लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

Posted On by &filed under प्रवक्ता न्यूज़.


bjp_up-डा. राधेश्याम द्विवेदी
ब्राह्मण शब्द से ही इनका अर्थ पता चलता हे की ब्रह्म को जाननेवाले को ब्राह्मण कहते हे, 3 युगों तक वैदिक सनातन धर्म में ज्ञान वर्ग को ब्राह्मण के नाम से जाना गया कर्म से ब्राह्मण ने सदेव ज्ञान दिया, धर्म को मजबूत किया परन्तु कलयुग में ब्राह्मण और धर्म दोनों को कही ना कही चोट पहुची.ब्राह्मण (विप्र, द्विज, द्विजोत्तम, भूसुर) यह आर्यों की समाज व्यवस्था अर्थात वर्ण व्यवस्था का सर्वोच्च वर्ण है। भारत के सामाजिक बदलाव के इतिहास में जब भारतीय समाज को हिन्दू के रुप में संबोधित किया जाने लगा तब ब्राह्मण वर्ण, जाति में भी परिवर्तित हो गया। अब यह ब्राह्मण वर्ण हिन्दू समाज की एक जाति भी है। एतिहासिक रूप से आर्यों की वर्ण व्यवस्था में चार वर्ण होते हैं। ब्राह्मण (आध्यात्मिकता के लिए उत्तरदायी), क्षत्रिय (धर्म रक्षक), वैश्य (व्यापारी) तथा शूद्र (सेवक, श्रमिक समाज)। यस्क मुनि की निरुक्त के अनुसार – ब्रह्म जानाति ब्राह्मण: — ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म (अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान) को जानता है। अतः ब्राह्मण का अर्थ है – “ईश्वर का ज्ञाता”। किन्तु हिन्दू समाज में एतिहासिक स्थिति यह रही है कि पारंपरिक पुजारी तथा पंडित ही ब्राह्मण होते हैं। यद्यपि भारतीय जनसंख्या में ब्राह्मणों का प्रतिशत कम है, तथापि धर्म, संस्कॄति, कला, शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान तथा उद्यम के क्षेत्र में इनका योगदान अपरिमित है।
अखंड भारत की सोच देने वाले आचार्य चाणक्य जी के काल तक ब्रह्मिनो का ज्ञान वर्ग अपने कर्म को लेकर सजग था, धीरे धीरे नास्तिक मत के उदय के कारण हिन्दू धर्म में कही बदलाव आते गए जेसे मूर्ति पूजा हुई उस समय कही वेदांतो के साथ ज्ञान वर्ग के ब्रह्मिनो ने उनके साथ ज्ञान चर्चा कर मात दी परन्तु अनेक वेदांत और नियम बन्ने से ब्रह्मिनो में ही आपसी मतभेद बढ़ने लग गए और धीरे धीरे ये बिखराव ने विकराल रूप ले लिया जिसका असर सीधे तौर पे धर्म पर पड़ा.आजाद भारत में आते आते कुछ ब्राह्मण अपने मूल कर्म से विमुख हुए, कही लन्दन तो कही ब्रिटिश ऑफिस में कार्य करते नजर आये. मुग़ल काल में ब्राह्मण उभर आये क्यों की ब्रह्मिनो ने इस्लामिक पद्दति और उसका अनुसरण नहीं किया परन्तु अंग्रेजी हुकूमत में ब्रह्मिनो ने आगे बढ़ते हुए अंग्रेजी और संस्कृति को अपनाया भी जिसके कारण बड़ी संख्या में ब्राह्मण सरकारी विभागों में पाए गए हालाँकि शुरू से ही सरकार के मार्ग दर्शन के लिए राजतंत्र में भी ब्राह्मण राजमहल में रहते थे परन्तु सांस्कृतिक हास नहीं था उस समय.
