लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव-
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चाणक्य ने कहा था, किसी भी देश में न्यूनतम ईमानदार और न्यूनतम ही बेईमान होते है, किंतु जब बेईमानों पर सरकार नकेल कसने में कमजोर पड़ती है या सरकार खुद बेईमान हो जाती है तो देश के ज्यादातर लोड़ बेईमानी का अनुसरण करने लड़ते है। इसी सच्चाई का पर्याय‘ यथा राजा, तथा प्रजा‘ लोकोक्ति है। यूपीए के दस साल के कार्यकाल में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने इतनी ढिलाई बरती कि ज्यादातर लोग बेईमान होने की कड़ी में शामिल होते चले गए। इसीलिए केंद्रीय मंत्री मंडल को अली बाबा चालीस चोर का समूह भी कहा जाने लड़ा था। नेतृत्व परिवर्तन के बाद नरेंद्र मोदी ने कड़े फैसलों के क्रम में एसआईटी का ड़ठन किया तो चंद दिनों में ही कालाधन से पर्दा उठने के हालत निर्मित हो एए। हालांकि एसआईटी सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर वजूद में आई है। लिहाजा कालेधन के खिलाफ भारत की मुहिम को बल देते हुए स्विट्जरलैंड सरकार ने ऐसे संदिग्ध भारतीयों की सूची तैयार कर ली है, जिन्होंने स्विस बैंकों में कालाधन जमा कर रखा है। इस धन की राशि 14 हजार करोड़ रूपए है बताई गई है।
हमारे देश में जितने भी गैरकानूनी काम हैं, उन्हें कानूनी जटिलताएं संरक्षण का काम करती हैं। कालेधन की वापसी की प्रक्रिया भी पूर्व केंद्र सरकार के स्तर पर ऐसे ही हश्र का शिकार रही है। ये सरकार इस धन को कर चोरियों का मामला मानते हुए संधियों की ओट में गुप्त बने रहने देना चाहती है। जबकि विदेशी बैंकों में जमा काला धन केवल करचोरी का धन नहीं है, भ्रष्टाचार से अर्जित काली-कमाई भी उसमें शामिल है। जिसमें बड़ा हिस्सा राजनेताओं और नौकरशाहों और उद्योगपतियों का है। बोफोर्स दलाली, 2 जी स्पेक्ट्रम और राष्ट्रमंडल खेलों के माध्यम से विदेशी बैंकों में जमा हुए कालेधन का भला कर चोरी से क्या वास्ता ? इसीलिए प्रधानमंत्री और उनके रहनुमा कर चोरी के बहाने कालेधन की वापिसी की कोशिशों को अंजाम तक नहीं पहुंचा पाए, क्योंकि नकाब हटने पर सबसे ज्यादा फजीहत कांग्रेसी कुनबे और उनके बरद्हस्त नौकरशाहों की ही होनी थी। वरना, स्विट्जरलैंड सरकार तो न केवल सहयोड़ के लिए तैयार थी, अलबत्ता वहां की एक संसदीय समिति ने तो इस मामले में दोनों देशों के बीच हुए समझौते को मंजूरी भी दे दी थी। यही नहीं, कालाधन जमा करने वाले दक्षिण पूर्व एशिया से लेकर अफ्रीका तक के कई देशों ने भी भारत को सहयोग करने का भरोसा जताया था। लेकिन सरकार कुंडली मारकर बैठी रही। यही वजह रही कि 2013 में यह धन 43 फीसदी और बढ़ गया।

