लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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dayanandमनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।
ऋषि दयानन्द का पं. लेखराम रचित जीवन चरित पढ़ते समय एक बार हमारी दृष्टि में यह तथ्य आया कि स्वामी दयानन्द मथुरा में गुरु विरजानन्द सरस्वती से सन् 1863 में दीक्षा लेकर आगरा आकर प्रचार कर रहे थे और वहां उन्हें मूल वेदों की आवश्यकता पड़ी थी। उन्होंने अपने निकटस्थ पण्डित सुन्दर लाल व पं. चेतो राम जी से वेद उपलब्ध कराने को कहा था। यह दोनों पण्डित प्रयास कर कहीं से वेद के कुछ पत्रे लाये जिसे ऋषि दयानन्द ने देखा और कहा कि यह थोड़े हैं। इनसे काम नहीं चलेगा। हम कहीं जाकर स्वयं ले आयेंगे। उसके बाद वह वेदों की खोज व प्राप्ति के लिए आगरा से 58 किमी. दूरी पर स्थित धौलपुर गये थे। ऐसा अनुमान है कि उनको वहां अधूरे अथवा पूर्ण वेद प्राप्त हो गये थे। इस प्रकार से कुछ तथ्य सामने आने पर हमारे अन्दर यह जिज्ञासा हुई कि ऋषि को प्राप्त हुए वेद कितने रहे होंगे व क्या वह छपे हुए थे या कि हस्तलिखित। यह वेद उन्हें, कब, किससे व कहां प्राप्त हुए थे? हमें इसका उत्तर नहीं मिल रहा था। हमने यह भी विचार किया था कि 31 अक्तूबर सन् 1883 को ऋषि की मृत्यु होने पर उनके द्वारा संग्रहीत ग्रन्थों की अवश्य कोई सूची बनी होगी। यदि वह कहीं उपलब्ध हो जाये तो उससे कुछ सहायता मिल सकती है। इसके लिए हमने परोपकारिणी सभा के पुस्तकालय में फोन पर भी जानकारी ली थी और इमेल पर जानकारी मांगी परन्तु ऋषि द्वारा संग्रहीत ग्रन्थों की सूची वा जानकारी उपलब्ध न हो सकी। कुछ दिन पहले हम पं. युधिष्ठिर मीमांसक कृत ‘ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों का इतिहास’ ग्रन्थ का अवलोकन कर रहे थे तो अनायास पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी के इस विषय में लिखे शब्दों पर हमारी दृष्टि गई। वहां इस सूची की प्राप्ति दो स्थानों का उल्लेख है जिसमें से एक वेदवाणी का मार्च, 1982 का अंक है जिसमें पण्डित मीमांसक जी ने इस सूची को प्रकाशित किया था। हमने अपने विगत 45 वर्षों में अपनी अल्प सामथ्र्यानुसार आर्यसामाजिक जीवन में आर्यसमाज के साहित्य को संग्रहीत कर अध्ययन करने का प्रयास किया है। हमें लगा कि वेदवाणी का यह अंक हमारे पास होना चाहिये। ढूंढने पर हमें यह प्राप्त हो गया। इससे जो प्रसन्नता हुई वह अवर्णनीय थी।

वेदवाणी का मार्च 1982 ई. अंक ‘ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज से संबद्ध महत्वपूर्ण अभिलेख’ विषयक विशेषांक का भाग 2 है। इस विशेषाक की विषय सूची के क्रमांक 4 पर ऋषि दयानन्द द्वारा संगृहीत हस्तलिखित तथा मुद्रित पुस्तकें वेदवाणी के पृष्ठ संख्या 94 से आरम्भ होकर 104 तक 11 पृष्ठों में है। पत्रिका के अन्दर लेख का शीर्षक है ‘ऋषि दयानन्द के द्वारा संगहीत हस्तलिखित तथा मुद्रित पुस्तक जो उनके निधन के समय विद्यमान थीं।‘ यह शीर्षक देकर लेख में बताया गया है कि ऋषि दयानन्द के निर्वाण के समय उनके पास कौन-कौन सी पुस्तकें संग्रहित थी और वह कहां-कहां रक्खी हुई थीं। इस विषयक एक लेख श्रीमती परोपकारिणी सभा के तात्कालिक उपमन्त्री श्री पं. मोहनलाल विष्णुलाल पण्डया ने तैयार कराकर सन् 1885 के सभा के अधिवेशन में आवेदन-पत्र के रूप में उपस्थित किया था। यही लेख व विवरण सं. 1942 सन् 1885 में वैदिक यन्त्रालय से छपकर प्रकाशित भी हुआ था। उसकी पं. युधिष्ठिर मीमांसक ने सन् 1944 में प्रतिलिपि की थी। उसके अनुसार मीमांसक जी ने ऋषि दयानन्द के द्वारा छोड़ी गई पुस्तकों की सूची वेदवाणी में दी है जिसे नीचे प्रस्तुत कर रहे हैं।