ब्राह्मणों की वर्तमान स्थिति:- आधुनिक भारत के निर्माण के विभिन्न क्षेत्रों जैसे साहित्य, विज्ञान एवं प्रौद्यौगिकी, राजनीति, संस्कृति, पाण्डित्य, धर्म में ब्राह्मणों का अपरिमित योगदान है। प्रमुख क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों मे बाल गंगाधर तिलक, चंद्रशेखर आजाद इत्यादि हैं। लेखकों और विद्वानों में कालिदास, रबीन्द्रनाथ ठाकुर हैं। उत्तर प्रदेश सियासत का एक ऐसा रणक्षेत्र है, जहां आंदोलनों के साथ नए सियासी समीकरण बनने और वक्त के साथ उनके सिर के बल खड़े होने में खास दिक्कत पेश नहीं आती. सूबे की राजनीति में 40 साल तक ब्राह्मणों का दबदबा कायम रहना, 1990 के दशक में उनका हाशिये पर जाना और इस सदी के दूसरे दशक के उत्तरार्द्ध में एक बार फिर से किंग मेकर बनकर उभरना उत्तर प्रदेश की इसी जाति आधारित राजनीति के दिलचस्प अध्याय हैं. बंबइया फिल्मों की तरह रोमांच और क्लाइमेक्स से भरी इस पटकथा का असली लेखक है-सूबे के 62 जिलों में 8 फीसदी से ज्यादा और इनमें से 31 जिलों में 12 फीसदी से ज्यादा ब्राह्मण वोट. इसी की खातिर नेता पंडित जी को हाथ दिखाएं न दिखाएं लेकिन सिर पर ब्राह्मण का हाथ जरूर चाहते हैं.
ब्राह्मणों के आशीर्वाद के लिए पार्टियां अपनी-अपनी तरफ से ऐसे ब्राह्मण चेहरे पेश करने में लगी हैं, जो पंडितों को एकमुश्त न सही तो कम-से-कम फुटकर तौर पर ही अपनी ओर खींच सकें. लेकिन दिक्कत यह है कि इन चेहरों में पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसा विराट व्यक्तित्व या अटल बिहारी वाजपेयी जैसा चुंबकीय आकर्षण तो दूर, खुद को सर्वमान्य नेता कहलाने का दमखम भी नजर नहीं आता. जबकि प्रदेश के इतिहास पर नजर डालें तो यहां अब तक बने 19 मुख्यमंत्रियों में से सबसे अधिक 6 मुख्यमंत्री ब्राह्मण जाति से ही आए और ये सभी कांग्रेस के थे. इसके बाद 4 ठाकुर, 4 पिछड़े, 3 वैश्य, 1 कायस्थ और एक दलित मुख्यमंत्री बना. अगर कुल कार्यकाल पर नजर डालें तो 23 साल तक प्रदेश की कमान ब्राह्मण मुख्यमंत्रियों के हाथ में रही.