पूरी दुनिया में करचोरी और भ्रष्ट आचरण से कमाया धन सुरक्षित रखने की पहली पसंद स्विस बैंक रहे हैं। क्योंकि यहां खाताधारकों के नाम ड़ोपनीय रखने संबंधी कानून का पालन कड़ाई से किया जाता है। यहां तक की बैंकों के बही खाते में खाताधारी का केवल नंबर रहता हैए ताकि रोजमर्रा काम करने वाले बैंककर्मी भी खाताधारक के नाम से अनजान रहें। नाम की जानकारी बैंक के कुछ आला अधिकारियों को ही रहती है। स्विट्जरलैंड में ऐसे बैंकों की संख्या 283 है, जिनमें 1-6 खरब अमेरिकी डॉलर से भी ज्यादा विदेशीयों का धन जमा है। खाता खोलने के लिए शुरूआती राशि ही 50 हजार करोड़ डॉलर होना जरूरी शर्त है, अन्यथा खाता नहीं खुलेगा। एसोचैम का दावा है कि विदेशी बैंकों में भारतीयों का करीब 20 खरब डॉलर एमसलन 12043 अरब रूपए जमा है। एसोचैम ने कालाधन वापिसी का फॉर्मूला सुझाते हुए कहा है कि सरकार को छह महीने की एमनेस्टी योजना शुरू करनी चाहिए। इसके तहत जमाखोरों को धन पर 40 फीसदी कर भुगतान के साथ ऐच्छिक निधि स्थानांतरण की अनुमति मिलें। 1997 में स्वैच्छिक आय प्रकटीकरण योजना के जरिये भारत सरकार ने 10 हजार करोड़ रूपए जुटाए थे। यह योजना पीपी नरसिंहराव सरकार ने लागू की थी। दरअसल, यह योजना कर चोरी के मामलों में लागू करना तो ठीक है, लेकिन भ्रष्टाचार से अर्जित धन पर लागू करना कतई उचित नहीं है।

मनमोहन सरकार इस मामले को कर चोरी और दोहरे कराधान संधियों का हवाला देकर टालती रही। दरअसल, इस मामले ने तूल पकड़ लिया होता तो यूपीए सरकार 2014 के आम चुनाव के पहले ही गर्त में चली गई होती। इसलिए सरकार बहाना बनाती रही कि खाताधारियों के नाम सार्वजनिक करने के लिए चल रहे करारों को बदलना होड़ा। किंतु हकीकत इसके विपरीत थी। सरकार का रूख काले धन की वापसी के लिए साफ नहीं था। यह इस बात से जाहिर होता है कि भारत और स्विट्जरलैंड के बीच दोहरे कराधान संशोधित करने के लिए संशोधित प्रोटोकॉल संपादित पहले ही हो चुका था। लेकिन इस पर दस्तखत करते वक्त भारत सरकार ने कोई ऐसी शर्त पेश नहीं की जिससे काले धन की वापिसी का रास्ता खुलता। जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संपन्न होने वाले ऐसे किसी भी दोहरे समझौते में राष्ट्रीय हित सर्वेपरी होते हैं। दुनिया में 77-6 प्रतिशत काली कमाई ट्रांसफर प्राइसिंग (संब) पक्षों के बीच सौदों में मूल्य अंतरण) के जरिए पैदा हो रही है। इसमें एक कंपनी विदेशों में अपनी सहायक कंपनी के साथ सौदों में 100 रू- की एक वस्तु की कीमत 1000 रू- या 10 रू- दिखाकर करों की चोरी और धन की हेराफेरी करती है। भारत में संब) फर्मां के बीच इस तरह के मूल्य अंतरण में हेराफेरी रोकने का प्रयास 2000 के आसपास वजूद में आने लड़ा था, पर मनमोहन सरकार ने इन नियमों को कड़ा करके इन्हें अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की कोशिश ही नहीं की। लिहाजा कालेधन की वापिसी तो संभव नहीं हुई, लेकिन विदेशों में जमा होने की तरलता बनी रही।
भ्रष्टाचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र ने एक संकल्प 2003 में पारित किया था। जिसका मकसद ड़ैरकानूनी तरीके से विदेशों में जामा कालाधन वापिस लाना था। इस संकल्प पर भारत समेत 140 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। यही नहीं 126 देशों ने तो इसे लाड़ू कर कालाधन वसूलना भी शुरू 2003 से ही कर दिया था। लेकिन भारत सरकार इसे टालती रही। उसने इस संकल्प के सत्यापन पर आखिरकार 2005 में जाकर हस्ताक्षर किए। स्विट्जरलैंड के कानून के अनुसार कोई भी देश संकल्प को सत्यापित किए बिना विदेशों में जमा धन की वापिसी की कार्रवाई नहीं कर सकता था। हालांकि इसके बावजूद स्विट्जरलैंड सरकार की संसदीय समिति ने इस मामले में भारत सरकार के प्रति उदारता बरतते हुए दोनों देशों के बीच हुए समझौते को मंजूरी 2005 में ही दे दी थी। इससे जाहिर होता है कि स्विट्जरलैंड सरकार भारत का सहयोड़ करने को तैयार था, लेकिन मनमोहन सरकार ही मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं जता पाई थी। जैसी की अब मोदी सरकार ने जताई है।

