लेखक परिचय

पियूष द्विवेदी 'भारत'

पीयूष द्विवेदी 'भारत'

लेखक मूलतः उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के निवासी हैं। वर्तमान में स्नातक के छात्र होने के साथ अख़बारों, पत्रिकाओं और वेबसाइट्स आदि के लिए स्वतंत्र लेखन कार्य भी करते हैं। इनका मानना है कि मंच महत्वपूर्ण नहीं होता, महत्वपूर्ण होते हैं विचार और वो विचार ही मंच को महत्वपूर्ण बनाते हैं।

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blackmoneyपीयूष द्विवेदी
विगत दिनों योगेन्द्र यादव और प्रशान्त भूषण की एक प्रेस कांफ्रेंस में ऑनलाइन वार्ता के जरिये स्विट्ज़रलैंड के जिनेवा स्थित एचएसबीसी बैंक के व्हिसल ब्लोवर हर्व फाल्सियानी द्वारा दावा किया गया कि भारत से अब भी बड़ी मात्रा में काला धन विदेश भेजा जा रहा है जबकि पहले से जमा काले धन को लेकर भी सरकार अभी बहुत संजीदा नहीं दिख रही। उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास इस सम्बन्ध में तमाम सूचनाएं हैं जिन्हें वे भारत सरकार से साझा कर सकते हैं बशर्ते कि सरकार उन्हें सुरक्षा उपलब्ध कराए। ज्ञात हो कि हर्व फाल्सियानी पर जिनेवा के एचएसबीसी बैंक में काला धन जमा करने वालों की सूची सार्वजनिक करने का आरोप है। इसी कारण वे भारत सरकार से सुरक्षा मुहैया कराने की मांग कर रहे थे। अब एक तरफ फाल्सियानी यह सब कह रहे थे तो वहीँ दूसरी तरफ केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा ‘नेटवर्किंग द नेटवर्क’ विषय पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए काले धन पर उठाए क़दमों की बात की जा रही थी। जेटली ने कहा कि काले धन पर की जा रही कार्रवाई से वे संतुष्ट हैं और इसका असर अगले कुछेक वर्षों में देश के सामने आएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दुनिया एक दूसरे से सूचनाएं साझा करने के जरिये अब ऐसी व्यवस्था की ओर अग्रसर है जिसमे कि आप एक देश से दूसरे देश में अवैध धन को गुप्त तरीके से छुपाकर बच नहीं सकते। गौरतलब है कि विगत वर्ष ऑस्ट्रेलिया में जी-२० देशों की बैठक में सभी देशों ने २०१७-१८ से सूचनाओं के स्वतः आदान-प्रदान के लिए सहमति जताई थी। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसी बैठक में काले धन का मुद्दा भी उठाया गया था। इसके बाद अब ९० देश व स्वायत्त क्षेत्र सूचनाओं के आदान-प्रदान करने को तैयार हो गए हैं। स्पष्ट है कि इसी अंतर्राष्ट्रीय समझौते के आलोक में केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा काले धन से सम्बंधित उक्त बातें कही गईं।
इसी क्रम में अगर ये समझने का प्रयास करें कि आखिर काला धन है क्या तो उल्लेखनीय होगा कि वो धन जो किसी लूट, डकैती, रिश्वतखोरी, अवैध तश्करी आदि गैरकानूनी तरीकों से अर्जित किया गया हो, काला धन कहलाता है। अब चूंकि आय की स्रोत बी बताए जा सकने के व टैक्स भरने से बचने के कारण सबंधित व्यक्तियों द्वारा काले धन की जानकारी आयकर विभाग को नहीं दी जाती हैं। ऐसे में, इस धन को आयकर विभाग की नज़रों से बचाने का सबसे सुरक्षित स्थान विदेशी बैंक होते हैं। सो, अधिकाधिक काले धन के स्वामी अपना धन विदेशी बैंकों में जमा करवा देते हैं। अब विदेशी बैंकों में भारत का कुल कितना धन जमा है, इसपर जितने लोग हैं उतनी ही बाते हैं। लेकिन सही मायने में देश आज भी इस बात से अनभिज्ञ है कि देश का कितना पैसा विदेशी बैंकों में काले धन के रूप में जमा है ?