कांग्रेस का राज:- ऐतिहासिक रूप से ब्राह्मण जाति के लोग कांग्रेस के सहयोगी हुआ करते थे. 1977 के पहले तक पूरे देश में कांग्रेस का स्थाई समर्थन तंत्र ब्राह्मण, मुसलमान और दलित हुआ करते थे. नेहरू जी के समय में तो सभी बड़े नेता ब्राहमण ही हुआ करते थे. बाद में डी पी मिश्र, उमाशंकर दीक्षित और कमलापति त्रिपाठी का ज़माना आया. आजकल भी कांग्रेस के वोट बैंक के रूप में किसी भी राज्य में ब्राह्मण नहीं है लेकिन कांग्रेस में सबसे बड़े नेता ब्राहमण ही हैं और अन्य जातियों के नेताओं को ऊपर नहीं आने देते .जब 1977 में यह समीकरण टूटा तो कांग्रेस की सरकार चली गयी ,जनता पार्टी का राज आया. जनता पार्टी का राजनीतिक प्रयोग सत्ता में बने रहने के लिहाज़ से बहुत ही बेकार साबित हुआ लेकिन जनता पार्टी के प्रादुर्भाव से यह साबित हो गया की अगर जातीय समीकरणों को बदल दिया जाए तो सत्ता हासिल करने के लिए कांग्रेस के प्रभुत्व को नकारा जा सकता है. कांग्रेस के शो-केस में रीता बहुगुणा-जोशी, प्रमोद तिवारी पहले से ही हैं, अब जनार्दन द्विवेदी, शीला दीक्षित और हरियाणा के मांगेराम शर्मा जैसे अनसुने नाम भी आ गए हैं. वैसे, कई कांग्रेसी यही मानते हैं कि ब्राह्मणों का सबसे बड़ा प्रतिनिधित्व तो खुद नेहरू-गांधी परिवार करता है. समाजवादी पार्टी ब्राह्मणों को लेकर बहुत हाय-तौबा मचाती नजर नहीं आती और अशोक वाजपेयी जैसे ब्राह्मण नेता पार्टी में कभी-कभार नजर आ जाते हैं.
जातिगत आंकड़ा:- इसी पौराणिक आख्यान पर जातिगत आंकड़ों की मजबूत जिल्द चढ़ाते हैं, ‘15 फीसदी ब्राह्मण और 23 फीसदी दलित इकट्ठा होकर कुछ भी कर सकते हैं.’ वैसे, ब्राह्मणों की 15 फीसदी आबादी का आंकड़ा कुछ अतिरंजित है, लेकिन आधिकारिक आंकड़ों के अभाव में सब अपने आंकड़े चला रहे हैं. बसपा ने 2007 में 80 और इस विधान सभा चुनाव में 74 ब्राह्मण उम्मीदवारों को हाथी पर सवार कराया है. ब्राह्मणों को टिकट देने में पार्टी भाजपा को चुनौती दे रही है. इतने बड़े पैमाने पर पंडितों को टिकट देने के बावजूद बसपा के ही कई नेताओं को लगता है कि दलित-ब्राह्मण का असहज गठजोड़ काठ की हांडी जैसा है, जिसे दुबारा चढ़ाना मुश्किल है. कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी बसपा के ब्राह्मण प्रेम को आड़े हाथों लेते हुए कहते हैं, ‘बसपा ने ब्राह्मणों को बेइज्जत कर निकाला है. रंगनाथ मिश्र, राकेशधर त्रिपाठी, राजेश त्रिपाठी आदि, पूरी कतार है, बसपा से बेइज्जत हुए ब्राह्मणों की. वह पार्टी कब से ब्राह्मणों की हितैषी हो गई.’ उनकी पार्टी किस तरह ब्राह्मणों को तरजीह दे रही है ? ‘कांग्रेस जात-पांत की बात नहीं करती. राहुल जी पार्टी का चेहरा हैं. नेहरू जी, इंदिरा जी और राजीव की छवि जनता राहुल जी में देखती है.’ पार्टी हर इलाके के लिए ब्राह्मण चेहरों की तलाश में है. राहुल गांधी ने जनवरी में जब बुंदेलखंड का दौरा किया तो मूल रूप से बांदा निवासी जनार्दन द्विवेदी को लगातार अपने साथ बनाए रखा और ब्राह्मण चेहरे के तौर पर पेश किया. बुंदेलखंड में झंसी, ललितपुर, जालौन, बांदा और चित्रकूट जिलों में ब्राह्मण वोटरों की संख्या 12 फीसदी से ज्यादा है. दलितों के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा वोट बैंक है.
पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का झंडा बुलंद करने वाले पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रतापगढ़, फैजाबाद, बलरामपुर, गोंडा, सिद्धार्थ नगर, बस्ती, संत कबीर नगर, महाराजगंज, गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, जौनपुर, वाराणसी, रविदास नगर, मिर्जापुर और सोनभद्र में ब्राह्मण मतदाताओं की औसत उपस्थिति 14 से 15 फीसदी के बीच बैठती है. भोले बाबा की नगरी बनारस में यह आंकड़ा 16 फीसदी तक है. इन्हीं इलाकों में 2007 में बसपा को भी थोक में सीटें मिली थीं. कांग्रेस के सामने ब्राह्मण चेहरों को आगे लाने की चुनौती इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि बसपा की तुलना में उसके ब्राह्मण प्रत्याशी बहुत कम यानी महज 42 हैं. पार्टी ने इस बार जो टिकट वितरण किए उसमें मंडल राजनीति के मूल सिद्धांत उभरकर सामने आए और पिछड़ों को खूब टिकट मिले. लेकिन पार्टी नहीं चाहती कि पिछड़ों के चक्कर में ब्राह्मण पास न आएं. इसीलिए दिल्ली से शीला दीक्षित और हरियाणा से मांगेराम शर्मा को भी चुनाव प्रचार के लिए बुलाया गया है.रीता बहुगुणा-जोशी कहती हैं, राहुल जी पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हैं. ऐसे में अलग से ब्राह्मणों की बात ही नहीं उठती.’ लेकिन बाकी पार्टियों की तुलना में कांग्रेस से ब्राह्मणों को कम टिकट मिलने का असर पूछने पर उन्होंने कहा, ‘ब्राह्मण विवेकशील है. वह एकमुश्त कभी वोट नहीं करता. ब्राह्मणों का वोट हमेशा अलग-अलग जगह जाता है. इसलिए प्रत्याशियों की संख्या कोई बड़ा सवाल नहीं है.’ रीता खुद लखनऊ से चुनावी मैदान में हैं और मध्य उत्तर प्रदेश में कानपुर, रमाबार्ई नगर (कानपुर देहात) और लखनऊ में ब्राह्मण वोट क्रमशः 17, 13 और 13 फीसदी हैं.
समाजवादी पार्टी:- समाजवादी पार्टी 50 ब्राह्मणों को टिकट देने के बाद भी ब्राह्मण शब्द जुबान पर नहीं लाती. पार्टी की नेताओं की फेहरिस्त में मुलायम सिंह यादव के परिवार के अलावा आजम खान का नाम ही नजर आता है. पार्टी में अशोक वाजपेयी जैसे कुछ ब्राह्मण चेहरे हैं लेकिन प्रमुखता से वे नहीं दिखाई देते. उधर, 46 सीटों पर चुनाव लड़ रहे राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजित सिंह से जब पूछा गया कि मुसलमानों को लेकर तो आप बहुत परेशान हैं, लेकिन ब्राह्मण चेहरा कहीं है? इस सवाल पर अजित सिंह ने कहा, ‘हमने कई ब्राह्मण प्रत्याशी उतारे हैं.’ मथुरा जैसे जिलों में रालोद को ब्राह्मणों के खासे समर्थन की जरूरत होगी. पार्टी के बड़े ब्राह्मण चेहरे जो काम नहीं कर पाएंगे, वह काम स्थानीय प्रत्याशी कर सकता है क्योंकि उत्तर प्रदेश सियासत के उस मोड़ पर है जहां, पार्टी के चुनाव चिन्ह से ज्यादा बड़ी छाप प्रत्याशी के नाम और काम की होगी. इतना साफ है कि 23 साल से सीएम की कुर्सी से दूर खड़ा ब्राह्मण अब खुद को किंग नहीं, किंग मेकर की भूमिका में देख रहा है.
