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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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संतोष कुमार मधुप

भारतीय राजनीति में सबसे लंबा चलने वाले प्रकरणों में से एक बोफोर्स मामला एक बार फिर कांग्रेस के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। टी. वी. के मेगा सिरियल की तरह इस मामले में नित नए मोड आ रहे हैं। पिछले 25 सालों से कांग्रेस के लिए सिर दर्द पैदा कर रहा यह मामला कब तक चलेगा यह कहना किसी के लिए भी संभव नहीं होगा। वर्ष 2009 में जब केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार ने बोफोर्स मामले से संबंधित सभी कानूनी प्रक्रिया रोक दी थी तो लगा था कि भारतीय राजनीति को बोफोर्स मामले से छुटकारा मिल गया, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कांग्रेस अभी ठीक से राहत की साँस ले भी नहीं पाई थी कि बोफोर्स का जिन्न एक बार फिर बोतल के बाहर निकल आया। आयकर विभाग के अपील ट्रिब्यूनल ने अचानक यह सनसनीखेज खुलासा कर कांग्रेस की मुश्किलें बढा दी कि बोफोर्स तोप सौदे में इटली के व्यापारी ओतावियो क्वात्रोची को 41 करोड़ रुपये की रिश्वत दी गई थी और इस रकम का एक हिस्सा पनामा के एक बैंक में जमा किए गए। जाहिर है, इस खुलासे से विपक्ष में नया उत्साह पैदा हो गया जो भ्रष्टाचार के मुद्दों पर पहले से ही कांग्रेस को घेरने में कामयाब हो चुका था। मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी तो इस खुलासे के बाद कांग्रेस पर टूट पड़ी। भाजपा के नेता इस मामले में सीधे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को घेरने की फिराक में दिखे। उन्होंने सीधे तौर पर बोफोर्स मामले के तार गांधी परिवार से जोड़ते हुए सच्चाई सामने लाए जाने की मांग कर डाली। दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के आरोपों से बूरी तरह घिरी कांग्रेस के लिए बोफोर्स मामला एक अप्रत्याशित संकट के रूप में सामने आया। बोफोर्स मामले में अदालती कार्रवाई पर रोक लगा कर कांग्रेस लगभग इस मामले से छुटकारा हासिल कर चुकी थी लेकिन आयकर के खुलासे के बाद कांग्रेस की परेशानियां और ज्यादा बढ़ गई। हालाकि कांग्रेस शुरु से ही बोफोर्स मामले में खुद को पाक साफ बताती रही है। कुछ दिन पूर्व कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी से जब बोफोर्स के बारे में एक सवाल किया गया तो उन्होंने खिन्न होकर कहा था कि बोफोर्स को लेकर माफी मांगने का सवाल ही नहीं उठता। मैं कभी भी माफी नहीं मांगूंगा। सच तो यह है कि जिस कांड ने राहुल गांधी के दिवंगत पिता की छवि को दागदार बना दिया उससे वे इतनी आसानी से पल्ला नही झाड सकते। आयकर ट्रिब्यूनल के खुलासे से यह जाहिर हो चुका है कि बोफोर्स का भूत आसानी से कांग्रेस का पीछा नहीं छोड़ने वाला। ट्रिब्यूनल के खुलासे के बाद उस वक्त स्थिति और जटिल हो गई जब सीबीआई कहा कि इस खुलासे में नया कुछ भी नहीं है। जैसा कि ज्ञात है कि सीबीआई ने सबूतों के अभाव में क्वात्रोची के खिलाफ मामला वापस ले लिया था। भाजपा जब सत्ता में थी तब लंदन के एक बैंक में क्वात्रोची का एकाउन्ट जब्त किया गया था। लेकिन यूपीए सरकार ने सत्ता में आते ही क्वात्रोची का वह एकाउंट यह कहते हुए दोबारा चालू कर दिया कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप सही साबित नहीं हुए। लेकिन जब आयकर ट्रिब्यूनल के खुलासे के बाद सीबीआई ने यह कहा कि इसमे नया कुछ भी नहीं है तो स्वाभाविक तौर पर यह सवाल उठने लगा कि क्या सीबीआई को यह पता था कि क्वात्रोची को बोफोर्स कंपनी की ओर से 41 करोड़ रुपये रिश्वत दिए गए थे और क्या यह जानते हुए भी सीबीआई ने क्वात्रोची के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं मिलने की बात कह कर मामला वापस ले लिया था? सवाल यह भी है कि यूपीए सरकार ने किस आधार पर क्वात्रोची के खिलाफ अदालती मामलों पर रोक लगा दी। शायद इस तरह के सवालों के कारण ही बोफोर्स मामले के तार सीधे 10 जनपथ से जुड जाते हैं। जो लोग इस मामले के तार 10 जनपथ से जोड़ते हैं उनका यह भी कहना है कि क्वात्रोची सिर्फ सोनिया गांधी के हम वतन ही नहीं हैं बल्कि राजीव और सोनियां से उनके करीबी संबंध रहे हैं। दलाली क्वात्रोची का पेशा है लेकिन बोफोर्स सौदे से पहले अस्त्र-शस्त्र की खरीद बिक्री का उसे बिल्कुल अनुभव नहीं था। तो क्या बोफोर्स कंपनी ने राजीव-सोनियां से करीबी रिश्तों के कारण ही क्वात्रोची को दलाल नियुक्त किया? कांग्रेस सरकारों की ओर से क्वात्रोची को क्लीन चिट देने के प्रयास भी क्या इसी रिश्ते का परिणाम है?

