना सर जमीन में गड़ा दिया जाता है।

पूर्व में भारतीय जनता पार्टी की मध्य प्रदेश इकाई द्वारा केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय द्वारा मध्य प्रदेश के साथ किए जाने वाले अन्याय का तराना बजाया था। इसके पहले भाजपा सरकार के ही मंत्री केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ का चालीसा गान कर रहे थे। मध्य प्रदेश से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों पर हस्ताक्षर अभियान, मानव शृंखला और 10 नवंबर को प्रदेश भाजपाध्यक्ष प्रभात झा के नेतृत्व में प्रधानमंत्री से मिलने का कार्यक्रम निर्धारित किया था, जो बाद में ‘अपरिहार्य‘ कारणों से परवान नहीं चढ़ सका।

अब शिवराज सरकार ने कमल नाथ के खिलाफ प्रत्यंचा चढ़ाई है, तरकश से तीर निकालने का स्वांग रचा है। जनता सब कुछ देख सुन रही है, समझ भी रही है। शिवराज सरकार के मंत्री तो आलीशान सरकारी वाहनों में सफर करते हैं। रही बात जनसेवकों की तो उनके लिए भी कथित तौर पर ‘‘उद्योगपति, करोबारी मित्रों‘‘ द्वारा विलासिता वाले वाहनों का प्रबंध कर दिया जाता है। इन वाहनों में चलने वालों को इस बात का किंचित मात्र भी भय नहीं होता है कि धुर्रे उड़ी सड़कों पर वाहन का कचूमर निकल जाएगा। आम जनता अपने गाढ़े पसीने की कमाई से खरीदे गए वाहन को बहुत ही संभाल कर चलाता है, फिर भी बदहाल सड़कें उसे राहत नहीं प्रदान कर पाती हैं।

अब उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारे का ही उदहारण लिया जाए तो इसमें मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में विधानसभा उपाध्यक्ष ठाकुर हरवंश सिंह द्वारा नेशनल हाईवे के गड्ढे भरने के काम का बड़े ही भव्य कार्यक्रम में भूमिपूजन किया। 11 अक्टूबर से चार चरणों में होने वाले थिगड़े लगाने के इस काम को यह भी कहा गया कि इसे दो माह पूर्व ही स्वीकृत करवा लिया गया था। विडम्बना है कि आज 18 दिन बाद भी नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) द्वारा यह कार्य आरंभ नहीं करवाया गया है। भाजपा इस मामले में मौन साधे हुए है, न जाने किस मुहूर्त का इंतजार कर ही है भाजपा।

हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि सियासी दल चाहे अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी, किसी को भी आम आदमी की पीड़ा से कोई लेना देना नहीं है। सभी नेताओं की नैतिकता मानो मर चुकी है। आम आदमी मरता है तो मरता रहे, किन्तु जनसेवा का बीड़ा उठाने वालों को इससे कोई सरोकार नहीं है। भाजपा की एमपी इकाई द्वारा नेशनल हाईवे को लेकर बनाई गई रणनीति के फिस्स हो जाने के बाद अगर शिवराज सरकार की कमल नाथ को घेरने की रणनीति भी औंधे मुंह गिर जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

यहां एक बात का उल्लेख करना भी लाजिमी होगा कि मध्य प्रदेश भाजपा की कमान जब से प्रभात झा ने संभाली है, तब से संगठन में तो जान आती दिख रही है, किन्तु सत्ता और संगठन के बीच गहरी होती खाई अलग ही समझ में आ रही है। भाजपाध्यक्ष बनने के उपरांत प्रभात झा ने 09 मई को संगठन की सत्ता का विकेंदीकरण करने की घोषणा की थी। उन्होंने पार्टी क सह मुख्यालय छिंदवाड़ा, मण्डला और झाबुआ में बनाने की मंशा व्यक्त की थी। विडम्बना ही कही जाएगी कि इस घोषणा को किए हुए छः माह बीतने को हैं, पर अब तक इस दिशा में कोई पहल नहीं हो सकी है। कहा जा रहा है चूंकि इस मामले में भी केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ का संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा जिला होने के कारण मामला ठंडे बस्ते के हवाले हो गया है। माना जा रहा है कि अगर पार्टी का सह कार्यालय छिंदवाड़ा में स्थापित हो जाएगा तो आने वाले दिनों में छिंदवाड़ा जिला भाजपा और छिंदवाड़ा जिला कांग्रेस की जुगलबंदी और नूरा कुश्ती पर विराम लग जाएगा।

आखिर सियासी जादूगर कमल नाथ का आभामण्डल है ही एसा। कमल नाथ का संसदीय क्षेत्र मध्य प्रदेश का छिंदवाड़ा जिला है, वह भी 1980 से। मूलतः व्यवासाई कमल नाथ को इंदिरा गांधी ने अपना तीसरा बेटा कहकर मध्य प्रदेश और छिंदवाड़ा को सौंपा था। तीस सालों में उन्हें मध्य प्रदेश से कितना मोह हुआ है, इस बात का उदाहरण उनके केंद्र में वन एवं पर्यावरण, वस्त्र, वाणिज्य और उद्योग के उपरांत भूतल परिवहन मंत्री बनने से मिलता है। कमल नाथ के मंत्री बनने के उपरांत मध्य प्रदेश की झोली में इन विभागों में क्या क्या आया यह बात किसी से छिपी नहीं है। हालात देखकर हमें यह कहने में कोई संकोच अनुभव नहीं हो रहा है कि केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की सुर और ताल पर मध्य प्रदेश भाजपा थिरक कर रही है।

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1 Comment on "कमल ताल पर थिरकती हृदय प्रदेश की भाजपा"

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श्रीराम तिवारी
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भाई लिमटी खरे जी आप की सूचनाएँ पूर्वाग्रह से मुक्त हुआ करतीं हैं …आलेख में वर्तमान दौर की भाजपाई और कांग्रेस संस्कृति पर पेना कटाक्ष किया है आपने ..धन्यवाद …यह देशभक्तिपूर्ण कार्य है ….

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