दलित-ब्राह्मण गठजोड़ :बहुजन समाज पार्टी:- 1977 में कांग्रेस से अलग होने वाला प्रमुख वर्ग मुसलिम ही था लेकिन 1978 में ही बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक, कांशीराम ने दलितों को कांग्रेस से अलग पहचान तलाशने की प्रेरणा देना शुरू कर दिया था. 1989 आते आते यह काम भी पूरा हो गया और दलितों ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से अलग और कई बार तो कांग्रेस के खिलाफ बहुजन समाज पार्टी में अपनी पहचान तलाश ली थी. कांग्रेस के तब तक लगभग स्थाई मतदाता के रूप में पहचाने जाने वाले ब्राह्मण समुदाय ने उसके बाद से नई ज़मीन तलाशनी शुरू कर दी और जब लाल कृष्ण आडवानी का रथ में सोमनाथ से अयोध्या तक दौड़ा तो ब्राह्मणों को एक नया पता मिल गया था.उत्तर भारत में बड़े पैमाने पर वर्ण व्यवस्था के शिखर पर मौजूद सबसे उच्च सामाजिक वर्ग बीजेपी का कोर वोटर बन चुका था. वह व्यवस्था अब तक चालू है. प्रदेश को पहला दलित मुख्यमंत्री देने वाली बसपा 2002 के विधानसभा चुनाव के बाद से ही दलित-ब्राह्मण गठजोड़ पर पूरा जोर लगा रही है. पार्टी ने सतीश चंद्र मिश्र के तौर पर अपना ब्राह्मण चेहरा सामने किया है. पार्टी ने उत्तर प्रदेश में मायावती से पहले सतीश चंद्र मिश्र की सभाएं शुरू कराईं. 2002 में बसपा से ब्राह्मणों को जोड़ने का सेहरा सिर पर बांधे घूम रहे मिश्र ब्राह्मण भाईचारा सम्मेलनों में भाषण की शुरुआत कुछ इस अंदाज में करते हैं, ‘सभी ब्राह्मणों को चरण स्पर्श. जिस तरह त्रेता युग में शबरी और वाल्मीकि ने मिलकर रामराज को सफल किया, वैसे ही पिछली बार ब्राह्मण और दलितों ने मिलकर बसपा सरकार बनाई थी.’2007 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के दौरान मायावती ने ब्राह्मणों को साथ लेने की रणनीति अपनाई और दलित ब्राहमण एकता के बल पर सत्ता पर काबिज़ होने में सफलता पाई. उसके बाद बीजेपी और कांग्रेस उत्तर प्रदेश में बहुत पिछड़ गए. तीसरे और चौथे स्थान की पार्टियों के रूप में संतुष्ट रहने को मजबूर हो गए. लेकिन बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही ब्राहमण प्रभुत्व वाली पार्टियां बनी रहीं. कांग्रेस में आज भी ब्राहमणों का ऐसा दबदबा है कि किसी अन्य जाति के लोगों का अस्तित्व ब्राहमणों की कृपा से ही चलता है.