आवेदन-पत्र के रूप में मुख्य पृष्ठ पर निम्नलिखित लेख है–

वार्षिक आवेदन

पण्डित श्री मोहनलाल विष्णुलाल पाण्डया उपमन्त्री श्रीमती परोपकारिणी सभा निवेदित
श्रीमद्दयानन्दस्वामीकृत स्वीकारपत्र संबन्धिनी श्रीमती परोपकारिणी सभा कार्यालय उदयपुर

ता. 6 दिसम्बर सन् 1885 ई.

इस आवेदन पत्र के पृष्ठ 2 पर निम्न लेख छपा है–

(1) पुस्तकों की एक फैरिस्त इसके साथ पेश करता हूं कि जिस पर (क) चिन्ह है, यह सब पुस्तकें मेरे (पं. मोहनलाल पाण्डया) पास उदयपुर में धरी हैं। और इसी के साथ दूसरी पुस्तकों की एक फैरिस्त (ख) चिन्ह की जो मुंशी समर्थदान जी ने मेरे पास भेजी है, पेश करता हूं, उसमें लिखी सब पुस्तकें वैदिक यन्त्रालय प्रयाग में है।

(क) पुस्तकों की फैरिस्त जो उदयपुर में उपस्थित हैं। (यहां हम इस सूची से केवल वेद की पुस्तक ही दे रहे हैं।)

ऋग्वेद विषयक पुस्तकानि

1- ऋग्वेद संहिता मूल जिल्द 1 छपी हुई 1
2- ऋग्वेद संहिता पदपाठ जिल्द 1 छपी हुई 1
3- ऋग्वेद सभाष्य जिल्द 2 छपी भाग 3 और 4 था 2
4- वेदार्थयत्न पुस्तक 1 छपी हुई अंक 1 1
(अगली सूची मे वेदार्थयत्न पुस्तक की संख्या 70 लिखी है)

यजुर्वेद विषयक पुस्तकानि

5- संहिता मूल 1 छपी 1
6- यजुर्वेद संहिता पदपाठ पुस्तक 1 लिखी 1
7- यजुर्वेद संहिता सभाष्य पुस्तक 1 छपी 1
8- यजुर्वेद अनुक्रमणिका पुस्तक 1 लिखी 1

सामवेद विषयक पुस्तकानि

9- सामवेद संहिता मूल पुस्तक 1 छपी 1
10- सामवेद संहिता मूल पुस्तक लिखी हुई 1
11- सामवेद संहिता मूल पदपाठ लिखित 1

