लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

निदेशक, विश्व संवाद केन्द्र सुदर्शन कुंज, सुमन नगर, धर्मपुर देहरादून - २४८००१

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पिछले चार साल कुछ घरेलू झंझटों में ऐसा फंसा रहा कि मित्रों और नाते-रिश्तेदारों के यहां जाना बिल्कुल नहीं हो पाया। मां का निधन हो गया। उनके जाने के बाद पिताजी ने चारपाई पकड़ ली। यद्यपि अब वे कुछ ठीक हैं, फिर भी उनकी देखभाल के लिए मुझे घर पर ही रहना पड़ता है। छोटा भाई मनोज एक निजी कम्पनी की नौकरी में है। वे लोग पैसा तो अच्छा देते हैं, पर छुट्टी बहुत कम। उसकी तैनाती भी घर से बहुत दूर है। इसलिए वह साल में बड़ी मुश्किल से दो बार घर आता है। उस समय ही मैं एक-दो दिन के लिए बाहर निकल पाता हूं। अब परिवार में ये सब जिम्मेदारी तो निभानी ही पड़ती हैं। इसी का नाम जीवन है।

पिछले सप्ताह की बात है। दिल्ली से संजय का फोन आया। वह मेरा पुराना साथी है। युवावस्था में बहुत घनिष्ठता रही है हम दोनों में; पर अब मिलना कम ही हो पाता है। वो दिल्ली और मैं मेरठ; लेकिन फोन से बात तो होती ही रहती है। वह अगले रविवार को अपने पौत्र के नामकरण संस्कार में आने का बहुत आग्रह कर रहा था। तीन साल पूर्व उसके पुत्र माधव के विवाह में भी मैं नहीं जा सका था। उन दिनों मां अस्पताल में थीं, इसलिए जाना संभव ही नहीं था; पर अब मनोज घर आया हुआ था। इसलिए एक दिन का समय निकालकर मैं अपनी पत्नी शीला के साथ दिल्ली चला ही गया।

मेरठ से दिल्ली अधिक दूर नहीं है। अपनी गाड़ी से दो-ढाई घंटे लगते हैं। सुबह नाश्ता करके नौ बजे घर से चले, तो बारह बजे संजय के घर पहुंच गये। नामकरण संस्कार का कार्यक्रम चल रहा था। हमने भी हवन में पूर्णाहुति देकर नवजात शिशु और उसके माता-पिता पर पुष्पवर्षा की। इसके बाद सबका भोजन था। उसके घर के पास ही एक धर्मशाला है। वहीं सारे कार्यक्रम हुए। संजय से घरेलू सम्बन्ध होने के कारण उसकी बहनों से भी मेरा परिचय है। वे सब बाल-बच्चों सहित वहां थीं। उनसे भी कई साल बाद मिलना हुआ था। इसलिए सबको बहुत अच्छा लगा।

भोजन के बाद हम उसके घर पर ही चले गये। जब कुछ फुर्सत हुई, तो संजय ने अपनी बहू से ठीक से परिचय कराया। उसने मेरे और शीला के पांव छुए। हमारी उससे यह पहली भेंट थी। इसलिए शीला उसके और नवजात शिशु के लिए कुछ कपड़े लायी थी। उसने आशीर्वाद के साथ वह सब भी उसे दिये। अनौपचारिक बातचीत में शाम की चाय का समय हो गया। बहू ने ही चाय बनाकर सबको पिलायी। उस समय मैंने उसका चेहरा ठीक से देखा, तो मुझे लगा कि मैंने इसे पहले कहीं देखा है। यद्यपि मैं माधव के विवाह में नहीं आया था। तो क्या यह मेरा भ्रम है ? मैं बार-बार दिमाग पर जोर दे रहा था; पर …।

संजय की अधिकांश रिश्तेदारी दिल्ली में ही है। इसलिए चाय के बाद लगभग सभी लोग चले गये। इसी समय बच्चा रोने लगा, तो बहू उसे लेकर अंदर चली गयी। बेटा माधव टैंट और हलवाई का हिसाब करने बाजार गया हुआ था। मुझे अपनी शंका दूर करने के लिए यह समय ठीक लगा। मेरी बात सुनकर संजय और भाभी दोनों ठठाकर हंस पड़े। मैं और शीला हैरानी से उनकी ओर देखते रहे। काफी देर हंसने के बाद संजय ने जो कहानी बतायी, वह सचमुच बहुत रोचक थी।

हुआ यों कि पांच साल पहले रात के समय संजय की पत्नी गीता के पेट में अचानक तेज दर्द उठा। ऐसा लग रहा था मानो पेट में चक्की सी चल रही है। सबने सोचा कि शायद खानपान में कुछ गड़बड़ हो गयी होगी। घर में ऐसे समय के लिए पुदीन हरा, हींगवटी आदि रहती हैं; पर उससे कुछ लाभ नहीं हुआ। फिर गरम पानी की बोतल से सिकाई की गयी। उससे दर्द कुछ कम हुआ और नींद आ गयी; पर अगले दिन फिर वही परेशानी होने लगी। अतः वे अपने घरेलू डॉक्टर के पास गये। उसने कुछ प्राथमिक दवाएं देकर अल्ट्रा साउंड कराने को कहा। अल्ट्रा साउंड से पता लगा कि उनके गॉल ब्लैडर में कई पथरियां विद्यमान हैं, जो काफी समय से शांत पड़ी थीं; पर अब वे हिलने लगी हैं। दर्द का कारण भी यही है।

