लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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सिद्धार्थ शंकर गौतम

बाबा रामदेव की संसद एवं सांसदों के प्रति की गई अशोभनीय टिप्पणी को लेकर बबाल थमता नज़र नहीं आ रहा है| गौरतलब है कि मंगलवार को छत्तीसगढ़ के दुर्ग में अपने अभियान की शुरुआत करते हुए रामदेव ने कहा कि संसद के भीतर कुछ लोग अच्छे हैं, लेकिन ज्यादातर लुटेरे और जाहिल लोग बैठे हुए हैं। उन्होंने सांसदों को हत्यारा तक करार देते हुए कहा कि इनमें से कुछ लोग इन्सान के रूप में शैतान हैं। इससे पहले टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल भी सांसदों के खिलाफ आपत्तिाजनक टिप्पणी कर चुके हैं। २५ फरवरी को यूपी के ग्रेटर नोएडा में एक चुनावी सभा में बोलते वक्त केजरीवाल ने कहा था कि संसद में लुटेरे बैठे हैं। उन्होंने ये भी कहा था कि संसद में हत्यारे और दुष्कर्मी बैठे हैं और उनसे उन्हें कोई उम्मीद नहीं है|

देखा जाए तो दोनों के बयान तार्किक दृष्टि से तो सही ठहराए जा सकते हैं किन्तु व्यावहारिकता के मापदंडों पर खरे नहीं उतरते| किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की इतनी स्वतंत्रता नहीं होना चाहिए कि वह नैतिक मूल्यों का ही क्षरण करने लगे| बाबा ने जिस असंसदीय वाणी का प्रयोग किया है उसे किसी भी नजरिये से न्यायोजित नहीं ठहराया जा सकता| संसद की एक मर्यादा है जिसका पालन करना सभी के लिए अवश्यंभावी है| हाँ, बाबा के इस कथन से इंकार नहीं किया जा सकता कि ज़्यादातर माननीयों का चारित्रिक पतन हो चुका है जिन्हें संसद में बैठने का कोई अधिकार नहीं है| किन्तु इस बात को बाबा मर्यादित ढंग से भी कह सकते थे| यहाँ ध्यान देखा होगा कि बाबा और केजरीवाल के बयानों में कोई बड़ा अन्तर नहीं है| दोनों के बयानों का लब्बोलुबाब यह है कि अब देश के कर्णधारों पर विश्वास करना बेमानी है और व्यवस्था परिवर्तन अवश्यंभावी है| किन्तु सवाल यह है कि व्यवस्था परिवर्तन हेतु विकल्प कहाँ हैं?

बाबा रामदेव ने काले धन की स्वदेश वापसी हेतु जिस अभियान का आवाहन किया था वह राजनीति की कुटिल चालों में उलझकर पथभ्रष्ट हो चुका है| पिछले वर्ष बाबा के अभियान को नेस्तनाबूत कर सरकार ने बाबा को अपने ऊपर हावी होने का मौका दिया किन्तु मीडिया द्वारा बाबा के विषय में जो तथ्य छनकर आ रहे हैं उससे निश्चित रूप से बाबा की लोकप्रियता भी घटी है| एक समय बाबा को राजनीतिक विकल्प के रूप में देखने वाला मीडिया आज बाबा के अरबों के साम्राज्य का भांडा फोड़ उन्हें व्यापारी साबित कर रहा है| बाबा पर कई तरह के आरोप हैं जिन्हें वे आज तक नहीं झुठला पाए| तब सवाल यह उठता है कि अकूत धन-सम्पदा के धनी बाबा किस मुंह से व्यवस्था परिवर्तन की बात करते हैं? संसद में बैठकर जो लोग धनाढ्य वर्ग की शोभा बढाकर बाबा के निशाने पर हैं तो बिना संसद सदस्य बने बाबा भी उसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं; ऐसी स्थिति में दोनों में से सही कौन है? जहां तक बात केजरीवाल के बयान की है तो उन्हें पहले अपनी टीम तथा स्वयं के दागदार होते दामन को देखना चाहिए तब दूसरों के ऊपर कीचड़ उछालना चाहिए|

