लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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आर्थिक तरक्की के मामले में नए मुकाम बननाने का दावा करने वाला भारत आज भ्रष्टाचार, घोटालो, और काले धन के मामले में नित नये नये कीर्तिमान बना रहा है। आज माननीय उच्च न्यायालय, हमारी सरकार, देश के वरिष्ठ अर्थशास्त्री, प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, सरकारी नुमाईन्दे व विपक्ष सहित पूरा भारत काले धन की समस्या से चिंतित है कि आखिर किस प्रकार इस समस्या से निबटा जाये साथ ही सरकार द्वारा इस मसले पर भी जोर आजमाईश की जा रही है की आखिर सरकार उन लोगो के नामो को किस प्रकार सार्वजनिक करे जिन भारतीयो के नाम विदेशी बैंको में कुबेर का खजाना जमा है। पर इस सब के साथ ही सरकार के सामने इक बडी चिंता ये भी आ रही है कि भारत का सकल घरेलू उत्पाद ब रहा है, देश भी संपन्न हो रहा है पर देश का एक बडा वर्ग निरंतर गरीब होता जा रहा है दाने दाने को मोहताज होता जा रहा है। कल कारखानो में कर्मचारियो की छटनी हो रही है देश के कर्णधार नौजवान डिग्री लिये एक आफिस से दूसरे आफिस नौकरी के लिये चक्कर काट रहे है हर जगह नोवेकंसी का बोर्ड लगा है। देश में संसाधन बे है हम मजबूत हुए है फिर भी ऐसा आखिर ऐसा क्यो हो रहा है। देश के बडे बडे अर्थशास्त्री सोच सोचकर परेशान है। दरअसल इस मुद्दे पर देश के कुछ प्रभावशाली अर्थशास्त्रीयो का ये मानना है कि देश के कुछ प्रभावशाली और भष्ट लोगो ने देश का एक बडा धन विदेशी बैंको में जमा करा रखा है। जिस पैसे से भारत तरक्की करता, कल कारखाने तरक्की के गीत गाते, जिस पैसे से स्वास्थ्य सेवाए देशवासियो को मिलती, ग्रामीण इलाको में सडको का जाल बुना जाता आज वो पैसा स्विस बैंक की कालकोठरी में बंद है और सरकार चुप है। राष्ट्र संघ में इस मुद्दे पर वर्षो चर्चा हुई पर नतीजा कुछ नही।
माननीय उच्चतम न्यायालय ने पिछले दिनो काला धन मामले में केन्द्र सरकार के ुलमुल रवैये पर सख्त एतराज जताते हुए कहा था की विदेशी बैंको में जमा काला धन राष्ट्रीय सम्पत्ति की लूट है। इस के साथ ही माननीय उच्चतम न्यायालय ने विदेशी बैंको में जमा काले धन का स्रोत, हथियार सौदो और मादक पदार्थो की तस्करी से देश को हो रहे नुकसान पर चिंता जताई। एक नई रिर्पोट के मुताबिक वष 2000 से 2008 के दौरान 104 अरब डालर(करीब 4680अरब रूपये)काला घन भारत से बाहर भेजा गया और इस के साथ ही काला धन विदेश भेजने वाले एशियाई देशो की सूची में भारत का स्थान पॉचवा थां। मात्र 35 हजार की आबादी और 61.8 वर्गमील की परिधि वाला देश लिश्टेन्स्टाइन दुनिया की अर्थ व्यवस्था को चूसने की पूरी ताकत रखता है। स्विट्जरलैंड और आस्ट्रिेया के बीच बसे भारत के किसी कस्बे से भी छोटे इस देश के राजा ॔॔प्रिंस एलोइस’’ एलटीजी बैंक के संचालक है। यहा का पर्यटन कार्यलय ही पर्यटक को पासपोर्ट पर मात्र दो फ्रांक(लगभग 96 रूप्ये)लेकर वीजा लग देता है। आप यहा अपने साथ लाया कितना भी धन लिश्टेन्स्टाईन प्रिंसपलिटी के बैंको में सुरक्षित जमा कर सकते है। यहॉ किसी भी व्यक्ति द्वारा लाये गये पैसे का स्रोत नही पूछा जाता। अगर आप इस