इससे सब चिन्तित हो उठे। डॉक्टर ने बताया कि इसका एकमात्र निदान ऑपरेशन ही है। इस ऑपरेशन में एक विशेष बात यह होती है कि उसमें पथरी के साथ गॉल ब्लैडर भी निकाल दिया जाता है। संजय ने अपने रिश्तेदारों और मित्रों से पूछा। ऐसे में लोग कई तरह की सलाह देते हैं। कुछ ने होम्योपैथी लेने को कहा, तो कुछ ने आयुर्वेद। एक ने दादरी के किसी वैद्य का पता बताया, जो दवा से हर तरह की पथरी निकालने का दावा करते थे। उसने मुझसे भी पूछा। मैं स्वयं इस रोग का भुक्तभोगी रह चुका हूं। मैंने कहा कि बेकार के चक्कर में न पड़कर तुरंत ऑपरेशन करा लेना चाहिए। कई बार देर करने से रोग बिगड़ जाता है। आजकल चिकित्सा विज्ञान बहुत आगे बढ़ गया है। ऑपरेशन के बाद प्रायः अगले दिन ही छुट्टी दे दी जाती है।

संजय को मेरी सलाह जंच गयी। शायद कुछ औरों ने भी यही कहा होगा। उसने दिल पक्का किया और पत्नी को ‘वर्मा स्टोन अस्पताल’ में भर्ती करा दिया। वहां केवल पथरी के मरीज ही देखे जाते थे। डा. वर्मा काफी अनुभवी और अच्छे स्वभाव के व्यक्ति थे।  कई डॉक्टर लालची होते हैं। वे बिना बात कई तरह जांच आदि करा कर मरीज को लूटने का प्रयास करते हैं; पर डा. वर्मा इस मामले में भी अपवाद थे। तीन दिन बाद संजय का फोन आया कि गीता का ऑपरेशन तो ठीक हो गया है; पर अस्पताल में कम से कम एक सप्ताह और रहना होगा।

मुझे अगले दिन किसी काम से दिल्ली जाना था। इसलिए मैं उनसे मिलने अस्पताल ही चला गया। वहां संजय ने बताया कि डॉक्टर ने पहले छोटे ऑपरेशन की बात कही थी। उसमें पेट में दो छोटे छेद किये जाते हैं। उनसे टार्च, कैमरा, कैंची आदि अंदर डालकर गॉल ब्लैडर को काटकर अलग कर देते हैं। फिर उसे धागे से बांधकर पथरी सहित बाहर निकाल लेते हैं। यह सारा काम टी.वी. जैसे बड़े पर्दे पर देखते हुए किया जाता है। आजकल प्रायः इसी विधि से ऑपरेशन होते हैं।

लेकिन जब ये उपकरण अंदर डाले गये, तो वहां का दृश्य कुछ दूसरा था। इस पर डा. वर्मा बाहर आये। संजय, माधव और अन्य कई परिजन वहां थे। डा. वर्मा ने बताया कि मरीज का गॉल ब्लैडर बिल्कुल सड़ चुका है। उसका आकार भी काफी बड़ा हो गया है। बाहर खींचते समय उसके फटने का खतरा है। फटने से सारा मवाद और पथरियां पेट में फैल जाएंगी। इसलिए अब ‘ओपन सर्जरी’ यानि पेट खोलकर ही ऑपरेशन करना होगा।

संजय की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे ? गीता अंदर ऑपरेशन की मेज पर बेहोश पड़ी थी। अतः डॉक्टर की बात मानने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं था। परिणाम ये हुआ कि आधा घंटे वाला ऑपरेशन ढाई घंटे में पूरा हुआ। सोचा था कि गीता अगले दिन घर आ जाएगी; पर अब उसे एक सप्ताह तक अस्पताल में ही रहना पड़ा। इलाज का खर्च भी दोगुना हो गया।

संजय की दिल्ली के पास औद्योगिक क्षेत्र में ताले की चाबियां बनाने की एक फैक्ट्री है। बेटा माधव भी उसके साथ ही काम में लगा है। अलीगढ़ी तालों के कई प्रसिद्ध ब्रांडों की चाबियां वहीं बनती हैं। काम बहुत अच्छा है। कहीं कोई झंझट नहीं है। बनते ही सारा माल अलीगढ़ चला जाता है। 20 कर्मचारी दो पारियों मे काम करते हैं। काम के बारे में संजय से पूछो, तो वह यही कहता है कि भगवान की बड़ी कृपा है और इज्जत से दाल-रोटी निकल रही है।

ऑपरेशन के बाद पिता-पुत्र दोनों ने गीता की भरपूर सेवा की। संजय की बड़ी बेटी का विवाह दिल्ली में ही हुआ है। वह भी आती-जाती रहीं। डा. वर्मा भी भले आदमी थे। यों तो अस्पताल में कई नर्सें हैं; पर उन्होंने एक युवा नर्स को अलग से गीता की देखभाल के लिए नियुक्त कर दिया। आठवें दिन टांके कट गये और फिर सब लोग घर आ गये।

मैंने अधीर होकर पूछा, ‘‘लेकिन इस कहानी का बहू से क्या सम्बन्ध है ?’’