हालांकि दुनिया के तमाम देशों ने कालेधन की वापसी का सिलसिला 5-6 साल पहले ही शुरू कर दिया था। इसकी पृष्ठभूमि में दुनिया में 2008 आई आर्थिक मंदी थी। इसने दुनिया की आर्थिक महाशक्ति माने जाने वाले देश अमेरिका की भी चूलें हिलाकर रख दी थीं। मंदी के काले पक्ष में छिपे इस उज्जवल पक्ष ने ही पश्चिमी देशों को समझाया कि काला धन ही उस आधुनिक पूंजीवाद की देन हैए जो विश्वव्यापी आर्थिक संकट का कारण बना। 9/11 के आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका की आंखें खुलीं कि दुनिया के नेताए नौकरशाह, कारोबारी और दलालों का गठजोड़ ही नहीं, आतंकवाद का पर्याय बना ओसामा बिन लादेन भी अपना धन खातों को गोपनीय रखने वाले बैंकों में जमा कर दुनिया के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
नतीजतन पहले जर्मनी ने ‘वित्तीय गोपनीय कानून’ शिथिल कर कालाधन जमा करने वाले खाताधारियों के नाम उजाड़र करने के लिए स्विट्जरलैंड पर दबाव बनाया। फिर इस मकसद पूर्ति के लिए इटली, फ्रांस, अमेरिका एवं ब्रिटेन आड़े आए। अमेरिका की बराक ओबामा सरकार ने स्विट्जरलैंड पर इतना दबाव बनाया कि वहां के यूबीए बैंक ने कालाधन जमा करने वाले 17 हजार अमेरिकियों की सूची तो दी ही 78 करोड़ डॉलर काले धन की वापसी भी कर दी। अब तो मुद्रा के नकदीकरण से जूझ रही पूरी दुनिया में बैंकों की गोपनीयता समाप्त करने का वातावरण बनना शुरू हो चुका है। इसी दबाव के चलते स्विट्जरलैंड सरकार ने कालाधन जमा करने वाले देशों की सूची जारी की है। स्विस बैंक इस सूची को जारी करने में देर कर भी सकता था, लेकिन इसी बैंक से सेवा निवृत्त हुए कर्मचारी रूडोल्फ ऐल्मर ने यह सूची की सीडी चुरा ली थी। इस सूची में दो हजार भारतीय खाताधारियों के नाम दर्ज हैं।

हालांकि अब संयुक्त राष्ट्र को ऐसी पहल करनी चाहिए जिससे विकसित देशों के बैंकों में कालाधन जमा करने पर पाबंदी लड़े। क्योंकि भारत जैसे गरीब व विकासशील देशों से जब भ्रष्ट्राचार के रूप में अर्जित कालाधन बाहर जाता है तो देश में गरीबी और असमानता बढ़ती है। देर से ही सही, यदि मोदी सरकार धन वापस लाने में सफल होती है तो आर्थिक तंगी से जूझ रहे भारत की तस्वीर बदलने में इस धन से मदद मिलेगी।

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