हालांकि कांग्रेस इस तरह के सवालों से निरुत्तर नहीं होना चाहती। कांग्रेस का यह तर्क हो सकता है कि यदि यह मान भी लिया जाये कि बोफोर्स कंपनी की ओर से क्वात्रोची को रिश्वत दी गई थी तो भी इसे भ्रष्टाचार नहीं कहा जा सकता। क्योंकि इस तरह के सौदों में कमीशन का लेन-देन लाजिमी है। क्वात्रोची के माध्यम से रिश्वत की रकम राजीव गांधी या कांग्रेस के किसी अन्य नेता तक पहुंची थी जिसकी एवज में तत्कालीन सरकार ने बोफोर्स के साथ तोप खरीदने का सौदा किया इस बात के कोई प्रमाण नहीं है। कांग्रेस का यह भी कहना है कि लगातार छः सालों तक सत्ता में रही भाजपा ने अपने कार्यकाल में बोफोर्स मामले का रहस्य उजागर करने की कोशिशें क्यों नहीं की? भाजपा ने इस तरह की कोशिशें नहीं की यह कहना ठीक नहीं होगा। भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने बोफोर्स मामले की तह तक पहुंचने की कोशिशें जरूर की लेकिन वह एक सीमा से आगे नहीं बढ पाई। उस दौरान मलेशिया में मौजूद क्वात्रोची को भारत लाए जाने तमाम प्रयास किए गए लेकिन क्वात्रोची के भारत प्रत्यर्पण संबंधी आवेदनों को मलेशिया की अदालतों ने खारिज कर दिया। कुछ समय बाद क्वात्रोची दक्षिण दक्षिण अमेरिका में पाए गए। वहां से भी उन्हें भारत लाने की कोशिशें हुई लेकिन कानूनी जटिलताओं के चलते यह संभव नहीं हो सका। एनडीए के शासनकाल में सीबीआई ने इस मामले में जो चार्जशीट दाखिल किया था उसमे कुछ चौकाने वाले तथ्य सामने आए थे। क्वात्रोची की संस्था ‘ए-ई सर्विेसेस’ को बोफोर्स के लिए कमीशन मिले यह सुनिश्चित करने के लिए सरकारी अधिकारियों ने एक ही दिन में जरूरी फाईल तैयार कर दिया था और उस फाईल पर खुद प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने हस्ताक्षर किए थे जो उस समय रक्षामंत्री भी थे। लेकिन इससे भी यह प्रमाणित नहीं होता कि रिश्वत के पैसे राजीव गांधी तक पहुंचे थे या वे रिश्वत लेकर बोफोर्स से सौदा करने को राजी हुए थे। यह साबित करना आसान नहीं है क्योंकि बोफोर्स तोप खरीदने का अंतिम फैसला सैन्य अधिकारियों का थाऔर बोफोर्स से खरीदे गए तोपों की गुणवत्ता को लेकर भी कभी शंका उत्पन्न नहीं हुई।

अब सवाल यह है कि बोफोर्स का भूत पिछले 25 सालों से कांग्रेस का पीछा क्यों कर रहा है? कहने वाले यह भी कहते हैं कि सोनिया गांधी को परेशानी में डालने के लिए इस मुद्दे को इतना तूल दिया जा रहा है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि आज के दौर में जब हजारों करोड़ के वारे-न्यारे हो रहे हैं ऐसे में 65 करोड (बोफोर्स घोटाले की कुल राशि) की हेरा-फेरी के लिए इतना हो-हल्ला क्यों? उनका यह भी कहना है कि 65 करोड का पता लगाने के लिए भारत सरकार पिछले 25 सालों में 200 करोड से ज्यादा खर्च कर चुकी है। लेकिन सवाल सिर्फ 65 करोड़ का नहीं है। रिश्वत कहें या कमीशन लेकिन बोफोर्स तोप सौदे में पैसे का लेन-देन हुआ था इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। बोफोर्स मामले में हेरा-फेरी की खबर सबसे पहले स्वीडन के रेडियो ने प्रसारित की थी। उसके बाद भारतीय मीडिया ने इस मामले की तह तक जाने की कोशिशें शुरु की तो पैसे पाने वालों में क्वात्रोची के अलावा बिन चड्ढा व हिंदुजा बंधुओं के नाम भी शामिल हो गए।

इस मामले में अंतर्राष्ट्रीय जटिलताओं से पार पाकर सच को सामने लाना बेहद मुश्किल काम है। लेकिन दूसरी तरफ इस मामले की हकीकत जानना भारतवासियों का अधिकार है। जिस मामले ने प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही समय बाद राजीव गांधी की छवि को करारा आघात पहुंचाया और जिसके चलते चुनाव में उनकी हार हुई उस मामले को मामूली मानकर उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोरता से पेश आने के दावे कर रही केंद्र की यूपीए सरकार को इस मामले से खुद को बचाने के बजाए सच्चाई सामने लाने की कोशिश करनी चाहिए।

* लेखक पत्रकार हैं।

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