बहरहाल, अब सवाल यह उठता है कि अगर सरकार काले धन पर वाकई में इतनी गंभीर है तो फिर फाल्सियानी की इस बात में कितनी सच्चाई है कि देश से अब भी काला धन विदेशों में भेजा जा रहा है ? इस सवाल पर विचार करें तो फाल्सियानी की बातों में सच्चाई की पूरी संभावना दिखती है। क्योंकि अभी सरकार राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काले धन की रोकथाम के लिए व्यवस्था निर्मित करने की दिशा में काम कर रही है, न कि व्यवस्था निर्मित होकर काम करना शुरू कर चुकी है। लिहाजा अभी अगर फाल्सियानी यह कहते हैं कि देश से भारी मात्रा में काला धन विदेशों में जा रहा है तो इससे इंकार करने की कोई बड़ी वजह नहीं दिखती। अब काले धन की रोकथाम की अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्थाओं को तो भारत सरकार अकेले लागू नहीं कर सकती, इसके लिए अन्य देशों से भी सहमति बनानी होती है जिसमे कि समय लगना स्वाभाविक है। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर काले धन की निगरानी के लिए व्यवस्था बनाना भारत सरकार के हाथ में है। संतोषजनक यह है कि सरकार इस दिशा में काले धन पर क़ानून बनाने से लेकर आयकर विभाग की निगरानी प्रणाली को और दुरुस्त करने जैसी प्रयास कर भी रही है, लेकिन अब जरूरत ये है कि ये प्रयास सिर्फ कागजों तक न रह जाएं वरन यथाशीघ्र उनके समुचित क्रियान्वयन की तरफ भी बढ़ा जाय।
गौरतलब है कि सत्ता में आने के बाद से अबतक अगर भाजपा किसी मुद्दे पर सर्वाधिक रूप से विपक्ष के निशाने पर रही है तो वो मुद्दा काला धन ही है। चूंकि कहीं न कहीं भाजपा ने आम चुनावों के दौरान काले धन के मुद्दे का एक हद तक राजनीतिक इस्तेमाल किया, पर इसमें बहुत चकित होने की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि, भारतीय राजनीति में ये अक्सर होता रहा है कि चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा कहा कुछ जाता है और सत्ता में आने के बाद किया कुछ जाता है। यह भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का एक अकाट्य कु-तथ्य है। इसे गलत कह सकते हैं, पर चाहकर भी इससे मुँह नहीं मोड़ा सकते। और इसी व्यवस्था की उपज होने व इसीमे पालित-पोषित होने के कारण कोई भी दल इससे अछूता नहीं है, भाजपा भी नहीं। हालांकि इस बात के बावजूद काले धन के मसले पर अगर गौर करें तो मौजूदा भाजपानीत राजग सरकार की कार्यशैली पिछली संप्रग सरकार से अधिक विश्वसनीय और स्पष्ट सोच वाली नज़र आती है। इसी सन्दर्भ में अगर एक संक्षिप्त दृष्टि डालें कि भाजपा द्वारा सत्ता में आने के बाद से काले धन पर क्या किया गया है तो स्पष्ट होता है कि उसने काले धन के मसले पर चुनाव के दौरान जो वादे किए थे, उनको पूरा करने की दिशा में कई कदम भी उठाए हैं। मसलन, मोदी सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा काले धन पर विशेष जांच दल (एस आई टी) गठित करने के निर्देश पर मुहर लगाकर उसका गठन कर दिया गया था। जबकि कांग्रेसनीत संप्रग-२ सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम दौर तक सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश को मानने से बचती रही। भाजपा सरकार के ही कार्यकाल के दौरान सभी नहीं तो कुछ ही सही, विदेशी खाताधारकों के नाम भी सार्वजनिक किए गए। इसके अतिरिक्त काले धन पर ‘कालाधन (अघोषित विदेशी आय और आस्ति) कर अधिरोपण कानून-२०१५’ बनाने का काम भी इसी सरकार द्वारा किया गया है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न कर संधियाँ जिनके अमल में आने के बाद अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक आवागमन में काफी हद तक पारदर्शिता आने की संभावना है, पर भी विचार-विमर्श शुरू हुआ। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि काले धन पर सरकार ने कदम तो उठाए हैं, लेकिन अभी इस दिशा में और भी बहुत कुछ करने की ज़रूरत है।

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