अब जबकि बाबा के बयान को लेकर तमाम संसद सदस्य विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने की बात कर रहे हैं तो उनसे पूछा जाना चाहिए कि केजरीवाल के विरुद्ध जो विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव आया था उसका क्या हुआ? विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव के अंतर्गत दोनों पक्षों को संसद में अपने कथन की सत्यता को प्रमाणित करना पड़ता है| तो क्या संसद में इतना साहस भी नहीं था कि वह केजरीवाल के बयान को झूठा साबित कर उन्हें कड़ी सजा दे? जिस विशेषाधिकार हनन कानून की वजह से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को जेल जाना पड़ा, उस कानून का उपयोग मात्र डराने-धमकाने के लिए हो रहा है| क्यों नहीं हमारे माननीय विशेषाधिकार हनन कानून के अंतर्गत केजरीवाल एवं बाबा रामदेव को जेल की सलाखों के पीछे ड़ाल देते? मोटे तौर पर देखा जाए तो यहाँ इच्छाशक्ति की कमी माननीयों में ही नज़र आती है क्योंकि दूध के धुले तो वे भी नहीं है| जब दोनों ही पक्ष नैतिक रूप से पूर्ण नहीं हैं तो पहले दोनों आत्म-मंथन करें तब एक-दूसरे के गुण-दोषों की बात करें वरना अशोभनीय टिप्पणी करने से दोनों पक्ष अपनी बची-खुची प्रासंगिकता भी खो देंगे? इस स्थिति में कमजोर हमारा लोकतंत्र ही होगा जिसकी जवाबदेही से ये बच नहीं सकते|

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4 Comments on "दोनों ही पक्ष आत्म-मंथन करें"

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इंसान
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यदि हम “आज देश की ऎसी दुर्दशा कैसे और क्योंकर हुई?” प्रश्न का उत्तर समझें तो सिद्धार्थ शंकर गौतम द्वारा लिखे इस लेख का विषय केवल निरर्थक वाद-विवाद ही है| विशिष्ट के ब्रह्मदंड का आचरण निभाती भारतीय जनता इस वाद-विवाद में अनन्त काल तक व्यस्त रहेगी|

Rekha singh
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(१)किसी भी लोकतान्त्रिक व्यस्था में व्यक्ति को इतनी स्वतन्त्रता नहीं होनी चाहिए की जनता को धोखा देकर वोटो को खरीदकर नेता बन जाओ और देश को लूटो| (२) बाबा रामदेव जी ने संसद नहीं सांसदों की मर्यादा पर प्रश्न चिन्ह लगाये है | (३)बाबा लोकप्रियता की लड़ाई नहीं लड़ रहे है परन्तु लोकप्रिय है | (४)बाबा जनता का मनोबल और ज्ञान बड़ा रहे है |बाबा माता पिता और गुरु की तरह जनता को अपने कर्तव्य और अधिकारों का सदुपयोग करने की शिक्षा दे रहे है | (५)बाबा का जीवन इतना साफ़ है की हम जो भी जानना चाहते है उनके… Read more »
आर. सिंह
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ऐसे तो यह थोडा पुराना लेख है,पर मैं नहीं समझता कि यह इतना पुराना हैं कि इस पर अब विचार विमर्श नहीं हो सकता.स्वामी राम देव के विरुद्ध एक शब्द भी कहना बर्रे के छत्ते को छेडने जैसा है,पर मैं वास्तव में बचपन में यह काम किया करता था.डंक लगते थे,पर मैं ज्यादा परवाह नहीं करता था,पर जब आँख के पास डंक लगा तो समझ में आ गया कि ऐसा करने में बहुत सावधानी की आवश्यकता है. मैं स्वामी राम देव के बारे में अधिक कुछ न कहकर टिप्पणीकार, सुश्री रेखा सिंह की टिप्पणी के पांचवे बिंदु पर कुछ प्रश्न… Read more »
Bipin Kumar Sinha
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आज राजनीति और राजनीतिज्ञ गंदे शब्द होने लग गए है तो इसके लिए हमारे सांसद और उनकी राजनीति ही जिम्मेवार है आम लोगों को इसके प्रति उदासीनता और घ्रणा बेवजह नहीं है पिछले साठ साल का इतिहास कोई अच्छी तस्वीर नहीं पेश करता इस मनःस्थिति में कोई भी चाहे वे बाबा रामदेव हो या केजरीवाल वे जनता की भावना के प्रोजेक्टर बन जाते है संचार क्रांति के इस युग में ऐसा होना स्वाभाविक ही है. राजनेताओं का व्यवहार निरंकुश और सामंतशाही जैसा हो गया है इसका ज्वलंत उदहारण ममता बेनर्जी और निकट भूतकाल के लालू यादव और मायावती है उनलोगों… Read more »
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