संजय जोर से हंसा और गीता भी। फिर वह बोला, ‘‘वही तो बता रहा हूं। अस्पताल में जिस नर्स को डा. वर्मा ने नियुक्त किया था, उसका नाम आशा था। वह भी बहुत अच्छे स्वभाव की थी। दो दिन में वह सबसे घुलमिल गयी। कई बार वह ड्यूटी टाइम के बाद भी बैठी रहती थी। बातचीत में पता लगा कि जिस कॉलोनी में मेरी बेटी की ससुराल है, उसके सामने वाले मोहल्ले में ही वह रहती है। उसके पिताजी अध्यापक हैं। घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, इसलिए उसे काम करना पड़ रहा है। कुछ और पूछा, तो ध्यान में आया कि वह हमारी ही बिरादरी की भी है।’’

अब कहानी में समझने जैसा कुछ बाकी नहीं बचा था। यानि आशा वही लड़की है, जिसे ऑपरेशन के बाद अस्पताल में मैंने गीता भाभी की सेवा करते हुए देखा था।

संजय ने आगे बताया, ‘‘हमें लगभग दस दिन वहां रहना पड़ा। कभी मैं रात को वहां रुकता था, तो कभी माधव। दिन भर कमरे में रहने के कारण आशा से भी हमारी बातचीत होती ही रहती थी। इस बीच माधव और आशा में कब और कैसे घनिष्ठता हो गयी, हमें ये पता ही नहीं लगा। जब गीता घर आ गयी, तो उसके बाद भी आशा दो-तीन बार उसे देखने घर आयी। यद्यपि यह उसकी ड्यूटी में शामिल नहीं था। इससे गीता को कुछ संदेह सा हुआ। महिलाएं ऐसे मामले में कुछ ज्यादा ही समझदार होती हैं। वे एक-दूसरे की आंखों की भाषा आसानी से पढ़ लेती हैं।

इसके बाद तो बात खुलनी ही थी। गीता ने माधव से पूछा, तो उसने आशा के प्रति अपने आकर्षण की बात मान ली। मैंने अपनी बेटी से कहा, तो उसने आशा के परिवार के बारे में विस्तृत जांच कर ली। परिवार तो अच्छा था, पर आर्थिक स्थिति काफी ढीली थी। आशा से छोटी दो बहिनें थीं और फिर एक भाई। हमने घर में विचार किया कि पैसा तो आता-जाता रहता है। यदि माधव और आशा सहमत हैं, तो हमें इस रिश्ते में कोई आपत्ति नहीं है।

लेकिन मेरा और आशा के पिताजी का कोई परिचय नहीं था। ऑपरेशन के महीने भर बाद गीता की फिर से कुछ जांच होनी थी। उसके लिए मैं उसके साथ डा. वर्मा के पास गया। वहां मैंने डा. वर्मा से इस विषय में चर्चा की। वे सारी बात जानकर खूब हंसे। उन्होंने आशा के पिताजी से बात करने और इस विषय को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी ले ली। जांच के बाद हम वापस लौट आये।

दूसरे ही दिन आशा के पिताजी का फोन आया और फिर वे अपनी पत्नी के साथ हमारे घर आ गये। प्रारम्भिक बात के बाद उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति और विवाह का बजट साफ-साफ हमें बता दिया। उन्होंने कहा कि यदि इसके बाद भी आप हमारी बेटी लेंगे, तो यह उनके लिए बहुत खुशी की बात होगी। आपके घर की बहू बनना आशा के लिए सौभाग्य की बात है। हम तो सोचते थे कि वह नर्स है, तो अस्पताल के किसी कर्मचारी से ही उसका विवाह कर देंगे; पर वह इतने अच्छे और सम्पन्न परिवार में जाएगी, यह तो हमने कभी सोचा ही नहीं था।

इतना कहते हुए आशा के पिताजी ने हाथ जोड़ दिये। पति-पत्नी दोनों की आंखों में आंसू आ गये। सचमुच किसी गरीब व्यक्ति के लिए बेटी की जिम्मेदारी कितनी बड़ी होती है, ये वही जान सकता है, जो इस परिस्थिति से गुजरा हो।