अथर्ववेद विषयक पुस्तकें

12- अथर्ववेद संहिता मूल पुस्तक 2 छपी 2
13- अथर्ववेद संहिता मूल पदपाठ आठवें काण्ड तक लिखित 1
14- अथर्ववेद की अनुक्रमणिका पुस्तक 1 लिखित 1
15- अथर्ववेद संहिता मूल पुस्तक 1 प्राचीन लिखित सम्वत् 1941 की 1
पण्डित मोहनलाल जी विष्णुलाल जी पण्डया को भेंट करी हुई।
16- अथर्ववेद संहिता मूल पुस्तक 1 प्राचीन 13 काण्ड से 17 काण्ड 1
तक सम्वत् 1822 की लिखित
पण्डित मोहनलाल जी विष्णुलाल जी पण्डया को भेंट करी हुई।
17- अथर्ववेद संहिता मूल पुस्तक 1 प्रथम काण्ड से 6 काण्ड के 1
27 सूक्त के पहिले मन्त्र तक
पण्डित मोहनलाल जी विष्णुलाल जी पण्डया को भेंट करी हुई।
18- अथर्ववेद संहिता मूल 11 वें काण्ड से 19 तक प्राचीन 1
पण्डित मोहनलाल जी विष्णुलाल जी पण्डया को भेंट करी हुई।
19- अथर्ववेद संहिता मूल पदपाठ 1 दूसरे काण्ड के पहिले सूक्त 1
के चौथे मन्त्र से चैथे काण्ड के पन्दरहवें सूक्त के दूसरे मन्त्र
तक प्राचीन
पण्डित मोहनलाल जी विष्णुलाल जी पण्डया को भेंट करी हुई।

क्रमांक 13 से 19 तक के विवरण पर पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी की विशेष टिप्पणीः राथ और ह्विटनी ने शौनकीय अथर्वसंहिता का सम्पादन सन् 1856 (सं. 1913) में किया था। ऋषि दयानन्द ने अपने ग्रन्थों में अथर्ववेद के पाठ इसी संस्करण के अनुसार दिये हैं। अथर्ववेद का भाष्य करने के लिये उन्होंने सन् 1882 के उत्तरार्ध में बम्बई आर्यसमाज के मन्त्री श्री सेवकलाल कृष्णदास को अथर्ववेद की टीका, ऋषि, छन्द और मूल ग्रन्थ की हस्तलिखित पुस्तक ढूंढने के लिये लिखा था। इसका निर्देश सेवकलाल कृष्णदास के 20 जनवरी सन् 1883 के पत्र में मिलता है। (देखो श्री महात्मा मुंशीराम सम्पादित पत्रव्यवहार पृष्ठ 269, 270)। इसके लिये सेवकलाल कृष्णदास ने प्रयत्न भी किया था। अतः सम्भव है, अथर्ववेद के उक्त हस्तलिखित ग्रन्थ सेवकलाल कृष्ण के सहयोग से श्री स्वामी जी ने प्राप्त किये होंगे। जैनियों के भी बहुत से हस्तलिखित ग्रन्थ श्रीमति परोपकारिणी सभा के संग्रह में विद्यमान नहीं हैं। आवेदन पत्र में इन हस्तलेखों के विषय में, ‘‘पण्डित मोहनलाल विष्णुलाल जी पण्डया को भेंट करी हुई” लेख कुछ सन्देह प्रकट करता है कि कहीं पण्डया जी ने इन्हें दबाने के लिए ही ये शब्द नहीं लिख दिए? सेवकलाल कृष्णदास ने राथ ह्विटनी द्वारा प्रकाशित अथर्ववेद की प्रतिलिपि सन् 1884 में लीथो प्रेस में छपवाई थी।

सूची (क) में 24 वेष्टन हैं। पुस्तकों का क्रमांक 153 तक है। उसके बाद 13 पुस्तकों व सामग्री पर क्रमांक नहीं दिये गये हैं। यदि इन्हें सम्मिलित करें तो सूची (क) में पुस्तकों/ग्रन्थों आदि का कुल क्रमाक 1666 हो जाता है। सूची (क) के अन्त में पं. मोहनलाल विष्णुलाल पण्डया उपमन्त्री के हस्ताक्षर हैं।

अब फैरिस्त/सूची (ख) से वेद की पुस्तकों का उल्लेख करते हैं।

3- सामवेद संहिता 37 जिल्द (=खण्ड) में 1 संख्या
37- ऋग्वेद संहिता अंग्रेजी में भाग 4 1 संख्या
38- ,, (यहां प्रतिलिपि करते समय नाम लिखना छूट गया है।)
53- वेदार्थयत्न अंक 70 70 संख्या

सूची (ख) में ग्रन्थों वा पुस्तकों की कुल संख्या क्रमांक 63 तक है और अन्त में उपमन्त्री पं. मोहनलाल विष्णुलाल पण्डया जी के हस्ताक्षर हैं।