धन को अपने नाम जमा नही करना चाहे तो आप इसे मात्र 0.1 प्रतिशत के मामूली ट्रांसफर चार्ज पर आप बेनामी ंग से शाही परिवार के हवाले भी कर सकते है। जिस की निकासी इसी चार्ज पर कही भी संभव है। आयकर इतना मामूली है कि दुनिया भर के प्रभावशाली और भष्ट लोग यहा भागे चले आते है। इस कस्बेनुमा देश की बस ये ही हकीकत और इतनी सी कहानी है यहॉ पैसे की खेती होती है और पैसे की फसल काटी जाती है ये ही इस छोटे से देश का फंडा है जिस में आज बडे बडे देश उलझे है।
ग्लोबल फिनांशियल इंटेग्रिटी वाशिंगटनडीसी आधारित एक संस्था है। यह संस्था अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली में पारदिशर्ता को बावा देने के मकसद से अनुसंधान करती है और सुझाव भी देती है। इस संस्था द्वारा किए गये अध्यन के मुताबिक 2000 से 2008 के बीच नौ वर्षो में एशिया के जिन देशो ने सब से ज्यादा काला धन विदेश भेजा है उन में पहले पॉच देश है मलेशिया, भारत, चीन, इंडोनेशिया, फिलीपींस के नाम शामिल है। संस्था की रिपोंर्ट के मुताबिक इन नौ सालो में चीन ने 2.2 खरब डॉलर, मलेशिया ने 291 अीब डॉलर, फिलीपींस ने 109 अरब डॉलर, इंडोनेशिया ने 104 अरब डॉलर विदेश भेजे। वही इस रिपोर्ट में कहा गया कि भारत ने भी इंडोनेशिया के बराबर काला धन विदेश भेजा। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि औसतन एशिया से जितना काला धन विदेश भेजा जाता है उस का 95.5 प्रतिशतइन्ही पॉच देशो का होता है। यदि सभी विकासशील देशो द्वारा भेजे जाने वाले कुल काले धन के संदर्भ में देखे तो उस में इन पॉच देशो का हिस्सा करीब 44.9 प्रतिशत ठहरता है। हालांकि विकासशील देशो द्वारा भेजे जाने वाले कुल धन के संदर्भ में इन अव्वल पॉच देशो की हिस्सेदारी में गिरावट देखाी जा रही है। इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि वर्ष 2000 में इन पॉच देशो की हिस्सेदारी 53.3 प्रतिशत थी, लेकिन आठ वर्ष बाद 2008 में ये हिस्सेदारी 36.9 प्रतिशत दर्ज की गई। वही स्विस बैंक एसोसिएशन की वर्ष 2006 की रिर्पोट के अनुसार चीन, रूस, भारत, ब्रिटेन, युक्रेन केवल इन पॉच देशो के लोगो द्वारा स्विस बैंक में 251.2 करोड डालर जमा कराया गया है जिन में से केवल भारत के प्रभावशाली और भ्रष्ट लोगो का 145.6 करोड डालर इस बैंक में जमा है।
भारत का इतना अधिक धन विदेशी बैंको में जमा है और मौजूदा सरकार खामोश है। पिछले दिनो घोडा फार्म मालिक हसन अली के दस विदेशी बैंक खातो का पता चला था। जिस पर सरकार ने हसन अली पर पचॉस हजार करोड रूपये की आयकर देनदारी निकाली थी कुछ छापे भी डाले गये थे। पर कुछ बडे नेताओ के उन से संबध निकल आये और मामला दबा दिया गया। सरकार के शीर्ष नेताओ और देश के प्रधानमंत्री की ईमानदरी पर किसी को शक नही, लेकिन सरकार भ्रष्टाचार और काले धन के मामले में क्यो रक्षात्मक नजर आती है। लूट के इस धन का बहुत सा भाग जिस स्विस बैंको में जमा है उस के प्रतिनिधि ने राष्ट्रसंघ में घोषणा की कि वह यह धन वापस करना चाहता है पर मनमोहन सरकार इस संबध में कोई उचित कार्यवाही करने को तैयार ही नही है आखिर क्यो ?।

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