हमने भी साफ कर दिया कि भगवान का दिया हमारे पास सब कुछ है। आप दहेज या बारात की खातिरदारी की चिन्ता न करें। माधव हमारा इकलौता बेटा है। उसका विवाह बड़ी धूमधाम से होगा और उसका सारा खर्च भी हम ही करेंगे। आप तो बस शगुन के तौर पर वर-वधू के लिए जो वस्त्राभूषण आदि बनते हैं, वे बनवा लें। बाकी सब जिम्मेदारी हमारी है।

इतना कहकर संजय में मेरी ओर देखा, ‘‘बस, इसके बाद जो हुआ, वो तुम्हें पता ही है। और अब तो एक खिलौना भी घर में आ गया है। हमारा बुढ़ापा तो उससे खेलते हुए ही कट जाएगा।

इस बातचीत में पहली बार शीला ने हस्तक्षेप किया, ‘‘गीता भाभी, आपको इस तरह दो लाभ हो गये।’’

– वो क्या ?

– बहू के साथ ही सेवा करने वाली एक नर्स भी मिल गयी।

सबने खुलकर ठहाका लगाया। अब हमने वापसी की तैयारी की। मना करने पर भी संजय ने मिठाई और नमकीन के कई डिब्बे हमारी गाड़ी में रख दिये। चलते समय आशा और माधव ने फिर से हमारे पैर छुए। मैंने कहा, ‘‘बीमारी प्रायः लोगों के लिए मुसीबत बन कर आती है; पर इसे ‘वरदान’ बनते हुए पहली बार ही देखा है।’’

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लेखक परिचय

रामानुज मिश्र

रामानुज मिश्र

जन्म : 01.08.1950 शिक्षा : स्नातकोत्तर (हिंदी) काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी उपसंपादक : घाटी का दर्द, साप्ताहिक राबटर्सगंज, सोनभद्र लेखन : कहानी, कविता मो. : 08400437691 ई-मेल : ramanujmishra10@gmail.com स्थान : ग्राम मझुई, पोस्ट मधुपुर, जिला सोनभद्र-231216(उ.प्र.), : रानी लक्ष्मीबाई महाविद्यालय मधुपुर, सोनभद्र-231216(उ.प्र.) प्रकाशित कृति : मुट्ठीभर ज़िंदगी (कहानी संग्रह) प्रकाशक : गुंजन प्रकाशन, मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश

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रामानुज मिश्र

चलते-चलते रात जब थककर निढाल हो गयी तो उसने भोर की दहलीज पर बैठ अपने पाँव फैला दिये। गाँव के पूरबी आकाश में उगा टहकार शुकवा मीठी मुस्कान के साथ थकी हुई रात के कन्धे सहलाने लगा। मन्द-मन्द डोलती हवा ने गाँव को जगाना शुरु कर दिया। पेडों की पत्तियों भी धीरे-धीरे गुनगुनाती हुई रात्रिकालीन अपूर्ण राग को पूरा करने लगीं। डीहवाले पीपल के सिरहाने जमा बस्ती का जागरण नीचे उतरने लगा। पाल गली में निश्चिन्त सोई हलचल जाग उठी। पाँच, सात, नौ. बारह, पन्द्रह वर्षीया लडकियाँ अपने घरों से निकल गली में जमा हो गयीं. अब वे बाकी लड़कियों को पुकार कर जगायेंगी। हाथ में छोटे बड़े फाक, चड्ढ़ी, बनियान थामे ये लडकियाँ पश्चिमी सिवान में स्थित शिवालय की ओर प्रस्थान करेंगी।

यह कार्तिक माह भी अजीब है। मनाने से नहीं मानता, हर साल आ जाता है। काम धन्धे के इन्द्रजाल में थकी माँयें भी इन लडकियों को नहाने से नहीं रोक पातीं- शायद उनका अतीत भी तो इस स्नान के महीन, मजबूत धागे से अभी तक बँधा है।

गाँव के पश्चिमी छोर पर गाँव से भी पुराना शिवालय है। जहाँ गौरा के साथ ही नन्दी की मूर्ति है। चौखट के ऊपर गणेश जी विराजते हैं। मन्दिर के पिछवाड़े पक्के घाट की सीढियाँ ताल के पानी में डूबी रहती हैं। घाट के एक कोने में भींगे कपडों को फेंचने के बाद लडकियाँ ऊपर चढ़ गयी हैं। चबूतरे पर पंक्तिबद्ध मिट्टी के दीये एक-एक कर जलाने की जुगत में लग गयी हैं। प्रकाश की छोटी-बडी लौ की मद्धिम रोशनी उनके चेहरों पर पड़ रही है। कनेर के फूलों को दीयों के नीचे रख देने पर हथेलियाँ जुड जाती हैं, जिनमें भर गये हैं शिव आराधना के अनेक विनय-स्वर। कितनी पार्वतियाँ महादेव सदृश अमर, परम शक्तिमान पति पाने की लालसा में उन्हें मनाने का जुगत कर रही हैं. पर मनायें तो कैसे?

 

कउने जतन से मनाई हे भोलेनाथ!

कउने जतन से….