यहां यह भी बता दें कि सूची (ख) वेष्टन 24 पर ‘गोरक्षार्थ हस्ताक्षरी पत्र बिना छांटे बहुत गड़बड़ संख्या 1’ का वर्णन है। इस पर टिप्पणी करते हुए पं. मीमांसक जी ने कहा है कि यदि ये पत्रे सुरक्षित रहते तो इनसे ऋषि दयानन्द के गोरक्षा संबन्धी महान् कार्य पर अद्भुत प्रकाश पड़ता। परोपकारिणी सभा को पुराने कागजों के ढेर में इन्हें ढुंढवाना चाहिए। (इस पर हमारी टिप्पणी यह है कि पता नहीं परोपकारिणी सभा के अधिकारी मीमांसक जी की यह टिप्पणी देख भी पाये या नहीं और उन्होंने इसके अनुसार कोई प्रयत्न किया व नहीं? काश कि परोपकारिणी सभा में पं. मीमांसक जी जैसे अधिकारी हुए होते।) पण्डित जी ने अपनी टिप्पणी में यह भी स्पष्ट किया है कि पुस्तक सूचियों में जहां जिल्द शब्द का प्रयोग हुआ है उसका अभिप्राय खण्ड है। इसी आधार पर हमने सूची ख के क्रमांक 3 में कोष्ठक में जिल्द = खण्ड दिया है।
महर्षि दयानन्द जी के पास जो वेद की पुस्तकें थी वह छपी हुई व लिखित दोनों प्रकार की थी। सम्भव है कि इन सभी पुस्तकों की प्राप्ति के स्रोत भी अलग अलग रहे होंगे। स्वामी दयानन्द जी द्वारा सन् 1882 में बम्बई आर्यसमाज के मंत्री श्री सेवकलाल कृष्णलाल को अथर्ववेद भाष्य हेतु मूल ग्रन्थ उपलब्ध कराने की प्रेरणा करने से यह अनुमान होता है कि सम्भवतः उनके पास तब तक अथर्ववेद की पुस्तकें उपलब्ध न रही हों। यदि परोपकारिणी सभा द्वारा सन् 1885 के बाद में लिखित पुस्तकों के लिपिकर, सम्पादक, प्रकाशक व प्रकाशन वर्ष का विवरण भी आर्यों को सूचित कर दिया जाता तो यह जानकारी भी उपयोगी होती और भविष्य में ऋषि भक्तों व उन पर अनुसंधान कार्य करने वालों के लिए भी सहयोगी होती। ऋषि द्वारा संगृहीत हस्तलिखित पुस्तकों का भी विवरण उपलब्ध नहीं है। यह किस प्रकार के कागज पर लिखी हुई हैं। प्रत्येक जिल्द या खण्ड में किस आकार के कितने कितने पृष्ठ हैं? क्या उन पर लिपिकर्ता व भेंटकर्ता आदि का नाम है वा नहीं, आदि विवरण भी सभा द्वारा दिये जाने चाहिये थे। सभा ने शायद इसे आवश्यक एवं उचित नहीं समझा, यही कारण है कि उसने विगत 131 वर्षों में इस विषय में कुछ कार्य किया वा नहीं, इसका ज्ञान नहीं है। सूची में वर्णित सभी ग्रन्थ सभा के पास हैं या नहीं, यह भी नहीं कहा जा सकता? हमें इस लेख में प्रस्तुत की जा रही उपर्युक्त उपलब्ध जानकारी उपयोगी लगी, अतः उसे आज पाठकों को भेंट कर रहे हैं। पं. युधिष्ठिर मीमांसक दूरदर्शी महापुरुष थे। यदि वह इस सामग्री को सुरक्षित न करते तो आज यह हमारी पहुंच में न आ पाती। उनके प्रति हमारा धन्यवाद व कृतज्ञता का भाव है। आर्यसमाज के प्रकाशकों को वेदवाणी के मार्च, 1982 के अंक से इस समस्त विवरण को एक बार पुस्तकाकार प्रकाशित कर देना चाहिये जिससे इस ऐतिहासिक सामग्री की रक्षा हो सके। इत्योम्।

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