बीजेपी का राज:- भाजपा की नजर भी कमजोर नहीं है. मंदिर की राजनीति और संघ के स्वयं सेवकों के बल पर प्रदेश में सत्ता के शिखर तक पहुंचने के बाद बुरी तरह लुढ़की भाजपा के लिए भी ब्राह्मण वोटर अहम हैं. पार्टी ने 73 ब्राह्मण मैदान में उतारे हैं. भारतीय जनता पार्टी के पास कलराज मिश्र और मुरली मनोहर जोशी जैसे ब्राह्मण चेहरे हैं. लेकिन इतने ब्राह्मण उतारने के बावजूद पार्टी को समझ नहीं आ रहा कि ब्राह्मण चेहरे के तौर पर किसे पेश करें. भाजपा ने बसपा की तरह सीधे ब्राह्मण सम्मेलन नहीं किया, लेकिन कानपुर में चाणक्य सम्मेलन में मुरली मनोहर जोशी की मौजूदगी के जरिए पार्टी ने अपनी हसरतों के संकेत दिए. पार्टी का दूसरा ब्राह्मण चेहरा कलराज मिश्र हैं. अटल बिहारी वाजपेयी के बाद भाजपा में कौन सबसे बड़ा ब्राह्मण चेहरा है, इस सवाल पर मिश्र ने कहा, ‘वाजपेयी जी पार्टी के शीर्ष नेता हैं. हम विकास की राजनीति करते हैं, न कि समुदाय विशेष की. पार्टी ने ब्राह्मण, ठाकुर, ओबीसी सहित सभी समुदायों को टिकट दिए हैं. हर समुदाय के सहयोग से ही भाजपा सत्ता में आएगी.’ब्राह्मणों का सहयोग कितना अहम है, यह भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में देखा, जिसमें उसकी 10 में से आधी सीटें पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आईं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद, बुलंदशहर, अलीगढ़, महामाया नगर, मथुरा और औरैया जिलों में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या 12 फीसदी या इससे अधिक है. मथुरा में तो 17 फीसदी ब्राह्मण वोटर हैं. भाजपा अब भी अटल बिहारी वाजपेयी के नाम को ही प्रदेश में अपना सबसे बड़ा खेवनहार मान रही है. पार्टी के चुनाव घोषणापत्र पर अटल जी की तस्वीर है और होर्डिंग पर भी वही छाए हुए हैं. शायद इसकी एक वजह यह है कि पार्टी ब्राह्मणों में अटल जी की अपील और उनकी छवि को भुनाना चाहती है. यह दिग्गज नेता मैदान में भले नजर न आए, लेकिन प्रचार का चुनावी झंडा उनके नाम के सहारे ही लहरा रहा है..बीजेपी ने नए नेतृत्व ने शुद्ध रूप से जातियों की नयी प्राथमिकताएं निर्धारित की हैं. ब्राह्मणों के प्रभुत्व वाली पार्टी ने अब उनको दरकिनार करने की योजाना पर काम शुरू कर दिया है. अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी की पार्टी के रूप में पहचान बना चुकी बीजेपी में ब्राहमण प्रभुत्व चौतरफा देखा जासकता है लेकिन अब यह बदल रहा है.

नरेंद्र मोदी ने इस को बदल देने का काम शुरू कर दिया है. अटल बिहारी वाजपेयी की भांजी करूणा शुक्ला को जब पार्टी से अलग करने की योजना बन रही थी तो रायपुर में मौजूद इर रिपोर्टर को साफ़ नज़र आ रहा था कि कहीं कुछ बड़े बदलाव की तैयारी हो रही थी. अब एक बात और नज़र आ रही है कि उन लोगों को भी हाशिये पर ला दिया जाएगा जो अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी के क़रीबी माने जाते हैं . नरेंद्र मोदी की नई सोशल इंजीनियरिंग में ब्राहमणों के खिलाफ अभियान सा चल रहा है. मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, केशरीनाथ त्रिपाठी, कलराज मिश्र सभी हाशिये पर हैं. नरेंद्र मोदी के नए राजनीतिक समीकरणों की प्रयोगशाला में गुजरात में यह प्रयोग जांचा परखा जा चुका है. वहां यह काम बहुत समय से चल रहा है. अब यह काम पूरे देश में किया जा रहा है.