ना कुछ गुन ढंग, ना कुछ करनी

दियना अमर हो जलाई हे भोलेनाथ!

कउने जतन से…

कहाँ इतना गुण ढंग है उर्मिला, आशा, सरला, सुषमा, नन्दिनी में। इनके कोमल कंठों के प्रार्थना-स्वर ताल की शान्त जल तरगों पर धीरे-धीरे झर रहे हैं।

जब तक नन्दिनी की आँखों से बहते आँसू थमे, शिवपुर आ चुका था .। सत्रह साल की एक बड़ी जिन्दगी अनजानी सी दूसरी जिन्दगी में छलाँग लगा गयी थी। दरवाजे पर रेंगती नीम की घनी छाया तरंगों के साथ उछलता ताल का उजला-उजला पानी, पानी को अपनी छाया से काटते, उडते बगुले, बाड में अकुलाते झर-झर करती भेड़-बकरियों की विवश ऑखें सब कुछ छोड्‌कर यहाँ चली आई। इन्हें तो वह भुला भी देगी पर माँ की आंखों से झर-झर निकलते आँसुओं का क्या करे? बार-बार पगड़ी से आँखों को पोंछते बाबू का चेहरा तो यहाँ दिखाई नहीं देगा। गाड़ी रुकते ही उसने देखा लडकियाँ और औरतों की हलचल। घूँघट की कनखी से उसने जान लिया-दूसरा घर, पराया सा । भरे लोटे को हाथ में उठाये खिड़की के पास सास खड़ी थी। सहारा देकर नन्दिनी को उसने नीचे उतारा। अन्दर तक जानेवाले गोल-गोल पैरों में पाँव रखते हुए वह भीतर पहुँच गयी पर बाहर छोड़ गयी थी अपने महावरवाले लाल-लाल मुलायम पाँवों की गंध जिसमें शामिल थी पाँवों की झनकार। गोल ढेरों के अन्त होते-होते एक पल के लिए उसे याद आया, नवरात्रि में देवी पूजइया की आधी रात देवी मइया भी तो इसी घेरे में अपने पाँव रख हौले-हौले घर में प्रवेश करती हैं और आशीर्वाद देकर चली जाती हैं चुपचाप। सोच जब तक लम्बी डगर पकड़ती, सास ने जमीन पर बिछी दरी पर गुडही की तरह उसे स्थापित कर दिया

दिन भर पडोस की औरतें मुँह दिखाई के लिए कोठरी में आती रहीं खोइछे में दस-बीस रुपये धरती रहीं। ननद उचक-उचक अपनी माँ के हाथों थमाती रही। दुलहिनिया चाँद जइसन ह, ‘ ‘कउनो पै नाहीं, ‘टिकोरा जइसन आँख ह, ‘ ‘बोलत नाहीं, ‘ ‘ अबहिन दुलही बा, ‘ ‘का चर-चर करी’ सुनते- सुनते वह दरी पर बैठे-बैठे थक गयी। पैर फैलाने का मन हुआ। मारे लाज के ऐसा न कर सकी. भौजाई ने समझाया था। गिन में फैला उजाला दालान को लाँघ धीरे-धीरे निकल रहा है। अब जाकर वह अकेली हुई है। पास में ही पलंग था, मन हुआ नीचे से उठे और धम्म से पलंग पर पसर जाय। पलंग पर आराम करते अभी पन्द्रह मिनट ही बीते होंगे कि कमरे की रोशनी तेजी से भागने लगी। साँझ हो रही है, काली माई के चौरे पर वटवृक्ष के नीचे उसकी जगह कौन बैठा होगा? उढके पल्ले को खोलकर छोटकी ननद हाथ में ढिबरी लिये अन्दर आ गयी। ताखे पर दीया रखने के लिए उसने हाथ ऊपर किया, एड़ी के बल उचकी पर ताखे तक हाथ नहीं पहुँचा। नन्दिनी ने पलंग से उतर ढिबरी को गौखे में रख दिया। सरल सी रोशनी कोने-कोने समा गयी। एक अजनबी सूनापन उसकी आँखों में तैरने लगा।

सास ने जोर-जोर से पुकारकर उसे उठाया. आँख मलते-मलते उसने देखा कि सुबह की धूप कमरे की चौखट छू रही है। रात के असली सपने उसके सामने खडे थे। शरीर के पोर -पीर में मीठी चुभन अभी भी उठ रही थी। कितनी जल्दी वह अपनी माँ की बेटी से अपने पति की औरत बन गयी थी। एक लड़की को औरत बनने में भला कितनी देर लगती है।

जल्दी ही वह नई दुल्हन से पतोहू बन गई सहादुर की। सुबह होते-होते उसके हाथों में बडी- बडी बाल्टियाँ होतीं। बगलवाले हैण्डपम्प से पानी लाते वक्त चेहरे पर लम्बा घूंघट होता। पड़ोसी मर्द लड़के उसका मुँह तो नहीं देख पाते पर उसकी लाल रंगी अंगुलियों एवं एड़ियों को चोर नजरों से जरूर देख लेते। बखरी में घुसते-घुसते पायल भी चुगली कर जाती। अन्दर जाते-जाते बाल्टी नीचे रख घूँघट की ओट से जरूर निरखती कि कौन उसे देख रहा है।

अब उसके पास बहुत काम है, मन न होते हुए भी भोरहरी में बिस्तर से उठना, ऑख मलते- मलते चौखट पार करना. फिर बाहर भीतर। रात के पड़े खचिया भर बर्तन माँजना-धोना। बर्तन माँजते समय अक्सर घुंघराले बालों का एक महीन गुच्छा बार-बार उसकी आँखों पर आ जाता है। कटोरी साफ करते-करते सिर को तेजी से एक ओर झटकती कि बालों की वह आवारा लट अपने ठिकाने लौट जाये। रसोई घर के कच्चे आले पर संभालकर बर्तन रखते-रखते थक जाती है वह। हाथ-मुँह धोने के बाद पल भर के लिए अपनी कोठरी में आराम करना चाहती है तभी खयाल आता है देवर के लिए ताजा खराई बनानी है. खेलने गई ननद अभी आकर चिल्लायेगी-भौजी भूख लगी है बहुत।

सूरज अपने ही दिन से लड़ते झगड़ते जब पश्चिमवाली नीम की पत्तियों में उलझ गया, तब साँझ चुपके-चुपके दालान के दरवाजे से गन में घुस आई। अपनी कोठरी में आराम करती नन्दिनी बाहर निकल आई। अब तो सास-ससुर खेत से लौटेंगे। जल्दी ही उसने लोटे को माँज घसकर चमका दिया। बाहर से एक बाल्टी पानी लाई और कटोरी में गुड भर चौखट के पास ही तोप दिया। आज नया नहीं है ये सब। माँ ने कहा था, सास-ससुर माता-पिता के समान होते हैं।

अपनी घिसी-पिटी जिन्दगी के भारी बोझ को पीठ पर लादे सास ने पहले चौखट पार किया। फिर वह अन्दरवाली ओसार में दीवाल के बल बैठ गयी। नन्दिनी के पानी भरे लोटे को थामते-थामते सास ने उसके चिकने उभरे पेट का लक्ष्य किया फिर निगाह उठ गयी दुलहिन की ओर-जैसे पूछ रही हो कितना दिन हो गया महीना चढ़े। गुड की भेली को और छोटा करते हुए अम्मा ने सीधे -सीधे उससे कहा, ‘दुलही आज से छोटकी बल्टी में पानी लियावल करी। ‘ नन्दिनी ने विस्मयपूर्ण नजरों की कोरों से देखा, अम्मा के थके चेहरे पर समय के थपेड़ों से उभर रही लकीरें खिल उठी थीं।

वह इन्तजार करने लगी- कितनी जल्दी साँझ ढले और रात के पहले पहर में ही जल्दी-जल्दी अपने काम निबटा ले। उसे बताना है अपने पति से अम्मा जी की बात। खाना बनाकर खिलाते – खिलाते कुछ देर तो हो ही गई। आज वह बर्तन नहीं धोयेगी। केवल एक लोटा साफ पानी रख देगी। लोटा धोते- धोते उसने प्रत्यक्ष देखा, उसका पति अंधेरे की लय तोड कमरे में जा रहा है। उसने जल्दी से अपने हाथ साफ किये ‘ मुँह पर छींटे मारने के बाद आँचल से अपना चेहरा पोंछा-दिन भर का तनाव पलक झपकते दूर हो चला था। रंगदान लेकर पाँव की अंगुलियों को रंगने लगी। कमरे में टिमटिमाती ढिबरी की रोशनी उसके पास गन तक उछल रही थी-जैसे आज लरिकाई की तपस्या का एक बड़ा वरदान सम्भवत: मिलने जा रहा हो।

अपने नैहर लौटते समय गाड़ी में बैठती हुई नन्दिनी को लगा कि किसी ने टोकरी में बन्द हवा को खोल दिया है। लगभग दो साल बाद लौट रही है अपने गाँव प्रीतमपुर। ससुराल का हवा -पानी और रोशनी इतनी जल्दी पीछे छूट गये, उसे पता न चला। खिड़की से बाहर झाँकते ही उसने पाया कि वह तालवाले छौरे पर चल रही है। ताल की पीठ पर विराजमान शिवालय पानी में डूबी घाट की सीढियाँ अब उससे हाल-चाल कर रही हैं। कहीं थी? गली की एक ठोकर पर गाड़ी उछलती है, नन्हका रोने लगता है। देखती है कि सत्ती माई का चौरा अभी तक पहले जैसा ही है।

दालान में बिछी दरी पर बैठते हुए नन्दिनी ने देखा-आँगनवाली तुलसी माई कुछ मुरझा गयी हैं। कितने जतन से लिपती थी वह चौरे को, ताजा साफ पानी देती थी। पीतल की परात में पानी भर भौजाई सामने खड़ी थी। गोरी पिंडलियों से लुढ़कता पानी वापस परात में मिलने लगा। पाँव की पतली सुघर अंगुलियों से घुलता हुआ महावर का लाल रंग परात के पानी में समाने लगा। पल भर के लिए उसकी आँखें बन्द हुई -ससुराल की अयाचित एकरसता भंग होकर परात में डूब चुकी थी।

पटनीवाली कोठरी में बरसों पुराना अंधेरा ठसठस कर भर गया। माँ-बेटी की चारपाई को एक चुप्पी ने कसकर पकड़ लिया तो माँ के मन के भीतर कई प्रश्न कसमसा उठे। छाती से लगे नन्हका की सॉय-साँय को महसूस करते हुए नन्दिनी सोच रही थी कि माँ हाल-चाल का सिलसिला कहाँ से शुरू करेगी। बरामदे से अभी-अभी गुजर गई ढिबरी की रोशनी ने कमरे के अंधेरे को छू लिया है। माँ ने करवट बदल मुँह उसकी ओर कर लिया। ‘बचिया! तोर सास कइसन हइं खिलाय करय लीं कि नाहीं। ‘ अब नन्दिनी को जवाब देना चाहिए। आँखें खोल अँधेरे कोने में कुछ खोजने का यत्न करने लगी, ‘हाँ माई ठीक हइं। ‘ माँ सरककर बेटी के सिरहाने पहुँच गयी- ‘भगत जी कुछ कहतयँ त नाहीं। ‘ उसे लग रहा है कि छोटका जाग जायेगा। उसकी पीठ पर मीठी थपकी देती हुई उसने निश्चय किया कि इस सवाल का जवाब उतना जरूरी नहीं। माँ वापस अपनी चारपाई पर चली गई थी। उसके लिए अच्छा यही रहेगा कि दुबारा कोई हाल-चाल न पूछे। थोड़ी देर बाद जब चूड़ियों की बेजान खनखनाहट हुई, नन्दिनी ने समझ लिया माँ सोयेगी नहीं। अब जरूर वह सवाल करेगी जिसका जवाब देना फिलहाल उसके वश का नहीं। माँ उठकर बैठ गई- ननदनिया पाहुन मानय लँ कि नाहीं?’ परेशान हो उठी वह। उसने भी नन्हके के साथ करवट लेकर माँ की ओर मुँह कर लिया। पर बोलने की जगह चुप हो गई। खामोशी तब गहरा गई। माँ ने पाटी से पाटी सटा लिया- ‘बच्ची कल्लू क फुआ त कहत रहली पहुना दारु पियय लँ, चटिया पर जुआ भी खेलय लँ। मतारी-बाप से लड़यलँ। बात सही ह का बिटिया?’ माई ने कुरेदना शुरू किया।

‘माई हम पूरा नाहीं जानित। ”देख छिपाव जिन। हमार जीव ओही दिन से घबरात हव।’ नन्दिनी अब कहाँ तक छिपा पायेगी अपने आपको? भीतर बँधी गांठ दिली हो रही थी। ‘माई हमसे गहना माँगत रहलँ. कहनै दूना कराय देब। पूरा पासबुक भी रख देहली हमरे पास-हम नाहीं देहली। ‘ भविष्य के खतरे की आशंका माँ के मन में पैठ गई थी। बाहर-भीतर अंधेरा और गाढ़ा हो गया।

जवान होती जाड़ा के साथ छोटू भी बढ रहा है। दादा-दादी के साथ फुदकना उसने सीख लिया है। नन्दिनी घर के अन्दरूनी कामों को निपटाने के बाद खेतों में भी जाने लगी है। खेत से लौटते हुए दिन जब काफी ऊंचा हो जाता है. सास संग वापस लौटती है-जहां ढेर सारे जूठे बर्तन उसका इन्तजार कर रहे होते। बर्तन माँजना-धोना, हाथ-मुँह धोकर बच्चे को दूध पिलाते-पिलाते शाम का इन्तजार करना रोज की दिनचर्या बन गई थी।

साँझ आयी, पर आज कुछ अलग अन्दाज में। घर खाली सा है। सास अपने छोटे बेटे -बेटी को लेकर नैहर चली गई है। जाड़े में ही भतीजे का गौना है। इतने बडे आँगनवाली बखरी में आज वह थी. छोटू था. बुढऊ और उसका मर्द। ससुर तो बाहर बरामदे में चौकी पर लेटे रहते हैं. पर उसका पति कोई ठिकाना नहीं कहाँ जाता है, कहाँ रहता है? सांसू से पूछ-पूछकर थक गयी है। अब तो खाना भी अम्मा बाहरवाली आलमारी में रख आती हैं। कोठरी से निकल उसकी निगाह आँगन में चली आती है। बाहर चूल्हे के पास अक्सर बैठनेवाली पूसी भी आज दिखाई नहीं देती। वह होती तो करमों कर दूध भात देती और उसकी आँखों में अपने आगत के प्रश्नों का हल ढूंढ लेती। ये बिल्लियाँ भी बड़ी आगमजानी होती हैं।

ऊपर बेर डूबते ही नन्दिनी के आँगन से होकर धुआँ नीले आसमान में बढने लगा है। उपली सुलगाते-सुलगाते मन में आया कि आज कलौंजी बनाये बैंगन आलू की। रसोई में बेसन भी बचा है. कड़ू तेल तो एक डिब्बा भरा पड़ा है। छोटू को अपने ससुर के हाथ ओसार में दे आई।

रसोईघर की ठहर पर बैठ भोजन करते बुढउबाऊ ने कहा, ‘दुलहिन कलौजी बड़ा स्वादिष्ट बनल ह’ माँगने से पहले उसने चार-पाँच कलौजी उनकी थाली में डाल दिया। पानी पीते हुए ससुर ने कहा. ओके जोहा जिन। हमसे कह के गयल ह. जाने कब आई. ई ससुरा बड़ा अवारा होय गयल। ‘ जूठी थाली समेटने के बाद वह थाली में भात, क्टोरी भर दाल, आठ-दस कलौजी रख बाहर गौखे में तोप आई। कलौंजी की सोंधी-सोंधी बास घर से निकल गली में चली गयी। जल्दी खा पीकर जूठे बर्तन इसी समय धो डालेगी। ससुर ने कहा है, दालान की कुंडी भी बन्द कर दे वह। नहीं, वह दरवाजे की कुंडी बन्द नहीं करेगी. उढ़का देगी बस। कौन बड़ा सोना-चाँदी भरा है इस घर में। हाथ मुँह धोकर जैसे ही वह उठी. एक हल्की आहट ने उसे सचेत कर दिया-इतनी रात कोई कुत्ता दरवाजा नहीं भड़का सकता। सच. छोटू के पापा थे. देखते ही देखते कोठरी में चले गये। कितने अंतराल के बाद देह- मिलन की यह रात दुबारा आई है -यह सोचना इस समय अर्थहीन था। अरसे से सूखी पड़ी रंगदानी को गीला करते हुए उसने अंगुलियों को रंगना शुरू किया। लाल-लाल खुरदरी एड़ियों पर चढे रंग को सन्नाटे के सिवा और कौन देख सकता था। पलक झपकते नन्दिनी ने अपनी नई सुगापंखी साडी पहन ली। नई साड़ी की खुशबू लिए जब वह अन्दर पहुँची. छोटू गहरी निद्रा में लीन और उसके पापा की ऑखें खुली थी। टिमटिमाता दीया कब बुझा-इसे संज्ञान में लेने की जरूरत ही कहाँ थी। दाम्पत्य के प्रणय-समर में कौन जीता, कौन हारा इसे तो वह काली रात ही जान सकती है।

पाल गली में भिनसार से ही अजीब सन्नाटा दरवाजे-दरवाजे घूम रहा है। सुबह होते-होते बच्चों की खटर-पटर. रोना-धोना सब कुछ बन्द है। सरकारी नल पर बाल्टियों की ठेलम-ठेल गायब है। लगता है कोई हिंसक जानवर बस्ती के मुहाने पर अड्डा जमाकर बैठ गया है। कहीं कोई आवाजाही नहीं, पर घरों के अंदर फुसफुसाहटों का दौर जारी है। सहादुर के घर के सामने सड़क पर पुलिस की गाड़ी देख सहमे लोग अपने-अपने दरबों में फिर दुबक गये। पपिया मलुवा नटइया दबउलस हे मइया। ‘ कायरों की इस पाल बस्ती में सिर्फ यही एक छी आवाज रह-रहकर कलप रही है। ‘इहय मलुवा धरनिया पर टंगलस हे मइया। ‘ ‘पपिया मलुवा नटइया दबउलस हे मइया, अल्हरय परनवा इ लेहलस हे मइया। ‘

‘मलुवा नटइया दबउलस हे मइया, अल्हरय परनवा ई लेहलस हे मइया। ‘जीवन के आखिरी पडाव पर खड़ी, बरसों पहले इसी टीले में ब्याही एक वृद्धा अपनी भतीजी के लिए बिलख रही थी। ‘चुप रह बुढिया, तोरो नटई साह देब। ‘ उसका पोता गरजा था। बुजदिल, कायरों के मुहल्ले में उसका विलाप अंधे कुंए में जा गिरा।

शिवपुर में रिवाज है, जब कोई सुहागिन इस दुनिया से दूर चली जाती हैं, उसके घरवाले सिवान में एक टूटी दउरी रख आते हैं, दउरी में होता है मरा हुआ आईना, दात टूटी कंघी, एक-दो काली चोटियाँ, बिन्दी के कुछ पत्ते और एड़ी घिसी हुई एक जोड़ी चप्पल। इस बार भी पुल के बगल में देखा – दउरी के बाहर चप्पल, जिसका लाल-लाल चटख रंग अब भी नहीं गया है।

 

 

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