2010 में जब नितिन गडकरी बीजेपी के अध्यक्ष बने थे तो उन्होंने ब्राह्मणों को बहुत महत्व दिया था. सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और अनन्त कुमार सबसे महत्वपूर्ण लोगों में थे. आज इन तीनों को हाशिये पर ला दिया गया है. अरुण जेटली को निश्चित हार का सामना करने के लिए अमृतसर भेज दिया गया है जबकि उनको राज्य सभा में आसानी से बनाए रखा जा सकता था. हो सकता है अब भी वे राज्य सभा में बने रहें लेकिन उनके ऊपर अमृतसर का बोझ लाद देने की योजना पर काम चल रहा है. सुषमा स्वराज ने खुद स्वीकार किया है कि उनकी कुछ नहीं चल रही है. उनकी मर्जी के खिलाफ, उनके ऐलानियाँ विरोध के बाद ऐसे लोगों को टिकट दिया जा रहा है जिनसे पार्टी को नुक्सान हो सकता है लेकिन नरेंद्र मोदी की नई जातीय राजनीति में उन लोगों का इस्तेमाल किया जा रहा है जिनका सुषमा स्वराज विरोध करती हैं. ब्राहमणों को हाशिये पर लाने की नई रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश में मुरली मनोहर जोशी के अलावा केशरी नाथ त्रिपाठी और कलराज मिश्र को भी औकात बताने की कोशिश की गयी है. गुजरात में हरेन पाठक का टिकट काटना भी एक बड़े बदलाव का संकेत है. ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी को मालूम है कि ब्राहमणों को दरकिनार करके ही अन्य सामाजिक वर्गों को साथ लिय जा सकता है. शायद इसीलिए गुजरात कैडर के जिन सिविल सर्विस अफसरों को परेशान किया गया उनमें अधिकतर ब्राहमण ही हैं. संजीव भट्ट, राहुल शर्मा, प्रदीप शर्मा, कुलदीप शर्मा आदि इसी श्रेणी में आते हैं. बीजेपी के बड़े नेता और आर एस एस के करीबी माने जाने वाले संजय जोशी के साथ जो हुआ उसको दुनिया जानती है. मुंबई में हुए किसी बीजेपी सम्मलेन के ठीक पहले उनकी आपत्तिजनक सी डी बंटवा दी गयी थी. बाद में भी उनके खिलाफ अभियान चलता रहा. ऐसा लगता है कि नए लोगों को जोड़ने के लिए बीजेपी की कोशिश है कि वह अपने को ब्राहमणद्रोही के रूप में स्थापित कर सके.
सामाजिक वर्गों की राजनीति को नयी दिशा देने की कोशिश:- साफ़ नज़र आ रहा है कि बड़े पैमाने पर सामाजिक वर्गों की राजनीति को एक नयी दिशा देने की कोशिश हो रही है. अभी अन्य जातियों के लोगों के बीजेपी की तरफ आने की पक्की खबर तो नहीं है लेकिन इतना तय है कि लोकसभा 2014 में ब्राह्मण नेताओं का एक वर्ग बीजेपी के नए नेताओं से नाराज़ है. यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव में यह किस तरह से असर डालता है. जानकार बताते हैं कि जिन नये वर्गों को, खासकर पिछड़े वर्गों और राजपूतों को अपने करीब खींचने में नरेंद्र मोदी अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रहे हैं, वे पहले से ही किसी अन्य राजनीतिक पार्टी के साथ हैं. अभी यह किसी को पता नहीं है कि वे इस काम में कितना सफल होंगें लेकिन यह तय है अब ब्राह्मण नरेंद्र मोदी की बीजेपी से दूर जाने की तैयारी में हैं. यह भी लग रहा है कि इन चुनावों में उसक असर भी स्पष्ट दिखेगा.भारतीय जनता पार्टी ने एक नई तरह की सोशल इंजीनियरिंग को अपनी पार्टी का स्थाई भाव बनाया है. बीजेपी के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब बिहार की एक सार्वजनिक सभा में कहा कि आने वाला समय पिछड़ी और दलित जातियों की राजनीतिक प्रभुता देखेगें तो शुरू में लगा था कि बिहार में पिछड़ी जातियों के राजनीतिक महत्त्व को भांपकर नरेंद्र मोदी ने स्थानीय राजनीति के चक्कर में यह बात का दी लेकिन बाद की नरेंद्र मोदी की राजनीति को बारीकी से देखें पर बात समझ आने लगती है कि उन्होंने सिर्फ दिखावे के लिए यह बात नहीं कही थी.

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz